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अल्पसंख्यक कल्याण की राह पर मोदी सरकार

अल्पसंख्यक कल्याण की राह पर मोदी सरकार

26 मई को भारतीय जनता पार्टी संसदीय दल का नेता चुने जाने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पुराने नारे ‘सबका साथ, सबका विकास’ में दो और शब्द जोड़े थे सबका विश्वास.. संसदीय दल का नेता चुने जाने के बाद सांसदों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि उनका भी धन्यवाद जिनका हमने विश्वास जीता है और उनका भी धन्यवाद, जिनका विश्वास अभी हमें जीतना है। नरेंद्र मोदी की राजनीति को जिन्होंने लंबे अरसे से गौर से देखा और समझा है, उन्हें पता है कि इस भाषण और नए नारे के जरिए दरअसल वे नई इबारत लिखने जा रहे हैं।

2014 के पहले तक भारतीय जनता पार्टी को शहरी आधार वोट बैंक के साथ ब्राह्मण-बनिया जातीय आधार वाली पार्टी माना जाता रहा । 2014 में अपने दम पर बहुमत पाने और करीब दो तिहाई राज्यों में सरकार बनाने के बावजूद पार्टी के बारे में ये दोनों ही धारणाएं  चलती रहीं। इन धारणाओं पर आधारित सोच ही थी कि कथित तौर पर वस्तुनिष्ठ और धर्मनिरपेक्ष होने का दावा करने वाले पत्रकारों का मानना था कि 2019 के आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी का आधार वोट बैंक खिसकेगा और केंद्रीय सत्ता से भी उसकी विदाई हो सकती है। लेकिन यहीं पर वे गच्चा खा गए। 2019 में भारतीय जनता पार्टी को सिर्फ आंध्र, केरल और तमिलनाडु को छोड़कर हर राज्य में जीत मिली। दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और गुजरात में तो जैसे उसकी आंधी चली। मध्य प्रदेश, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, असम, उत्तर प्रदेश और ओडिशा में भी उसे भारी समर्थन मिला। इसके साथ ही उसे अपने सहयोगी दलों के साथ महाराष्ट्र और बिहार में भी भारी जीत मिली। जाहिर है कि यह सिर्फ ब्राह्मण-बनिया गठजोड़ की जीत नहीं थी, इसमें शहरी आधार वोट बैंक का ही जोर नहीं चला, भारतीय जनता पार्टी के ग्रामीण वोट बैंक में सात फीसद से ज्यादा बढ़ोत्तरी हुई। जाहिर है कि पिछली केंद्र सरकार की योजनाओं की कामयाबी की बदौलत देश के ग्रामीण इलाकों में भी भारतीय जनता पार्टी का एक बड़ा वोट बैंक बना है।

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ऐसे हालात में जरूरी हो जाता है कि भारतीय जनता पार्टी अपना आधार वोट बैंक में और बढ़ोतरी करे। वैसे भी माना जाता है कि भारतीय जनता पार्टी को अल्पसंख्यकों का समर्थन नहीं मिल पाता है। अल्पसंख्यकों में खासतौर पर मुसलमान समुदाय भारतीय जनता पार्टी को लेकर अब भी उदार नहीं बन पाया है। लेकिन अब भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का मानना है कि सही मायने में देश का विकास तभी हो पाएगा, जब इसमें अल्पसंख्यक समुदाय की भी सक्रिय भागीदारी हो। इसका असर सरकारी योजनाओं पर भी नजर आने लगा है। दूसरी बार मोदी सरकार के शपथ लेने के बाद 12 जून को अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने जिस तरह अल्पसंख्यकों के लिए सरकारी खजाने को खोलने का ऐलान किया, उससे साफ है कि अब भारतीय जनता पार्टी उस अवधारणा को बदलने जा रही है, जो उसके प्रति अब तक बनी रही है। वह अवधारणा है कि भारतीय जनता पार्टी अल्पसंख्यकों की विरोधी है। इसीको आगे बढ़ाते हुए केंद्र सरकार ने अल्पसंख्यक छात्रों को बड़ा तोहफा दिया है। इसके तहत अगले पांच साल में अल्पसंख्यक समुदाय के पांच करोड़ छात्रों को ‘प्रधानमंत्री छात्रवृत्ति’ देने का एलान किया है। इनमें आधी छात्राएं होंगी। अल्पसंख्यकों को लेकर मोदी सरकार की योजनाओं की जानकारी देते हुए अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि स्कूली शिक्षा को बीच में छोड़ देने वाली अल्पसंख्यक समुदाय की बालिकाओं को शिक्षा और रोजगार दिलाने के लिए प्रतिष्ठित शैक्षिक संस्थानों के ब्रिज कोर्ससे जोड़ा जाएगा। भारत में मदरसा शिक्षा को दकियानूसी माना जाता रहा है। सरकार ने इसमें भी बदलाव लाने की दिशा में कदम उठाने की घोषणा की है। इसके तहत मदरसा शिक्षकों को हिन्दी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान, कम्यूटर आदि विषयों का भी प्रशिक्षण दिया जाएगा, ताकि वे अपने छात्रों को मुख्यधारा की भी शिक्षा दे सकें।

