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आचार्य श्री विद्यासागरजी मुनिराज: अलौकिक साधना वाले विलक्षण संत

आचार्य श्री विद्यासागरजी मुनिराज: अलौकिक साधना वाले विलक्षण संत

साधक अध्यात्म का यात्री होता है। उसका लक्ष्य होता है अपूर्णता से पूर्णता की दिशा में प्रस्थान। सही दिशा में उठा एक-एक कदम उसे सत्य, ज्योति एवं अमृतत्व के निकट ले जाता है। ध्येय के निर्धारण के पश्चात आवश्यक है सही मार्ग और मार्गदर्शक का चुनाव तथा उसके प्रति संपूर्ण समर्पण भाव। भारतीय संत परम्परा में लक्ष्य की स्पष्टता, दिशा का निर्धारण और दिशादर्शक-इस त्रिपुटी का महत्वपूर्ण स्थान है। जैन साहित्य में इसकी पहचान होती है देव, गुरु और धर्म के नाम से। तीनों के केंद्र में गुरु हैं। अणु को विराट के साथ या आत्मा को परमात्मा के साथ जोडऩे वाला सेतु है-गुरु तत्व। भारतीय चिंतन एवं व्यवहार में गुरु का विशिष्ट स्थान है। धर्म का बोध और परमात्मभाव की प्राप्ति गुरु के मार्गदर्शन से ही संभव है। भारत अध्यात्म की अनूठी एवं विलक्षण धरा है, उसकी तेजस्विता एवं उसके गौरव की स्थापना के लिये अनेक संत-मनीषी महापुरूषों ने अपनी साधना, अपने त्याग, अपने कार्यक्रमों एवं अनुभूत विचारों से बहुआयामी उपक्रम किये हैं। ताकि जनता के मन में अध्यात्म एवं धर्म के प्रति आकर्षण जाग सके। अध्यात्म ही एक ऐसा तत्व है, जिसको उज्जीवित और पुनप्र्रतिष्ठित कर भारत अपने खोए गौरव को पुन: उपलब्ध कर सकता है। जैन संतों एवं आचार्यों का इस दृष्टि से महनीय योगदान है। उन्हीं में एक नाम है श्वेतपिच्छाचार्य आचार्य श्री विद्यानंदजी मुनिराज। वे प्रमुख विचारक, दार्शनिक, संगीतकार, संपादक, संरक्षक, महान् तपोधनी, ओजस्वी वक्ता, प्रखर लेखक, शांतमूर्ति, परोपकारी संत हैं। जिन्होंने अपना समस्त जीवन जैन धर्म द्वारा बताए गए अहिंसा, अनेकांत व अपरिग्रह के मार्ग को समझने व समझाने में समर्पित किया है। जिन्होंने भगवान महावीर के सिद्धान्तों को जीवन-दर्शन की भूमिका पर जीकर अपनी संत-चेतना को सम्पूर्ण मानवता के परमार्थ एवं कल्याण में स्वयं को समर्पित करके अपनी साधना, सृजना, सेवा, एवं समर्पण को सार्थक पहचान दी है। वे आचार्यरत्न श्री देशभूषणजी महाराज के परम शिष्य हैं और उन्हीं की प्रेरणा एवं मार्गदर्शन से कई कन्नड़ भाषा में लिखे हुए प्राचीन ग्रंथों का सरल हिन्दी व संस्कृत में अनुवाद कर चुके हैं। उनका नाम न केवल जैन साहित्य में अपितु सम्पूर्ण हिन्दी साहित्य में एक प्रमुख हस्ताक्षर के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

