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अवैध घुसपैठिया बनाम शरणार्थी

अवैध घुसपैठिया बनाम शरणार्थी

नागरिकता अधिनियम 1955 की धारा 2 (1) (b) illegal migrant अथवा अवैध घुसपैठिए की परिभाषा दी गई है। इसके अनुसार 2(1(b) “illegal migrant” means a foreigner who has entered into India

(i) without a valid passport or other travel documents and such other document or authority as may be prescribed by or under any law in that behalf; or

(ii) with a valid passport or other travel documents and such other document or authority as may be prescribed by or under any law in that behalf but remains therein beyond the permitted period of time.

अर्थात कोई भी विदेशी जो भारत में बिना वैध दस्तावेजों के बिना दाखिल होता है, वह अवैध घुसपैठिया माना जाएगा। ऐसा विदेशी भी जो भारत में दाखिल तो वैध दस्तावेजों के साथ हुआ था लेकिन वीजा की अवधि समाप्त हो जाने के बाद भी भारत में डटा हुआ है, तो वह भी अवैध घुसपैठिया ही माना जाएगा। लेकिन विदेशी कौन है? इसकी परिभाषा foreigners act 1946 में निम्न प्रकार से दी गई है।

२ (a) – foreigner” means a person who is not a citizen of India. इसका अर्थ यह हुआ कि भारत अधिनियम 1947, जब पन्द्रह अगस्त 1947 को लागू हो गया और उसके अनुसार जिस भूखंड को पाकिस्तान का नाम दे दिया गया, तो उस हिस्से में रहने वाले सभी स्वत: ही पाकिस्तान के नागरिक बन गए और भारत के लिए वे विदेशी मान लिए गए। वैसे तो इस अधिनियम को ब्रिटिश संसद ने भारत स्वतंत्रता अधिनियम का नाम दिया था लेकिन इसका सही नामकरण भारत विभाजन अधिनियम 1947 किया जा सकता है। इसलिए भारतीय सन्दर्भों में शरणार्थी की अवधारणा को समझने के लिए जरुरी है कि इस विवाद की जड़ को पकड़ा जाए, क्योंकि बिना जड़ को समझे, शरणार्थीं की अवधारणा को सही परिप्रेक्ष्य में समझा नहीं जा सकता। शरणार्थी को लेकर यह समस्या 1947 में भारत विभाजन के कारण पैदा हुई थी, अब उसके प्रभाव देश की ड्ढशस्र4 श्चशद्यद्बह्लद्बष् पर प्रकट हो रहे हैं। 1947 में इस देश में जानबूझकर एक भयंकर भूकंप लाया गया था, जिससे भारतीय नागरिकता के समानान्तर एक पाकिस्तानी नागरिकता को स्थापित किया गया था। करोड़ों लोगों की भारतीय नागरिकता उनकी इच्छा के बिना छीन ली गई थी। विभाजन से पहले वर्तमान भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश (उस समय पूर्वी पाकिस्तान) के सब लोग भारतीय नागरिक ही थे। लेकिन जुलाई 1947 में इंग्लैंड की संसद ने भारत अधिनियम 1947 पारित किया जिसमें भारत के कुछ हिस्से को काट कर उसे पाकिस्तान का नाम दे दिया गया। कांग्रेस लम्बे अरसे से लोगों को यह आश्वासन दे रही थी कि यदि ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने भारत का विभाजन कर, देश के  एक हिस्से के लोगों की भारतीय नागरिकता समाप्त करने की साजिश की तो कांग्रेस उसका विरोध करेगी। लेकिन दुर्भाग्य से नेहरु के नेतृत्व में कांग्रेस ने ब्रिटिश संसद द्वारा पारित इस विभेदकारी विधेयक का विरोध करने की बजाए उसको स्वीकार कर लिया। इसका कारण स्पष्ट था। यदि कांग्रेस ब्रिटिश संसद द्वारा पारित यह अधिनियम स्वीकार न करती तो अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालने का आन्दोलन कुछ और लम्बा चल सकता था और तब प्रधानमंत्री बनने के लिए या तो नेहरु इस दुनिया में न रहते या फिर इतने बुजुर्ग हो जाते कि प्रधानमंत्री बनना सम्भव ही न होता। (बाद में पंडित जवाहर लाल नेहरु ने इसे स्वयं स्वीकार भी किया) कांग्रेस के सत्ता के इस लालच ने इस विधेयक के स्वरुप को लेकर संघर्ष नहीं करने दिया, बल्कि उसने घुटने टेकने की रणनीति बना ली। इस विधेयक के पारित होने से केवल पाकिस्तान नाम का एक नया देश ही नहीं बना बल्कि करोड़ों लोगों की भारतीय नागरिकता भी छिन गई। अब ये करोड़ों भारतीय नागरिक,  पाकिस्तानी नागरिक हो गए थे। इन करोड़ों नागरिकों में मुसलमान भी थे और हिन्दू-सिख भी थे। लेकिन यहां एक बात ध्यान में रखनी चाहिए की पाकिस्तान के हिस्से में जो नागरिक आए, उनमें से कुछ ऐसे थे जो पाकिस्तान बनाए जाने के लिए प्रयास कर रहे थे या फिर उन प्रयासों के समर्थक थे। इसलिए वे तो अपनी इस नई पाकिस्तानी नागरिकता से प्रसन्न थे। लेकिन बहुत से लोग ऐसे भी थे जो विभाजन के इन प्रयासों का विरोध कर रहे थे। विरोध करने वालों में अधिकांश हिन्दु व सिख ही थे। लेकिन अब उनको भी उनकी इच्छा के विपरीत पाकिस्तानी नागरिक मान लिया गया था।

