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अवश्य करें : सत्यनिष्ठा

अवश्य करें : सत्यनिष्ठा

अत्यधिक सफल जीवन का सबसे प्रमुख लक्षण ईमानदारी ही दिखाई देता है। ऐसी ईमानदारी जो दृढ़, निर्भय और स्थिर हो। जिन लोगों ने अपने आपमें यह गुण विकसित किया है उन सब ने अपने क्षेत्र में अपने प्रतिद्वंदियों की अपेक्षा अधिक सफलता पाई है।

सत्यनिष्ठ मनुष्य जीवन में आने वाली चुनौतियों का सामना कर पड़ सकता है। वह अपने प्रयास इतने आत्मविश्वास के साथ करता है कि उसमें आकर्षण और सफलता दोनों विद्यमान रहते हैं।

यह गुण बहुत कम व्यक्तियों में होता है। किन्तु ऐसा कोई नहीं है जो इसके कारण आकृष्ट न हो। सत्यनिष्ठ व्यक्ति को सभी लोग अपना लेते हैं, विश्वास रखते हैं, भरोसा करते हैं, और उससे मैत्री मानते हैं। किसी मनुष्य के हृदय से इस प्रकार के भाव निसृत होने पर अन्य लोग उसकी सहायता करने की इच्छा करते हैं औस एक समझदारी का वातावरण बनता है। निश्चय ही सत्यनिष्ठा या ईमानदारी ऐसा गुण है जो हर क्षेत्र में मूल्यवान सिद्ध होता है।

सत्यनिष्ठा में केवल यह अच्छाई नहीं है कि उसके कारण हमारे कार्यों में सच्चाई और ईमानदारी आ जाती है वरन उसका प्रभाव इतना गहन है कि उसके कारण अपने इरादों में भी सुंदरता आती है और आकर्षण प्रकट होता है। यदि हमारे विचारों का उद्गम पवित्र है, यदि हम अपने विचारों के अनुसार वीरता के साथ जीवन जी सकें तो वे विचार ही अव्यावहारिक और काल्पनिक हो और कितनी ही असफलताएं मिलें फिर भी हमारे अंदर सत्यनिष्ठा विकसित होगी।

उसके उपरांत हमारे व्यक्तित्व में तेज आयेगा और शांति व्यक्त होगी। अनेक बार असफल होने पर भी, और भयंकर कठिनाईयों का सामना करके भी समाज के द्वारा मिलने वाली निंदा और उपहास के बाद भी हमें महानता प्राप्त होगी। अपने विचारों और आदर्शों के अनुरूप आदर के साथ जीवन जीने की दृढ़ता आयेगी।

विकास ऐसे ही व्यक्तियों का होता है। अन्य लोग तो परिस्थितियों के साथ समझौता कर लेते हैं और हर नई चुनौती के साथ बदलने को तैयार रहते हैं। वे अपनी प्रकृति के असहाय दास बने सदा संघर्ष ही झेलते रहते हैं। वे जगत् को कभी अपनी इच्छा से निर्धारित लक्ष्य की ओर ले जाने के लिए उस पर अधिकार स्थापित नहीं कर पाते। सत्यनिष्ठा मनुष्य ही जीवन और उनकी घटनाओं पर शासन रख सकता है। इसलिए स्वभावत: सभी प्रकार के सफल जीवन की आधारशिला विश्वसनीयता है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि सबके मन में एक महान लक्ष्य है, एक ऊंचा उद्देश्य या कोई विशाल योजना है और यह बहुत अच्छी बात है। किंतु मार्ग में पहली कठिनाई आते ही उसके अनुकूल जीवन जीने का संकल्प और उस दिशा में निरंतर आगे बढऩे का निश्चल हिल जाता है। भर्तृहरि कहते हैं-”कुछ लोग बाधा न आने तक आगे बढ़ते हैं, किन्तु बहुत लोग ऐसे भी होते हैं जो बाधाओं के भय से कोई कार्य हाथ में नहीं लेते।’’

जीवन-पथ पर जब कोई अनपेक्षित घटना घटती है तो दृढ़ता की परीक्षा होती है। उस समय सत्यनिष्ठा की जांच होती है। कभी-कभी यह परीक्षा बड़ी अनुदार और कठोर होती है। किन्तु यदि सत्यनिष्ठा हमारे विश्वास और आदर्श में गहरी जड़ जमाये हैं तो वह खरी सिद्ध होती है। उस समय हम संघर्ष के लिए अधिक सशक्त बन जाते हैं।

जब सत्यनिष्ठा के साथ मनुष्य जीवन के कठिन मार्ग पर आगे बढ़ता है और बाहरी परिस्थितियों पर विजय प्राप्त करता है, तो उसके अंदर नया उत्साह जाग्रत होता है। वह अपने एक संकल्प के पूरे होने पर दूसरा बड़ा संकल्प लेता है। इस प्रकार वह अपने को विशाल बनाता रहता है और अधिक कुशलता अर्जित करता रहता है।

कठिनाईयों के समय भी दृढ़ सत्यनिष्ठा बने रहने वाले पुरूष भी कभी-कभी ढीले पड़ जाते हैं और अपनी प्राप्त की हुई ऊंचाई से नीचे गिर जाते हैं। इस पतन का कारण प्राय: उनके मन में छिपा कोई भय होता है जो किसी प्रकार के उनके अंदर प्रविष्ठ हो गया है। उसका विश्लेषण सावधानी से करने पर ज्ञात होगा कि उसके उत्पन्न होने का कारण हमारे विचारों की अस्पष्टता है, क्षणिक निराशाओं पर विजय पाने की क्षमता का अभाव है और आस-पास के लोगों के कुछ कार्यों या आलोचनाओं के प्रति तटस्थ न रह पाना है। दुर्बल क्षणों में कोई घटना भी हमारे मन के ऊपर भारी बोझ डाल सकती है। चिंता का यह बोझ और उससे होने वाले विक्षेप सत्यनिष्ठा व्यक्ति में अवश्य आ जाते हैं। उसे मानसिक संतुलन रख कर आनी गरति बनाये रखना कठिन हो जाता है।