केंद्र सरकार ने अल्पसंख्यकों की भलाई के लिए तीन ई-एजूकेशन यानी शिक्षा, इंप्लाइमेंट यानी रोजगार और इम्पावरमेंट यानी सशक्तीककरण के जरिए अल्पसंख्यक छात्राओं के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक सशक्तीककरण बढ़ाने की तैयारी है। अल्पसंख्यकों के बारे में कहा जाता है कि जरूरी सहूलियतें ना मिल पाने के चलते इस समुदाय के छात्र केंद्र और राज्य सरकार की नौकरियों में उचित स्थान हासिल नहीं कर पाते। इसकी तरफ भी अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय ध्यान देने जा रहा है। इसके तहत केंद्र व राज्यै प्रशासनिक सेवाओं, बैंकिंग सेवाओं, कर्मचारी चयन आयोग, रेलवे और दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए आर्थिक रूप से कमजोर अल्पिसंख्यजक युवाओं को नि:शुल्क् कोचिंग दिलाई जाएगी। इसके साथ ही प्रधानमंत्री जनविकास कार्यक्रम के तहत स्कूल, कॉलेज, पॉलिटेक्निक, बालिका छात्रावास, आवासीय विद्यालय, जन सुविधा कें3द्र आदि का निर्माण भी कराने की तैयारी है। अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में केंद्र सरकार’पढ़ो, बढ़ो’ जागरूकता अभियान भी चलाने जा रही है, जहां लोग सामाजिक-आर्थिक वजहों से अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजते हैं। इस अभियान में यूं तो हर बच्चे पर ध्यान दिया जाएगा, लेकिन खास फोकस बच्चियों की शिक्षा पर रहेगा। इसके प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए सरकार नुक्ककड़ नाटक, लघु फिल्में, सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि का आयोजन भी करने की तैयारी में है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस अभियान को पहले साठ अल्पसंख्यक बहुल जिलों में शुरू करने की तैयारी है।

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यह पहला मौका नहीं है, जब मोदी सरकार ने अल्पसंख्यक समुदायों के लिए बड़ा कदम उठाया है। पहले की सरकारें खासतौर पर तुष्टिकरण को ध्यान में रखते हुए अल्पसंख्यक कल्याण की योजनाएं चलाती थीं। लेकिन मोदी सरकार ने खासतौर पर गरीब और कमजोर वर्ग के लिए योजनाएं चलाईं। जिसका फायदा हर वर्ग के गरीब समुदाय को मिला। जैसे उज्जवला योजना, मुद्रा योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना। इन योजनाओं के तहत हर वर्ग के गरीबों को फायदा मिला। इसके पहले भारत सरकार ने सऊदी अरब से  साल 2018 हज समझौते पर हस्ताक्षर किया था। जिसके जरिए सस्ती हज यात्रा के लिए समुद्री मार्ग से हज यात्रियों को भेजने की सिफारिश सऊदी अरब से की थी, जिसे उसने मान लिया है। इसके चलते अगले कुछ सालो में समुद्री रास्ते से हज यात्री जा सकेंगे। माना जा रहा है कि समुद्री जहाजों के जरिए हज यात्रियों को भेजने से यात्रा खर्च में कमी होगी। गौरतलब है कि साल 1995 में मुंबई और जेद्दा के बीच समुद्री मार्ग से हज यात्रा की परंपरा को रोक दिया गया था। इसके साथ ही भारत सरकार की कोशिशों से पहली बार भारत की लगभग 1300 मुस्लिम महिलाएं ‘मेहराम’ (पुरुष साथी) के बिना हज के लिए गईं। सऊदी अरब में इन महिला हज यात्रियों के लिए अलग से रिहायश और गाडिय़ों का इंतजाम किया गया था। पहली बार 100 से अधिक महिला हज सहायकों को सऊदी अरब में महिला हज यात्रियों की सहायता के लिए तैनात किया गया था। मोदी सरकार की कोशिशों से लगतार दूसरे साल भी भारत का हज कोटा बढ़ाया गया। जिसके तहत भारत से रिकॉर्ड एक लाख 75 हजार 25 हज यात्री मक्का गये। दिलचस्प यह है कि इन यात्रियों को कोई हज सब्सिडी भी नहीं दी गई।

वैसे मोदी सरकार की इन योजनाओं से राष्ट्रवादी विचार परिवार के एक वर्ग को नाराजगी है। सोशल मीडिया पर इस वर्ग ने अपना गुस्सा जाहिर करने में देर भी नहीं लगाई। उसका कहना है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार भी अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की नीति पर चल पड़ी है। लेकिन मोदी सरकार की अल्पसंख्यक योजनाओं की खासियत यह है कि सिर्फ यह मुस्लिम समुदाय के लिए नहीं है। भारत की 2011 की जनगणना के मुताबिक हिंदुओं की संख्या जहां 79.8 प्रतिशत है, वहीं मुस्लिम समुदाय की संख्या करीब 14.2 प्रतिशत है। इसी तरह देश की कुल जनसंख्या में करीब 2.3 प्रतिशत ईसाई हैं, जबकि 1.7 प्रतिशत सिक्ख हैं। देश की जनसंख्या में बौद्ध समुदाय की हिस्सेदारी जहां महज दशमलव सात प्रतिशत है, वहीं जैन समुदाय की हिस्सेदारी महज दशमलव चार प्रतिशत है। लेकिन कुछ राज्यों में राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक नजर आ रहे समुदाय बहुसंख्यक हैं। जैसे लक्षद्वीप और कश्मीर में जहां मुस्लिम बहुसंख्यक है, वहीं नगालैंड में ईसाई बहुसंख्यक है। केंद्र सरकार की तैयारी है कि राज्यों ने अपने यहां जिन समुदायों को अल्पसंख्यक घोषित किया है, उनके अल्पसंख्यक कोटा के तहत उनके सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक विकास की राह प्रशस्त की जाए। जाहिर है कि यह दीर्घावधि की योजना है। जिसका फायदा भारतीय जनता पार्टी को तत्काल शायद ही मिल सके। लेकिन इतना तय है कि अल्पसंख्यकों के लिए शुरू की गई योजनाओं से भारतीय जनता पार्टी को लेकर जो अवधारणा है, उसे बदलने की शुरूआत जरूर हो जाएगी।

 

उमेश चतुर्वेदी

 

 

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