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आंतरिक सुरक्षा के नये आयाम

आंतरिक सुरक्षा के नये आयाम

जब राजनाथ सिंह ने भारत के गृहमंत्री का पद संभाला तब मंत्रालय के बारे में आम धारणा थी की वह राष्ट्र-विरोधी ताकतों पर समय से पहले कार्यवाही करने की बजाय समय के बाद कार्यवाही करने में विश्वास करता था। किन्तु राजनाथ सिंह के गद्दी संभालने के बाद मंत्रालय के नजरिये में बदलाव महसूस हुआ-अब  परिस्थितियों को सुधारने का संकल्प था न की उनके सामने झुकने का। 2014 से उनके मंत्रालय ने न केवल कई सारे नए कदम उठाये एवं योजनाएं शुरू की बल्कि जो योजनाएं उस वक्त चल रहीं थीं उन्हें भी दुरूस्त किया और जमीन पर उतारा।

2017-18 के मामलों पर अगर एक दृष्टि डालें तो भारत की आंतरिक एवं बाह्य-सुरक्षा के मामलों में आये बदलाव स्पष्ट गोचर थे। सरकार ने एक पॉलिसी के तहत सुरक्षा बलों  को देश के दुश्मनों से निपटने के लिए, चाहें वो देश की सीमाओं में हों या देश की सीमा से बाहर, पूरी छूट दे रखी थी। राजनाथ सिंह ने कश्मीर में सुरक्षा बलों को कह रखा था की पहले वार नहीं करना है किन्तु हमला हो तो प्रतिकार में कितनी भी गोलियां खर्च हों उन्हें गिनना नहीं है। इसी वजह से 2017 में पिछले सालों की तुलना में सीमापार से घुसपैठ के मामलों में 45 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गयी। संदेश साफ था की भारत चुप नहीं बैठेगा और तुरंत हिसाब चुकाएगा जैसा की सर्जिकल स्ट्राइक्स में देखने को आया।

गृह मंत्रालय लगातार जमीनी परिस्थितियों की समीक्षा करता और आतंकवाद और राष्ट्र की सुरक्षा से जुड़ी किसी भी घटना को जड़ से  उखाडऩे के लिए कोई भी कदम लेने से नहीं कतराता था। इसीलिए सुरक्षा बालों की चक्रव्यूह रचनाओं में सतत नवपरिवर्तन स्पष्ट दिखते थे, हालांकि राष्ट्र-विरोधी तत्वों द्वारा सुरक्षा बलों के विजय अभियान को कुंद  करने के प्रयास जारी थे। 2017 में, पिछले सात साल में हुए सबसे घातक माओवादी हमले में, जिसमें 300 माओवादियों ने हिस्सा लिया, सीआरपीएफ के 26 जवान शहीद हुए। यह 2010 के दंतेवाड़ा के हमले के बाद से सबसे बड़ा हमला था।

शहीद हुए जवानों को श्रदांजलि देते हुए राजनाथ सिंह ने कहा था की सीआरपीएफ जवानों की निर्मम हत्या विकास कार्यों और आतंक-विरोधी कार्यवाहियों को हतोत्साहित नहीं कर पायेगी। वहां से दिल्ली लौटने के बाद श्री सिंह ने प्रधानमंत्री को वास्तुस्थिति से अवगत कराया और बाद में बस्तर में जारी सुरक्षा बलों के ऑपरेशन को और मजबूत करने से संबंधित एक मीटिंग का संचालन किया, जिसमें सुरक्षा बलों के स्टैण्डर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर में संशोधन का प्रस्ताव रखा गया। सुरक्षा बलों की रिडिप्लॉयमेंट के साथ-साथ कोबरा कमांडोज को भी माओवाद के खिलाफ ऑपरेशंस का हिस्सा बनाया गया। श्री सिंह ने सुरक्षा बलों से माओवादी ताकतों को जड़ से उखाडऩे का आह्वान किया, जिसके लिए सरकार ने सामरिक और रणनीतिक बदलाव किये। इसके तहत  सीआरपीएफ का केंद्रीय जोन कोलकात्ता से छत्तीसगढ़ की राजधानी में शिफ्ट किया गया। इसी प्रकार टेक्निकल कमांड सेंटर को बस्तर शिफ्ट कर दिया गया। इसके अलावा गृह मंत्रालय ने सुरक्षा बलों को तकनीकी सूचनाओं को उपलब्ध कराने के लिए बेस को 30 यूएवी रखने के लिए विस्तार की स्वीकृति दी।