इस विधेयक के बनने से जो व्यवहारिक परिणाम हुए, उन्हें सारणीबद्ध किया जा सकता है -

  1. भारत के कुछ हिस्से को, जिसमें पूर्वी बंगाल और पश्चिमोत्तर भारत का सप्त सिन्धु क्षेत्र शामिल था, को एक नया नाम पाकिस्तान दिया गया और उसे अलग प्रभुसत्तावादी सम्पन्न देश घोषित किया गया। वैसे भी इस विभाजन का सर्वाधिक प्रभाव बंगाल और सप्त सिन्धु क्षेत्र पर ही पड़ा था क्योंकि भारत के यही दो क्षेत्र थे जिनका विभाजन किया गया था। सप्त सिन्धु क्षेत्र का पंजाब प्रदेश  विभाजित हुआ था, लेकिन उसके शेष तीन प्रदेश सिन्ध, बलूचिस्तान और पश्चिमोत्तर सीमान्त प्रान्त तो  पूरे के  पूरे  पाकिस्तान के हिस्से आ गए थे।
  2. इस भूखंड में रहने वाले सभी भारतीय नागरिको को बिना उनकी राय जाने पाकिस्तानी नागरिक घोषित कर दिया गया।
  3. इन नई पाकिस्तानी नागरिकों में, खास कर सप्त सिन्धु क्षेत्र में (जिसे पश्चिमी पाकिस्तान कहा गया था) अधिसंख्य लोग ऐसे थे जिनके पुरखे सल्तनत काल या मुगल काल में इस्लाम मजहब में मतान्तरित हो चुके थे। उन्होंने इस नई पाकिस्तानी नागरिकता को सहर्ष स्वीकार कर लिया।
  4. लेकिन ऐसे लोग भी थे जिनके पुरखॉ ने सल्तनत काल या मुगल काल में इस्लाम मजहब को स्वीकार नहीं किया था। इसलिए विभाजन के बाद भी उन्होंने अपनी भारतीय नागरिकता को छोडऩे से इन्कार कर दिया। अब उनके पास दो ही विकल्प बचे थे

(1) प्रथम विकल्प था कि वे अपने पुरखों का पंथ छोड़ कर इस्लाम में मतान्तरित हो जाएं और नई पाकिस्तानी नागरिकता को स्वीकार कर लें।

