ईश्वर बिना जीवन

ईश्वर बिना जीवन

जीवन का मूल मंत्र ईश्वर प्राप्ती होना चाहिए। हम यह ना समझकर जीवन को ऐसे ही गुजार देते हैं और जब हमें एहसास होने लगता है। तबतक आधी जिंदगी कट गयी होती है। हम हमारे अच्छे समय में ईश्वर को याद नहीं कर पाते हैं। जो हमारा आर्दश होना चाहिए उसे हम अन्त मानने लगते हैं, ईश्वर के बिना हम मूल्यहीन हो जाते हैं। स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी ने कुछ इस प्रकार की व्याख्या की है। संख्या ‘एक’ के बाद शून्य लगाकर हम कितनी भी संख्या बना सकते हैं। पर यदि उस ‘एक’ को हम मिटा दे तो उन शून्यों का कोई भी मूल्य नहीं होता है। उसी प्रकार जबतक जीव उस एक स्वरूप ईश्वर के साथ युक्त नहीं होता तबतक उसकी कोई कीमत नहीं होती। ईश्वर के संबंध में रहकर ही जगत में सभी वस्तुओं का मूल्य प्राप्त होता है। उसी परमात्मा का सर्वत्र अनुभव करना हर व्यक्ति के लिए आवश्यक है। जैसे लोहा चुम्बक की ओर आकर्षित होता है उसी प्रकार जीव की आत्मा हमेशा परमात्मा के प्रति आकर्षित होना ऐसा उसका स्वभाव है। जैसे ही लोहा कचरा या अन्य कोई पदार्थ से ढक जाता है वह चुम्बक की ओर उतना अधिक आकर्षित नहीं हो पाता है। इसी प्रकार हमारे अंदर आने वाले दुर्गुण हमें ईश्वर की ओर आकर्षित होने से रोकते हैं। जब धीरे-धीरे उन दुर्गुणों से हम बाहर हो जाएगें तो हमारा हृदय अपने आप परमात्मा की ओर जाएगा।

हम अपनी आत्मा के स्वरूप को खुद ही बदल देते हैं। जैसे एक ही चीज को हम भिन्न-भिन्न पोषाक में भिन्न-भिन्न रूप में देखते हैं, पोषाक के अनुसार हम वस्तुओं का मूल्य अंदाज करते हैं। उसी प्रकार अंदर की आत्मा को देखे बैगेर हम प्रत्येक व्यक्ति को उसके बाहरी परिधान से पहचानने की कोशिश करते हैं। हर आत्मा सच्चिदानंद स्वरूप है। हम अहं भाव के कारण विभिन्न उपाधियों में उलझकर अपने यथार्थ को भूल जाते हैं। सहज रूप में समझाने के लिए यह भी मान सकते हैं कि हमारी आत्मा भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में भिन्न-भिन्न किरदार का अभिनय करती है। जब हमारा अभिनय खत्म होने के बाद हम खुद को किरदार से अलग नहीं कर पाते तो हम अपना अस्तित्व खो बैठते हैं। वेदांतवादी कहते है कि आत्मा पूर्ण निर्लिप्त है। सुख-दु:ख, पाप-पुण्य आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकते हैं किन्तु वे देहाभिमान व्यक्तियों को क्लेश दे सकते हैं।  यदि जीवन भर ईश्वर चिंतन का अभ्यास किया जाए तो कठिन समय में भी हम अपने आप को संभाल पाएंगे। ईश्वर को अपने अंदर धारण करना ही जीवन को सुखमय बना सकता है।

उपाली अपराजिता रथ

 

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