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कर्नाटक में फिर खिला कमल

कर्नाटक में फिर खिला कमल

कर्नाटक में एक बार फिर कमल खिल गया है। दक्षिण भारत के इस महत्वपूर्ण राज्य में कमल खिलाने वाले बी एस येदियुरप्पा ने चौथी बार राज्य की कमान संभाल ली है। 26 जुलाई को शपथ लेने के चौथे दिन उन्होंने राज्य विधानसभा में अपना बहुमत साबित कर भी दिया। विधानसभा की प्रभावी संख्या इन दिनों 207 है। जिसमें उनके लिए बहुमत साबित करना कठिन भी नहीं था। पिछले विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ा दल बनकर उभरी, लेकिन बहुमत के आंकड़े से आठ सीटें पीछे रह गई थी। लेकिन हाल तक सत्ताधारी रहे गठबंधन में कांग्रेस के 14 और जनता दल सेक्युलर के तीन विधायकों ने अपनी सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। लिहाजा विधानसभा की प्रभावी संख्या घट गई। लिहाजा 105 सदस्यों वाली भारतीय जनता पार्टी सरकार को अपना समर्थन साबित करना ही था। बेशक दक्षिण में एक बार फिर कमल खिल गया है, लेकिन इस बार उसकी चमक वैसी नहीं है। फिर येदियुरप्पा सरकार पर असमंजस के जो बादल छाए हैं, निकट भविष्य में उनके बने रहने के आसार हैं। इसकी वजह यह है कि इस्तीफा दे चुके विधायकों की खाली की हुई सीटों पर छह महीने में चुनाव होंगे ही। इन 17 सीटों में से कम से कम आठ सीटों पर भारतीय जनता पार्टी या उसके समर्थकों को जीत हासिल नहीं होगी तो येदियुरप्पा सरकार वैसे ही हिचकोले खाने लगेगी, जैसे जुलाई महीने के शुरूआत में कुमारस्वामी खाने लगी थी और अंतत: गिर ही गई।

नरेंद्र मोदी की अगुआई में 2014 की केंद्रीय सत्ता में उभरी भारतीय जनता पार्टी ने एक नियम स्वीकार किया है। 75 साल पार के अपने नेताओं को मार्गदर्शक मंडल में शामिल कर दिया। इस लिहाज से कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी के सबसे बड़े चेहरे येदियुरप्पा भी 76 साल की आयु की वजह से इसी श्रेणी में आ गए हैं। लेकिन जैसे हर नियम का अपवाद होता है, संभवत: येदियुरप्पा भी इस नियम के अपवाद हैं। उन्होंने कर्नाटक में कमान संभाल ली है। लेकिन इस बीच विधानसभा के अध्यक्ष रहे कांग्रेस नेता के आर रमेश कुमार ने जिस तरह के फैसले लिए हैं, उससे राज्य में राजनीतिक असमंजस के हालात और बढ़े हैं। रमेश कुमार ने कांग्रेस के सभी 14 और जनता दल सेक्युलर के सभी तीन विधायकों की विधानसभा से ना सिर्फ सदस्यता खारिज कर दी है, बल्कि उनके चुनाव लडऩे पर प्रतिबंध भी लगा दिया है। इससे विधायक अपने कैरियर को लेकर पसोपेश में हैं। विधानसभा की सदस्यता और विधानसभा के कार्यकाल तक चुनाव लडऩे से अयोग्य ठहराए जाने के इस फैसले को कांग्रेस के दो बागी विधायकों रमेश एल. जारकीहोली और महेश कुमाथल्ली ने 29 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। दोनों बागी नेताओं ने शीर्ष अदालत से विधानसभा अध्यक्ष के अयोग्यम करार देने वाले निर्णय को रद्द करने की मांग की है। निर्दलीय विधायक आर शंकर ने भी अयोग्या करार देने संबंधी स्पीेकर के फैसले को एक अलग याचिका डालकर चुनौती दी है। बागी नेताओं ने अपनी याचिका में कहा है कि विधानसभा अध्यक्ष ने ऐसा फैसला देकर उन्हें संविधान के अनुच्छेद 190 के तहत हासिल अधिकार का उल्लंघन किया है। बागी विधायकों ने इस कार्यवाही को संविधान के अनुच्छेद-14 के अनियंत्रित और अनुचित इस्तेमाल के साथ ही इसे उल्लंघनकारी बताया है। याचिका में कहा गया है कि स्पीकर का यह कदम उनके मूलभूत संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। देर-सवेर बाकी विधायक भी विधानसभा अध्यक्ष के इस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे ही। अगर सर्वोच्च अदालत का फैसला केआर रमेश कुमार के आदेशों के खिलाफ जाता है तो भारतीय जनता पार्टी राहत महसूस कर सकती है। अन्यथा इस बात की गारंटी नहीं है कि अयोग्य ठहराए गए विधायकों की सीट पर जो चुनाव होंगे, वहां से वह अपनी पसंद के उम्मीदवार शायद ही उतार पाए। क्योंकि विधायक अपने विश्वस्तों या घर के सदस्यों को ही चुनाव मैदान में उतारने पर जोर दे सकते हैं। फिर इस बात की गारंटी भी नहीं दी जा सकती कि विधायकों के विश्वस्त या रिश्तेदार जीतने की हालत में भारतीय जनता पार्टी के ही साथ जाएं। राज्य में जिस तरह कांग्रेस अब भी अपनी कोशिशों में जुटी हुई है, उससे साफ है कि वह आसानी से अपने हाथ से मामला निकलने नहीं देगी।