(2) द्वितीय विकल्प था कि वे अपना गांव या शहर छोड़ कर बचे हुए भारत भूखंड में आ जाएं और अपनी भारतीय नागरिकता को बरकरार रखें। लेकिन दूसरे विकल्प में खतरे अनेक थे। सबसे पहले तो अपनी सारी सम्पत्ति, जमीन जायदाद छोड़कर आना पड़ता। दूसरा वे लोग जिनके पुरखो ने इस्लाम मजहब स्वीकार कर लिया था और अपने आपको मुसलमान कहने लगे थे, अब उन्होंने नई पाकिस्तानी नागरिकता को भी सहर्ष स्वीकार कर लिया था, वे इनकी बहन बेटियों को भारत जाने नहीं दे रहे थे। प्रवास के समय मारकाट तो शुरु हो ही गई थी, इसलिए भारतीय नागरिकता को बचाते-बचाते भारत पहुंच भी पाएंगे या नहीं, इसका कोई भरोसा नहीं था।

(3) लेकिन तमाम खतरों के होते हुए भी लाखों लोगों ने अपनी भारतीय नागरिकता को बचाने के लिए जोखिम भरा दूसरा रास्ता ही चुना। इन लोगों की सप्तसिन्धु के मैदानों से दिल्ली की ओर की गई यह यात्रा महाभयानक यात्रा मानी जाती है। यह यात्रा प्राण हथेली पर रख कर ही की जा सकती थी। लेकिन इन हिन्दु सिखों ने ये सारे खतरे उठाए और शेष बचे हिन्दुस्तान (जिसे संविधान में भारत दैट इज इंडिया कहा गया है ) की ओर चल पड़े। उनमें से कुछ तो अपनी भारतीय नागरिकता को बचाते हुए हिन्दुस्तान पहुंच गए और दूसरे उसकी आशा में रास्ते में ही मार दिए गए। यह अलग बात है कि भारतीय नागरिकता बरकरार रखने के लिए हिन्दुस्तान आ रहे इन हिन्दू-सिखों को कांग्रेस बार बार यह सलाह दी रही थी कि वे भारत न आएं और पाकिस्तान में ही रहें और अपनी नई पाकिस्तानी नागरिकता को सहर्ष स्वीकार कर लें। लेकिन लाखों की संख्या में पूर्व की ओर आ रहे हिन्दू-सिखों ने कांग्रेस की सलाह नहीं मानी बल्कि अपनी भारतीय नागरिकता को बचाए रखने के लिए अपने प्राण देना बेहतर समझा। यह प्रक्रिया दोनों और से हो रही थी। विभाजित पंजाब के पूर्वी हिसे से इस्लाम पंथ को मानने वाले भारतीय नागरिक पश्चिमी पंजाब को जा रहे थे ताकि नई बनी पाकिस्तानी नागरिकता ग्रहण कर सकें। उनमें से भी कुछ पाकिस्तान पहुंच  गए और कुछ रास्ते में ही मारे गए। इस प्रकार दोनों ओर से ऐसे मरने वालों की संख्या दस लाख तक के आसपास कही जाती है। जहां तक पंजाब का प्रश्न था, पाकिस्तान के हिस्से में आ गए पश्चिमी पंजाब से अधिकांश हिन्दू सिख, अपनी भारतीय नागरिकता को बचाने के लिए पूर्वी पंजाब में आ गए। लेकिन बहुत से हिन्दू-सिख या तो आने की स्थिति में नहीं थे या फिर नई पाकिस्तानी सरकार ने उन्हें आने नहीं दिया। यही स्थिति सिन्ध, बलूचिस्तान और सीमान्त प्रान्त या खैबर पख्तूनख्वा की थी। पूर्वी पंजाब से लगभग सभी मुसलमान पाकिस्तानी नागरिकता प्राप्त करने के लिए पश्चिमी पंजाब में चले गए। लेकिन भारत के उन प्रदेशों जिन का विभाजन नहीं हुआ था, में से भी, खासकर बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों मसलन भोपाल आदि से इस्लाम को मानने वाले अनेक भारतीय नागरिक, अपनी भारतीय नागरिकता स्वेच्छा से त्यागकर पाकिस्तान चले गए ताकि उनको पाकिस्तानी नागरिकता मिल जाए।