कर्नाटक के सीमांत ग्राम शेडवाल में 22 अप्रैल, 1925 को एक शिशु का जन्म हुआ। शेडवाल ग्राम के वासियों व शिशु की माता सरस्वती देवी और पिता कल्लप्पा उपाध्ये ने कल्पना भी न की होगी कि एक भावी निग्र्रंथ सारस्वत का जन्म हुआ है। यही शिशु सुरेन्द्र कालांतर में आगे चलकर अलौकिक दिव्यपुरुष मुनि विद्यानंद बने। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जब संपूर्ण विश्व कलह, क्लेश, अज्ञान, हिंसा और अशांति की समस्याओं से जूझ रहा था, ठीक उसी समय उनके आध्यात्मिक नेतृत्व में मानवता व विश्वधर्म अहिंसा की पताका लेकर आगे बढ़ा। कन्नाौज (उत्तर प्रदेश) में स्थित दिगम्बर जैन ‘मुनि विद्यानन्द शोधपीठ’ की स्थापना उन्हीं के नाम पर की गई है जो की आज भी प्राचीन भाषाओं से सम्बन्धित शोध का अनूठा संस्थान है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवम् विद्वान साहू शांतिप्रसाद जैन और डॉ. जयकुमारजी उपाध्याय उन्हीं के परम शिष्यों में से है। दिल्ली स्थित ‘अहिंसा स्थल’ एवं कुंदकुंद भारती की स्थापना भी उन्हीं के करकमलों द्वारा की गई है। ऐसे अनेक संस्थानों एवं उपक्रमों के आप प्रेरक रहे हैं।

आज भी ऐसी किवदंती है कि तपस्या देखनी हो तो आचार्य विद्यासागरजी की और ज्ञान देखना हो तो आचार्य विद्यानंदजी का। सृजनात्मक दृष्टि, सकारात्मक चिंतन, स्वच्छ भाव, सर्वोत्तम साध्य, सघन श्रद्धा, शुभंकर संकल्प, शिवंकर शक्ति, सम्यक पुरूषार्थ, श्रेयस अनुशासन, शुचि संयम, सतत् ज्ञानोपयोग-इन सबके सुललित समुच्चय का नाम है आचार्य श्री विद्यानंदजी मुनिराज। वे इक्कीसवीं शताब्दी को अपने विलक्षण व्यक्तित्व, अपरिमेय कर्तृत्व एवं क्रांतिकारी दृष्टिकोण से प्रभावित करने वाले युगद्रष्टा ऋषि, महर्षि, राजर्षि एवं ब्रह्मर्षि हैं। जितनी अलौकिक हैं उनकी साधना, उतने ही अलौकिक हैं उनके अवदान। नैतिक और चारित्रिक मूल्यों की प्रतिष्ठा एवं शांत-संतुलित व्यक्तित्व का निर्माण उनके जीवन का मिशन है। उन्होंने जहां एक ओर जैन धर्म में विकास के नए क्षितिज उन्मुक्त किए वहीं दूसरी ओर जैनधर्म को जनधर्म बनाकर अभिनव धर्मक्रांति की। उन्होंने धर्म को ग्रंथों, पंथों और धर्मस्थानों से निकाल कर जीवन व्यवहार का अंग बनाने का श्लाघनीय प्रयत्न किया।