बहरहाल अभी तक येदियुरप्पा ने अपनी कैबिनेट गठित नहीं की है। उनके सामने कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर से बागी हुए विधायकों की पसंद के नेताओं को भी कैबिनेट में शामिल करने का दबाव होगा। इस बीच सत्ता बदलते ही विधानसभा के अध्यक्ष के आर रमेश कुमार ने अपने पद से 29 जुलाई को ही इस्तीफा दे दिया। इसके बाद भारतीय जनता पार्टी अपना अध्यक्ष निर्वाचित करने की कोशिशों में जुट गई है। इस बीच भारतीय जनता पार्टी के विधायक के जी. बोपैया का नाम विधानसभा अध्यक्ष के लिए आगे आया है। माना जा रहा है कि पार्टी उन्हें ही इस पद के लिए अपना उम्मीदवार बनाएगी और विधानसभा की प्रभावी संख्या के हिसाब से उनकी जीत सुनिश्चित भी मानी जा रही है। विश्वासमत साबित करते वक्त येदियुरप्पा ने कहा कि वे हर मिनट राज्य के विकास के लिए काम करेंगे। वैसे भी लोकसभा चुनावों में जिस तरह भारतीय जनता पार्टी को राज्य के लोगों ने गठबंधन के मुकाबले तरजीह दी है, उससे भारतीय जनता पार्टी पर दबाव भी है। राज्य की 28 में से 26 सीटों पर भारतीय जनता पार्टी की जीत मामूली नहीं है। भारतीय जनता पार्टी को जनसमर्थन का ऐसा उभार रहा कि प्रधानमंत्री रहे देवेगौड़ा तक अपना चुनाव हार गए।

2018 में विधानसभा में किसी भी दल को बहुमत ना मिलने के चलते कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मणिपुर और गोवा का बदला कर्नाटक में आनन-फानन में ले लिया। लेकिन माना जा रहा है कि पहले ही दिन से कर्नाटक की सरकार ठीक से काम नहीं कर पाई। 37 विधायकों वाले छोटे दल को समर्थन और अगुआई देना कांग्रेस के ही एक बड़े धड़े को स्वीकार नहीं हो पाया। वैसे भी साल 2006 में कांग्रेस नेता सिद्धारमैया ने जनता दल एस का दामन छोड़कर कांग्रेस का हाथ देवेगौड़ा द्वारा उनकी जगह अपने बेटे एचडी कुमारस्वामी को अपना उत्तराधिकारी बनाने की वजह से थामा था। तब से उनका कुमारस्वामी से रिश्ता सहज नहीं रहा है। ऐसे में सरकार डगमगाती रही और जुलाई की शुरूआत में सरकार पर संकट के बादल मंडराने लगे। कर्नाटक में विपक्षी एकता के जरिए राहुल गांधी ने एक तरह से भावी संसदीय चुनावों के लिए विपक्षी एकता का भी राग शुरू किया था। लेकिन वह राग भी ठीक से बज नहीं पाया।

येदियुरप्पा कर्नाटक की कमान संभाल चुके हैं। उन्होंने बहुमत साबित भी कर दिया है। लेकिन अतीत में जिस तरह तीन-तीन बार शपथ लेने के बावजूद वे अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए, उस परिप्रक्ष्य में देखना होगा कि वे इस बार कार्यकाल पूरा कर पाते हैं या नहीं.. वैसे दक्षिण में अपना पैर पसारने की कोशिशों में जुटी भारतीय जनता पार्टी के लिए येदियुरप्पा सरकार की कामयाबी दो साल बाद तमिलनाडु में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए नजीर बन सकती है। चूंकि भारतीय जनता पार्टी के नए संगठन महासचिव बीएल संतोष भी कर्नाटक से ही हैं, इसलिए माना जा रहा है कि कर्नाटक में हाथ आई सत्ता को कुशलतापूर्वक चलाते रहना और कार्यकाल पूरा करने के लिए भारतीय जनता पार्टी अपना राजनीतिक कौशल दिखाने से नहीं हिचकेगी।

 

उमेश चतुर्वेदी

 

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