ब्रेकिंग न्यूज़

आचार्य श्री मृदुल कृष्ण गोस्वामी: भागवत पुराण के अद्भुत शिल्पकार

आचार्य श्री मृदुल कृष्ण गोस्वामी: भागवत पुराण के अद्भुत शिल्पकार

हमारे देश में कितने ही पवित्र संत, गुरु, ऋषियों ने अपने दैवीय शक्ति, आनंद, प्राचीन ग्रंथों के ज्ञान और आध्यात्मिक ज्ञान के साथ दुनिया को आशीर्वाद दिया है, परम सत्ता से साक्षात्कार के लिये अग्रसर किया है। इनमें श्रद्धेय आचार्य श्री मृदुलकृष्ण शास्त्री भी हैं। उन्होंने श्रीमद्भागवतजी का ऐसा प्रचार प्रसार किया और एक ऐसी आध्यात्मिक लहर चलायी है जिसने हर इंसान का जीवन ही बदल दिया है। उन्होंने अपने गहन प्रेम और भक्ति के सहारे न केवल अपने बिहारीजी से स्वयं साक्षात्कार किया बल्कि अपने भक्तों को भी उनसे मिलवाया और श्रीमद्भागवतजी के ज्ञान से सभी भक्त प्रेमियो को सच्चे सुख और शांति का अनुभव कराया है। एक अद्भुत छवि, एक अद्भुत जीवन, एक अद्भुत संत, एक विलक्षण कथावाचक के रूप में उनका जीवन तनावों की भीड़ में शांति का सन्देश है, समस्याओ एवं परेशानियों के बीच मुस्कुराहट का पैगाम है, चंचल चित्त के लिये एकाग्रता एवं श्रीकृष्ण-भक्ति की प्रेरणा है। गुरुजी श्री मृदुलकृष्ण शास्त्री दुनियाभर के कई लोगों के लिए एक आध्यात्मिक नेता और गुरु हैं। उनके सुन्दर भजन ने आंतरिक प्रकाश को जगाया और दिव्य-अलौकिक उपस्थिति को जन्म दिया। लोग उनके भजन और भगवतकथाओं को सुनने के लिए बड़ी संख्या में इकट्ठे होते हैं। संस्कृति और आध्यात्मिकता के बारे में उनका ज्ञान लोगों को आत्म-प्राप्ति और सर्वोच्च शक्ति के करीब महसूस करने में मदद करता है। वे अपने मधुर भजनों को सुनाते हैं, तो वह भक्तों को दिव्य शांति और प्रेम (भक्ति) की अनूठी दुनिया में ले जाता है, आप उनके भजन एवं कथा दुनिया के किसी भी स्थान पर सुने, लेकिन आपको ऐसा लगता है जैसे आप वृंदावन में बैठे हैं। गुरुजी श्री मृदुलजी ऐसी संत-चेतना है जो स्वयं श्रीकृष्ण-भक्ति में जागृत है और सबके भीतर उस भक्ति की ज्योति जलाने के प्रयास में हैं। उनका जागता पौरुष, ओजस्वी वाणी, श्रीकृष्ण-जीवन की सूक्ष्मगूढ़ता, करुणा एवं सबके साथ सह-अस्तित्व का भाव सबके अभ्युदय की अभिप्रेरणा है।

