ब्रेकिंग न्यूज़

आबादी विस्फोट पर नियंत्रण के आगे-पीछे

आबादी विस्फोट पर नियंत्रण के आगे-पीछे

आबादी नियंत्रण के लिए लाल किलेे की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश से अपील करने के बाद जनसंख्या विस्फोट को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। देश में छोटा परिवार रखने और जन्मदर घटाने को लेकर चिंताएं पहले भी सार्वजनिक होती रही हैं, लेकिन इस ओर एक बार फिर देश का ध्यान गंभीरता से गया है। चूंकि आबादी की बढ़ोतरी को लेकर देश में अन्य समुदायों की बजाय मुस्लिम समुदाय पर ज्यादा निशाना साधा जाता रहा है, लिहाजा मुस्लिम समुदाय के कम पढ़े-लिखे वर्ग को प्रधानमंत्री की इस अपील को लेकर संशयी बनाने की राजनीति भी शुरू हो गई है। कहा जाने लगा है कि तीन तलाक कानून बनाने और जम्मू-कश्मीर को लेकर संविधान के अनुच्छेद 370 के कुछ अंशों को हटाने के बाद मोदी सरकार का अगला लक्ष्य आबादी नियंत्रण कानून बनाकर मुस्लिम समुदाय को नियंत्रित करना है। हालांकि यह सोच एकांगी ही है। जनसंख्या नियंत्रण को लेकर राजनीति अतीत में भी होती रही है, लेकिन जिस तरह से संसाधनों की कमी होती जा रही है और तमाम आर्थिक विकास के बावजूद अब भी गरीबी और कुपोषण के साथ ही कम सहूलियतों में जीने वाली आबादी की संख्या में खास गिरावट नहीं आ रही है, उसकी वजह से अपनी जनसंख्या के विस्फोट की तरफ गंभीरता से ध्यान देने का वक्त आ गया है। जनसंख्या नियंत्रण को लेकर प्रधानमंत्री की चिंताओं को समुदाय विशेष की राजनीति की बजाय गरीबी और देश के खुशहाल भविष्य की उम्मीदों से जोड़कर देखा जाना चाहिए।

जनसंख्या विस्फोट से भारत के सामने आ रही चुनौतियों की तरफ भी देखना होगा। 1951 में भारत की आबादी सिर्फ 36 करोड़ थी, जो बढ़कर अब करीब 130 करोड़ हो गई है। जाहिर है कि इस जनसंख्या बढ़ोत्तरी के पीछे एक बड़ी वजह अपने यहां बढ़ती जीवन प्रत्याशा और स्वास्थ्य सुविधाओं की आजादी के पहले की तुलना में बेहतर स्थिति भी है। लेकिन जनसंख्या बढ़ोत्तरी की एक बड़ी वजह देश में रही गरीबी और वक्त से पहले शादियां भी रही हैं। गरीब परिवार मानते रहे हैं कि उनके पास ज्यादा बच्चे होंगे तो उनकी कमाई के स्रोत भी ज्यादा होंगे। इसी तरह कम व्यय में होने वाली शादियों की वजह से भी ज्यादा बच्चे पैदा होते रहे हैं। समाजशास्त्री मानते हैं कि अगर विवाह की उम्र 18 से बढ़ाकर 28 कर दी जाय तो जन्मदर में करीब आधी की गिरावट आ सकती है। भारत में जन्मदर बढऩे की एक और भी वजह रही है। पितृप्रधान भारतीय समाज में हाल के दिनों तक तमाम परिवारों की अवधारणा रही है कि बेटा ही उसे मोक्ष दिला सकता है। वंश चलाने के लिए भी बेटे को ही प्राथमिकता दी जाती रही है। इसलिए कई परिवारों में बेटे की चाहत में कई बेटियां भी होती रही हैं।