हम अपने अंदर क्षमा की धारा निरंतर प्रवाहित रखें। उसकी तेज धारा में हमारे आत्मघाती विक्षेप बहे चले जाएंगे। महान उपलब्धियों के लिए अपने आपको सुसज्जित रखने वाला व्यक्ति क्षमाशील ही नहीं वरन् दूसरे के अपराधों को भूल जाने वाला होना चाहिए। उसके साथ काम करने वाले बेईमानों और उपद्रवियों को भी क्षमा करना होगा। सब लोगों के अंदर कार्य करने की सच्ची प्रेरणा न होगी। प्रेरणा होने पर भी सब लोगों में पर्याप्त कुशलता न होगी अथवा उनमें अपने लक्ष्य के प्रति स्थायी निष्ठा न होगी। उन्हें क्षमा कर दें। यदि वे सदा पूर्ववत बुरे ही बने रहते हैं तो उन्हें भूल जाएं। कवि राबर्ट ब्राउनिंग कहते हैं:

Good to forgive, best to forget.

‘क्षमा करना उत्तम है, और भूल जाना सर्वोत्तम’

हमें कोई रोक नहीं सकता। हमें अपने में अनंत साहस, साधन, संपन्नता, त्याग हेतु तत्परता और निरंतर अपने प्रयास में लगे रहने की प्रवृति होनी चाहिए। ये सब गुण भी हमारे हृदय में स्वत: आ बसेंगे यदि हम अपने समस्त कर्म अपने हृदयेश्वर के चरणों में अर्पित करते रहें।

प्रभु चरणों में भक्ति रखने से हमारी सत्यनिष्ठा बढ़ेगी। वे समस्त गुण हमारे अंदर प्रकट होंगे जिनसे महान कार्यों में भी सफलता प्राप्त होती है। याद रखें, जीवन में हमारा सर्वोत्कृष्ठ कर्तव्य निरंतर अपना विकास करते रहना है। विकास की ओर बढ़ रहे जगत की भी यही मांग है। मनुष्येतर जीवन में विकास का रूप शारीरिक था। मनुष्य का शरीर पाकर अब विकास की गति हमारी नैतिकता में, हमारी आध्यात्मिकता में और हमारे सांस्कृतिक सौंदर्य में आनी चाहिए। इसमें शास्त्रों का सतत् नियमित स्वाध्याय और लगन के साथ अखंड साधना सहायक होती है। स्वाध्याय से जीवन-लक्ष्य का ज्ञान होता है और उसे प्राप्त करने का उपाय समझ में आता है। साधना से अपने अंदर वह शक्ति उत्पन्न होती है जिससे हम अपने लक्ष्य को खोज कर उसमें प्रवेश कर सकते हैं। यह हम अवश्य करें।

इस प्रकार अपने जीवन को निर्माण की ओर धीरे-धीरे आगे बढ़ाने में कभी भी ऐसे अवसर आ सकते हैं जब हमारे पैर लडख़ड़ा जायें। ऐसी दशा में हम अपनी त्रुटियों के लिए अपने को क्षमा कर दें और भूल जायें। उसे यार रख कर बार-बार उसकी चिंता करना उचित नहीं हैं। जीवन की महानता का यह अर्थ नहीं कि हमसे कभी भूल न हो, हम कभी गिरे नहीं, कि हमसे कभी भूल न हों, हम कभी गिरे नहीं, वरन उसकी महानता का लक्षण यही है कि हम जब कभी गिरें उठकर शीघ्र आगे चल पड़ें। खुशी से उठ खड़े हों, साहसपूर्वक मार्ग पर आगे बढ़ते रहें, मार्ग पर चलते हुए अपना सिर गौरव के साथ ऊंचा रखें अपने में सदा आत्मविश्वास तथा दृढ़ता रहे।

जीवन के खेल में यदाकदा गिर जाना स्वाभाविक है। यदि हम दुर्बल और अपूर्ण न हो तो अपने को सशक्त और पूर्ण बनाने का प्रयोग क्यों करें। अपनी दुर्बलताओं के कारण कभी-कभी हमारे कार्यों में बड़ी कुरूपतायें दिखाई दे सकती हैं। किन्तु आध्यात्मिक साधक को सदा कीचड़ में लोटते रहना शोभा नहीं देता। हम हर बार कीचड़ के गर्त से खुशी के साथ बाहर निकलें और अपने में साहस रखें। यह अवश्य करें।

कवि एफ वान लोगन की कुछ काव्य पंक्तियों का हिन्दी रूपांतर इस प्रकार हो सकता है:

मानव की ही प्रकृति पाप में पडऩा।

असुर भाव है सदा पाप में सडऩा।।

निज पापों पर महापुरूष ही रोते।

सब पापों को त्याग देवता होते।।

साहस और ईश्वर-प्रार्थना के द्वारा हम यह कर सकते हैं। अपने में सत्यनिष्ठा ला सकते हैं। हम यह अवश्य करें।

…अवश्य करें।

साभार: News Bulletin Chinmaya Mission

 

स्वामी चिन्मयानन्द

 

 

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