एक आदर्श चुनाव घोषणा पत्र

एक आदर्श चुनाव घोषणा पत्र

भारत एक ऐसा देश है जहां हर चीज का मौसम होता है—गेहूं का, चावल का, आम का, संगत्रे का, अंगूर का, गोभी, गाजर का, भिंडी का और बहुत कुछ का। पर यहाँ चुनाव का कोई मौसम नहीं है। वह तो हर समय हो सकता है। एक प्रदेश में चुनाव सम्पन्न होता है तो दूसरे की तैयारी शुरू हो जाती है। पिछले साल नवम्बर में पांच प्रदेशों के चुनाव पूरे हुए कि अब अप्रैल-मई में लोकसभा चुनाव के साथ कुछ प्रदेश विधानसभा चुनाव सिर पर आन खड़े हैं।

और तो सब ठीक है पर जो सबसे ज्यादा परेशान करने वाली चीज है वह है चुनाव घोषणापत्र। हर प्रदेश के लिए अलग-अलग घोषणापत्र बनाना पड़ता है।

एक और मुसीबत है। हमारे राजनीतिक दल एक दूसरे की ओर देखते रहते हैं कि अपने घोषणा पत्र के पिटारे पहले कौन खोलता है। असल में हर राजनीतिक दल का यही प्रयास रहता है कि वह अपने विरोधी से अच्छा चुनाव घोषणापत्र प्रस्तुत करे ताकि मतदाता उससे इतना प्रभावित हो जाए कि वह अपना मत उसी को दे। दूसरे की ओर कोई देखे भी न। उनकी मंशा यही होती है कि यदि दूसरा दल अपना घोषणा पत्र पहले प्रस्तुत कर दे तो विरोधी दल उससे भी ऐसा घोषणा बढिय़ा पत्र कर दे ताकि मतदाता उन्हें देख कर अपना विचार बदल ले और वोट उसी को दें।

वैसे तो हर व्यक्तिऔर पार्टी इसी उम्मीद से चुनाव मैदान में उतरते हैं कि वह जीतेंगे और सरकार बनाएंगे। पर कुछ ऐसे दल भी होते हैं जिन्हें पता होता है कि वह सरकार तो नहीं बना सकते पर चुनाव लड़ते हैं इसलिए कि हो सकता है कि केंद्र व प्रदेश में किसी भी दल को पूर्ण बहुमत न मिले। उस स्थिति में अगर व्यक्ति अकेला या उसके दल को दो-चार सीटें भी मिल गईं तो उनकी कीमत बढ़ जाएगी। उन्हें इस चक्कर में मंत्रिपद और मुंह मांगे विभाग भी मिल सकते हैं। यह लोग इसी उम्मीद से चुनाव लड़ते हैं। ऐसे दल तो अपने चुनाव घोषणापत्र में आसमान से तारे तोड़ कर ला देने का आश्वासन भी दे सकते हैं क्योंकि उनका दल तो जीतेगा नहीं। इसलिए तब अपने वादे पूरा करने का कोई दबाब भी नहीं हो सकता। वह तो जनता को दोषी ठहरा सकते हैं। वह तो मतदाता को कह सकते हैं कि यदि आपने हमें जिताया होता तो हम सब वादे पूरे कर देते।

लेकिन जिन दलों को जीत जाने की उम्मीद होती है वह भी ऐसा जोखिम उठा सकते हैं। अगर कुछ वादे आप पूरा नहीं भी कर पाये तो कई बहाने किए जा सकते हैं। उल्टे वह मतदाता से पांच साल के बाद पूर्ण बहुमत की मांग कर सकते हैं ताकि बाकी वादे पूरे किए जा सकें। वादों को पूरा न कर पाने के लिए कई किन्तु, परन्तु लगाए जा सकते हैं। चुनाव जीतने के लिए शर्तियां बिन्दु बहुत हैं। किसान देश के अन्नदाता है। यह शर्म की बात है कि देश के विभिन्न भागों में प्रतिदिन अनेकों किसान आत्महत्या करते जा रहे हैं। उन्हें शुरू में ही समझाने की बात है कि तुम ऋण तो ले रहे हो पर तुम्हें इसे वापस करने की चिंता नहीं करनी चाहिए। हर पांच साल के बाद जब नए चुनाव आएंगे तो तब तक ये ऋण मुआफ कर ही दिये जाएंगे। कई किसान ऐसे भी होते हैं जो यह बर्दाश्त नहीं कर सकते कि कोई  उनके पास ऋण वापसी के लिए कोई तकाजा करने आए और उनके पास पैसे न हों। तब वह अपनी जमीन बेच कर ही अपना ऋण चुका देते हैं। ऐसी अवस्था में ऐसे किसानों का ऋण ब्याज सहित लौटा दिया जायेगा।