शायद यही वजह है कि लाल किले के प्राचीर से प्रधानमंत्री को कहना पड़ा कि छोटा परिवार रखना भी देशभक्ति है। प्रधानमंत्री मोदी ने जनसंख्या दर को सीमित करने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा, ‘सीमित परिवारों से न सिर्फ खुद का बल्कि देश का भी भला होने वाला है। जो लोग सीमित परिवार के फायदे को समझ रहे हैं, वे सम्मान के पात्र हैं। घर में बच्चे के आने से पहले सबको सोचना चाहिए कि क्या हम उसके लिए तैयार हैं।’ प्रधानमंत्री मोदी ने आबादी नियंत्रण के लिए छोटे परिवार पर जोर देते हुए यह भी कहा कि आबादी समृद्ध हो, शिक्षित हो तो देश को आगे बढऩे से कोई नहीं रोक सकता। उन्होंने जनसंख्या विस्फोट को शिक्षा और रोजगार से जोड़ते हुए कहा कि आबादी को शिक्षित और स्वस्थ रखना जरूरी है। लाल किलेे के प्राचीर से जनसंख्या विस्फोट को लेकर समाजशास्त्रियों और अर्थशास्त्रियों की चिंताओं को ही जाहिर किया। भारत में जिस तरह से आबादी बढ़ रही है, उसकी वजह से माना जा रहा है कि 2027 तक भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश बन जाएगा। भारत के लोगों की स्थिति का आकलन इसी तथ्य से किया जा सकता है कि दुनिया के भौगोलिक क्षेत्रफल का सिर्फ 2.4 प्रतिशत ही भारत के पास है, जबकि उसके पास दुनिया की आबादी की 17.5 फीसद है। जाहिर है कि देश का भौगोलिक क्षेत्रफल स्थिर होने के कारण उपलब्ध संसाधनों पर ही अधिक दबाव पड़ रहा है। भारत में आबादी के घनत्व को समझने के लिए दूसरे देशों की आबादी के घनत्व को भी देखना होगा। अमेरिका में जहां प्रति वर्ग किलोमीटर 35 लोग रहते हैं, वहीं चीन में 146, जबकि भारत में 441 लोग रहते हैं।

भारत में हालांकि आबादी दर में भी गिरावट आई है। बीते कुछ दशकों की तुलना में आबादी दर में गिरावट के आंकड़े इसके गवाह हैं। वर्ष 1991 की जनगणना में आबादी में 23.87 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई थी, जो 2001 में घटकर 21.54 फीसद रह गई और वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार बीते एक दशक में आबादी 17.64 फीसदी बढ़ी। जनसांख्यिकी के जानकारों का मानना है कि अगले दशक में इस वृद्धि दर में और गिरावट देखने को मिलेगी। लेकिन यह गिरावट भारत के उपलब्ध संसाधनों के अनुपात में कम है। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, उड़ीसा जैसे राज्यों में जिस तरह से जनसंख्या बढ़ी है, उसका ग्रामीण बसावट पर भी असर पड़ा है। अब कई गांव बढ़ते-बढ़ते एक-दूसरे में सिमट गए हैं। चूंकि बढ़ती आबादी के मुकाबले संसाधन और रोजगार उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं, इसलिए महानगरों की तरफ पलायन का रूझान बढ़ा है। इसकी वजह से महानगरों में स्लम यानी झुग्गियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। सरकार के ही आंकड़ों के मुताबिक जितनी आबादी आजादी के वक्त थी, उससे ज्यादा यानी करीब 40 करोड़ लोग अब भी गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करने को मजबूर हैं। बढ़ती आबादी ही बड़ी वजह है कि पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की तरफ बढ़ते देश की प्रति व्यक्ति आबादी विकसित देशों की तुलना में बेहद कम है। अमेरिका में जहां प्रति व्यक्ति सालाना आमदनी 55 हजार डॉलर और चीन में 7820 डॉलर है, वहीं भारत में प्रति व्यक्ति सालाना आमदनी महज 1550 डॉलर है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री को इसकी तरफ देश का ध्यान दिलाना पड़ रहा है।

