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अवैध घुसपैठियों की पहचान जरूरी

अवैध घुसपैठियों की पहचान जरूरी

असम में एनआरसी की फाइनल लिस्टक में 19 लाख से अधिक लोगों को जगह नहीं मिली है। इन लोगों को विदेशी ट्रिब्यू्नल में जाने का मौका दिया गया है। अभी न तो इन्हें विदेशी घोषित किया जाएगा और न ही डिटेंशन सेंटर भेजा जाएगा। दूसरी ओर, इस मामले को लेकर देश भर से प्रतिक्रियाएं आई हैं। सरकार जहां एनआरसी का बचाव कर रही है, वहीं विपक्षी दलों के नेता सरकार की नीयत पर शक जाहिर कर रहे हैं। कांग्रेस ही नहीं बल्कि बीजेपी के कुछ नेताओं ने भी लिस्ट पर सवाल उठाए हैं।

एनआरसी पर एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी और भारतीय जनता पार्टी के नेता हेमंता बिस्वा शर्मा ट्विटर पर भिड़ गए। दरअसल, असदुद्दीन ओवैसी ने एक ट्वीट किया। इसमें एक ट्वीट को उन्होंने रिट्वीट किया और साथ में हेमंता बिस्वा शर्मा को टैग करते हुए उनपर निशाना साधा। ओवैसी ने ट्वीट किया, है कि कैसे असम में एनआरसी का इस्तेमाल मुसलमानों को बाहर करने के लिए किया जा रहा है। दूसरी तरफ हेमंता बिस्वा का कहना है कि ऐसे या वैसे किसी भी तरह हिंदुओं की रक्षा की जाएगी। औवेसी के जवाब में हेमंता बिस्वा शर्मा ने कहा, अगर भारत हिंदुओं की रक्षा नहीं करेगा तो उनकी रक्षा कौन करेगा? पाकिस्तान? भारत सदैव सताए हुए हिंदुओं का घर रहेगा, भले ही आप इसके विरोधी हों सर।

इस पर फिर ओवैसी ने जवाब दिया। उन्होंने ट्वीट करके कहा, भारत को सभी भारतीयों की रक्षा करनी चाहिए, केवल हिंदुओं की नहीं। दो-राष्ट्र सिद्धांत के उपासक कभी भी यह नहीं समझ सकते कि यह देश एक विश्वास की तुलना में बहुत बड़ा है। संविधान कहता है कि भारत सभी धर्मों, जातियों और जातियों के साथ समान व्यवहार करेगा। यह हिन्दू राष्ट्र नहीं है, इंशाल्लाह यह कभी भी नहीं होगा।

अपने अगले ट्वीट में उन्होंने कहा, हम ऐसे देश हैं जिन्होंने कई उत्पीडि़त समुदायों (हिंदुओं और गैर-हिंदुओं) का स्वागत किया है, वे संभावित नागरिक नहीं हैं। धर्म कभी भी नागरिकता का आधार नहीं हो सकता। हमारे पूर्वजों ने इसे अस्वीकार कर दिया जब उन्होंने संविधान का मसौदा तैयार किया और गोडसे की औलाद इसे इतनी आसानी से बदल नहीं सकती।

भारतीय राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की फाइनल सूची आने वाले समय में असम में कई परेशानियां खड़ी कर सकती है। सबसे खतरनाक यह है कि नागरिकता बिल को लेकर राज्य में सांप्रदायिक माहौल बनाया जा रहा है, जिसमें बाहरी और राज्य का नागरिक कौन है इसकी बात होने लगी है।

एनआरसी की अंतिम सूची में 19 लाख लोगों को बाहर कर दिया गया है। इन लोगों में लाखों हिन्दू है। लेकिन अनुमान लगाया जा रहा था कि बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोग इस सूची में शामिल होंगे। इसके बाद नए तरह की सामाजिक और राजनीतिक बहस शुरू हो गई है। सूची से बाहर लोगों में ज्यादातर बंगाली हिन्दू समुदाय के हैं। बाकी लोगों में नेपाली, मारवाड़ी और जनजातीय समुदाय के लोग भी शामिल है। असम सरकार में काम करने वाले एक सूत्र ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि जितने भी लोग सूची से बाहर किए गए हैं, उनमें से 50 फीसदी इन्हीं समुदाय के हैं।

