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एलोपैथी चिकित्सा लाभ तथा हानि

एलोपैथी चिकित्सा लाभ तथा हानि

एलोपैथी चिकित्सा इस समय सारे संसार में तेजी से फैल रही है। उसके अनुसंधान भी सभी क्षेत्रों में हो रहे हैं, परंतु जिन परिणामों की इस विज्ञान को आशा थी, वे नहीं मिल पा रहे हैं।

एलोपैथी से लाभ

एलोपैथी चिकित्सा से कुछ लाभ होना निर्विवाद है, जैसे यह मनुष्य को तुरंत राहत दिला देती है। मनुष्य यह चाहता है कि मुझे कष्टों से शीघ्र-से-शीघ्र राहत मिल सके। एलोपैथी चिकित्सा उसमें सफल रही है। दूसरा निर्विवाद लाभ सफल शल्यचिकित्सा है। एलोपैथी ने शल्यचिकित्सा में वास्तव में आशातीत सफलता प्राप्त की है। पहले तो परम्परागत औजारों द्वारा शल्यचिकित्सा की जाती थी, परंतु विज्ञान के बढ़ते चरणों में इन औजारों का स्थान विज्ञान की नयी तकनीकों दे दिया है। इसमें लेजर का प्रयोग उल्लेखनीय है। अणु तकनीक ने भी इस चिकित्सा-पद्धति में बहुत सहायता की है। अब तो विज्ञान निरंतर इस ओर प्रयत्नशील है कि जहां तक हो, शल्यचिकित्सा में चीर-फाड़ कम-से-कम करनी पड़े।

एलोपैथी चिकित्सा विज्ञान के स्थापित सिद्धान्तों पर आधारित है। इसमें नित्य नये प्रयोग होते रहते हैं, जो इस चिकित्सा-पद्धति को प्रगति की ओर ही ले जा रहा है, परंतु इन सबके होते हुए भी इसको अपेक्षित सफलता नहीं मिल पा रही है। इस पद्धति में ‘इंजेक्शन’ एक ऐसी ही प्रक्रिया है, जिसके परिणाम शीघ्र ही सामने आ जाते हैं और इसके द्वारा मनुष्य को तत्काल राहत मिलती है। इस प्रक्रिया से कई कठिन रोगों पर अंकुश लगाने में सहायता मिली है। वैज्ञानिक पद्धति पर चलते हुए चिकित्सा-पद्धति में विभिन्न परीक्षणों में का विशेष महत्त्व है। यदि परीक्षणों रोग के लक्षण नहीं आते तो डॉक्टर यह मानकर चलता है कि रोगी को कोई रोग नहीं है, परंतु वास्तविकता यह नहीं होती। परीक्षणों में कहीं-न-कहीं कुछ कमियां रह ही जाती हैं, जिनके लिये वे और परीक्षण करना चाहते हैं। नये-नये यंत्र निकाले जा रहे है, नयी-नयी तकनीक विकसित की जा रही है, जिससे परीक्षण पूर्ण हो सके, परंतु यह कितना सफल हुआ है, यह तो भविष्य ही बता पायेगा।