1

प्रधानमंत्री के समक्ष बीजेपी के नेता अश्विनी उपाध्याय ने जनसंख्या नियंत्रण पर अपना प्रस्तुतिकरण दिया था। उस वक्त उन्होंने प्रधानमंत्री के सामने कुछ आंकड़े भी पेश किए थे। जिनके मुताबिक जनसंख्या के विस्फोट की वजह से देश के सामने क्या-क्या चुनौतियां आ रही हैं। अश्विनी उपाध्याय के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में भारत की बुरी हालत का मुख्य कारण भी जनसंख्या विस्फोट है। वैश्विक भूख सूचकांक में भारत 103, साक्षरता दर में 168, वल्र्ड हैपिनेस इंडेक्स में 140, मानव विकास सूचकांक में 130, सामाजिक विकास सूचकांक में 53, युवा विकास सूचकांक में 134, गृहहीन सूचकांक में 8, लिंग असमानता में 76, न्यूनतम वेतन में 64, रोजगार दर में 42, जीवन गुणवत्ता सूचकांक में 43, वित्तीय विकास सूचकांक में 51, करप्शन परसेप्शन इंडेक्स में 78, रूल ऑफ लॉ इंडेक्स में 66, पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक में 177 तथा प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद में 139वें पायदान पर है। जबकि भूजल दोहन में हम दुनिया में पहले स्थान पर हैं, जबकि हमारे पास पीने योग्य पानी मात्र 4 फीसद ही है। जाहिर है कि इन समस्याओं पर कम आबादी के जरिए काबू पाया जा सकता है।

ग्रामीण जनजीवन के मशहूर ललित निबंधकार विवेकी राय अक्सर कहा करते थे कि देश की ज्यादातर समस्याओं की जड़ इसकी बढ़ती हुई जनसंख्या है। बढ़ती जनसंख्या पर काबू पाने की वकालत हर वह समझदार नागरिक करता रहा है, जो देश की चिंताओं और आमजन की बदहाली से वाकिफ है। लेकिन इसे लेकर राजनीति भी शुरू हो गई है। राजनीति तो 1975 में भी हुई थी। जब जनसंख्या नियंत्रण को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल के दिनों अपने बेटे संजय गांधी की पहल पर नसबंदी अभियान चलाया था। उस दौरान सरकारी कर्मचारियों को नसबंदी कराने का कोटा निर्धारित कर दिया गया था। उस कार्यक्रम का मकसद तो नेक था, लेकिन उसका कार्यान्वयन गलत ढंग से किया गया। आपातकाल की आड़ में सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों और पुलिसवालों ने अपना कोटा पूरा करने के लिए अविवाहित और नाबालिग बच्चों से लेकर बूढ़ों तक की नसबंदी करा दी। एक आंकड़े के मुताबिक उस वक्त 62 लाख लोगों की देशव्यापी नसबंदी की गई। बहरहाल अपात्रों और गैर जरूरी लोगों की नसबंदी ने आपातकाल के अत्याचारों से त्रस्त देश के आक्रोश को बढ़ाने में मदद की। यह मानने में गुरेज नहीं होना चाहिए कि अगर उस समय ही तार्किक और नियमबद्ध ढंग से नसबंदी और परिवार नियोजन की व्यवस्था लागू की गई होती तो देश को जनसंख्या विस्फोट के आज के भयावह दृश्य से अब तक बचाया जा चुका होता। बहरहाल प्रधानमंत्री की कोशिश का भारतीय जनता पार्टी के मार्गदर्शक मंडल के नेता और हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री शांताकुमार ने भी स्वागत किया है। उन्होंने कहा है कि जनसंख्या विस्फोट ही वह वजह है, जिसकी वजह से तमाम विकास के बावजूद भारत की 18 करोड़ आबादी को अब भी भूखे पेट सोना पड़ता है। हालांकि इन बयानों को भी एक समुदाय विशेष की आबादी से जोड़कर देखा जाएगा। खासतौर पर मुस्लिम समुदाय को आंदोलित करने की कोशिशें होंगी। जबकि मुस्लिम समुदाय का भी पढ़ा-लिखा वर्ग मानने लगा है कि छोटा परिवार ज्यादा सहूलियत की गारंटी है। वैसे अब तक जैसी राजनीति होती रही है, उसमें बहरहाल यह भी सच है कि भारत की जनसंख्या वृद्धि की दर धीमी हो रही है और महिलाओं की प्रजनन दर यानी टोटल फर्टिलिटी रेट में भी गिरावट दर्ज की गई है। यह तथ्य खुद संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष भी स्वीकार कर रहा है। इसके भारत में राष्ट्रीय कार्यक्रम अधिकारी डॉ देवेन्द्र सिंह के मुताबिक 1990 के दशक में महिलाओं की प्रजनन दर 3.6 बच्चे प्रति महिला थी, लेकिन अब यह घटकर 2.2 रह गई है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के मुताबिक जनसंख्या में बढ़ोत्तरी के नजरिए से आदर्श दर, 2.1 है। जाहिर है कि भारत की प्रजनन दर आदर्श दर के बेहद नजदीक है।