हमारी सरकार बनते ही किसानों पर हर प्रकार के कर्जे मुआफ कर देगी। यह नहीं हो सकता है कि कुछ लोगों ने ऋण का गम भुलाने के लिए शराब पीनी शुरू कर दी हो, उन्हें इसका भी मुआबजा दिया जायेगा।

यदि किसान की फसल फेल हो जाये तो किसानों ने  बीज, खाद, तथा कुछ उपकरणों की खरीद में जो धन लगाया हो उसकी भी प्रतिपूर्ति सरकार द्वारा की जायेगी।

कर्ज में डूबे किसान भाइयों की कन्या और बेटे के विवाह पर खर्च सरकार वहन करेगी। उसके बच्चे जहां तक पढऩा चाहें, उसका बोझ भी सरकार ही उठाएगी।

किसानों द्वारा ट्रैक्टर खरीद पर दी जाने सब्सिडी और बढ़ा दी जाएगी। ट्रैक्टर में जितना भी डीजल खर्च हो वह सरकार मुफ्त देगी। इसी तरह की सुख-सुविधाएं छोटे व मझोले उद्योगों को भी दी जाएंगी।

युवा हमारे देश की उर्जा हैं और उसकी शक्ति। देश की प्रगति व उत्थान में उसका समुचित उपयोग व सहयोग लिया जायेगा।

उनकी शिक्षा व दीक्षा सरकार का उत्तरदायित्व होगा। स्कूल में मैट्रिक तक किसी प्रकार की परीक्षा नहीं ली जाएगी। उसके बाद यदि कोई विद्यार्थी परीक्षा में फेल हो जाता है तो इस असफलता को सफलता में बदलने के लिए उसे तीन मौके दिए जायेंगे। तीसरे प्रयास में उसे सफल ही समझा जायेगा।

महाविद्यालय व विश्वविद्यालय में छात्र संघों को सशक्त किया जायेगा। हमारे युवा व छात्र देश का भविष्य हैं इसलिए उनको अपनी शिक्षा संस्थाओं के माध्यम से देश का भविष्य तय करने के लिए प्रशिक्षित किया जायेगा ताकि बाद में उन्हें कोई दिक्कत पेश न आये। छात्र संघों के चुनावों को संसद के चुनावों की तर्ज पर सम्पन्न किया जायेगा। शिक्षा संस्थाओं को संसद और विधानसभाओं की तर्ज पर चलाया जायेगा। महाविद्यालय के प्रधानाचार्य और विश्वविद्यालय के कुलपति तो बस नाममात्र के मुखिया होंगे। जिस प्रकार शक्ति तो वस्तुत: संसद और प्रधानमंत्री व उनके मंत्रिमंडल के पास निहित होती है उसी प्रकार चुने हुए छात्र संघों के अध्यक्ष व उसके सदस्यों के पास होगी। स्कूलों व कालिजों को वास्तव में जनतंत्र के असूलों के आधार पर विद्यार्थियों का, विद्यार्थियों केलिए विद्यार्थियों द्वारा एक आदर्श संस्था के रूप में विकास किया जाएगा।

हमारे स्कूलों व विद्यालय/विश्वविद्यालयों में हमारी दांस्ता के समय से चली आ रही रोलकाल की व्यवस्था को समाप्त कर दिया जायेगा। पढ़ाई विद्यालय में करनी है या कहीं और, इसका निर्णय करने के लिए विद्यार्थी स्वतंत्र होंगे।

यह निर्णय तो विद्यार्थी संघ करेंगे कि कब पढ़ाई की जाएगी और कब वह छुट्टी करना चाहेंगे। विद्यालय के विद्यार्थी हॉल में नई-नई फिल्में दिखाई जायेगी ताकि विद्यार्थी अपनी पसंद की फिल्में देखने के लिए इधर-उधर भटक कर अपना बहुमूल्य समय बर्बाद करने से बच जाएं। क्योंकि वह व्यस्क हैं और अपना भला-बुरा सोचने में सक्षम हैं, इसलिए समय-समय पर व्यस्क व नंगी फिल्में भी देख सकेंगे।  हमारी पार्टी हर विद्यार्थी को लैपटाप के अतिरिक्त एक बढिय़ा स्मार्ट फोन भी मुफ्त देगी। होस्टलों में मदिरा व सिगरेट पीने पर कोई प्रतिबंध नहीं होगा। विद्यार्थी अपना भला-बुरा सोचने में सक्षम हैं। हॉस्टल चौबीसों घंटे खुले रहेंगे। लड़के व लड़कियां एक दूसरे के होस्टलों में कभी भी और किसी समय भी बेरोकटोक आ जा सकेंगे।