ऐसी स्थिति में भाजपा सरकार एक बार फिर से राज्य में नागरिकता बिल लाने की कोशिश करेगी, ताकि सूची से बाहर हुए हिन्दू लोग राज्य के नागरिक बने रहें। पिछली बार राज्यसभा में बहुमत न होने के कारण नरेंद्र मोदी सरकार ये बिल पास नहीं करा सकी थी। उस समय असम के लोगों ने इस बिल का विरोध किया था।

2016 का नागरिकता संशोधन बिल 1955 के बिल में संशोधन की बात करता है। इस बिल के तहत अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से गैर-कानूनी रूप से आए हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी  लोगों को भारत का नागरिक माना जाएगा। अगर यह बिल आ गया तो एनआरसी की सूची से बाहर हुए हिन्दू लोगों को राज्य का नागरिक मान लिया जाएगा। जिसके बाद सिर्फ मुस्लिम लोगों को ही बाहरी कहा जाएगा। नागरिकता बिल को दोबारा लाने के लिए एक बार फिर से आवाज तेज हो जाएगी। बंगाली हिन्दू लोग इस बार इसके लिए मांग कर सकते हैं।

राज्य में काफी लंबी समय से बाहरी लोगों को निकाले जाने की बात हो रही थी। लेकिन सूची के आने के बाद राज्य के बंगाली हिंदुओं को ही सूची से बाहर कर दिया गया। एनआरसी  सूची से काफी बंगाली भाषी हिन्दू को बाहर कर दिया गया है।

नालबाड़ी के एक कॉलेज छात्र का कहना है, ‘हम हिन्दू हैं। सरकार को हमें नागरिकता दे देनी चाहिए। असमी लोगों को कोई दिक्कत नहीं है कि ज्यादातर मुस्लिम लोग बांग्लादेशी हैं।’

एक अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, ‘बहुत सारे बंगाली हिन्दू मेरे पास आ रहे हैं और पूछ रहे हैं कि आगे क्या होगा। लेकिन हमें भी आगे के बारे में ज्यादा कुछ नहीं पता है।’

इस साल की शुरुआत में जब भाजपा सरकार ने बिल लाने की कोशिश की थी तब ब्रह्मपुत्र घाटी के लोगों ने इसका विरोध किया था। इसके इतर बराक घाटी के लोगों ने सरकार के फैसले का स्वागत किया था। बराक घाटी बंगाली हिन्दू बहुल क्षेत्र है। इस क्षेत्र के लोगों ने नागरिकता बिल का समर्थन किया था। लोकसभा चुनाव के दौरान नागरिकता बिल चुनाव का प्रमुख मुद्दा था।

आखिर एनआरसी है क्या? आसान शब्दों में कहें तो यह असम में रह रहे भारतीय नागरिकों की एक सूची है, जो यह तय करती है कि कौन भारत का नागरिक नहीं है और फिर भी भारत में रह रहा है।

एनआरसी की वर्तमान लिस्ट में शामिल होने के लिए व्यक्ति के परिजनों का नाम साल 1951 में बने पहले नागरिकता रजिस्टर में होना चाहिए या फिर 24 मार्च 1971 तक की चुनाव सूची में होना चाहिए। इसके लिए अन्य दस्तावेजों में जन्म प्रमाणपत्र, शरणार्थी पंजीकरण प्रमाणपत्र, भूमि और किरायेदारी के रिकॉर्ड, नागरिकता प्रमाणपत्र, स्थायी आवास प्रमाणपत्र, पासपोर्ट, एलआईसी पॉलिसी, सरकार द्वारा जारी लाइसेंस या प्रमाणपत्र, बैंक या पोस्ट ऑफिस खाता, सरकारी नौकरी का प्रमाण पत्र, शैक्षिक प्रमाण पत्र और अदालती रिकॉर्ड शामिल हैं।

एनआरसी की अंतिम सूची में जो जरूरतमंद लोग शामिल नहीं हो पाएं, उन्हें सरकार मुफ्त में कानूनी सहायता मुहैया कराने के लिए जरूरी प्रबंध करेगी। असम के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह एवं राजनीतिक विभाग) कुमार संजय कृष्णा ने एक बयान में कहा कि एनआरसी सूची में जो लोग शामिल नहीं हो पाएंगे उन्हें तब तक किसी भी हालत में हिरासत में नहीं लिया जाएगा जब तक विदेशी न्यायाधिकरण (एफटी) उन्हें विदेशी नागरिक घोषित न कर दे।

