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ओडिशा के रसगुल्ले को मिली मान्यता

ओडिशा के रसगुल्ले को मिली मान्यता

रसगुल्ले का जिक्र हो और मुंह में पानी न आये ऐसा हो सकता है क्या? मीठी चाशनी में घुला-मिला रसगुल्ला अपने आप में मिठास का प्रतीक है। क्या इसे लेकर कोई झगड़ा या विवाद हो सकता है?  व्यक्तियों में तो संभव है पर क्या दो राज्यों में भी रसगुल्ला टकराहट का विषय हो सकता है? सुनने में अजीब लग सकता है पर है यह सच। ओडिशा और पश्चिम बंगाल में यह विवाद हुआ है। विवाद खाने को लेकर नहीं बल्कि रसगुल्ला किसका है? कहां इसकी उत्पत्ति हुई? रसगुल्ला किस राज्य का है? यह विवाद का कारण बना। सामान्य रूप में रसगुल्ले को एक साधारण भारतीय बंगाल से ही जोड़कर देखता रहा है। इस सोच को लेकर  कभी कोई विवाद नहीं हुआ। लेकिन चार साल पहले यह मीठा पदार्थ ओडिशा और बंगाल के बीच कडुवाहट का कारण बन गया।

साल 2015 से ओडिशा और पश्चिम बंगाल के बीच रसगुल्ले  को लेकर जंग की शुरुआत हुई। बंगाल दावा करता था कि रसगुल्ले बनाने की शुरुआत कोलकाता के नबीन चन्द्र दास ने 1845 में की थी। 2015 में पश्चिम बंगाल ने रसगुल्ले को अपने प्रदेश की उत्पती होने का दावा करते हुए चेन्नई स्थित भौगोलिक संकेत के रजिस्ट्रार (पंजीकरण एवं संरक्षण), कानून 1999 के तहत टैग देने हेतु आवेदन किया। यह टैग किसी प्रांत को उसकी विशिष्टता के आधार पर तैयार उत्पाद पर मिलता है। भारत के किसी भी क्षेत्र में बनाये जाने वाली विशिष्ट वस्तु का कानूनी अधिकार उस राज्य को दिया जाता है। जियोग्राफिकल इंडिकेशन टैग का काम उस खास भौगोलिक परिस्थिति में मिलने वाली चीजों का दूसरे स्थानों पर गैरकानूनी इस्तेमाल को कानूनी तौर पर रोकता है।

2017 में  बंगाल को ‘बंगालेर रसगुल्ले’ के लिए जीआई टैग मिल गया।  बंगाल को यह टैग मिलते ही ओडिशा में तूफान उठ खड़ा हुआ। यहां के राजनैतिक दलों, बुद्धिजीवियों, सोशल मीडिया में आवाज उठने के बाद राज्य सरकार चेती। ओडिशा लघु उद्योग निगम लिमिटेड और रसगुल्ले कारोबारियों के संगठन उत्कल मिष्ठान व्यवसायी समिति ने संयुक्त रूप से रसगुल्ले को जीआई मान्यता देने के लिए 22 फरवरी, 2018 को आवेदन किया। इस संबंध में जीआई ने कई सूचनाएं मांगी। जिसे ओडिशा सरकार ने मुहैया कराया।

जीआई के समक्ष ओडिशा ने तर्क दिया कि उनके राज्य में 12वीं सदी से रसगुल्ला बनता आ रहा है। ओएसआईसी के अध्यक्ष रामकृष्ण दास महापात्र ने कहा हमने अपना पक्ष मजबूती से रखा और उन्हें बताया कि रसगुल्ले की उतपति ओडिशा में हुई है। जगन्नाथ महाप्रभु के भोग के रूप में रसगुल्ला सदियों पुरानी परंपराओं का हिस्सा रहा है।  ओडयि़ा संस्कृति के गवेषक असित मोहंती ने शोध में दर्शाया कि 15वीं सदी में बलरामदास रचित उडयि़ा ग्रंथ दांडी रामायण में रसगुल्ला की चर्चा है।

सभी तरह की जांच पड़ताल,  स्वाद और रंगरूप के आधार से पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद 29 जुलाई को जीआई प्रमाणन ने ‘ओडिशा रसगुल्ला’ को वैश्विक पहचान प्रदान की है। जीआई ने मान्यता देते हुए कहा कि ओडिशा में रसगुल्ले के बनाने का तरीका और स्वाद अलग है। 10 सालों के लिये मान्य यह प्रमाणपत्र 22 फरवरी 2028 तक वैध रहेगा।

इस टैग के मिलने से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में उस वस्तु की कीमत और  महत्व बढ़ जाता है। देश-विदेश से लोग उस खास जगह पर टैग वाले सामान को देखने आते हैं इससे व्यापार और पर्यटन से उस प्रांत को फायदा होता है। ओडिशा और बंगाली रसगुल्ला में अंतर को देखें तो पता चलेगा कि बंगाली रसगुल्ला बिल्कुल सफेद रंग और स्पंजी होता है, जबकि ओडिशा का रसगुल्ला हल्के भूरे रंग का और बंगाली रसगुल्ला की तुलना में मुलायम होता है। यह मुंह में जाकर आसानी से घुल जाता है।

अब ओडिशा लघु उद्योग निगम लिमिटेड ओडिशा रसगुल्ला के तमगे का मालिक होगा। वह उत्पाद और इसके साथ जुड़े सभी वैधानिक व बौद्धिक  संरक्षण का जिम्मेदार होगा। अपने रसगुल्ले को वैश्विक पहचान मिलने से ओडिशा के लोगों में खुशी की लहर है। मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने  लिखा मुझे खुशी है कि ओडिशा रसगुल्ले को जीआई मान्यता मिली। ऊर्जा व एमएसएमई मंत्री दिब्य शंकर मिश्र ने कहा इससे ओडिशा की संस्कृति व परंपरा को विश्व स्तर पर प्रोत्साहन मिलेगा। पर विरोधी दलों ने विलंब के लिए सरकार की आलोचना की है। विधानसभा में विपक्ष के नेता भाजपा के प्रदीप्त कुमार नायक ने कहा यह टैग तो काफी पहले मिल जाना चाहिए था। राज्य सरकार की लापरवाही के कारण देरी हुई है।

देर आये दुरुस्त आये की तर्ज पर कहा जाये तो विलंब होने के बावजूद ‘ओडिशा रसगुल्ला’ को विशिष्ट पहचान मिलने के बाद यह सभी ओडिशावासियों के मुंह में मुलायम व मीठी मिठास घोल गया है।

भुवनेश्वर से सतीश शर्मा

 

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