शुरु के कुछ वर्षों में तो भारत सरकार ने पाकिस्तान से हिन्दू सिखों को भारत में आने दिया लेकिन बाद में उनको आने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। इतना ही नहीं उनके आने में अड़चनें भी डालना शुरु कर दीं। वैसे जिन्ना ने भी पाकिस्तान के हिन्दू सिखों को धोखे में रखने का प्रयास किया ही था। उसने पाकिस्तान की संविधान सभा में एक बहुत ही सैक्युलर टाइप का भाषण देकर भारत में कांग्रेस वालों की वाहवाह लूटी थी। लेकिन उस भाषण के बाद ही पूर्वी पाकिस्तान में हिन्दुओं को बलपूर्वक मतान्तरित करने का काम तेजी से शुरु हो गया था। वैसे भी अपने जन्म के कुछ अरसे बाद ही पाकिस्तान ने अपने आप को इस्लामी गणराज्य घोषित कर दिया था, जिसका अर्थ स्पष्ट था कि मूलत: पाकिस्तान इस्लाम मत को स्वीकारने वाले लोगों का देश है। इससे पूर्वी पाकिस्तान से हिन्दू हिन्दुस्तान की ओर भागने लगे और कांग्रेस सरकार उन्हें हिन्दुस्तान में आने नहीं दे रही थी। इससे बंगाल में गुस्सा था। अब तक जिन्ना भी सुपुर्दे-ख़ाक हो चुके थे। पूर्वी बंगाल के हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों और उन्हें बलपूर्वक मतान्तरित किए जाने से विधि मंत्री जोगेन्द्र नाथ मंडल भी सकते में आ गए थे। वे बार-बार प्रधानमंत्री से इसे रुकवाने के लिए कह रहे थे। लेकिन स्थिति यह हो गई कि उन्हें अपने प्राण बचाने के लिए खुद ही भाग कर हिन्दुस्तान आना पड़ा। इससे सहज ही अन्दाजा लगाया जा सकता है कि आम हिन्दुओं की हालत कैसी होगी? जाहिर है इससे मंत्रिमंडल में मतभेद उत्पन्न होता। तात्कालिक उद्योग मंत्री डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने नेहरु के इस व्यवहार का सख़्त विरोध किया। उनका कहना था कि कांग्रेस ने अपने सत्ता के लालच में पहले तो इन हिन्दुओं की भारतीय नागरिकता छीन ली और जब वे पाकिस्तान के मज़हबी अत्याचार से बचने के लिए भारत आना चाहते हैं तो नेहरु उन्हें घुसपैठिए की संज्ञा दे रहे हैं। तगड़ा मारे भी और रोने भी न दे। चारों ओर से पड़ रही फटकार से बचने के लिए नेहरु ने इसको लेकर पाकिस्तान के उस समय के खान प्रधानमंत्री लियाकत अली से एक समझौता कर लिया, जो उपर से देखने पर लगता था कि पूर्वी पाकिस्तान के हिन्दुओं के अधिकारों की रक्षा करने वाला है लेकिन व्यवहारिक रूप से वह पूर्वी पाकिस्तान से हिन्दुओं के निकल आने के रास्ते बन्द करता था। इससे नाराज होकर नेहरु मंत्रिमंडल के उद्योग मंत्री डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने तो त्यागपत्र ही दे दिया और इसे कांग्रेस द्वारा  हिन्दुओ से किया गया दूसरा विश्वासघात बताया। यहां तक कि जब कुछ साल बाद बाबा साहिब आम्बेडकर ने नेहरु मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दिया तो उन्होंने अपने वक्तव्य में यह भी कहा कि नेहरु को कश्मीर के मुसलमानों की ज़्यादा चिन्ता है और वे पूर्वी बंगाल के हिन्दुओं की ओर तनिक ध्यान नहीं दे रहे जिन की स्थिति बहुत ही दयनीय होती जा रही है। लेकिन अब तक कांग्रेस सरकार की नजर में ये हिन्दु सिख अवैध विदेशी घुसपैठिए हो गए थे।