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने यह स्पष्ट किया है कि केवल एनआरसी में नाम न आने से कोई व्यक्ति विदेशी नागरिक घोषित नहीं हो जाएगा। जिनके नाम इसमें शामिल नहीं हैं, उन्हें फॉरेन ट्रिब्यूनल (एफटी) के सामने कागजातों के साथ पेश होना होगा। इसके लिए व्यक्ति को 120 दिन का समय दिए जाने का प्रावधान है। आवेदक के भारत का नागरिक होने या न होने का फैसला एफटी के हाथ में होगा। हालांकि, यदि आवेदक एफटी के फैसले से असंतुष्ट है तो उसके पास हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के पास जाने का भी अधिकार है।

एनआरसी का पहला ड्राफ्ट पिछले साल 30 जुलाई को प्रकाशित हुआ था। जिसमें असम के 3.29 करोड़ लोगों में से 2.9 करोड़ लोगों के नाम सूची में शामिल नहीं थे। जिस पर काफी विवाद हुआ था। इसके बाद जून 2019 में प्रकाशित हुई सूची में एक लाख लोगों के नाम नहीं थे। अब 31 अगस्त को अंतिम सूची प्रकाशित हुई। उच्चतम न्यायालय एनआरसी की प्रक्रिया की निगरानी कर रही है। इसका उद्देश्य असम में अवैध अप्रवासियों की पहचान करना है। यदि 2011 की जनगणना को देखा जाए तो राज्य की कुल जनसंख्या 3.11 करोड़ से ज्यादा थी।

साल 1980 के दशक में वहां के कट्टर क्षेत्रीय समूहों द्वारा एनआरसी को अपडेट करने की लगातार मांग की जाती रही थी। असम आंदोलन को समाप्त करने के लिए राजीव गांधी सरकार ने 1985 में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे, जिसमें 1971 के बाद आने वाले लोगों को एनआरसी में शामिल न करने पर सहमति व्यक्त की गई थी।

अवैध प्रवासियों को हटाने के लिए राज्य की कांग्रेस सरकार ने पायलट प्रोजेक्ट के रूप में साल 2010 में एनआरसी को अपडेट करने की शुरुआत असम के दो जिलों- बारपेटा और कामरूप से की। लेकिन, बारपेटा में हिंसक झड़प के बाद यह प्रक्रिया ठप हो गई। हालांकि, एनआरसी का काम एक स्वयंसेवी संगठन असम पब्लिक वर्क्स द्वारा एक याचिका दायर करने के बाद सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से ही फिर से शुरू हो सका। वर्ष 2015 में असम सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एनआरसी का काम फिर से शुरू किया।

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असम में केवल 19 लाख  लोगों को इनआरसी में जगह न मिल पाने पर कई लोग सवाल उठा रहे हैं कि अवैध नागरिकों के सवाल को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया। उनकी तादाद बहुत ज्यादा नहीं है मगर हकीकत यह है कि घसपैठिये असम में आ तो सही मगर वहां के घुसपैठिये विरोधी आंदोलन को देखते हुए उन्हें सुरक्षित नहीं लगा और कश्मीर दिल्ली से लेकर कर्नाटक में जाकर बस गए। पश्चिम बंगाल, बिहार, त्रिपुरा जैसे राज्यों में तो इनकी अच्छी खासी तादाद है। इसलिए देश के कई राज्यों से एनआरसी की मांग उठ रही है। असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन के तहत 40 लाख अवैध बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान के बाद राजधानी दिल्ली में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी मुसलमानों को लेकर पिछले दिनों ‘भारत रक्षा मंच’ ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया। ‘भारत रक्षा मंच’ ने दिल्ली में भी एनआरसी के गठन की मांग करते हुए कहा कि दिल्ली में 20 लाख से भी ज्यादा अवैध रूप से बांग्लादेशी घुसपैठिये रह रहे हैं जिसकी वजह से दिल्ली में अपराध बढ़ गया है।’

