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एक्यूप्रेशर चिकित्सा

एक्यूप्रेशर चिकित्सा

एक्यूप्रेशर ऐसी चिकित्सा-पद्धति है, जिससे रोग दूर ही नहीं किये जाते, बल्कि जड़ से मिटा देने का प्रयत्न किया जाता है।

एक्यूप्रेशर-एक भारतीय पद्धति

यह पद्धति प्राचीन भारतीय पद्धतियों में एक है, इस पद्धति का उल्लेख सुश्रुतसंहिता में भी मिलता है तथा हमारे प्राचीन आयुर्वेदाचार्य इसके जानकार थे। हमारे ऋषि-मुनि, साधु-संत एवं गृहस्थ अपने दैनिक जीवन में इस पद्धति को अपनाकर अपना तथा अपने शिष्यों का सहज में उपचार किया करते थे। ध्यान, योग एवं विभिन्न आसनों के परिप्रेक्ष्य में एक्यूप्रेशर आंशिक रूप से सम्मुख आता है। प्राचीन काल से महिलाओं का शरीर के भिन्न-भिन्न अंगों में आभूषण पहनना, गृहकार्यों में सहयोग तथा सामाजिक और धार्मिक रीति-रिवाजों के पीछे भी इसी पद्धति का हाथ माना गया है। स्त्रियों का हाथ में कड़ा पहनना, कपड़े धोना, पैरों में पायल पहनना, गले में हार, ललाट पर चमकती बिंदिया तथा दैनिक कार्यों- जैसे कुएं से पानी खींचना, झुककर वृद्ध जनों के चरण-स्र्पश करना, वन्दना करना आदि भी एक्यूप्रेशर की परिधि आते हैं। ऐसे कार्यों से भारतीय संस्कृति का निर्वाह तो होता ही हैं, साथ में शरीर की विभिन्न मुद्राओं से भी हमारा शरीर स्वस्थ रहता है। भारत में लगभग दस वर्षों से चिकित्सा-पद्धति प्रति व्यापक चेतना जाग्रत् हुई है।

एक्यूप्रेशर क्या है?

सामान्य रूप से मानव-शरीर में स्थित निश्चित बिंदुओं पर दबाव डालकर रोग-निराकरण करने की पद्धति को एक्यूप्रेशर- पद्धति कहा जाता है। एक्यूप्रेशर दो शब्दों से मिलकर बना है। ‘एक्यू’ का साधारण अर्थ है ‘तीक्ष्ण’ और ‘प्रेशर’ का अर्थ है ‘दबाव’। शरीर के निश्चित बिंदुओं पर दबाव डालकर रोग को नष्ट करने की इस पद्धति द्वारा पांव के तलवों तथा हाथ की हथेलियों में स्थित बिंदुओं पर दबाव डालकर रोग का निदान किया जाता है। एक्यूप्रेशर में दबाव तथा एक्यूपंक्चर में सूइयों को प्रयोग में लाया जाता है।

एक्यूप्रेशर के सिद्धांत

इस पद्धति का पहला सिद्धांत है कि प्रत्येक रोग का उपचार शरीर को शारीरिक एवं भावनात्मक रूप से संगठित (Unit) मानकर किया जाता है। एक्यूप्रेशर-पद्धति मनुष्य को शारीरिक एवं भावनात्मक रूप से एक अभिन्न इकाई मानती है।

दूसरा प्रमुख सिद्धांत है कि सभी रक्त-संचार नाडियों, स्नायु-संस्थान एवं ग्रंथियों के अंतिम सिरे हथेली अथवा पगथली (पदतल)- में स्थित होते हैं। इस पद्धति का मुख्य उद्देश्य स्नायु-संस्थान एवं रक्त-संचार को सुव्यवस्थित करना एवं मांसपेशियों को शक्तिशाली बनाना है। जब कोई व्यक्ति अपनी सामथ्र्य को न पहचानकर अपने शरीर के गुणधर्म एवं क्षमता की उपेक्षा कर खान-पान, व्यायाम और निद्रा आदि के नियमों का उल्लंघन करता है, तब उसके शरीर में उत्पन्न द्रव्य रक्त-प्रवाह में अवरोध पैदा करता है। यह अवरोध शरीर के आन्तरिक एवं बाहय् वातावरण के असंतुलन से भी उत्पन्न होता है।

अंगों में रक्त की कमी से शिथिलता आने लगती है। फलत: कार्य-क्षमता घटने लगती है, मांसपेश्यिां मंद पड़ जाती हैं, हाथ और पांव में स्थित मांसपेशियों के ऊतक (ञ्जद्बह्यह्यह्वद्गह्य) निश्चित स्थान हटने लगते हैं। परिणामस्वरूप पैरों स्थित छब्बीस हड्डियों में से कोई भी हडड्ी अपना स्थान छोडऩे लगती है। उससे पैरों स्थित रक्त एवं स्नायु-संस्थान की नाडिय़ों के अंतिम सिरे पर अधिक दबाव पडऩे लगता है और उन संबंधित केन्द्रों के अंगों में नाड़ी ठीक से कार्य नहीं कर पाती। फलत: रक्त-संचार कम हो जाता है एवं रक्त की कमी से रासायनिक तत्त्व, अपद्रव्य (व्यर्थ-पदार्थ) इन हटे हुए जोड़ों के आस-पास जमा होने लगते हैं। जितने अधिक विकार जमा होंगे उतना ही अधिक रोग बढ़ेगा।