साथ ही सीआरपीएफ के आतंकविरोधी अभियान में स्थानीय प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के लिए, गृह मंत्रालय ने बस्तरिया बटालियन की शुरूआत की जिसमें 534 आदिवासी जवान थे। ये आदिवासी जवान बस्तर के सुदूर जंगलों से आए थे, जिन्हें जंगल वारफेयर की एक साल की ट्रेनिंग दी गयी। मई 24, 2018 को राजनाथ सिंह छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह के साथ सीआरपीएफ की 241 बटालियन, बस्तरिया बटालियन, के पासिंग-आउट परेड के मौके पर उपस्थित थे। इसके साथ-साथ सरकार के माओवाद के खिलाफ कड़े कदमों ने इस पर नकेल कसने का काम किया।

पिछली सरकार के विपरीत, मोदी सरकार ने देश-विरोधी कार्यों में लिप्त संभावित गैर-सरकारी संगठनों को मिलने वाले विदेशी फंड के मुद्दे को भी हल किया। यही नहीं, गृह मंत्रालय ने ग्रीनपीस इंडिया के पंजीकरण को भी रद्द किया। संगठनों के पंजीकरण रद्द करने के पांच महीने पहले, गृह मंत्रालय ने इन संगठनों को 180 दिन के अंदर भारत के उर्जा क्षेत्र में हो रहे कार्यों में बाधाएं उत्पन्न करने, भारत सरकार की नीतियों के विरोध में  अभियान चलाने, पैरवी करने जैसे उन पर लगे गंभीर आरोपों का जबाब मांगा था। गृह मंत्रालय के इस कदम को उठाये जाने से पहले ही यह प्रश्न उठाया जा रहा था कि आखिरकार ये गैर-सरकारी संगठन अपने विदेशी फंड का ब्योरा देने में इतने अनिच्छुक क्यों है? गृह मंत्रालय ने अपनी जांच में यह पाया कि लगभग 1000 गैर-सरकारी संगठन एफसीआरए, 2010 के विभिन्न प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए विदेशी फंड का उपयोग कर रहे थे।

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अगर हम कश्मीर मुद्दे की बात करें तो 2016 के मध्य तथा 2017 के शुरूआत तक आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद कश्मीर की हालात थोड़ी खराब थी। 2008 के बाद 2016-17 में पत्थरबाजी की 2690 घटनाएं सामने आयीं। जिसमें 492 घटनाएं बारामुला और 339 घटना श्रीनगर और कुपवारा में देखने को मिली। हालांकि पत्रकारों और अन्य लोगों का मानना था कि 1990 और 2010 के विरोध प्रदर्शन बिल्कुल ही अलग थे। 1990 के समय के विरोध प्रदर्शन भारत-विरोधी थे जबकि 2010 के विरोध-प्रदर्शन आतंकियों के मारे जाने के विरोध में होते थे, जिन्हें निर्दोष माना जाता था। हालांकि इंडिया टुडे ने अपनी 2017 में की गयी जांच में पाया कि विरोध प्रदर्शन कराने कि लिए बकायदा पत्थरबाजों को पांच से सात हजार रूपये प्रति महीने दिये जाते हैं। इसके मास्टरमाइंड विभिन्न स्थानों पर पथराव करने के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं और जम्मू-कश्मीर पुलिसकर्मियों, सेना के जवानों, विधायकों और सरकारी वाहनों को निशाना बनाने के लिए विशिष्ट निर्देश देते हैं।

