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”कला के प्रति लोगों में जागरूकता लाने की जरूरत”

”कला के प्रति लोगों में जागरूकता लाने की जरूरत”

”कला के प्रति लोगों की जागरूकता बिल्कुल नगण्य है। मेरे हिसाब से चार-पांच साल शिक्षा को बंद कर देना चाहिए। क्योंकि आर्ट के नाम पर इतना प्रदूषण है कि आप सोच भी नहीं सकते। अब आप देखिए, आजकल छोटे-छोटे बच्चों को लेकर आर्ट पाल्यूशन करवाये जाते हैं, जबकि उन्हें पेटिंग के बारे में जानकारी भी नहीं है। जो भी सच्चा आर्टिस्ट है वह वर्तमान के बारे में नहीं सोचता, बल्कि वह अपनी कला के माध्यम से यह दिखाता है कि हजारों वर्ष बाद क्या होगा। अत: एक कलाकार सन्यासी की तरह कार्य करता है। ओडिशा में जिसने कोणार्क मंदिर बनाया, 12 साल तक उसके परिवार को उसके बारे में पता ही नहीं था। तब कलाकार इतने मन से कार्य करते थे, जबकि आज हम चालाकी से काम करते हैं,’’ यह कहना है नेशनल गैलरी ऑफ माडर्न आर्ट के महानिदेशक अद्वैत गडनायक का उदय इंडिया के साथ खास बातचीत में। प्रस्तुत है बातचीत के मुख्य अंश:

नेशनल गैलरी ऑफ माडर्न आर्ट की स्थापना कैसे हुई?

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने मिलकर सोचा कि संगीत नाटय एकेडमी खोला जाए। उस समय आर्ट संस्थाएं बिल्कुल नहीं थी। ललित कला एकेडमी, संगीत नाट्य एकेडमी कुछ नहीं था। उस समय ही सोचा गया कि  नेशनल गैलरी ऑफ माडर्न आर्ट खोला जाए। लेकिन मैं आज भी देखता हूं कि मेरे पास  ओडिशा और उत्तर-पूर्व भारत से किसी भी कलाकार का काम नहीं आता। जब एक नेशनल कंसेप्ट के साथ कुछ होता है तो वह केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं होता है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर होता है। लेकिन उस समय ऐसा हो गया कि कुछ लोगों तक यह सीमित रहा। जो आस-पास के लोग थे उनके लिए आसान हो गया।

इसका मतलब जो लोग उस समय की सरकार के आसपास थे उन्हें ही फायदा मिला?

औरो को भी मिला लेकिन उतना नहीं मिला। वास्तव में जब संस्था एक ग्रुप के हाथ में आ जाती है तो एक चेन बनती है। जैसे मैं आपका नाम बता रहा हूं, आप किसी और का बता रहे हैं तो एक टीम बन जाती है। 20-25 कलाकार हो तो उनके अंदर ये काम शुरू हो जाता है और एक, सिस्टम बन जाता है। जैसा अभी  पिछले 15-20 साल में हुआ। आर्टिस्ट मार्केट तैयार करता है। पहले ऐसा नहीं था। अब जिसकी मार्केटिंग अच्छा है, वही पदार्थ बिकता है। अब आप कोका-कोला को ले लो। हमारे गांव में भी कोका-कोला मिलता है लेकिन वहां नारियल पानी भी मिलता है। लेकिन अगर कोई समारोह होता है तो कोका-कोला ही लोग पसंद करते है क्योंकि उसकी माकेंर्टिंग जबरदस्त है। इसके लिए मार्केटिंग की स्ट्रेटेजी का बहुत महत्व है।

आप अमेरिका एवं लंदन को देख लो, उनके पास मीडिया भी है और पैसा भी है। वो चाहे तो रातोंरात कलाकार बना सकते हैं। जैसे हम किसी चाय के कप को बाजार में बेचने के लिए तैयार करते है और हम कहें कि इस कप में गांधी जी ने चाय पी थी। तब उस कप को हम 2 करोड़ में भी बेच सकते हैं। जब बाजार तैयार हो जाता है तो असली चीज नीचे आ जाती है, इसलिए ओडिशा, पटना में जो लोग काम करते थे वो ऊपर नहीं आ पाये। वो कहीं जा ही नहीं पाये, क्योंकि  जो कलाकार होता है वह बहुत स्वाभिमानी होता है। आज 99 प्रतिशत आर्टिस्ट लेफ्टिस्ट है। अत: मॉडर्न आर्ट से जनता का संबंध नहीं रहा।

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कला के क्षेत्र में लोगों की जागरूकता बहुत कम है जो शिक्षा  के माध्यम से आती है?

यह जागरूकता बिल्कुल नगण्य है। मेरे हिसाब से चार-पांच साल शिक्षा को बंद कर देना चाहिए। क्योंकि आर्ट के नाम पर इतना प्रदूषण है कि आप सोच भी नहीं सकते। अब आप देखिए, आजकल छोटे-छोटे बच्चों को लेकर आर्ट पाल्यूशन करवाये जाते है, जबकि उन्हें पेटिंग के बारे में जानकारी भी नहीं है। जो भी सच्चा आर्टिस्ट है वह वर्तमान के बारे में नहीं सोचता, बल्कि वह अपनी कला के माध्यम से यह दिखाता है कि हजारों वर्ष बाद क्या होगा। अत: एक कलाकार सन्यासी की तरह कार्य करता है। ओडिशा में जिसने कोणार्क मंदिर बनाया, 12 साल तक उसके परिवार को उसके बारे में पता तक नहीं था। तब कलाकार इतने मन से कार्य करते थे, जबकि आज हम चालाकी से काम करते हैं। इसलिए जो हमारी कला है, आर्ट है, ट्राइबल आर्टिस्ट हैं ये लोग अभी भी मुख्यधारा में नहीं आ पाए हैं। जबकि वे ही सच्चे आर्टिस्ट हैं। इसलिए हमारा कर्तव्य है कि उनके पास जाएं और उन्हें मुख्यधारा में लाएं। क्योंकि कला का कॉलेज ऐसा होना चाहिए जो एक बहुत बड़ा शिप के आकार का हो और ओडिशा से निकले और पूरा विश्व घुमकर आये।

