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उल्टा चोर कोतवाल को डांटे

उल्टा चोर कोतवाल को डांटे

पिछले दिनों शारदा चिटफंड घोटाले में सबूतों के साथ छेड़छाड़ के आरोपों में फसें कोलकाता के पुलिस आयुक्त राजीव कुमार से पूछताछ करने की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की कोशिश के दौरान जो  हंगामा और प्रदर्शन हुआ उससे पश्चिम बंगाल पुलिस की जो फजीहत हुयी वह अकल्पनीय थी। इस तमाशे का जैसा राजनीतिकरण हुआ वह भी बेहद अरूचिकर रहा। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस धरने प्रदर्शन से यह जाहिर करने की कोशिश की केंद्र की मोदी सरकार अपने संबैधानिक दायरे का उल्लंघन कर रही है  लेकिन ममता ने जिस तरह अपने पुलिस अधिकारियो के बचाव के लिए धरना प्रदर्शन के हथियार को काम में लाया उससे भारत के संघीय ढांचे की एक बेहद ही खराब तस्वीर सामने आयी। इसे महज इत्तेफाक ही नहीं कहा जायेगा की यह तस्वीर तब सामने आयी जब भाजपा नेताओ की रैलियों को लेकर मोदी और ममता सरकार में तनातनी का माहौल चल रहा है। भारत की राजनितिक व्यवस्था एक नए बदलाव से गुजर रही है। अब वो जमाना गया जब भ्रष्टाचार या भ्रष्टाचारियों के खिलाफ गुटबंदी होती थी। अब भ्रष्टाचार या उसमे लिप्त नेताओ का बचाओ करना ही नया सामान्य (न्यू नार्मल) हो गया है। पाठको को याद होगा की पांच साल पहले भारत के ‘युथ आइकॉन’ राहुल गांधी ने एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान अपनी ही मनमोहन सरकार के एक विधेयक की प्रतीकात्मक प्रति को चिन्दी-चिन्दी कर दिया था। वह विधेयक भ्रष्ट और अपराधी नेताओ को तीन साल से ज्यादा की सजा होने पर चुनाव लडऩे से रोकने के उच्चतम न्यायालय के फैसले को बदलने के लिए था।  इस विधेयक का सीधा फायदा उस समय के उनके गठबंधन के साथी लालू प्रसाद यादव को मिलना था। राहुल ने बड़े जोश से उस विधेयक की मुखालफत की थी लेकिन आज उन्हें उन्ही लालू प्रसाद से हाथ मिलाने में कोई गुरेज नहीं है। राहुल को आज भारत के संघीय ढांचे में तमाम खामियां नजर आती हैं लेकिन भ्रष्टाचारियों और आपराधिक चरित्र के नेताओ का साथ देने में कुछ भी गलत नहीं दीखता।

अब सवाल यह है की क्या किसी घोटाले की जांच में जानबूझ कर गड़बड़ी करने वाले अधिकारी से पूछताछ करने से लोकतंत्र, संविधान और संघीय ढांचा खतरे में पड़ जाता है? कम से कम ममता दीदी का तो यही मानना है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल इस मुद्दे पर ममता दीदी के साथ खड़े हैं। कोई भी ममता दीदी से यह पूछने का साहस नहीं कर सकता की ममता भ्रष्टाचार की जांच में गड़बड़ करने के आरोपी को क्यों बचाना चाहती है? इन विपक्षी पार्टियों या यूं कहे महागठबंधन के साथियों को ऐसी गड़बड़ कोशिश का समर्थन करने से भी परहेज नहीं है, यह बात दीगर है को कांग्रेस की पश्चिम बंगाल इकाई कह रही है की राज्य व्यवस्था चरमरा गयी है और वहां तत्काल राष्ट्रपति शासन लागू कर देना चाहिए। 19 जनवरी को कोलकाता में हुयी रैली में जिन  दलों के नेता  शामिल हुए थे उन सबने ममता के समर्थन में बयान दिया। सबने संविधान, लोकतंत्र और संघीय ढांचे पर खतरे की दुहाई दी है। इनमे से किसी ने कभी पश्चिम बंगाल में हो रहे विरोधी दलों के कार्यकर्ताओ की हत्या, पंचायत चुनावों में विपक्षिओं को नामांकन तक ना करने देने और विपक्षी दलों के नेताओ को सभा करने की इजाजत ना देने जैसे मुद्दों पर कभी कुछ बोला है। उन्हें एक घोटाले की जांच को बाधित करने वाले अधिकारी से हो रही पूछताछ से ऐतराज है। इस देश में जहां पूर्व प्रधानमंत्री, तत्कालीन मुख्यमंत्री और पूर्व वायुसेना अध्यक्ष से पूछताछ हो सकती है वहां एक पुलिस अधिकारी से पूछताछ पर इतना बड़ा हंगाम खड़ा करना, किस तरह से सही है यह समझ से पड़े है।

