ब्रेकिंग न्यूज़

अनुच्छेद 370 के प्रभावहीन होने के बाद

अनुच्छेद 370 के प्रभावहीन होने के बाद

5 अगस्त, 2019 में राष्ट्रपति ने राजाज्ञा जारी करके भारत के संविधान के अनुच्छेद 370 को प्रभावहीन कर दिया जिससे जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त हो गया। अनुच्छेद 35ए भी विलुप्त हो गया जो जम्मू-कश्मीर के बाहरी लोगों को वहां जमीन की खरीद-फरोख्त करने से रोकता था तथा राज्य सरकार की नौकरियों में भी बाहरी लोग प्रवेश नहीं पा सकते थे। जम्मू-कश्मीर का संविधान भी भारतीय संविधान में समाहित हो गया। जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019, 31 अक्टूबर, 2019 से जम्मू-कश्मीर राज्य दो केन्द्र शासित प्रदेशों अर्थात् जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख में विभाजित हो जाएगा। जम्मू-कश्मीर केन्द्र शासित प्रदेश में पुडुचेरी की भांति निर्वाचित प्रतिनिधि (विधानसभा सदस्य) होंगे जबकि उपेक्षित लद्दाख विशुद्ध केन्द्र शासित प्रदेश होगा तथा केन्द्र द्वारा उसका संपूर्ण प्रशासन लेफ्रिटनेट गवर्नर के माध्यम से संचालित होगा।

जम्मू-कश्मीर राज्य को लेकर प्रारम्भ से ही समस्याएं आती रहीं। कश्मीर के महाराजा हरि सिंह द्वारा भारत में विलय के करार पर हस्ताक्षर करने पर भी कश्मीर घाटी की जनता अपने लोकप्रिय नेता शेख अब्दुल्ला तथा पाकिस्तानी समर्थक तत्वों के नेतृत्व में इसका विरोध करती रही। वे इस मुद्दे पर जनमत संग्रह चाहते थे जिसका प्रावधान न तो भारत के संविधान में हैं और न ही जम्मू-कश्मीर के संविधान में था। उन्हें राष्ट्रपति का सन् 1954 का आदेश भी संतुष्ट न कर सका जिसमें उन्हें काफी स्वायत्तता दी गई। अधिक स्वायत्तता की मांग करने पर सन् 1955 में शेख अब्दुल्ला को रोक विरोध अधिनियम (पी-डी-) के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिया गया तथा 1964 में जनमत संग्रह की मांग बंद करने के बाद छोड़ा गया। 1965 में भारत की सुरक्षा नियम (डी.आई.आर.) के अंतर्गत उन्हें दुबारा गिरफ्तार करके जम्मू-कश्मीर से बाहर भेज दिया गया। 24 फरवरी, सन् 1975 को इन्दिरा-अब्दुल्ला समझौता के बाद प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी की शक्ति को परख कर जब शेख अब्दुल्ला ने जनमत संग्रह की मांग को छोड़ दिया, तो उन्हें स्वतंत्र कर दिया गया। पर कुछ मतभेदों के चलते अनुच्छेद 370 में कोई परिवर्तन नहीं हुआ और वह अस्थायी प्रावधान ही बना रहा जो 4 अगस्त, 2019 तक वैसे ही रहा। शेख अब्दुल्ला जुलाई 1975 से सन् 1982 में मृत्यु होने तक जम्मू-कश्मीर के मुख्य मंत्री रहे और उन्होंने अनेक जनोन्मुखी कार्य किये जिससे जम्मू-कश्मीर की जनता उनके प्रति कृतज्ञ है पर उनकी मृत्यु के बाद सरकारों के कई दौर चले, बीच-बीच में पृथकतावादी आंदोलन भी चलते रहे जिससे भारतीय संघ परेशान हो गया।