अफगानिस्तान का हिन्दू-सिख समाज

जैसा कि उपर संकेत किया गया है, जब भारत को विभाजित करने की योजना, ब्रिटेन ने प्रस्तावित की और कांग्रेस ने स्वीकृत की तो करोड़ों भारतीयों की भारतीय नागरिकता छिन गई। पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त या खैबर पख्तूनवा के भारतीय नागरिक, जिनको शेष बचा हिन्दुस्तान दूर पड़ता था, पाकिस्तान छोड़ कर पड़ोसी अफगानिस्तान में चले गए। बहुत से भारतीय पहले ही अफगानिस्तान में रहते थे। इनमें से अधिकांश भारतीय, पंजाबी खत्री थे और अफगानिस्तान के शहरों में व्यवसाय करते थे। उन दिनों अफगानिस्तान कट्टरता की मार में नहीं आया था। अफगानिस्तान में 1500 में दश गुरु परम्परा के प्रथम गुरु श्री नानक देव जी भी गए थे। बड़े शहरों में कुछ गुरुद्वारे व मंदिर भी थे/हैं जिनमें ये हिन्दू-सिख परम्परा से पूजा पाठ करते थे। लेकिन अफगानिस्तान पर रूस के आक्रमण के बाद अफगानिस्तान में इन हिन्दू-सिखों के लिए हालात बदलने लगे। रुस की सेना से लडऩे के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान के साथ मिल कर मुजाहदीनों की फौज तैयार की। इन मुजाहिदीनों ने रूस को तो अफगानिस्तान से निकाल दिया लेकिन उसके बाद पूरे अफगानिस्तान में एक प्रकार से मध्यकालीन शरीयत व्यवस्था लागू कर दी। इसके शिकार अफगानिस्तान के ये हिन्दू-सिख हुए जो इस्लामपंथी नहीं थे। मुजाहिदीन अफगानिस्तान को सही अर्थों में दारुल इस्लाम बनाना चाहता था। इसलिए उसके पहले शिकार ये हिन्दू-सिख ही हुए। उनके आगे एक ही रास्ता बचा था, इस्लाम में मतान्तरित होकर  मुसलमान बन जाने का। उनके पुरखों ने महमूद गजनवी से लेकर मुगल काल तक का समय देखा था लेकिन अपनी आस्था और विरासत नहीं छोड़ी थी। अब लगता था इतिहास घूम फिर कर वापिस उसी चौराहे पर पहुंच गया था। मुजाहिदीनों ने मंदिर गुरुद्वारे गिराने शुरु कर दिए। हिन्दू-सिखों की महिलाएं का अपहरण शुरु हो गया और उनको जबरदस्ती मुसलमान बना कर उनकी मुसलमानों से शादियां की जाने लगीं। हिन्दू-सिखों की सामूहिक हत्याएं आम बात हो गई। अफगानिस्तान में हिन्दुओं और सिखों के लिए सबसे बड़ी समस्या मृतकों के दाह संस्कार की हो गई थी। शमशान घाटों पर कब्जा कर लिया गया था। मजाहदीन और तालिबान मृतकों का दाह संस्कार करने की अनुमति ही नहीं देते थे बल्कि वे मृतक को दबाने के लिए दबाब डालते थे। अनेक बार तो ऐसा हुआ कि कट्टरपंथियों ने चिता पर आकर पत्थरबाजी करनी शुरु कर दी। हिन्दू-सिखों के बच्चों का स्कूलों में जाना मुश्किल हो गया। सार्वजनिक स्थानों पर हिन्दू-सिखों को अपनी पहचान बताने के लिए विशेष चिन्ह धारण करना अनिवार्य कर दिया गया था। वे अपना मजहब बदल कर वहां आराम से रह सकते थे और अपना व्यवसाय भी कर सकते थे। लेकिन वे उस दश गुरु परम्परा के अनुयायी थे, जिस परम्परा के गुरुओं ने अपना शीश कटवा लिया लेकिन अपना धर्म नहीं छोड़ा। इस लिए वे अपना करोड़ों का व्यवसाय और सम्पत्ति छोड़ कर एक-एक कर कुछ दिनों के लिए भारत का वीजा लेकर भारत पहुंचने लगे। वे दिल्ली और पंजाब के कुछ शहरों में आकर ठहर गए। वीजा समाप्त हो गया। पासपोर्ट अफगानी है। कानून वापिस अफगानिस्तान जाने के लिए कह रहा है। लेकिन वे अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में खड़े होकर अमरदास कर रहे हैं कि उन्हें भारतीय नागरिकता मिल जाए। जबकि कायदे से देखा जाए तो यह उनका अधिकार है। उस अधिकार के लिए भी वे भीख मांग रहे हैं।