किसी भी मुख्यमंत्री का यह दायित्व होता है कि वह अपने राज्य में शासन व्यवस्था को मजबूत रखे, लेकिन आज बंगाल की हालत बदत्तर होती जा रही है। प्राय: राज्य में साम्प्रदायिक हिंसा, भ्रष्टाचार, दमन, शोषण आदि की खबरें सामने आ रहीं हैं। बंगाल की समूची शासन व्यवस्था ममता की तानाशाही रवैये के चलते ताक पर है। कहना गलत नहीं होगा कि पश्चिम बंगाल की सियासत में वामपंथियों के जाने के बाद निजाम तो बदला है, लेकिन उसके बाद भी वहां की स्थिति जस की तस बनी हुई है। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, हिंसा,  आज भी उसी तरह काबिज हैं, जहां वामपंथी छोड़ कर गये थे।

बंगाल की राजनीति पहले भी रक्तरंजित रहीं है। ममता खुद भी बंगाल में वामपंथियों द्वारा की गयी हिंसा के खिलाफ आवाज उठाती रही हैं। आज उन्हीं की पार्टी के लोग बीजेपी के दफ्तरों पर हमला कर कार्यकर्ताओं को मारपीट रहें हैं और पुलिस चुप्पी साधे तमाशा देख रही है। बंगाल को बदलने का दावा करने वाली ममता, बंगाल को तो अभी तक नहीं बदल पाई, लेकिन खुद उसी रंग में रंग गई हैं, जो वामपंथियों का था।

पिछले साल मालदा की घटना के बाद राज्य की अन्य अनेक जगहों पर छोटी-बड़ी साम्प्रदायिक हिंसा होती रही है। हद तो तब हो गई जब ममता नोटबंदी के विरोध के लिए दिल्ली में डेरा जमाई हुईं थी, उस वक्त बंगाल का धूलागढ़ मुस्लिम समुदाय द्वारा हिन्दुओं पर की जा रही हिंसा की चपेट में तबाह हो रहा रहा था, लेकिन ममता का शासन तंत्र इस हिंसा को रोकने में नाकाम साबित हुआ था। लेकिन इस हिंसा पर भी वो अपने मुस्लिम तुष्टिकरण के एजेंडे के कारण चुप्पी की चादर ओढ़े सोई हुई हैं।

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शारदा घोटाला और ममता

नवम्बर 2014 में जब तृणमूल कांग्रेस के गिरफ्तार सांसद कुणाल घोष ने जेल में नींद की गोलियां खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की तथा उधर उड़ीसा में बीजू जनता दल के सांसद हंसदा को सीबीआई ने गिरफ्तार किया, तब जाकर आम जनता को पता चला कि शारदा चिटफंड घोटाला ऊपर से जितना छोटा या सरल दिखाई देता है उतना है नहीं। इस घोटाले की जड़ें पश्चिम बंगाल से शुरू होकर पड़ोसी उड़ीसा, असम और ठेठ बांग्लादेश तक गई हैं। आरंभिक जांच में पता चला है कि शारदा समूह ने अपने फर्जी नेटवर्क से 279 कम्पनियां खोल रखी थीं, ताकि पूरे प्रदेश से गरीबों के खून-पसीने की गाढी कमाई को चूसकर उन्हें लूटा जा सके। सीबीआई का प्रारम्भिक अनुमान 2500 करोड़ के घोटाले का है, लेकिन जब जांच बांग्लादेश तक पहुंचेगी तब पता चलेगा कि वास्तव में बांग्लादेश के इस्लामिक बैंकों में कितना पैसा जमा हुआ है और कितना हेराफेरी कर दिया गया है। इस कंपनी की विशालता का अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि गरीबों से पैसा एकत्रित करने के लिए इनके तीन लाख एजेंट नियुक्त थे। जिस तेजी से इसमें तृणमूल कांग्रेस के छोटे-बड़े नेताओं के नाम सामने आ रहे हैं, उसे देखते हुए इसके राजनैतिक परिणाम-दुष्परिणाम भी कई लोगों को भोगने पड़ेंगे।

