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कर्नाटक दिल से येदी फिर से

कर्नाटक दिल से येदी फिर से

हाल के लोकसभा चुनाव के नतीजे ही जाहिर कर गए थे कि कर्नाटक की जनता जेडी(एस)-कांग्रेस गठजोड़ सरकार में जारी सत्ता की खींचतान से खुश नहीं है। सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल पा रहा था और मुख्यमंत्री एच.डी. कुमारस्वामी नाराजगी जाहिर कर रहे थे कि गठजोड़ सहयोगी के असंतुष्ट उन्हें सरकार का कामकाज सही ढंग से चलाने नहीं दे रहे हैं। गठजोड़ सरकारें चलाना एक कला होती है और यही अंदाजा लगता है कि अपनी ही पार्टी के असंतुष्ट सदस्यों और कांग्रेस के लोगों को साथ लेकर चलना उनके वश में नहीं था और अंतत: सरकार भारी राजनैतिक उठापटक के बाद गिर गई। भाजपा ने अपने सशक्त किसान नेता तथा राजनीति के माहिर खिलाड़ी बी.एस. येदियुरप्पा की अगुआई में पहल की और आज फिर वे मुख्यमंत्री हैं। इसका वादा उन्होंने विधानसभा चुनावा के बाद सदन में विश्वास मत हासिल न कर पाने के बाद किया था और उन्होंने कर दिखाया। येदियुरप्पा जमीनी नेता हैं और वे कर्नाटक की राजनीति की नब्ज पहचानते हैं। उनका आदर उनकी पार्टी के बाहर के नेताओं में भी काफी है। पिछले हफ्ते मैं बेंगलुरू में था और यही गहरा एहसास हुआ कि दक्षिण भारतीय राज्य कर्नाटक में फिर से कमल खिलाने का माद्दा सिर्फ येदियुरप्पा में ही है। सेकुलर मीडिया अब राजनैतिक नैतिकता के सवाल पर अपना गला फाड़ रहा है। उन्हें वह नहीं दिखा जब तमिलनाडु में भी ऐसी ही राजनैतिक उठापटक हुई थी। मैं भाजपा को साधुवाद देना चाहता हूं कि वही गठजोड़ सरकारें बेहतर चला सकती है और गठबंधन राजनीति के पुरोधा तो यकीनन स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ही थे।

अब निवर्तमान विधानसभा अध्यक्ष रमेश कुमार के फैसले में सदस्यता के अयोग्य ठहराए गए जेडी (एस) और कांग्रेस के 17 विधायकों का भविष्य फिलहाल अधर में लटका हुआ है। उनके लिए सुप्रीम कोर्ट या चुनाव आयोग से स्पीकर के फैसले के खिलाफ राहत हासिल करना बड़ी चुनौती होगी। सुप्रीम कोर्ट पहले ही साफ-साफ कह चुका है कि स्पीकर पहले विधायकों के इस्तीफे पर फैसला सुनाएं, जिस पर उन्होंने ध्यान नहीं दिया। हालांकि सदस्यता रद्द करना स्पीकर के अधिकार क्षेत्र में है, फिर भी उन्हें विधायकों को सुनवाई का मौका देना चाहिए था। मगर यह उन्होंने नहीं किया। इस तरह सदस्यता गंवा बैठे विधायकों को उपचुनाव में दोबारा जीतने के लिए लंबी लड़ाई लडऩी होगी। तमिलनाडु का उदाहरण सामने है कि वहां सितंबर 2017 में अन्नाद्रमुक के 18 विधायकों की सदस्यता स्पीकर ने रद्द कर दी थी लेकिन उपचुनाव अप्रैल 2019 में 19 महीने बाद हुए।

जहां तक येदियुरप्पा सरकार की बात है तो उसकी स्थिरता पर कोई संदेह नहीं है। यह येदियुरप्पा का राजनैतिक कौशल ही है कि वे चौथी बार मुख्यमंत्री बने हैं। फिलहाल सदस्यता रद्द हुए विधायक भी उनके लिए सिरदर्द नहीं बनने वाले हैं, उन्हें मंत्रिमंडल में लेने की कोई जल्दबाजी नहीं है। सदन में भाजपा को बहुमत प्राप्त है। अब कर्नाटक के लोगों की नजर येदियुरप्पा के विकास एजेंडे पर है, जिसकी बात वे बराबर करते हैं। अब उनकी इस बात की परीक्षा होनी है कि वे
पटरी से उतरे विकास को हर क्षेत्र में फिर आगे बढ़ाएं, चाहें वह इन्फ्रास्ट्रक्चर हो या किसानों के मुद्दे। चौथी बार मुख्यमंत्री बनने पर उनके पास यह मौका भी है कि वे भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की नजर में अपनी साख दुरुस्त करें और कथित भ्रष्टाचार का धब्बा अपनी छवि से हटाएं। अपनी पार्टी में भी उनके प्रतिद्वंद्वी कई हैं और वे उनकी हर गतिविधि की सूचना राष्ट्रीय अध्यक्ष तक पहुंचाएंगे। जहां तक पार्टी की छवि का सवाल है, नरेन्द्र मोदी उन्हें ऐसी कोई छूट नहीं दे सकते, जिससे कोई दाग लगे। दिग्गज नेता को पार्टी के सभी नेताओं को साथ लेकर चलना चाहिए और ऐसे लोगों की टीम चुननी चाहिए, जो कर्नाटक के इतिहास में कामकाज का रिकॉर्ड कायम कर सकें। येदियुरप्पा के पास सुनहरा मौका है क्योंकि केंद्र से भी राज्य के विकास में काफी मदद मिलेगी। उन्हें अपने को साबित करना चाहिए। मैं पिछले हफ्ते बेंगलुरू में उनसे मिला था तो वे कुछ फिक्रमंद थे मगर उन्होंने कहा कि वे चुनौती स्वीकार करने को तैयार हैं और कर्नाटक के लोगों की उम्मीदें पूरी करेंगे। उम्मीद करनी चाहिए कि ऐसा ही हो, बाकी तो समय ही तय करेगा।

Deepak Kumar Rath

   दीपक कुमार रथ

(editor@udayindia.in)

 

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