जम्मू-कश्मीर के संवैधानिक इतिहास को दृष्टिगोचर करते हुए यह स्पष्ट है कि जम्मू-कश्मीर को भारतीय संघ में एक विशेष स्थान प्राप्त है जो कि अन्य राज्यों को प्राप्त नहीं है क्योंकि जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय दो शासकों के समझौता से हुआ था पर वह विधि-संगत ढंग से संविधान में नहीं जुड़ सका। वह अस्थायी प्रावधान के रूप में ही जुड़ा।

17

भारत के संविधान में नागालैंड राज्य के सम्बन्ध में अनुच्छेद 371क, आसाम राज्य के संबंध में  अनुच्छेद 371ख, मणिपुर राज्य के संबंध में अनुच्छेद 371ग, सिक्किम राज्य के संबंध में अनुच्छेद 371च, मिजोरम राज्य के संबंध में अनुच्छेद 371छ, अरुणाचल प्रदेश राज्य के संबंध में अनुच्छेद 371ज विशेष उपबंध हैं जबकि गोवा, आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र तथा गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों के लिए भी भारत के संविधान में विशेष उपबंध अर्थात् प्रावधान हैं। संविधान की पांचवीं अनुसूची तथा छठी अनुसूची में उल्लेखित उत्तर पूर्वी राज्यों के लिए विशेष प्रावधानों को और स्पष्ट किया गया है। पांचवीं अनुसूची में जनजाति सलाहकार परिषद् सहित स्वशासी जिला परिषदों एवं क्षेत्रीय परिषदों के गठन की व्यवस्था है। इन सभी संवैधानिक प्रावधानों में संविधान की आत्मा उभर कर आती है कि विशेष क्षेत्रों के लिए विशेष व्यवस्था है। चूंकि कश्मीर घाटी मुसलमान बाहुल्य है तथा वहां आदिवासियों की संख्या भी है, ये प्रावधान जम्मू-कश्मीर के लिए भी संविधान में रखे जा सकते है। जम्मू-कश्मीर के दूर-दराज क्षेत्रों में भी निर्धन भूमिहीन है।