शारदा चिटफंड स्कीम को अंगरेजी में ‘पोंजी’ स्कीम कहा जाता है। यह नाम अमेरिका के धोखेबाज व्यापारी चार्लस पोंजी के नाम पर पड़ा, क्योंकि सन् 1920 में उसी ने इस प्रकार की चिटफंड योजना का आरम्भ किया था, जिसमें वह निवेशकों से वादा करता था कि पैंतालीस दिनों में उनके पैसों पर 50 प्रतिशत रिटर्न मिलेगा और नब्बे दिनों में उन्हें 100 प्रतिशत रिटर्न मिलेगा। भोलेभाले और बेवकूफ किस्म के लोग इस चाल में अक्सर फंस जाते थे क्योंकि शुरूआत में वह उन्हें नियत समय पर पैसा लौटाता भी था। ठीक यही स्कीम भारत में चल रही सैकड़ों चिटफंड कम्पनियां भी अपना रही हैं। बंगाल का शारदा समूह भी इन्हीं में से एक है। ये कम्पनियां पुराने निवेशकों को योजनानुसार ही पैसा देती हैं, जबकि नए निवेशकों को बौंड अथवा पॉलिसी बेचकर उन्हें लंबे समय तक बेवकूफ बनाए रखती हैं। जांच एजेंसियों ने पाया है कि शारदा समूह ने प्राप्त पैसों को लाभ वाले क्षेत्रों अथवा शेयर मार्केट अथवा फिक्स डिपॉजिट में न रखते हुए, जानबूझकर ऐसी फर्जी अथवा घाटे वाली मीडिया कंपनियों में लगाया जहां से उसके डूबने का खतरा हो। फिर इन्हीं कंपनियों को घाटे में दिखाकर सारा पैसा धीरे-धीरे बांग्लादेश की बैंकों में विस्थापित कर दिया गया। एनआईए तथा गंभीर आर्थिक मामलों की जांच एजेंसी एसएफआईओ ने केन्द्र सरकार से कहा है कि चूंकि पश्चिम बंगाल पुलिस उनका समुचित सहयोग नहीं कर रही है, इसलिए कम से कम तीन प्रमुख मीडिया कंपनियों शारदा प्रिंटिंग एंड पब्लिकेशंस प्रा. लि., बंगाल मीडिया प्रा. लि. तथा ग्लोबल ऑटोमोबाइल प्रा. लि. के सभी खातों, लेन-देन तथा गतिविधियों की जांच सीबीआई द्वारा गहराई से की जाए। एसएफआईओ ने अपनी जांच में पाया कि शारदा समूह का अध्यक्ष सुदीप्तो सेन (जो फिलहाल जेल में है) 160 कंपनियों में निदेशक था, जबकि उसका बेटा सुभोजित सेन 64 कंपनियों में निदेशक के पद पर था।