शरणार्थीं की परिभाषा जरुरी थी – ऐसी हालत में विभाजन के बाद की उपजी परिस्थितियों का न्याय पूर्ण समाधान करने के लिए भारत सरकार को अधिनियमों में शरणार्थी की परिभाषा भी निर्धारित करनी चाहिए थी, जो उसने नहीं की। लेकिन शरणार्थीं और अवैध विदेशी घुसपैठिए में अन्तर करने की जरुरत और भी बढ गई जब बंगलादेश ने भी अपने निर्माण के कुछ साल बाद ही स्वयं को इस्लामी राज्य घोषित कर दिया था। स्वभाविक ही इससे अन्य मतावलम्वियों का जीवन दुष्कर हो गया। इसलिए वहां से भारत में येन-केन-प्रकारेण आने वाले हिन्दुओं की संख्या में इजाफा होने लगा। बाद में तो वहां से मुसलमानों मे भी लाखों की संख्या में अनेक कारणों से भारत में अवैध तरीके से आना शुरु कर दिया। इतना तो निश्चित था कि इस्लामी गणतांत्रिक बंगलादेश में मजहबी कारणों से मुसलमानों का उत्पीडऩ नहीं हो रहा था। लेकिन इसके बाबजूद उनकी भारत में घुसपैठ जारी थी। वैसे भी,अवैध घुसपैठिए और शरणार्थी में अन्तर किया जाना चाहिए, इसकी मांग 1947 के बाद से ही चल रही थी। इसमें तो कोई शक ही नहीं कि इन दोनों में जमीन आसमान का अन्तर है। नागरिकता अधिनियम 1955 में, अवैध विदेशी घुसपैठिए की तो स्पष्ट परिभाषा दी हुई है लेकिन दुर्भाग्य से शरणार्थीं का नाम तक नहीं लिया गया है। इसी के कारण अवैध विदेशी और शरणार्थी एक ही रस्सी से खूंटे पर बंधे दिखाई दे जाते हैं।  इधर भारत सरकार अपने अधिनियमों में शरणार्थी को पारिभाषित नहीं कर रही थी, उधर मजहबी कारणों से सताए पाकिस्तानी और बांग्लादेशी हिन्दू-सिखों की संख्या भारत में प्रतिदिन बढती जा रही थी। ये वापिस बांग्लादेश या पाकिस्तान नहीं जा सकते थे क्योंकि वहां न इनका जीवन सुरक्षित था और न ही मजहब। यहां तक कि इनकी बहू-बेटियां भी सुरक्षित नहीं थीं। इसलिए पाकिस्तान और बांग्लादेश से गैर मुसलमानों का भारत की ओर पलायन किसी न किसी रूप में निरन्तर जारी रहा। कालान्तर में जब अफगानिस्तान पर मुजाहिदीन का शासन स्थापित हो गया तो वहां से भी हिन्दु-सिखों का पलायन भारत की ओर शुरु हो गया। इस प्रकार 31 दिसम्बर 2014 तक ( जिसे भारत सरकार ने कट डेट स्वीकार किया है) पाकिस्तान, बंगला देश और अफगानिस्तान से भाग कर आए हुए हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, मसीही और पारसियों की संख्या हजारों में हो गई थी लेकिन नागरिकता के बिना उनका और उनके बच्चों का भविष्य ही अंधकार मय नहीं था बल्कि वे कानून की नजर में अपराधी होने के कारण अनेक मामलों में दंडित भी हो रहे थे। कुछ गिरोह उनकी विवशता का लाभ उठा कर उन्हें ब्लैकमेल भी कर रहे थे।

