आचार्य डॉ. संजय कृष्ण सलिल विलक्षण कथावाचक और भक्ति सम्राट

आचार्य डॉ. संजय कृष्ण सलिल  विलक्षण कथावाचक और भक्ति सम्राट

भारत की संस्कृति में ऐसे अनेक महापुरुष संत, ऋषि एवं कथावाचक हैं जो जनता के मन में अध्यात्म एवं धर्म के प्रति आकर्षण जाग रहे हैं। अध्यात्म ही एक ऐसा तत्व है, जिसको उज्जीवित और पुनप्र्रतिष्ठित कर भारत अपने खोए गौरव को पुन: उपलब्ध कर सकता है, विश्वगुरू का दर्जा पा सकता है। इस दृष्टि से अनेक कथावाचकों का महनीय योगदान है। इस देश की माटी ने अनेक विलक्षण कथावाचक दिये हैं। जिन्होंने देश और दुनिया में जन-जन के मन को मोहने वाले बेहतरीन अंदाज, सारगर्भित भाषा, दिल को छूने वाले भाव में ईश्वर का गुणगान करने की क्षमता अर्जित की हैं। मानो वे अमृत बांट रहे हो। वे जहां भारतीय संस्कृति और संस्कारों के संवाहक बने हुए हैं, वहीं समाज सुधारक, शांतिदूत एवं जनकल्याण के प्रेरक भी बने हैं। उन्हीं में एक नाम है आचार्य डॉ. संजय कृष्ण सलिल। वे धार्मिक वैष्णव संस्कृति के प्रति पूरी तरह से समर्पित है और श्रीमद्भवत और रामायण की शिक्षाओं को प्रभावी एवं मोहक तरीके से जन-जन के बीच पहुंचा रहे हैं। आप तो कृष्णभक्ति एवं रामरस की भावमाधुरी की बानगी बनाकर, वाणी का जादू कर जन-जन के बीच मुखर हैं। इस प्रकार आपने कथा वाचन से ही मानस प्रेमियों के अन्तर्मन में गहरे पैठकर उनसे अभिन्नता स्थापित कर ली है। आपकी कथन शैली व वैचारिक श्रृंखला कुछ ऐसी मनोहर बन जाती है कि श्रोतासमाज विमुग्ध होकर, तन-मन व सुध-बुध खोकर उसमें अनायास ही बंध जाता हैं।

आचार्य डॉ. संजय कृष्ण सलिल अपनी अमृतमयी, धीर, गम्भीर-वाणी-माधुर्य द्वारा भक्ति रसाभिलाषी-भक्तों को, जनसाधारण एवं बुद्धिजीवियों को, भक्ति का दिव्य रसपान कराकर रससिक्त करते हुए, प्रतिपल निज व्यक्तित्व व चरित्र में श्रीमद् भागवत कथा के नायक श्रीकृष्ण एवं श्रीरामचरितमानस के ब्रह्म राम की कृपामयी विभूति एवं दिव्यलीला का भावात्मक साक्षात्कार कराने वाले सलिलजी आधुनिक युग के परम तेजस्वी मनीषी, मानस के अद्भुत शिल्पकार, भागवत कथा एवं रामकथा के अद्वितीय अधिकारी व्याख्याकार हैं। उनके उपदेश, भजन और आध्यात्मिक प्रस्तुतियां संपूर्ण मानवजाति के लिए कल्याण का संदेश है। आप तुलसी रामायण भागवत पीठ के संस्थापक भी हैं। जिसके माध्यम से देश और विदेश में भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों के प्रसार के विशिष्ट उपक्रम संचालित किये जाते हैं। एक शांतिपूर्ण आदर्श समाज निर्माण के लिए भी आपका जीवन समर्पित है। यह संस्था जीवन की वास्तविकता के ज्ञान के लिए वैदिक शिक्षा और दर्शन का प्रोत्साहन करती है। जिसके अंतर्गत गरीब ब्राह्मण बच्चों को वैदिक शिक्षा मुफ्त में दी जाती है। इसके अलावा गौ-सेवा एवं अन्य मानव कल्याण के उपक्रम भी संचालित किये जा रहे हैं।