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने असम में एनआरसी के मुद्दें को लेकर बयान जारी किया है। उन्होंने कहा की राज्य में बांग्लादेशी घुस गये  है। उन्हें जल्द से जल्द बाहर निकलना है। जानकारी के अनुसार, मुख्यमंत्री ने बयान जारी करते हुए कहा कि राज्य में बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। इस मामले में सरकार काफी गंभीर दिखाई दे रही है। इस मामले पर निगरानी टीम के द्वारा काम किया जा रहा है। सीएम ने कहा कि राज्य में अवैध रूप से जो भी लोग रह रहे हैं, उन पर कानूनी कार्र्यवाही की जायेगी।

मुंबई एक तरफ जहां देश में अवैध बांग्लादेशियों को लेकर राजनीति गर्म है वहीं मुंबई में भी अब अवैध रूप से रहने वाले बांग्लादेशियों के खिलाफ कार्यवाही की मांग तेज होने लगी है। राज ठाकरे की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने मुंबई में रहने वाले बांग्लादेशियों को लेकर सर्वे किये जाने की मांग की है तो वहीं भाजपा नेता राज पुरोहित ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को चिट्ठी लिखकर गैर कानूनी ढंग से शहर में रहने वाले बांग्लादेशियों के खिलाफ ठोस कार्यवाही की मांग की है। भाजपा नेता राज पुरोहित ने बांग्लादेशियों पर अपनी राय रखते हुए जी मीडिया से कहा, ‘मुंबई के कई ऐसे हिस्से हैं जहां बांग्लादेशियों की बढ़त ने कई मुसीबतें खड़ी की हैं और इस पर अंकुश लगना चाहिए। मेरे ही चुनाव क्षेत्र कुलाबा के कई ऐसे इलाके हैं जहां बांग्लादेशियों की बहुलता मुसीबतों को आमंत्रित करती है। एनआरसी असम में ही नहीं मुंबई में, महाराष्ट्र में, देश के हर हिस्से में लागू होना चाहिए। क्योंकि जिस तरीके से बांग्लादेशी आते हैं और यहां छुप कर बैठ जाते हैं उन पर कोई कार्यवाही नहीं होती।’

नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन के मुद्दे पर जेडीयू और बीजेपी के बीच मतभेद एक बार फिर सामने आ गए हैं। भारतीय जनता पार्टी ने जहां इसका दायरा बढ़ाकर दूसरे राज्यों में करने और बिहार और पश्चिम बंगाल में एनआरसी की वकालत की है, वहीं जेडीयू ने इस मसले पर रूख स्पष्ट कर दिया है। पार्टी ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने एनआरसी का गठन सिर्फ असम के लिए किया था। इसलिए इसे बिहार या किसी अन्य राज्य में फैलाने की जरूरत नहीं है। बता दें कि जेडीयू और बीजेपी के बीच इस मुद्दे पर आपस में ठन गई है। दरअसल पूर्व आरएसएस पदाधिकारी और वर्तमान में भाजपा के राज्यसभा सदस्य राकेश सिन्हा ने सोमवार को बिहार के सीमावर्ती इलाके में एनआरसी की मांग कर दी। उन्होंने कहा कि बिहार के सीमावर्ती जिलों में जिस प्रकार आबादी बढ़ती जा रही है, इससे साबित होता है कि यहां पर बड़ी संख्या में बांग्लादेशी नागरिक आकर बस गए हैं। बीजेपी सांसद ने कहा कि असम और बिहार के सीमांचल में कोई बुनियादी अंतर नहीं है। यदि एनआरसी असम के लिए आवश्यक है तो उससे कम आवश्यक सीमांचल के लिए नहीं है। सीमांचल की जनसंख्या में हुई वृद्धि का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि कटिहार, किशनगंज, पूर्णिया और अररिया जिलों में खास तौर पर एनआरसी की सख्त जरूरत है। उन्होंने दावा किया कि इन इलाकों में जनसंख्या वृद्धि स्वभाविक, प्राकृतिक और देशज नहीं है।

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने एक साक्षात्कार में कहा कि इससे देश के नागरिकों और अवैध प्रवासियों में फर्क पता चल सकेगा। डेली न्यूज पर छपी खबर के मुताबिक मनोहर लाल खट्टर ने कहा कि मौजूदा हालात में इसकी काफी जरूरत है। हरियाणा में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने हैं।

सतीश पेडणेकर

 

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