श्री मृदुल कृष्ण शास्त्री जी का जन्म 15वीं शताब्दी के संत स्वामी हरिदासजी महाराज के परिवार में वृंदावन में हुआ था, जो भारतीय संगीत शास्त्रीय के संस्थापक और कायाकल्पक भी थे। स्वामी हरिदासजी बैजू बावरा और तानसेन जैसे प्रसिद्ध संगीतकारों के गुरु थे। अपने परिवार की परम्परा को आगे बढ़ाने वाली यह महान् संत-चेतना पिता आचार्य श्री मूल बिहारी गोस्वामी और माता श्रीमती शांति गोस्वामी को देवी सरस्वती के आशीर्वाद के रूप में मिले। इनका जन्म वृंदावन उत्तर प्रदेश में हुआ, यह वह पावन भूमि है जहां श्रीकृष्ण भगवान का जन्म हुआ और उनका बचपन बीता। उन्होंने अपने पिता से भागवत, संस्कृत मूलपाठ और संस्कृत भाषा की अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। यह वह परिवार है जिनको श्री बांके बिहारी जी आशीर्वाद मिला हुआ है, इस परिवार में असंख्य दिव्य आत्माएं पैदा हुई हैं जो संस्कृत भाषा और श्रीमद्भगवत पुराण का विशेष ज्ञान रखते हैं। उनकी सभी पीढिय़ां संगीत में बहुत ही कुशल रही हैं। इनका जीवन एक खुली किताब के जैसे है सम्पूर्ण जीवन कृष्णा नाम और श्रीमद्भगवतजी के प्रसार को समर्पित है। वे विवाहित है इनकी धर्मपत्नी, जिनको सभी गुरुमां कहते हैं, उनका नाम वंदना गोस्वामी है। इनके एक पुत्र श्रद्धेय आचार्य श्री गौरव कृष्ण गोस्वामी हैं। वे भी अपने पिता के पदचिह्नों पर चलते हुए अपनी स्वतंत्र पहचान कायम किये हुए हैं। उन्होंने अपने विवेक प्रदीप्त मस्तिष्क से, विशाल परिकल्पना से श्रीमद्भागवत कथा के अन्तर्रहस्यों का उद्घाटन किया है। आपने जो अभूतपूर्व एवं अनूठी दिव्य दृष्टि प्रदान की है, जो भक्ति-ज्ञान का विश्लेषण तथा समन्वय, शब्द ब्रह्म के माध्यम से विश्व के सम्मुख रखा है, उस प्रकाश स्तम्भ के दिग्दर्शन में आज सारे इष्ट मार्ग आलोकित हो रहे हैं। आपके अनुपम शास्त्रीय पाण्डित्य द्वारा, न केवल आस्तिकों का ही ज्ञानवर्धन होता है अपितु नयी पीढ़ी के शंकालु युवकों में भी धर्म और कर्म का भाव संचित हो जाता है।

श्री मृदुल कृष्ण शास्त्री ने अपनी युवावस्था का अधिकतर समय श्री बांके बिहारीजी (श्रीकृष्ण भगवान) की सेवा में बिताया और अपने पिता के साथ ‘भागवत पुराण कथा’ का वाचन करना सीखा। सोलह वर्ष की आयु में, उन्हें श्री मूलजी बिहारी (पिता) के द्वारा हरिद्वार में एक समागम के दौरान भागवत पुराण के अगले वक्ता (निदेशक) के रूप में नियुक्त किया गया। वे 36 वर्षों से ‘भागवत कथा’ का प्रभावी, मन को छू लेने वाला अद्भुत एवं चमत्कारी कथावाचन कर असंख्य श्रद्धालुओं के जीवन में भक्ति, आनन्द एवं अलौकिकता का प्रवाह कर रहे हैं और अब तक उन्होंने 700 से भी अधिक भागवत कथाएं की हैं।

श्री राधाराणी और भगवान श्रीकृष्ण के लिए श्री मृदुल कृष्ण शास्त्री के सुन्दर भजन दिव्य वातावरण निर्मित करते हैं जिससे भक्त भगवान की साक्षात् उपस्थिति महसूस करना शुरू कर देता है। यह भीतर और आसपास दिव्यता के साथ उपस्थित हर आत्मा को प्रबुद्ध करता है। श्लोकों को समझाने का उनका तरीका इतना आसान है कि हर एक व्यक्ति जीवन भर के लिए आसानी से याद कर सकता है। उनकी प्यारी आवाज, सरल शब्दावली हर किसी को अपने दिल में दिव्य भावना को अवतरित करने और कथों को सुनने में सहजता एवं सरलता का अहसास कराती है। अपनी अमृतमयी, धीर, गम्भीर-वाणी-माधुर्य द्वारा भक्ति रसाभिलाषी-भक्तों को, जनसाधारण एवं बुद्धिजीवियों को, भक्ति का दिव्य रसपान कराकर रससिक्त करते हुए, प्रतिपल निज व्यक्तित्व व चरित्र में श्रीमद् भागवत कथा के नायक श्रीकृष्ण एवं श्रीरामचरितमानस के ब्रह्म श्रीराम की कृपामयी विभूति एवं दिव्यलीला का भावात्मक साक्षात्कार कराने वाले पूज्य गुरुजी आधुनिक युग के परम तेजस्वी मनीषी, भगवत पुराण के अद्भुत शिल्पकार, भागवत कथा एवं रामकथा के अद्वितीय अधिकारी व्याख्याकार हैं। उनके उपदेश, भजन और आध्यात्मिक प्रस्तुतियां संपूर्ण मानवजाति के लिए कल्याण का संदेश है। हर संवाद व्यक्तित्व बदलाव की दिशा का माध्यम है। हर उपदेश जीने का सही आचरण है।