आचार्य विद्यानंदजी के बचपन का नाम सुरेन्द्र था, उनका बचपन अनेक कष्टोंभरा रहा।  उन्हें मात्र भौतिक उपलब्धियों से कभी संतोष नहीं हुआ। उसके मन में चलने वाला अंतद्र्वंद्व उसे किसी बड़े उद्देश्य की दिशा में बढ़ाने का स्मरण कराता रहता था। अपने असली लक्ष्य की तरफ बढ़ते जाने को उनकी इच्छा अडिंग थी। धर्म की तरफ उनका रूझान और वैराग्य वृत्ति बचपन में भी स्पष्ट नजर आती थी। आजीविका की तलाश में वह पुणे पहुंचे। वहां उन्हें अपने मौसाजी की मदद से सैन्य सामग्री बेचने वाले कारखाने में काम मिल गया। इसे भाग्य की विडम्बना नहीं तो क्या कहा जाए कि जिसे भविष्य में अहिंसा का उपदेश देना था, उन्हें अपनी आजीविका के लिए हथियारों के कारखाने पर निर्भर होना पड़ा। कुछ दिनों बाद ही उन्हें एक बिस्कुट फैक्टरी में काम मिल गया। पुणे में रहते हुए, सुरेन्द्र व्यापक वैचारिक संपर्क में आए। राष्ट्र के मुक्ति युद्ध में शामिल हो गए। वे गांधीजी के विचारों से प्रभावित हुए और ये विचार उनके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा बन गए। लेकिन बीमारी के कारण वे शेडवाल पहुंच गये वहां उनका सारा समय चिंतन मनन में बीतने लगा। गंतव्य को पहचानने और अंधकार को चीरकर प्रकाश में आने की तड़प उनमें थी। नये कर्तव्य पथ और उदात्त जीवनशैली की खोज के लिए उनके मन द्वारा भी खोज का अनवरत क्रम जारी था। सन् 1942 में जब भारत छोड़्ों का देशव्यापी आंदोलन चला तो सुरेन्द्र भी इसके आह्वान से अछूते नहीं रहे सके।

संसार के अनुभवों ने, जो प्राय: कड़वे थे, उन्हें अनासक्ति की ओर मोड़ दिया। वैराग्य और ज्ञान के पथ पर सुरेन्द्र की निर्णायक यात्रा शुरू हो गई, यह सन् 1945 की बात थी। अगले ही वर्ष 1946 में एक अद्भुत संयोग हुआ। संयमपूर्ति ज्ञानसूर्य महामुनि आचार्यश्री महावीरकीर्ति जी ने शेडवाल में वर्षायोग किया। आत्मिक शांति के इस मनोज्ञ अवसर से मानो सुरेन्द्र का पुनर्जन्म ही हुआ। सुरेन्द्र प्रतिदिन आचार्यश्री के वचन सुनते और आत्मा के आनंद में निमग्न हो जाते। यहीं से आपमें बैराग्य का अंकुर प्रस्फुटित हुआ। आधुनिक वेशभूषा में रहने वाले इस क्रांतिकारी युवक ने सादगी को अपना जीवन क्रम बना लिया। परिचित, मित्र व परिजन इस परिवर्तन को देखकर चिंतित हुए परन्तु कोई भी सुरेन्द्र के मन की थाह नहीं पा सका। नियमित रूप से ज्ञान साधना के लिए आने वाले इस सुंदर युवक की तरफ आचार्यश्री महावीरकीर्ति जी का ध्यान जाना स्वाभाविक था। सुरेन्द्र की ज्ञान पिपासा और तर्कणा शक्ति ने उन्हें प्रभावित किया। वे बड़े प्रेमपूर्वक सुरेन्द्र से चर्चा करते और उसके विचारों को सुनकर हर्षित होते। एक दिन बातों ही बातों में सुरेन्द्र ने आचार्यश्री के सामने मुनि दीक्षा लेने की इच्छा प्रकट की। आचार्यश्री महावीर कीर्तिजी ने 21 वर्ष की तरूणावस्था फाल्गुन सुदी तेरस 1946 को उनको वर्णी दीक्षा क्षुल्लक पाश्र्वकीर्ति के नाम से दी। सन् 1946 कुंडपुर से 1962 तक वे शिमोगा में अपने 17 चातुर्मास पूर्ण करने के उपरांत उन्होंने दिगम्बर मुनि दीक्षा लेने की इच्छा प्रकट की। 17 साल के कठोर तप एवं जैन आचार्य संघ के अनुशासन और मार्गदर्शन में दिल्ली के चांदनी चैक क्षेत्र की लच्छूमलजी धर्मशाला, 10 जुलाई 1963 को पूज्य आचार्यरत्नश्री देशभूषणजी महाराज के समक्ष क्षुल्लक पाश्र्वकीर्ति ने मुनि दीक्षा प्रदान करने के लिए प्रार्थना की तो उन्होंने बृहस्पतिवार, 25 जुलाई 1963 को क्षुल्लक पाश्र्वकीर्तिजी को एक भव्य आयोजन कर विधि विधानपूर्वक मुनि विद्यानन्द के रूप में दीक्षा दी और अपने संघ में सम्मिलित कर लिया। 8 दिसंबर 1974 में एक आयोजन के तहत दिल्ली में आचार्य रत्न श्री देशभूषणजी ने उन्हें उपाध्याय के रूप में सम्मानित किया, उन्होंने ही 17 अगस्त 1978 को दिल्ली में भव्य आयोजन के तहत एलाचार्य उपाधि प्रदान की। तत्पश्चात 28 जून, 1987 को एक भव्य आयोजन में मुनि विद्यानंदजी को आचार्य पद प्रदान किया। आचार्य विद्यानंदजी के पुरूषार्थी जीवन की एक पहचान है गत्यात्मकता। वे अपने जीवन में कभी कहीं रूके नहीं, झुके नहीं। प्रतिकूलताओं के बीच भी आपने अपने लक्ष्य का चिराग सुरक्षित रखा। इसीलिये उनकी हर सांस अपने दायित्वों एवं कत्र्तव्यों पर चैकसी रखती है। प्रयत्न पुरूषार्थ बनते हैं और संकल्प साधना में ढ़लते हैं। उनके संयम जीवन के छह दशक के विकास की अनगिनत उपलब्धियां आज जैन शासन के उज्ज्वल इतिहास का स्वर्णित पृष्ठ बन चुकी हैं। आपने शिक्षा, साहित्य, शोध, सेवा, संगठन, संस्कृति, साधना सभी के साथ जीवन-मूल्यों को तलाशा, उन्हें जीवनशैली से जोड़ा और इस प्रकार पगडंडी पर भटकते मनुष्य के लिये राजपथ प्रशस्त कर दिया। उनका जीवन विलक्षण विविधताओं का समवाय है। वे असांप्रदायिक धर्म के मंत्रदाता और आध्यात्मिक जीवनमूल्यों के अधिष्ठाता हैं। व्यष्टि और समष्टि के हित के लिए सर्वतोभावेन समर्पित हैं। उनका कार्यक्षेत्र न केवल वैयक्तिक है और न केवल सामाजिक। उन्होंने व्यक्ति और समाज दोनों की शुद्धि के लिए तीव्र प्रयत्न किए।