अत: यह भारतीय संघ की नैतिक जिम्मेदारी है कि जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता किसी-न-किसी प्रकार जारी रहे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वयं घोषित किया है कि लद्दाख को निकालकर जम्मू-कश्मीर को शीघ्र राज्य का दर्जा दे दिया जायेगा। यह एक शुभ संकेत है तथा इतने विशाल भू-भाग तथा जनसंख्या के केन्द्रीय शासित क्षेत्र का उचित प्रशासन कठिन है क्योंकि केन्द्र शासित क्षेत्र में जनता के प्रतिनिधियों की आवाज उस प्रकार से मुखर नहीं हो पाती जिस प्रकार राज्य के विधान-मंडल द्वारा उभर कर आती है। इस कारण जम्मू-कश्मीर में और असंतोष बढ़ेगा। द्वितीय केन्द्र शासित क्षेत्र का विकास उस गति से आगे नहीं बढ़ सकता जो एक पूर्ण राज्य का विकास संभव है। दिल्ली के नॉर्थ ब्लॉक सचिवालय के गृह मंत्रालय में बैठे नौकरशाह कलम चलाने में तो माहिर हैं, पर उन्हें जमीनी हालत का ठीक-ठीक संज्ञान न होने के कारण विकास का सम्यक प्रभाव जनता तक नहीं पहुंचेगा। तृतीय जनता अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों से शिकायत-मशविरा करके अपनी अनेक समस्याओं का समाधान कर लेती हैं। यह संभव है कि उत्तर-पूर्वी राज्यों की भांति जम्मू-कश्मीर में भी जमीन सम्बन्धी अधिकारों में स्थानीय स्थायी निवासियों को अग्राधिकार रहे तथा बाहरी व्यक्तियों को केवल आवास के लिए सीमित जमीन खरीदने का अधिकार रहे जैसा जम्मू-कश्मीर से सटे पार्वत्य क्षेत्र हिमाचल प्रदेश में है तथा पार्वत्य क्षेत्र उत्तराखंड में है। उत्तर-पूर्वी राज्य भी पार्वत्य प्रदेश हैं। अत: जम्मू-कश्मीर में भी वैसे विशेष प्रावधानों वाला भूमि अधिनियम बने जिसमें वर्तमान जम्मू-कश्मीर कृषि सुधार अधिनियम, 1976 के भूमि-सुधार सम्बन्धी प्रावधानों को भी स्थान मिले। जिन निर्धनों को सरकारी जमीन के पट्टे मिले हैं, उनके पट्टों के स्थानान्तरण का निषेध रहे जैसा अन्य राज्यों में भी है तथा यह एक उत्तम नीति है। जो भूमिहीन बचे हैं, उन्हें सरकारी जमीनें आवंटित की जायें। इससे ही जम्मू-कश्मीर की सामान्य जनता का भारतीय संघ के प्रति विश्वास एवं भक्ति दृढ़ होगी। हां, राज्य के विकास के लिए नये उद्योगों की स्थापना हेतु सरकार द्वारा विशेष अनुमोदन प्रदत्त हो जैसा कि प्राय: सभी पार्वत्य राज्यों में है ताकि निवेशकर्ता जम्मू-कश्मीर में केवल जमीन की सट्टाबाजी करने के लिए वहां न जाय। यह नया जम्मू-कश्मीर कृषि सुधार अधिनियम राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति से ही बने जैसा कि संविधान की पांचवीं अनुसूची के भाग ख के पांचवें उपबंध में दिया गया है। भविष्य में जम्मू-कश्मीर का छठवीं अनुसूची में रखने पर भी विचार किया जा सकता है यदि जम्मू-कश्मीर के निवासी भारतीय संघ के प्रति अपनी अटूट निष्ठा एवं विश्वास व्यक्त करते हैं। पर जब तक जम्मू-कश्मीर में पृथकतावादी तत्त्वों के सहयोग से पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद जारी रहेगा, उपर्युक्त सुझाव शनै: शनै: ही लागू हो सकेंगे।

अत: समय की आवश्यकता है कि जम्मू-कश्मीर की जनता अपने स्वार्थी राजनीतिक आकाओं के भुलावे तथा आतंकवादियों के भय में न आकर पंचायतों तथा नगरपालिकाओं द्वारा इसी प्रकार स्वशासन की ओर बढ़ती रहे। उसे क्रमश: स्वायत्तता प्राप्त होती ही रहेगी। फिर कश्मीर घाटी की जनता अपने पड़ोसी पाकिस्तान कब्जे वाले कश्मीर की दुर्दशा देख और सुन रही है। आधुनिक काल में राज्य के पास इतनी प्रबल पुलिस तथा सैन्य शक्ति है, कि जनता का कोई भी अवैधानिक या असंवैधानिक आंदोलन टिक नहीं सकता। सीमांकन के दौरान भारत का निर्वाचन आयोग, जम्मू-कश्मीर के लोगों को आपत्तियों एवं सुझावों के लिए विशेष अवसर प्रदान करेगा। दूसरी ओर राज्य शक्ति किसी भी क्षेत्र पर बल और हिंसा के बलबूते पर शासन नहीं कर सकती। विकास ही एकमात्र पथ है। आशा है कि भारत सरकार भी अपनी भविष्य की नीतियों में जम्मू-कश्मीर की जनता की आशा-आकांक्षाओं का पूरा ध्यान रखेगी ताकि जम्मू-कश्मीर स्विट्जरलैंड की भांति भारत का एक विकसित राज्य हो सके।

डॉ. प्रमोद कुमार अग्रवाल

(लेखक अवकाश प्राप्त आई.ए.एस. हैं और उनकी भारत के संविधान पर तीन पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं।)

Leave a Reply

Your email address will not be published.