यह तो जनसंख्या विस्फोट का एक पक्ष है। लेकिन यह भी सच है कि बढ़ती आबादी को रोकने के बाद आने वाले दिनों में कुछ चुनौतियां भी बढ़ेंगी। इन चुनौतियों की एक झलक पिछले संसद सत्र में पेश आर्थिक समीक्षा में भी दिखी। इसके मुताबिक जनसंख्या में 19 वर्ष की आयु वर्ग के युवाओं की संख्या 2011 के उच्चतम स्तर 41 प्रतिशत से घटकर 2041 में 25 प्रतिशत रह जाएगी। दूसरी ओर आबादी में 60 वर्ष की आयु वर्ग वाले लोगों की संख्या 2011 के 8.6 प्रतिशत से मुकाबले 2041 तक 16 प्रतिशत पर पहुंच जाएगी। इसी तरह कामगार आबादी की संख्या 2021-31 के बीच 97 लाख प्रति वर्ष की दर से बढ़ेगी और 2031-41 के बीच यह घटकर 42 लाख प्रति वर्ष रह जाएगी। आर्थिक समीक्षा के मुताबिक, इसकी वजह से 2021-41 की अवधि में श्रम बल की हिस्सेदारी के रूझानों के हिसाब से सरकार को अतिरिक्त रोजगार के अवसर सृजित करने होंगे, ताकि श्रम बल में सलाना हो रही बढ़ोतरी के हिसाब से रोजगार भी उपलब्ध कराए जा सकें। आर्थिक समीक्षा के मुताबिक जनसंख्या के स्वरूप में बदलाव से भविष्य में स्कूलों, स्वास्थ्य सेवाओं और सेवानिवृत्ति की आयु तय करने जैसी बाते होगी। 2021-41 के बीच देश में स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या 18.4 प्रतिशत घट जाएगी। इसकी वजह से छात्रों के अनुपात में स्कूलों की संख्या बढ़ जाएगी, इससे कई प्राथमिक स्कूलों को एक साथ मिलाना पड़ जाएगा। आर्थिक समीक्षा के मुताबिक, स्वास्थ्य सेवाएं आज भी बड़ी चुनौती हैं। यदि देश में अस्पताल की सुविधाएं मौजूदा स्तर तक बनी रही तो अगले दो दशक में जनसंख्या वृद्धि दर में गिरावट के बावजूद बढ़ती आबादी के कारण प्रति व्यक्ति अस्पताल के बिस्तरों की उपलब्ध बहुत कम हो जाएगी।

बहरहाल इन सब चुनौतियों और समस्याओं के बावजूद यह तय है कि जनसंख्या नियंत्रण कानून पर राजनीति तेज होगी। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि अब भी देश की बड़ी आबादी के लिए अकेले केंद्र सरकार को ही करीब 2.32 लाख करोड़ की सब्सिडी मुहैया करानी पड़ती है। जिस वर्ग को यह सब्सिडी मिलती है, उस वर्ग पर कुछ दलों की राजनीति ज्यादा निर्भर है। लिहाजा वे जनता को यह समझाने की कोशिश करेंगे कि जनसंख्या नियंत्रण का कानून यदि बनता है तो वह उनके हक को मारने की कोशिश होगी। हालांकि उम्मीद की जानी चाहिए कि बढ़ती जनसंख्या की चुनौतियों से देश का एक बड़ा वर्ग समझदार बन चुका है। समझदारी ही है कि 1991 के दशक के मुकाबले 2011 के दशक में जनसंख्या वृद्धि दर में 3.9 प्रतिशत की गिरावट आई है। इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री की अपील के मुताबिक देश के लोग बढ़ती जनसंख्या की भयावहता को समझेंगे और छोटे परिवार की दिशा में कदम उठाएंगे।

उमेश चतुर्वेदी

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.