आचार्य विद्यानंदजी अपनी कठिन दिनचर्या, संयम और तपस्या के बल पर इस युग के महान जैन संतों में गिने जाते हैं। अपना सम्पूर्ण भावी समय कठोर ध्यान और साधना को समर्पित करने हेतु आपने अपने परम शिष्य आचार्य श्रूतसागरजी मुनिराज को अपना उत्तराधिकारी बनाने की घोषणा कुंदकुंद भारती के पदाधिकारियों की बैठक के दौरान दिनांक 18 मार्च, 2018 को की। इस तरह सारे विशेषणों से मुक्त होकर आचार्य विद्यानंदजी ने यह दिखा दिया कि साधना की भूमिका पर उपाधियां और पद कैसे छूटती हैं। सचमुच! यह घोषणा इस सदी के राजनेताओं के लिये सबक है जिनके जीवन में चरित्र से भी ज्यादा कीमती पद, प्रतिष्ठा, प्रशंसा और पैसा है। सचमुच हमें गर्व और गौरव है कि हमने उस सदी में आंखें खोलीं जब आचार्य विद्यानंदजी जैसी पवित्र संतचेतना इस धरती पर अवतरित है, अपनी अलौकिक आध्यात्मिक आभा से मानवता का मार्गदर्शन कर रही है।

 

ललित गर्ग

 

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