सितम्बर 2016 में, आर्मी ने साउथ कश्मीर में विरोध प्रदर्शन को रोकने के लिए आपरेशन ‘काम डॉउन’ चलाया, जो तीन महीने तक चला। इस काम के लिए 4000 जवानों की तैनाती की गई थी। गृह मंत्रालय ने इसके लिए कम-से-कम सैन्य बलों की तैनाती का आदेश दिया था। उस समय रिपोर्ट यह भी थी कि जब से कश्मीर में अशांति फैली है, तब से पाकिस्तान की तरफ से 100 आतंकी दक्षिण कश्मीर के पुलवामा, सोपिया, अनंतनाग और कुलगाम में घुसने की फिराक में हैं। जब आर्मी पर पत्थरबाजों द्वारा पत्थरबाजी की जाने की घटनायें सामने आयीं तो गृह मंत्रालय ने जम्मू-कश्मीर पुलिस को आर्मी के लिए बख्तरबंद गाडिय़ा मुहैया कराने का आदेश दिया। सीआरपीएफ और राज्य की पुलिस ने पत्थरबाजों द्वारा सड़कों को बंद करने के लिए उन पर रखे गये पेड़ों, बिजली के खम्भों, बड़ी-बड़ी चट्टानों और जली हुई गाडिय़ों को हटाने में सहायता की।

यहां पर गृह मंत्रालय द्वारा गैर-सरकारी संगठनों के आय के स्रोत की जांच करने के सम्बंध में उठाये गये कदमों से एनआईए को यह पता चला कि अलगाववादी सैय्यद अली शाह गीलानी की ऑल पार्टीस हुर्रियत कान्फ्रेंस जम्मू-कश्मीर में हिजबुल मुजाहिदीन जैसे आतंकी संगठन को फाईनेंस करने के लिए हवाला रैकेट चलाती है। एनआईए द्वारा जनवरी 2018 में दायर एक चार्जशीट में लश्कर-ए-तैयबा के प्रमुख हाफिज मोहम्मद सईद और हिजबुल मुजाहिदीन के प्रमुख सैयद सलाहुद्दीन को आतंकी फंडिंग करने के संबंध में ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से जुड़े कई कश्मीरी अलगाववादी समूहों के शीर्ष नेतृत्व का नाम इंगित किया।

पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने आतंकी बुरहान वानी के एनकाउन्टर के बाद न केवल लोगों में विद्रोह पैदा करने के लिए अलगाववादी संगठनों को 800 करोड़ रूपये दिये, बल्कि पत्थरबाजों को ‘संगबाज’ नाम के एक गीत के माध्यम से भड़काने का भी खूब प्रयास किया। लेकिन जुलाई 2017 और मई 2018 के बीच, सरकार ने जम्मू-कश्मीर से आतंक को खत्म करने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ कदम उठाया। महीनों भर की योजना और शोध के पश्चात गृह मंत्रालय ने देश की प्रमुख खुफिया एजेंसियों की मदद से लश्कर, जैश, हिजबुल और अल-बद्र जैसे आतंकी संगठनों के 258 आतंकियों का नाम जारी किया, जिसमें 130 स्थानीय तथा 128 बाहरी आतंकी थे। इन आतंकियों का नाम हर जिले में खुफिया सर्वे करने के पश्चात जारी किया गया था।

इस ऑपरेशन में भारतीय सेना, सीआरपीएफ, बीएसएफ, आईबी और जम्मू-कश्मीर पुलिस के जवान शामिल थे।  गृह मंत्रालय द्वारा जारी किये गये इस ऑपरेशन का उद्देश्य घाटी में पूर्ण शांति लाना था। कुछ मीडिया संस्थानों ने इसे ऑपरेशन आल-आउट का नाम दिया। यह ऑपरेशन तब चालू किया गया जब जुलाई 2017 में लश्कर के आतंकियों ने अमरनाथ जा रहे यात्रियों पर हमला किया।

2019 के शुरूआत में 13,000 लोगों के बीच किये गये सर्वे में राजनाथ सिंह को नरेन्द्र मोदी सरकार में सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले नेता के रूप में पाया गया और उनके कार्य ने लोगों के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव डाला। राजनाथ सिंह के कार्यकाल में सुरक्षा बलों ने भारत को पहले से अधिक सुरक्षित बनाया है।

गौतम चिंतामणि

(यह लेख पेंगुइन रेन्डम हाउस द्वारा प्रकाशित पुस्तक ”राजनीति’’ के अध्याय ”द स्काई एज ए शेल्टर’’ के संपादित अंशों पर आधारित है)

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