आस्तीन में पलते सांप?

आस्तीन में पलते सांप?

एक तरफ जहां देश 71वां गणतंत्र दिवस मना रहा था तो वहीं दूसरी तरफ संविधान की ओट में कुछ देशविरोधी तत्व देश को तोडऩे की साजिश में लगे है। मजे की बात तो ये है कि देश को तोडऩे वालो का साथ वो लोग भी दे रहे हैं जो ये कहते है कि आजादी में उनके पुरखो ने पसीने के साथ खून भी बहाया था। लेकिन आज वही सवाल के घेरे में है कि आखिर वो इन लोगों की मदद क्यों कर रहे हैं? नागरिकता कानून का विरोध करना गलत नही है लेकिन देश के संविधान को तोडऩा गलत है। संविधान बचाओ के नाम पर ही संविधान को तोड़ा जा रहा है जबकि संविधान में साफ लिखा है कि अगर आपको सरकार से किसी तरह की तकलीफ है तो वो शांति से उसका विरोध कर सकते है। जिस तरह से सीएए को लेकर देश में आगजनी की जा रही है, सरकारी संपत्ति को तोड़ा जा रहा है, उससे ये साफ हो रहा है कि संविधान की आड़ में कुछ और ही सियासत की जा रही है। इतना ही नही बच्चों से पीएम को जान से मारने की धमकी दी जा रही है जो काफी भयावह है। लेकिन ये साजिश रच कौन रहा है, ये सवाल अगर पूछें तो पता चलता है कि ये वही लोग है जिन्हें चुनाव में जनता ने नकार दिया था जो लोग सरकार से सीधे टक्कर नहीं ले पा रहे थे, या यूं कहे कि जिनके पास पीएम मोदी से सीधे टकराने की हिम्मत नहीं है वो पर्दे के पीछे से इस तरह से देश तोडऩे वालो की मदद कर रहे हैं। जो आने वाले दिनो में बहुत बड़ा खतरा बन सकता है।

शाहीन बाग हो या फिर रांची का हज हाउस, देश में नागरिकता संशोधन अधिनियम पर चल रहा बवाल निरर्थक है। उसका कोई औचित्य नहीं है। शाहीन बाग का आंदोलन बहाना है। इसके पीछे सोची-समझी साजिश की बू आ रही है। इसका पर्दाफाश जल्द होना चाहिए। अन्यथा निरर्थक मुद्दों पर भारत में शाहीन बाग जैसा घिनौना खेल जारी रहेगा। पाकिस्तान की रुचि और आंदोलन के लिए विदेशों से बड़ी धनराशि का आना सह-अस्तित्व की भावना और सहिष्णुता के लिए खतरा है।

कहीं न कहीं इस आंदोलन ने देश के सामाजिक तानेबाने को तोडऩे का ही काम किया है। संविधान बचाने की आड़ में जिस तरह की गुंडागर्दी देखने को मिल रही है उससे तो यह साफ दिखता है कि शाहीन बाग के आंदोलन के पीछे इस्लामिक राज्य की स्थापना का एजेंडा नुमाया हो रहा है। आंदोलन के पीछे ऐसा वर्ग है, जो 800 वर्षों के मुस्लिमकाल के शासन की सोच को अपने दिमाग से निकाल नहीं पाया है। यही वर्ग मोदी की दूसरी पारी को पचा नहीं पा रहा। नागरिकता संशोधन अधिनियम से एक भी हिन्दुस्तानी पर कोई आंच नहीं आने वाली। नेशनल रजिस्टर बनाने पर सरकार ने कोई निर्णय नहीं लिया है, उस पर गृह मंत्रालय ने आज साफ भी कर दिया की अभी सरकार की ऐसी कोई मंशा भी नहीं है निकट भविष्य में, तो फिर यह बवाल क्यों है? इस वर्ग के मकसद को समझना जरूरी है। देशवासियों को बैकफुट पर खड़े होने की जरूरत नहीं। यही लोकतंत्र का तकाजा है।

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नागरिकता संशोधन कानून सीएए के खिलाफ भड़काऊ नारेबाजी और हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बीच एक बेहद आपत्तिजनक वीडियो सामने आया है। इस वीडियो में जिस लहजे का इस्तेमाल किया गया है, वह ना सिर्फ हमारे संघीय ढांचे पर प्रहार है बल्कि इस वर्ग के अलगाववादी और विभाजनकारी एजेंडे को भी सामने लाता है।

‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ और आजादी के नारों पर मचे घमासान के बीच जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) के छात्र शरजिल इमाम के इस वीडियो में पूर्वोत्तर और असम को भारत के नक्शे से मिटाने का घृणित मंसूबा बेनकाब हुआ है। यह वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है। वायरल वीडियो में जेएनयू छात्र शरजिल इमाम कहता है, ‘हमारे पास संगठित लोग हों तो हम असम से हिंदुस्तान को हमेशा के लिए अलग कर सकते हैं। परमानेंटली नहीं तो एक-दो महीने के लिए असम को हिंदुस्तान से कट कर ही सकते हैं। रेलवे ट्रैक पर इतना मलबा डालो कि उनको एक महीना हटाने में लगेगा हैं ना हो तो जाएं एयरफोर्स से। असम को काटना हमारी जिम्मेदारी है।’ वीडियो में शरजिल बेहद भड़काऊ भाषा का इस्तेमाल करते हुए कहता है, ‘असम और इंडिया कटकर अलग हो जाएं तभी वह हमारी बात सुनेंगे। असम में मुसलमानों का क्या हाल है, आपको पता है क्या? वहां एनआरसी लागू हो गया है। मुसलमान डिटेंशन कैंप में डाले जा रहे हैंज्6-8 महीनों में पता चलेगा कि सारे बंगालियों को मार दिया गया वहां अगर हमें असम की मदद करनी है तो हमें असम का रास्ता बंद करना होगा।’

अब ऐसे में शाहीन बाग की महिलाओं के विरोध प्रदर्शन का क्या औचित्य रह जाता है? इसलिए जब आंदोलन लंबा खिंचने लगे और उसमें बड़ी धनराशि की दरकार की गुंजाइश दिखाई पडऩे लगे तो उस धन के स्रोत का हर संभव पता लगाकर उस पर उचित कदम उठाने ही चाहिए। यह अफसोसनाक ही है की  आंदोलनकारी इस देश का खाते-पीते हैं और देश के टुकड़े-टुकड़े करने की बात करते हैं। ऐसे लोगों से सावधान रहने की जरूरत है। सरकार को विदेशी फंडिंग की तह में जाकर तत्काल रोक लगानी चाहिए।

नीलाभ कृष्ण

 

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