अपने बच्चों को उनकी मर्जी की शिक्षा देना माता-पिता का कर्तव्य बनाया जाएगा। पर व्याह-शादी में उनका कोई दखल नहीं होगा। बच्चे अपनी मर्जी से जहां चाहें, जिससे चाहें शादी कर सकेंगे। क्योंकि शादी बच्चों की होनी है, न कि माता-पिता की। दुर्भाग्यवश अगर बाद में बात तलाक तक पहुंच जाए तो उन्हें अपने घर में संरक्षण देना माता-पिता का कर्तव्य होगा।

व्यस्क महिला-पुरूषों के लिए अपनी मर्जी से विवाह करना अधिक सुगम बनाया जायेगा। इसी प्रकार तलाक की प्रक्रिया को भी आसान बनाया जायेगा। सार्वजानिक स्थानों पर किसी महिला-पुरूष जोड़े से कोई पुलिसवाला उलटे-सीधे प्रश्न न कर सकेगा। परस्पर सहमति से सम्बन्ध बना लेने की हर महिला-पुरूष को स्वतंत्रता होगी। यदि कोई कानून इसमें आड़ आता हो, तो उसे रद्द कर दिया जायेगा।

घरेलु हिंसा विधेयक को और सशक्त कर दिया जायेगा। इस समय इसे महिला पर हिंसा करने तक ही सिमित कर दिया गया है। यदि कोई महिला अपने या दूसरे व्यक्ति पर हिंसा करे, तो इसका सख्ती से संज्ञान लिया जायेगा।

लिव-इन संबंधों को और सुगम बना दिया जायेगा। इसके लाभ बहुत हैं। जब मर्जी चाहो तो इकठ्ठा रह लो और जब चाहो तो बोरी-बिस्तर बांध कर अलग हो जाओ। न विवाह की धूमधाम और व्यय की चिंता।  बात न बने तो तलाक के लिए अदालतों में धक्के खाने की जरूरत नहीं।

महिला आरक्षण विधेयक को हर सरकार लटकाए जा रही है। इसे संसद के पहले सत्र में ही पास करवा दिया जायेगा। हम ऐसी व्यवस्था बनाएंगे जिसमें महिला को पुरूष के समान और पुरूष को महिला के समान अधिकार होंगे। बेरोजगारों को दिया जाने वाला भत्ता सरकारी नौकरी में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों को मिलने वाले वेतन और भत्तों से कम नहीं होगा। हर छ: महीने बाद बढऩे वाला महंगाई भत्ता उनको भी दिया जाएगा।

अविरल बढऩे वाली जनसंख्या पर कोई नियंत्रण नहीं किया जाएगा। कोई भी नियंत्रण मानव के अधिकारों पर कुठाराघात है और व्यक्ति के मानवाधिकारों का उल्लंघन।

पुलिस निर्दोष व्यक्तियों को बहुत परेशान करती रहती है। इस व्यवस्था को सुधारा जाएगा। अपना गुनाह कबूल करवाने के लिए पुलिस निर्दोष लोगों पर कई किस्म के अत्याचार करती है। अब एक व्यवस्था बनाई जाएगी जिसके अनुसार किसी का नाम किसी अपराध में संलिप्त होने के शक पर पुलिस उस व्यक्ति को थाने में नहीं बुला सकेगी। बल्कि पुलिस अफसर उस व्यक्ति के घर जाकर पूछेगा कि क्या आपने चोरी तो नहीं की? डाका तो नहीं डाला? बलात्कार तो नहीं किया? अमुक व्यक्ति की हत्या तो नहीं की? यदि वह व्यक्ति इंकार कर दे तो वह पुलिस अफसर उस व्यक्ति को ‘सौरी’ कहकर एक स्लूट मारकर वापस आ जाएगा। इस प्रकार निर्दोष व्यक्तियों पर पुलिस की अमानवीय व्यवहार पुलिस अत्याचारों पर रोक लग जाएगी।

यदि कोई महानुभाव जेल से ही चुनाव लड़कर विजयी हो जाता है तो जनता की भावनाओं का आदर करते हुये उस

विधायक या सांसद को कैबिनट मंत्री का दर्जा दे दिया जाएगा।

चुनाव घोषणापत्र में बाकी तो घिसे-पिटे आम वादे तो किए ही जा सकते हैं। पर जो पार्टी हमारे द्वारा सुझाए वादे कर देगी वह तो अपने विरोधियों को चारों खाने चित्त कर देगी। यह हमारा भी वादा है।

 

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