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एलोपैथी से हानियां

एलोपैथी से लाभ तो जो हैं, वे प्रत्यक्ष ही हैं, पर इस पद्धति में जो सबसे बड़ा दोष है, वह है दवाईयों का प्रतिकूल प्रभाव (साइड इफेक्ट)। एक तो दवाइयां रोग को दबा देती हैं, इससे रोग निर्मूल नहीं हो पाता, साथ ही वह किसी अन्य रोग को जन्म भी दे देता है। यह इस पैथी के मौलिक सिद्धांत की ही न्यूनता है। दूसरी बात है अधिकतर रोग डॉक्टरों के अनुसार असाध्य भी हैं। जैसे हृदयरोग, कैंसर, एड्स, दमा, मधुमेह आदि। यहां तक कि साधारण से लगने वाले रोग जुकाम का भी एलोपैथी में कोई उपचार नहीं। पेट से संबंधित जितने भी रोग हैं, वे तो अधिकतर डॉक्टरों की समझ में कम ही आते हैं। उदर रोगों का परीक्षण भी कठिन होता है तथा उसके परिणाम भी नहीं मिल पाते। उदर रोगों का जितना सटीक एवं सफल उपचार आयुर्वेद में है, उतना और दूसरी चिकित्सा-पद्धति में देखने में नहीं आता। अधिकतर रोग उदर से प्रारंभ होते हैं, अत: यदि वहां पर अंकुश लगाया जा सके तो कई रोगों का निदान स्वत: हो सकता है। मनुष्य अधिकतर स्वस्थ और निरोग रह सकता है। डॉक्टरों के पास एक ही अस्त्र है कि वे ‘एन्टीबाईटिक’ दवाई देते हैं, जो लाभ कम और हानि अधिक करती है। इन दवाइयों का उदर पर सीधा दुष्प्रभाव पड़ता है और व्यक्ति की पाचन क्रिया उलट-पुलट हो जाती है। यदि वह उस दवाई को शीघ्र ही बंद न कर दे तो दूसरी व्याधियां उग्र रूप ले लेती हैं। इस चिकित्सा-पद्धति में औषधि से अधिक शल्यचिकित्सा सफल हो पायी है। यहां तक कि जिन कई रोगों का आयुर्वेद अथवा यूनानी या होम्योपैथिक चिकित्सा में औषधियों से उपचार हो जाता है, वहां भी एलोपैथी शल्यचिकित्सा का सहारा लेती है। दूसरे शब्दों में यह पद्धति शल्य चिकित्सा पर अधिक आधारित होती जा रही है। इससे यह चिकित्सा अन्य चिकित्सा-पद्धतियों से महंगी भी होती जा रही है और साधारण व्यक्ति की पहुंच से बाहर होती जा रही है। एलोपैथी में यह देखने में आया है कि कई ऐसे रोग हैं, जिनका कोई कारण डॉक्टरों की समझ में नहीं आता। वे उसका नाम ‘एलर्जी’ दे देते हैं। इसका उनके पास कोई उपचार नहीं है। डॉक्टर लोग इस ‘एलर्जी’ के उपचार के विषय में सतत प्रयत्नशील हैं, परंतु अभी तक उन्हें विशेष सफलता नहीं मिल पायी है। इस कथित रोग के विशेषज्ञ भी हो गये हैं, परंतु परिणाम में कोई विशेष सफलता नहीं मिल पायी है। यह कहा जा सकता है कि एलोपैथिक चिकित्सा से लाभ सीमित हैं, परंतु इससे हानियां अधिक हैं। इसलिये आज संसार के जिन देशों में केवल इसी चिकित्सा-पद्धति का अनुसरण हो रहा है, वे भी दूसरी चिकित्सा-पद्धतियों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। यूरोप के कुछ देश होम्योपैथिक अथवा प्राकृतिक चिकित्सा की ओर आकर्षित हो रहे हैं। जब कि अमरीका के लोग अब आयुर्वेद की ओर विशेष रूप से आकर्षित हो रहे हैं। वहां उस विषय में अनुसंधान भी तेजी से किये जा रहे हैं। इसके उदाहरण हैं कि कुछ आयुर्वेदिक औषधियां अमरीका से भारत आ रही हैं और वे सफलता पूर्वक प्रयोग में लायी जा रही हैं।

यह तथ्य तो सही है कि एलोपैथिक चिकित्सा वैज्ञानिक कसौटी पर खरी है। इसलिये इसका प्रचार-प्रसार भी अधिक हो सका, परंतु मेरे विचार से यह चिकित्सा-पद्धति अपने-आप में पूर्ण नहीं है। आयुर्वेदिक चिकित्सा-पद्धति अपने आप में पूर्ण है, परंतु इसका अधिक प्रचार नहीं हो पाया। इसमें हमारी मानसिकता – विदेशी पद्धति श्रेष्ठ है –  भी एक मुख्य कारण है। आयुर्वेदिक चिकित्सा में विश्वास बढ़ाना हम सबका कर्तव्य होना चाहिये, क्योंकि यह श्रेष्ठ, सफल एवं पूर्ण चिकित्सा-पद्धति है।

(साभार: कल्याण आरोग्य अंक)

श्रीमति उषाकिरणजी अग्रवाल

 

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