जब कोई अंग शिथिल होकर निष्क्रिय हो जाता है, तब हाथ की हथेली और पांव तलवों में स्थित उससे संबंधित सभी बिंदुओं में अवरोध उत्पन्न हो जाता है तथा शक्कर के दानों-जैसे क्रिस्टल जमा हो जाते हैं, जिन्हें ‘टॉक्सिन’ क्रिस्टल भी कहते हैं। नसों (नाड़ी) – के छोर में स्थित ये कण रक्त-प्रवाह को अवरूद्ध करते हैं। एक्यूप्रेशर- पद्धति से इन दबाव-बिंदुओं पर प्रेशर (दबाव) दिया जाता है। इससे अवरोध बने हुए ये कण नष्ट हो जाते हैं और रक्त-प्रवाह व्यवस्थित हो जाने से रोगग्रस्त अंग नीरोग बन जाते हैं।

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अधिकतर लोग तनाव से ग्रसित रहते हैं। एक्यूप्रेशर ज्ञान-तन्तु के कोशों को कार्यरत कर मानसिक तनाव कम करता है और चेतना जाग्रत करके मानव-शरीर में शक्ति उत्पन्न करता है।

एक्यूप्रेशर की तीन शाखाएं हैं- 1- मेरिडीयनोलोजी, 2- जोनोलोजी तथा 3-शिआत्सु।

मेरिडीयनोलोजी- मानव-शरीर पांच महाभूतों से बना है-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश। इन सबका संचालन हमारे शरीर में स्थित प्राणशक्ति होता है। यह प्राणशक्ति चौदह मुख्य मार्गों द्वारा शरीर प्रवाहित होती रहती है, जिन्हें मेरिडीयन लाईन कहते हैं। इस शक्ति के दो गुण-धर्म हैं, जिन्हें ऋणात्मक एवं धनात्मक कहा जाता है। इन दोनों गुण-धर्मों के संतुलन से शरीर आरोग्य एवं इनके असंतुलन से शरीर रोगी हो जाता है। एक्यूप्रेशर इस असंतुलन को दूर करके शरीर रोगमुक्त करता है।

जोनोलोजी- इसके अन्तर्गत शरीर को दस भागों में बांटा गया है। शरीर के मध्यम भाग से पांच भाग बायीं ओर और पांच भाग दायीं ओर होते हैं, जिनके अंतिम सिरे हाथ और पैर की पांचों अंगुलियों में होते हैं। दाहिने भाग के अवयवों में उत्पन्न होने वाले रोगों के प्रतिबिंब दाहिनी हथेली अथवा दाहिनी पगथली (पदतल)- में प्रतिबिम्बित होते हैं तथा बायें भाग के अवयवों में उत्पन्न होने वाले रोगों के प्रतिबिंब बायीं हथेली एवं बायीं पगथली (पदतल)- में प्रतिबिम्बित होते हैं। तात्पर्य यह हे कि जो अवयव जिस जोन में होता है, उसका प्रतिबिंब भी उसी जोन में होता है। इस पद्धति को जोनोलोजी, जोनोथैरेपी या रिफ्लोक्सोलोजी भी कहा जाता है।

जोनोलोजी- इसके अन्तर्गत शरीर को दस भागों में बांटा गया है। शरीर के मध्य भाग से पांच भाग बायीं ओर और पांच भाग दायीं ओर होते हैं, जिनके अंतिम सिरे हाथ और पैर की पांचों अंगुलियों में होते हैं। दाहिने भाग के अवयवों उत्पन्न होने वाले रोगों प्रतिबिंब दाहिनी हथेली अथवा दाहिनी पगथली (पदतल)- में प्रतिबिम्बित होते हैं तथा बायें भाग के अवयावों में उत्पन्न होने वाले रोगों प्रतिबिंब बायीं हथेली एवं बायीं पगथली (पदतल)- में प्रतिबिम्बित होते हैं। तात्पर्य यह है कि जो अवयव जिस जोन में होता है, उसका प्रतिबिंब भी उसी जोन में होता है। इस पद्धति को जोनोलोजी, जोनोथैरेपी या रिफ्लोक्सोलोजी भी कहा जाता है।

शिआत्सु- शिआत्सु में ‘शि’ अर्थात् अंगुली और ‘आत्सु’ का तात्पर्य है दबाव। शरीर में स्थित निधारित दाब-बिंदुओं पर दबाव डालकर रोग-मुक्त करने की पद्धति को शिआत्सु कहते हैं।

‘दाब-बिंदु’ हमारे सारे शरीर पर फैले रहते हैं। किसी भी रोग से मुक्ति दिलाने-हेतु मानव-शरीर के उस अवयव के क्षेत्र-बिंदुओं को दबाव देकर उस रोग से मुक्ति दिलायी जा सकती है।

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मुख्य बीमारियां, जिनमें एक्यूप्रेशर कारगर प्रमाणित होता है

साइटिका, पुराना जुकाम, नजला, स्लिपडिस्क, गर्दन का दर्द, पीठ का दर्द पैरों तथा एडिय़ों का दर्द, पिण्डलियों में ऐंठन, ब्ल्ड-प्रेशर, कब्ज, बदहजमी, गठिया, मासिक धर्म, डिप्रेशन,अनिद्रा, स्मरण-शक्ति, माईग्रेन इत्यादि। एक्यूप्रेशर-चिकित्सा-पद्धति द्वारा उपचार कभी भी, कहीं भी तथा किसी भी समय पर किया जा सकता है, परंतु भोजन करने के एक घंटा पहले तथा एक घंटा बाद ही इस पद्धति पगयोग में लाना श्रेयस्कर है तथा एक दिन में केवल दो बार ही इसको करना चाहिये अन्यथा यह हानिकारक भी सिद्ध हो सकता है।

साभार: कल्याण आरोग्य-अंक

डॉ. बृजेश कुमार साहू

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