श्री मृदुल कृष्ण शास्त्री ने श्री भगवत मिशन ट्रस्ट की स्थापना की। जिसके द्वारा वृंदावन में श्री राधारानी गोशाला (150 गायों के साथ) और श्री राधा स्नेह बिहारी आश्रम को स्थापित किया गया। जो पर्यटकों को आवास, भोजन और अन्य सुविधाएं प्रदान करती हैं। वर्ष 2003 से श्री भगवत मिशन ट्रस्ट के द्वारा एक मासिक हिंदी पत्रिका ‘मृदुल चिंतन’ को प्रकाशित किया जा रहा है। एक धार्मिक केबल टेलीविजन चैनल-अध्यात्म को भी शुरू किया गया। हाल ही में, उन्होंने पारंपरिक वृंदावन और आधुनिक वास्तुकला के द्वारा स्नेह बिहारी मंदिर का पुनर्निर्माण किया है। जहां हर साल कई आध्यात्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।

श्री मृदुलजी वृंदावन में श्री बांके बिहारी मंदिर में प्रमुख पाटाधिकारी हैं। वे अपने सभी भक्तों के बीच गुरुजी के रूप में पहचाने जाते हैं। उन्होंने भजनों को अपनी सुखद आवाज में सुनाकर पूरी दुनिया में लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया है। उनकी श्री भागवत कथा ने आश्रम में बड़ी संख्या में भक्तों को आकर्षित किया। न केवल भारत में बल्कि विदेशों में लोग इसे सुनने के लिए बड़ी संख्या में आते हैं। उनके श्रोताओं के अनुसार, मृदुलजी ‘भागवत पुराण’ के पात्रों एवं परिस्थितियों को इस तरह व्यक्त करते हैं कि मानो वह दर्शकों के सामने ही हों। उनकी दिव्य आवाज हर दिल में कंपन पैदा करती है। उनके कथावाचना पूरी तरह से भगवान के प्रति भक्ति से भरी हुई होती हैं। उनके कथावाचन में भगवान श्री कृष्ण के जीवन से जुड़ी हर घटना सजीव एवं जीवंत हो जाती है, जैसे कि हम इसे अपनी आंखों के सामने देख रहे हैं और न केवल इसे सुनते हैं बल्कि एक ऐसा जादू वे बिखेरते हैं, जो दिव्यता और भक्ति से ओतप्रोत होता है। उनकी सरल और प्यारी आवाज एक जादुई दिव्य वातावरण बनाती है। हर श्रोता उनको एकाग्रता एवं तन्मयता से सुनता है  क्योंकि वे भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति पैदा कर रहे होते हैं। उनके लाखों की संख्या में शिष्य हैं, जो गुरु पूर्णिमा के शुभ अवसर पर प्रतिवर्ष आध्यात्मिक गुरु के रूप में उनकी पूजा करते हैं। उन्होंने श्रीमद्भागवत से ना जाने कितने लोगों के जीवन जीने के ढंग को बदल दिया हैं। उनके अनुसार भगवान को पाने के दो माध्यम है गाना और रोना। जो उनके लिए गायेगा और उनके लिए प्रेम अश्रु बहायेगा,  भगवान उसे ही मिलेंगे। प्रभु की याद में गिरे अश्रु अनमोल मोती बन जाते हैं। श्रीमद्भागवत कथा की ज्ञान गंगा बहाते हुए वे कहते हैं कि भागवत कथा मनुष्य के जीवन में ज्ञान, भक्ति और वैराग्य को प्रकट कर उसके मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करती है। यह कथा मनुष्य के शुष्क हृदय में श्रीकृष्ण भक्ति का प्रेम रस भर देती है। विलक्षण प्रतिभा के धनी और भक्ति के सम्राट पूज्य गुरुजी चलता-फिरता भारतीय आध्यात्मिकता का विश्वकोष हैं।

 

ललित गर्ग

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.