अबकी बारी भाजपा नड्डा की सवारी

अबकी बारी भाजपा नड्डा की सवारी

समकालीन भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में, जब कई पार्टियां सिर्फ निजी सीमित पार्टी रह जाती हैं, और कुछ अन्य दल एक या दो परिवारों के इर्द-गिर्द घूमते हैं, भारतीय जनता पार्टी अपने दल और लोकाचार में एक ऐसी पार्टी के रूप में निहित रहती है, जो हर बार एक नया नेतृत्व लाती है, समय आने पर पार्टी की कमान संभालने के लिए जमीन से जुड़ा एक नया व्यक्तित्व सामने आता है। इसके परंपरा को कायम रखते हुये, 20 जनवरी, 2020 को, भारतीय जनता पार्टी ने एक बार फिर अपने एक कार्यकर्ता को पार्टी की कमान सौंपी और वह हैं जगत प्रकाश नड्डा। नड्डाजी का जन्म 02 दिसंबर, 1960 को पटना (बिहार) में हुआ था। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा पटना के सेंट जेवियर्स स्कूल से की। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। फिर वह अपने राज्य चले गये और वहां हिमाचल विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री प्राप्त की। इस दौरान, वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की गतिविधियों में बहुत सक्रिय हो गए। इसके माध्यम से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के करीब आए। यहां यह कहना अत्ति आवश्यक है की जब अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, राजनाथ सिंह और अमित शाह जैसी हस्तियों ने पार्टी की कमान संभाली है, तब यह बहुत गर्व के साथ-साथ बहुत जिम्मेदारी की बात भी है। दरअसल, संगठन में सबको साथ लेकर चलने का हुनर ही नड्डाजी को संगठन के शीर्ष पर ले गया। यही वह बुनियादी कौशल है जो नड्डाजी को भाजपा अध्यक्ष के पद तक ले गया। इसके लिए, इस पद पर बैठे व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह संघ और भाजपा के बीच एक सेतु का काम करेगा, जो दोनों संगठनों के बीच समन्वय स्थापित कर सकता हो। मृदुभाषी कहे जाने वाले नड्डाजी छोटे और बड़े के साथ आसानी से सामंजस्य बिठा लेते हैं। वह सबकी सुनते है और वही करते हैं जो देश और पार्टी के हित में है। वह दिखावे और आडंबर से दूर रहते हैं। और इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए की वह दृश्य के पीछे से काम करने में संतुष्ट हैं। जहां तक पार्टी के काम का सवाल है, वह लक्ष्य को पूरा करने और उद्देश्य को हासिल करने में किसी तरह की ढिलाई या लापरवाही बर्दाश्त नहीं करते हैं।

नड्डाजी बीजेपी के अध्यक्ष बन गए हैं, लेकिन उनके सामने कई चुनौतियां हैं। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल ऐसे राज्य हैं जहां भाजपा के राजनीतिक प्रभाव की उपस्थिति कम है। इस पृष्ठभूमि के अंतर्गत, यह कहना उचित है कि नड्डाजी को अपनी संगठनात्मक क्षमता को उन राज्यों में पार्टी के आधार को फैलाने के लिए दिखाना होगा, जहां पार्टी ने आज तक अच्छा प्रदर्शन नहीं किया है। उनके कार्यभार संभालने से ठीक पहले, भारतीय जनता पार्टी अपने एक महत्वपूर्ण राज्य झारखंड में सत्ता से बाहर हो गई थी। दिल्ली में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं जब उन्होंने पार्टी की कमान संभाली। दिल्ली में लोकसभा चुनाव में पार्टी ने सभी सात सीटें जीतीं। इसलिए, दिल्ली में पार्टी को सत्ता में लाने के लिए उनकी जिम्मेदारी बढ़ गयी है। हरियाणा में पार्टी काफी जोड़तोड़ के बाद ही सरकार बना पायी, जबकि महाराष्ट्र में, उसके अपने सहयोगी दल शिवसेना ने बीजेपी के साथ गठबंधन छोड़ दिया, और राज्य में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद भाजपा सत्ता से बाहर है। दिल्ली में जीत दर्ज करने के लिए जहां नड्डाजी पर दबाव होगा, वहीं असंतुष्ट पार्टी कार्यकर्ताओं की शिकायतों को दूर करने की चुनौती है। इसके अलावा, जब नड्डाजी भाजपा के अध्यक्ष बने, तब देश में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। पूरा विपक्ष भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ एकजुट है। सीएए को लेकर मुस्लिम समाज भाजपा के खिलाफ सड़कों पर है। इसलिए, नागरिकता संशोधन अधिनियम की वास्तविक जानकारी से लोगों को अवगत कराना नड्डाजी की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है।

Deepak Kumar Rath

 

  दीपक कुमार रथ

(editor@udayindia.in)

 

 

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