इस पृष्ठभूमि का उल्लेख गृहमंत्री अमित शाह ने चार दिसम्बर 2019 को संसद में नागरिकता संशोधन बिल प्रस्तुत करते हुए भी किया था। अब क्योंकि भारत में आने वाले ये लोग बिना वैध दस्तावेजों के हैं, इसलिए कानूनन तो ये अवैध घुसपैठिए हुए। इसलिए ये भारत के नागरिकता अधिनियम की धारा 5 और 6 के अन्तर्गत भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन भी नहीं कर सकते थे। इसके विपरीत इन पर Passport (Entry into India) Act, v~w® and the Foreigners Act, 1946 के अनुसार दंडित किया जा सकता था। लेकिन Passport (Entry into India) Act, 1920 की धारा 3 के अन्तर्गत भारत सरकार को यह अधिकार भी है कि वह इस अधिनियम के उल्लंघन करने वाले किसी व्यक्ति या समूह को इसके प्रभाव से मुक्त भी कर सकती है। भारत सरकार ने उस अधिकार का उपयोग करते हुए 2015 और 2016 में पाकिस्तान व बंगला देश से आने वाले अल्पसंख्यकों को इस दंड से मुक्त भी किया था। इतना ही नहीं भारत सरकार ने ऐसे अल्पसंख्यकों को भारत में लम्बी अवधि का वीजा देने का प्रावधान भी किया ताकि उन्हें बलपूर्वक पाकिस्तान या बंगला देश न भेजा जा सके।

यह ठीक है इससे भारत में आए शरणार्थियों को कुछ सीमा तक राहत मिली लेकिन अनिश्चय की तलवार अभी भी उन पर लटक रही थी। इस समस्या का एक ही समाधान हो सकता था यदि पाकिस्तान और बांग्लादेश से आए इन हिन्दु सिखों को उनकी मूल भारतीय नागरिकता वापिस दे दी जाती। वे नया कुछ नहीं मांग रहे थे बल्कि अपनी पुरानी नागरिकता की वापिसी की ही मांग कर रहे थे जो बिना उनकी मर्जी से छीन ली गई थी। इनको इनकी भारतीय नागरिकता वापिस देने की बजाए सरकार ने इन पर विविध धाराओं के अन्तर्गत केस चला रखे थे जिसके कारण ये भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन भी नहीं कर सकते थे। इन परिस्थितियों को देखते हुए सरकार ने नए प्रावधान करने का निर्णय किया।

भारत की नागरिकता लेने के लिए फिलहाल नागरिकता अधिनियम 1955 की धारा 5 के अन्तर्गत आवेदन करना पड़ता है। लेकिन इस धारा के अन्तर्गत आवेदक को सिद्ध करना होता है कि वह भारतीय मूल का है। बहुत से शरणार्थियों के पास इसका प्रमाण नहीं होता। अत: वे धारा 6 के अन्तर्गत नागरिकता हेतु आवेदन करते हैं। धारा 6 में आवेदन करने वाले आवेदक के लिए अनिवार्य है कि उसे भारत में रहते बारह साल हो गए हों, जिसके कारण अनेक आवेदक, आवेदन देने के अयोग्य हो जाते हैं। इस अड़चन को दूर करने के लिए सरकार ने नए प्रावधान बनाए।

इस व्यवहारिक परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए अन्तत: गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में चार दिसम्बर 2019 को नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 को प्रस्तुत किया। इस विधेयक में मुख्य रूप से 31 दिसम्बर 2014 तक पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान से किसी प्रकार से भी भारत में प्रवेश कर चुके हिन्दू, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध और पारसी अल्पसंख्यकों को अवैध विदेशी घुसपैठिए न मान कर उन्हें शरणार्थी का दर्जा दिया गया। उसके उपरान्त उनको उनकी 1947 से पहले की भारतीय नागरिकता वापिस देने का प्रावधान किया गया। संसद से पारित हो जाने के बाद राष्ट्रपति ने नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 पर 12 दिसम्बर 2019 को हस्ताक्षर कर दिए। इस अधिनियम से उन लाखों, हिन्दू-सखों बौद्धों जैनों, पारसियों और ईसाइयों के लिए भारतीय नागरिकता लेने का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा जो पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान से दर-ब-दर हो कर केवल अपने धर्म और विरासत की रक्षा के लिए संकट झेल रहे थे।

प्रो. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

(लेखक हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला, के कुलपति हैं)

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