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इमरान की पाकिस्तानी चाल

इमरान की पाकिस्तानी चाल

युद्ध का परिणाम अन्तोगत्वा विनाश ही होता है। इसलिए अच्छे भविष्य के लिए शांति का मार्ग ही उचित है। यह सही है कि करतारपुर कोरिडोर भारत-पाकिस्तान के बीच बातचीत करने में सहायक है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यह महत्वपूर्ण मुद्दों को हल कर पायेगा? क्योंकि पाकिस्तान आर्मी के चाल-चरित्र में कोई बदलाव नहीं दिख रहा है। ऐसा लग रहा है कि सीमापार से गोलाबारी कर पाकिस्तान का पेट नहीं भरा था, इसलिए अब वह खुलेआम पंजाब में खलिस्तानी आंदोलन को भड़काने में लगा है। यदि हम इतिहास पर नजर डालें तो भारत में संस्कृतिक और धार्मिक संबन्ध काफी गहरे रहे हैं।  यह कई धर्मों का एकदम सही मिश्रण था, और फिर ब्रिटिश सरकार आयी, जिसने अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए पूरे सामाजिक परिदृश्य को ही बदल दिया जिसके परिणामस्वरूप भाईचारे की एकता का विभाजन हो गया। यह स्थिति कभी नहीं बदली और अब तक दोनों देशों के बीच तीन युद्ध हुए, जिसने दोनों तरफ नफरत की दिवार बना डाली।  लेकिन करतारपुर कोरीडोर दोनों के बीच कुछ  शांति ला सकता है। यह मना नहीं किया जा सकता कि इतिहास में पाकिस्तान का रिकॉर्ड भारत के साथ धोखाधड़ी और घृणा से भरा हुआ है। मैं हमेशा आचंभित हो जाता हूं, जब हम पाकिस्तान के साथ सकारात्मक और उद्देश्यपूर्ण जुड़ाव की आशा व्यक्त करते हैं। भारत को विभाजन (1930-1947) से पहले जिन्ना के हाथों में 17 साल  तक पिसना पड़ा था और विभाजन के बाद उनके उत्तराधिकारी के हाथों 71 साल से सामना करना पड़ रहा है। हमने अब तक पाकिस्तान से विश्वासघात, शत्रुता, झड़प, युद्ध, और जिहादी आतंकवाद को ही पाया है। अब तो सिर्फ ऐसा है कि पाकिस्तान के लिए हमारे पास कोई सहानुभूति भी नहीं बची है।

सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि  सीमा पार से करतारपूर कोरीडोर के माध्यम से पंजाबी स्नेह दिखाने का प्रयास किया जा रहा है जो पाकिस्तान की भयावह साजिश के सिद्धांतों पर आधारित है। हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि पाकिस्तान सभी खालिस्तानी आतंकवादियों को पालता है।

करतारपुर कोरिडोर के माध्यम से पाकिस्तान पंजाब में खालिस्तानी आंदोलन को हवा देने का प्रयास कर रहा है और यहां तक कि कोरिडोर के शिलान्यास के समय  खलिस्तानी समर्थक गोपाल चावला को पाकिस्तानी सेना अध्यक्ष जनरल बाजवा के करीब देखा गया। इसलिए डर यह है कि इसे कहीं ‘रेड कोरिडोर’ बनाने का षड्यंत्र न हो। क्योंकि करतारपुर कोरिडोर के पीछे खलिस्तानी आंदोलन को पुनर्जीवित करने का प्रयास लगता है। पाकिस्तान भारतीय सिख समुदाय पर भावनात्मक दबाव बनाकर  खेल खेलना चाहता है। हमें यह याद रखना चाहिये कि आज 71 वर्ष के बाद भी यदि पाकिस्तान कुछ अच्छा कदम उठा रहा है, तो वह भी शांति के लिए नहीं है। भारत को पाकिस्तान में मौजूद कुछ तत्वों के खिलाफ सुरक्षा करने की आवश्यकता है, क्योंकि दर्शन के लिए जा रहे तीर्थयात्रियों के ऊपर सांप्रदायिक सद्भावना में बाधा डालने का प्रयास किया जा सकता है। उदाहरण के लिए हाल ही में पाकिस्तान स्थित गुरूद्वारें में भारतीय राजनायिक के प्रवेश से साफ मना कर दिया गया, जो पाकिस्तान की मानसिकता को दर्शाता है। इसलिए इसे भारत सरकार और सुरक्षा एजेंसियों पर ही छोड़ देना चाहिये। भारत-पाकिस्तान के बीच शांति बनी रहनी चाहिये, लेकिन यह शांति तब तक नहीं बन सकती जब तक पाकिस्तान खुफिया एजेंसी और पाक आर्मी समर्थित आतंकवादी पाकिस्तान में सक्रिय हैं। यदि पाकिस्तान ने कश्मीर में हुर्रियत का प्रयोग किया, तो अब ऐसा लग रहा है कि वह पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू का प्रयोग कर रहा है। यह तो सच है कि सिद्धू अब भी पाकिस्तान की चाल को नहीं समझेंगे। उन्हें लगता है कि वह दूसरे कैप्टन बनने योग्य है, लेकिन वह यह भूल रहे है कि वे इमरान के एलबीडब्ल्यू में फंस गये हैं। यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत यदि शांति चाहता है तो पाकिस्तान को टुकड़ों में बंटना होगा।

Deepak Kumar Rath

  दीपक कुमार रथ

(editor@udayindia.in)

 

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