सीबीआई को अपनी जांच में पता चला है कि भद्र पुरूष जैसा दिखाई देने वाला और खासा भाषण देने वाला सुदीप्तो सेन वास्तव में एक पुराना नक्सली है। सुदीप्तो सेन का असली नाम शंकरादित्य सेन था। नक्सली गतिविधियों में संलिप्त होने तथा पुलिस से बचने के चक्कर में 1990 में इसने अपनी प्लास्टिक सर्जरी करवाई और नया नाम सुदीप्तो सेन रख लिया। बांग्ला भाषा पर अच्छी पकड़ रखने तथा नक्सली रहने के दौरान अपने संबंधों व संपर्कों तथा गरीबों की मानसिकता समझने के गुर की वजह से इसने दक्षिण कोलकाता में 2000 लोगों को जोड़ते हुए इस पोंजी स्कीम की शुरूआत की। सुदीप्तो सेन की ही तरह शारदा समूह की विशेष निदेशक देबजानी मुखर्जी भी बेहद चतुर लेकिन संदिग्ध महिला है। इस औरत को शारदा समूह के चेक पर हस्ताक्षर करने की शक्ति हासिल थी। देबजानी मुखर्जी पहले एक एयर होस्टेस थी, लेकिन 2010 में नौकरी छोड़कर उसने शारदा समूह में रिसेप्शनिस्ट की नौकरी आरम्भ की, और सभी को आश्चर्य में डालते हुए, देखते ही देखते पूरे समूह की एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर बन बैठी। शारदा समूह की तरफ से कई राजनैतिक पार्टियों को नियमित रूप से चन्दा दिया जाता था। कहने की जरूरत नहीं कि सर्वाधिक चन्दा प्राप्त करने वालों में तृणमूल कांग्रेस के सांसद ही थे। खुद कुणाल घोष प्रतिमाह 26,000 डॉलर की तनख्वाह पाते थे। इसी प्रकार श्रंजय बोस नामक सांसद महोदय शारदा समूह की मीडिया कंपनियों में सीधा दखल रखते थे। इनके अलावा मदन मित्रा, जो ममता सरकार के परिवहन मंत्री थे इसी समूह में युनियन लीडर बने रहे और इसी समूह में गरीब मजदूरों का पैसा लगाने के लिए उकसाते और प्रेरित करते रहे। ममता बनर्जी की ‘अदभुत एवं अवर्णनीय’ कही जाने वाली पेंटिंग्स को भी सुदीप्तो सेन ने ही अठारह करोड़ में खरीदा था। बदले में ममता ने आदेश जारी करके राज्य की सभी सरकारी लायब्रेरीयों में शारदा समूह से निकलने वाले सभी अखबारों एवं पत्रिकाओं को खरीदना अनिवार्य कर दिया था। सूची अभी खत्म नहीं हुई है, शारदा समूह ने वफादारी दिखाते हुए राज्य के कपड़ा मंत्री श्यामपद मुखर्जी की बीमारू सीमेंट कंपनी को खरीदकर उसे फायदे में ला दिया। ऐसा नहीं कि वामपंथी दूध के धुले हों, उनके कार्यकाल में भी शारदा समूह ने वित्तमंत्री के विशेष सहायक गणेश डे को आर्थिक ‘मदद’ (?) दी थी। शारदा समूह ने पश्चिम बंगाल से बाहर अपने पैर कैसे पसारे? असम के तत्कालीन स्वास्थ्य एवं शिक्षा मंत्री हिमंता बिस्वा सरमा को शारदा की पोंजी स्कीम से लगभग पच्चीस करोड़ रूपए का भुगतान हुआ। असम से पूर्व कांग्रेसी मंत्री मातंग सिंह की पत्नी श्रीमती मनोरंजना सिंह को बीस करोड़ के शेयर मिले, जबकि उनके पिता केएन गुप्ता को तीस करोड़ रूपए के शेयर मिले जिसे बेचकर उन्होंने शारदा के ही एक टीवी चैनल को खरीदा। जांच अधिकारियों के अनुसार जब जांच पूरी होगी, तो संभवत: धन के लेन-देन का यह आंकड़ा दोगुना भी हो सकता है। सभी विश्लेषक मानते है कि गरीबों के पैसों पर यह लूट बिना राजनैतिक संरक्षण के संभव ही नहीं थी, इसलिए कांग्रेस-वामपंथी और खासकर तृणमूल कांग्रेस के सभी राजनेता इस बात को जानते थे, लेकिन चूंकि सभी की जेब भरी जा रही थी, इसलिए कोई कुछ नहीं बोल रहा था। (सभी जानकारी सुरेश चिपलूनकर के ब्लॉग से)