आचार्य संजय कृष्ण सलिलजी ने प्राचीन शास्त्रों में लिखी आध्यात्मिक शिक्षाओं को कथाओं और वक्तव्य के माध्यम से आम जन मानस तक पहुंचाया है। आप बहुत विख्यात कथावाचक हैं। इनका जन्म वृन्दावन के एक छोटे से गांव में 1968 में एक प्रतिष्ठित हिन्दू परिवार में हुआ था। आपने चैतन्य संप्रदाय से शिक्षा-दीक्षा ली और श्रीमद् भागवत का अध्ययन किया। आपको श्री रामानुजाचार्य और श्रीमद्भागवत पर उनके गहन अध्ययन के लिए आगरा विश्वविद्यालय द्वारा पीएचडी की उपाधि से सम्मानित किया गया था। आपकी भारतीय संस्कृति और दर्शन में गहरी रूचि है और उनके जीवन का लक्ष्य अंतिम क्षण तक इस संस्कृति के गौरव की अभिवृद्धि करना एवं जन-जन के बीच इसकी प्रतिष्ठापना करना है। आप श्रीमद् भागवत कथा की ज्ञान गंगा बहाते हुए कहते हैं कि भागवत कथा मनुष्य के जीवन में ज्ञान, भक्ति और वैराग्य को प्रकट कर उसके मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करती है। यह कथा मनुष्य के शुष्क हृदय में श्रीकृष्ण भक्ति का प्रेम रस भर देती है। विलक्षण प्रतिभा के धनी और भक्ति के सम्राट पूज्य सलिल जी चलता-फिरता भारतीय आध्यात्मिकता का विश्वकोष हैं। उनकी अद्भुत प्रतिभा, अद्वितीय स्मरण शक्ति और उत्कृष्ट भक्ति जन-जन को प्रेरित करती है।

पूज्य आचार्य संजय कृष्ण सलिलजी की विद्वता एवं कथावाचन ने असंख्य लोगों के मनोमस्तिष्क को गहराई तक उद्वेलित किया हैं। आपकी विलक्षण एवं नवीन चिंतनशैली ने सभी को प्रभावित किया। आप परम्परागत कथावाचक नहीं हैं, क्योंकि कथा उनका साध्य नहीं, साधन है। उनका उद्देश्य है भारतीय जीवन पद्धति की समग्र खोज अर्थात् भारतीय मानस का साक्षात्कार। उन्होंने अपने विवेक प्रदीप्त मस्तिष्क से, विशाल परिकल्पना से श्रीमद् भागवत कथा के अन्तर्रहस्यों का उद्घाटन किया है। आपने जो अभूतपूर्व एवं अनूठी दिव्य दृष्टि प्रदान की है, जो भक्ति-ज्ञान का विश्लेषण तथा समन्वय, शब्द ब्रह्म के माध्यम से विश्व के सम्मुख रखा है, उस प्रकाश स्तम्भ के दिग्दर्शन में आज सारे इष्ट मार्ग आलोकित हो रहे हैं। आपके अनुपम शास्त्रीय पाण्डित्य द्वारा, न केवल आस्तिकों का ही ज्ञानवर्धन होता है अपितु नयी पीढ़ी के शंकालु युवकों में भी धर्म और कर्म का भाव संचित हो जाता है। श्रीमद् भागवत में बिखरे हुए विभिन्न रत्नों को संजोकर आपने अनेक आभूषण रूपी भजनों की सृष्टि की है। जो आज लाखों लोगों के बीच श्रीमद् भागवत का अनुपम पीयूष वितरण कर रही है।

निष्काम साधक, प्रबल पुरूषार्थ के धनी एवं मानवीय मूल्यों के संवाहक आचार्य संजय कृष्ण सलिलजी एक ऐसी दिव्य ज्योति हैं, जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन भगवान श्रीकृष्ण एवं भगवान श्रीराम के आदर्श जीवन चरित्र को जीवंत करने एवं मानव कल्याण हेतु समर्पित कर दिया। वे हमें नया धर्म प्रदान नहीं कर रहे हैं वरन् धर्म के अन्तर्गत सही जीवन का मार्ग दिखा रहे हैं। ‘धर्म’ एक है विचार अनेक हो सकते हैं। धर्म जीवन का मार्ग है। उन्होंने अपने उपदेशों में कहा है ‘धर्म हमें बांधता कहां है, वह तो हर कर्मबंधनों से मुक्त करता है।’ उनका मानना है कि ‘सद्गुरु पंथ नहीं पथ दिया करते हैं’ ताकि परिवार से परमात्मा तक की यात्रा हम सफलतापूर्वक तय कर सकें। ‘जीना आवश्यक है पर अर्थपूर्ण जीवन जीना उससे भी आवश्यक है।’

मानव जाति के लिये आचार्य संजय कृष्ण की सेवायें असीम है। श्रीमद् भागवत एवं रामायण के कथावाचक के रूप में देश एवं विदेश में अपनी यात्रा के दौरान उनकी दिव्य वाणी से लाखों लोगों की जीवन शैली परिवर्तित हुई है, इनके प्रभावी उपदेशों से श्रोता एवं श्रद्धालुजन हिंसा और व्यसन का त्याग कर धर्म के मार्ग पर चलने के लिये संकल्पबद्ध भी हुये हैं। उनकी अनवरत साधनाओं को देखते हुये लगता है कि अब तो मानवता की सेवा ही उनका जीवन है। वे ईश्वर के बारे में ही नहीं अपितु ईश्वर को ही जानते हैं। यह सत्य है कि अल्प विश्वास आपको स्वर्ग तक ले जा सकता है, परन्तु सम्पूर्ण विश्वास स्वर्ग को ही आपके द्वार पर ले आता है।

आचार्य संजय कृष्ण सलिलजी ने अपनी अखूट ऊर्जा, अमाप्य गुणों एवं विकसित चेतना से न केवल अपने व्यक्तित्व का निर्माण किया, अपितु हजारों व्यक्तियों के ‘सत्व’ को निर्मित किया, संवारा और निखारा। उनका व्यक्तित्व-निर्माण का अद्भुत कौशल आने वाली शताब्दियों में आश्चर्य का विषय होगा। उनके परूषार्थी जीवन की एक पहचान है गत्यात्मकता। वे अपने जीवन में कभी कहीं रूके नहीं, झुके नहीं। प्रतिकूलताओं के बीच भी अपने लक्ष्य का चिराग सुरक्षित रखा। वैसे ही आपने अनेक व्यक्तित्वों को तराशकर उनको भव्य, महनीय और सुघड़ रूप प्रदान कर रहे हैं। आपने कहा भी है कि मनुष्य का चित्त (मन की भावना) परिवर्तनशील है, धन संपत्ति, युवावस्था तथा जीवन भी चलायमान (अस्थायी) है, परन्तु किसी व्यक्ति द्वारा अपने कर्मों से अर्जित उसकी कीर्ति (प्रसिद्धि) सदा बनी रहती है।

आचार्य संजय कृष्ण सलिलजी का संपूर्ण जीवन तेजस्विता एवं आध्यात्मिकता का सफरनामा है। तेजस्वी व्यक्तित्व का यह प्रगतिशील सफर सीख देता है कि संकल्प जब भी करो, पूरी प्राणवत्ता के साथ करो। कोई विकल्प शेष न रह जाए। आज संकल्प किया और कल परिस्थितियां बदल गई तो संकल्प भी बहाना ढूंढने लग जाए, यह काम्य नहीं, संकल्प फौलादी चट्टान-सा मजबूत हो। हमारा संकल्प सृजनशील संकल्प हो। न उसमें विचारों का आग्रह हो, न परंपराओं का व्यामोह, न सिद्धांतों की कट्टरता हो, न क्रिया में जड़ता हो। समय का हर पल पुरुषार्थ के साथ निर्माण का नया इतिहास रचे। सफलता स्वयं उपलब्धि बने। उनकी इसी उदारवादी सोच ने सामयिक संदर्भों से जुड़कर युग की समस्याओं को समाहित करने का प्रयत्न इतिहास की दुर्लभ घटना है। आपने कहा है कि जब देश संकट में हो तब जो उदासीन भाव से दूर खड़े होकर केवल देखते रहते हैं और कोई भी प्रतिकार नहीं करते, ऐसे व्यक्ति अथवा समूह, शत्रु के पक्ष के अर्थात् शत्रु ही होते हैं।

आचार्य संजय कृष्ण सलिलजी के कार्यक्रमों में अनेक मत-मतान्तरों वाले लोग बड़ी संख्या में शामिल होते हैं। आपके कथावाचना के कार्यक्रम विभिन्न चैनलों पर नियमित प्रसारित होते हैं। आपके चिन्तन ने श्रीमद् भागवत एवं रामचरितमानस के पूरे घटनाक्रम को और प्रत्येक पात्र की मानसिकता को जिस तरह से प्रस्तुत किया है उसको सुनकर आपको ऐसा लगेगा कि आप उस युग के एक नागरिक हैं और वे घटनाएं आपके जीवन का सत्य हैं। हम शुभाशंसा करते हैं कि पूज्य सलिलजी की कथा वाचना की उपलब्धियां भक्ति को नये  शिखर दें। आने वाली पीढिय़ों के लिए नये पदचिन्ह स्थापित करें ताकि कोई कभी अपने मुकाम से भटक न सके।

 

ललित गर्ग

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.