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धरने के बहाने

जाहिर है की लोकसभा चुनाव सामने हैं और ममता नहीं चाहती की चिटफंड घोटाले की जांच इन चुनावों में मुद्दा बने। राजीव कुमार के फंसने से तृणमूल कांग्रेस भी मुसीबत में पड़ सकती है। क्यूंकि सीबीआई ने उच्चतम न्यायालय में कहा है की राजीव कुमार ने कई अभियुक्तों के कॉल डाटा रिकॉर्ड (सीडीआर) से कई नंबर मिटा दिए हैं। जांच एजेंसी ने फोन कंपनियों से जब फिर से डाटा लिए तो इन बातों का खुलासा हुआ। इसके अलावा कोलकाता पुलिस द्वारा की गयी प्रारम्भिक जांच में जो लैपटॉप और अन्य कई चीजें जो मिली थी वो भी जांच एजेंसी को नहीं सौंपा गया है। इन्हीं सब चीजों को लेकर जांच एजेंसी राजीव कुमार से पूछताछ करना चाहती है जिससे वो भाग रहे हैं और ममता उनका सुरक्षा कवच बनी हुई हैं और पूरे मुद्दे को राजनितिक रंग देने में लगी हैं।

यह तो समय ही बताएगा की शारदा घोटाले में तृणमूल के नेताओं की संलिप्तता है की नहीं लेकिन इतना तो सभी मानते हैं की इतना बड़ा घोटाला बिना राजनितिक संरक्षण के हो नहीं सकता। आवश्यकता केवल यह पता लगाने की ही नहीं है की शारदा या उससे जुड़ी कंपनियों के संचालकों को किस हद तक राजनितिक संरक्षण प्राप्त था बल्कि यह भी पता लगाना जरूरी है की कहीं इसमें पुलिस अधिकारीयों की भी तो सहभागिता नहीं थी। इस जांच को अंत तक पहचाना भी इसलिए जरूरी है क्यूंकि ममता जिस तरह से एक पुलिस आयुक्त का बचाव कर रही हैं जैसे वह उनकी पार्टी का एक पदाधिकारी हो। यह भी समझना मुश्किल है की ममता के साथ-साथ चार अन्य पुलिस अधिकारी भी इस धरने पर क्यों बैठे? यह तो पुलिस का खुले रूप से  राजनीतिकरण है। पता नहीं इस मामले में आगे क्या होगा लेकिन पुलिस का इस तरह से राजनीतिकरण ठीक नहीं की उसके वरिष्ठ अधिकारी भी नेताओं के साथ धरने प्रदर्शन पर बैठें।

इस धरने के पीछे एक और मकसद दीखता है। भाजपा विरोधी खेमा या यूं कहे महागठबंधन में प्रधानमंत्री पद के लिए होड़ मची हुयी है। तीन राज्यों में सफलता के बाद कांग्रेस किसी से समझौते के मूड में दिख नहीं रही है और यही बात ममता और अन्य उम्मीदवारों को पसंद नहीं आ रही है। ममता इस धरने के बहाने यह संदेश देना चाह रही हैं की राहुल हो या मायावती, उन सबसे ज्यादा दलों का जुगाड़ वो कर सकती हैं और उनकी उम्मीदवारी का दावा मजबूत होता है। लेकिन खतरनाक बात ये है की इसके लिए उन्होंने देश के संघीय ढांचे जैसे संवेदनशील मुद्दे का कार्ड खेल दिया है। जिस तरह से केंद्रीय एजेंसियों के अधिकारियों और सुरक्षा बलों  को राज्य पुलिस घेर लेती है, उनके साथ धक्का-मुक्की करती है, और सेवा नियमावली के अंतर्गत अखिल भारतीय सेवा के खिलाफ कार्रवाई के केंद्र सरकार के निर्देशों को मानने  से इंकार किया जा रहा है, उससे कौन सी संघीय ढांचा के मजबूत होने की बात की जा रही है, वह समझ से परे है। ज्यादा चिंताजनक बात तो यह है की कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय स्तर की पार्टी भी ऐसे कदमों का समर्थन कर रही है। ऐसे में भारत के संघीय व्यवस्था भविष्य में क्या हालत होगी, यह अंदाजा लगाया जा सकता है।

यह सही है की पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और वामदल अपने हाशिये पर हैं और राज्य में अब भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच सीधी लड़ाई है। ममता इस लड़ाई को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य देना चाहती हैं और यह साबित करना चाहती हैं की भाजपा से लडऩे की कूवत सिर्फ उनमें हैं लेकिन इस तरह से देश के राजनितिक व्यवस्था पर ही हमला करना और उससे केंद्र के माथे थोपना ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ वाली कहावत को सच साबित करना दिखता है।

 

नीलाभ कृष्ण

 

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