दिल्ली आर्ट कालेज में क्या सिखाया जाता है सिवाय राजनीति के। हमारी शिक्षा बहुत बहुत निचले स्तर पर चली गई है, किंतु हम महसूस नहीं कर पा रहे हंै। नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट में हमने शुरू किया है कि  हम छोटे-छोटें बच्चों को लेंगे। पहले छोटे-छोटे बच्चे आते थे एक बहुत बड़ी लाइन बनाकर, आगे एक टीचर पीछे एक टीचर, पर इन टीचरों को अपनी जिम्मेदारी के बारे में कोई ज्ञान नहीं। अब मैने कहा कि तीस से चालीस बच्चे भेजिए। वे मेरे साथ एक घंटा बिताएंगे और उन्हें अच्छा लगेगा।  क्या होना चाहिए, कैसा होना चाहिए, कला के पास बैठिए, दो लाइन खींचिए, क्या बना है देखिए। जब तक उस प्रणाली को समझोगे नहीं तो कोई मतलब नहीं रह जाता। इसलिए एनसीआरटी वालों से भी बात हुई है उनके विद्यार्थी आते है, किंतु उनके आर्ट शिक्षकों का स्तर निम्न स्तर का होता है। प्राइवेट आर्ट शिक्षक थोड़े अच्छे होते हैं। आर्ट को लिखना नहीं समझना होता है इसलिए सभी को बुलाया जैसे शिक्षक, प्रिंसिपल। जब तक सब का सहयोग नहीं होगा, तो कैसे चलेगा? आर्ट सोसायटी को कनेक्ट करती है।कला हर जगह है, आप कुछ भी कर रहे है तो वह कला है। अगर कोई भी इंजीनियर बना, अगर उसको ड्राईंग पता नहीं है, तो वह एक अच्छा इंजीनियर नहीं बन सकता। अगर एक डॉक्टर सर्जन है, मगर उसको ड्राईंग पता नहीं होगी तो वह एक अच्छा डॉक्टर नहीं बन सकता।

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क्या साढ़े चार साल यहां रहने के बाद यह संभव हो पागा?

इतना जल्दी रिजल्ट नहीं आयेगा। हम छोटे-छोटे बच्चों से शुरू कर रहे है। क्योंकि ये तुरंत नहीं हो सकता। इतने सालों की गुलामी को हम कैसे भुल सकते हैं। इसलिए लोग कुछ चीजें खरीदते भी है तो क्रॉफ्ट वालों से मोल-भाव करते हैं फिर उसे कम कराते हैं। कलाकार नहीं मानते, लोग भी नहीं मानते। अत: दोनों में दूरी बढ़ गयी है और हमें दोनों को नजदीक लाना है। और यह शिक्षा के माध्यम से ही संभव है। इसलिए अब हम उेसी शिक्षा से शुरू कर रहे हैं, जिसके माध्यम से हम छोटे-छोंटे बच्चों से मिलते है, उनके कला शिक्षकों से मिलते हैं। आजकल जब हम बच्चों से मिलते है तो बच्चे हमें प्रतिक्रिया देते हैं। अत: हमें बच्चों से भी कुछ सुझाव लेना चाहिए फिर हमारे पास जो टेक्नॉलोजी है उसको हम उपयोग में लाये तो इस तरह का वातावरण हो सकता है। शुरूआत में थोड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। अगर 20 बच्चे है तो 20 को एक जैसा नहीं बना सकते। मुझे पता करना होगा कि किन बच्चों का किस कला के प्रति रूझान है।

अभी जो ऑर्ट अड्डा शुरू हुआ है वह क्या है?

पहले खुलकर कोई बात नहीं करता था, किंतु ये सारी बातें मैं आर्ट अड्डा में करता हूं। आज कलाकार बहुत व्यक्तिगत हो गया है, कोई किसी को मिलता नहीं है। किंतु जब कलाकार आर्ट अड्डा में एक दूसरे के नजदीक आएंगे तो समाज के बारे में कुछ सोच सकते हैं। क्योंकि जब हम अकेले हो जायेंगे होते हैं, तो हमारा दिमाग छोटी सोच का हो जाता है। किंतु हजारों कलाकार जब मिलते है तो नए आइडिया उत्पन्न होते हैं।

हाल ही में पुलिस मेमोरियल के बारे में काफी चर्चा हुई, उसके बारे में कुछ बताइये।

पुलिस मेमोरियल बनने से पहले काफी चर्चा हुई। काफी आर्टिस्ट सारे देश से इसके लिए आए। मेरे डॉयरेक्टर आफ जनरल बनने से पहले मेरे सारे कागजात एक हाई-पावर्ड कमेटी के पास थे। जब मेरा चयन हुआ तो पूछा गया कि आप क्या करना चाहते हैं? मैंने कहा मेमोरियल का मीडियम तो स्टोन होना चाहिए। और स्टोन भी ब्लैक स्टोन होना चाहिए। तो उन्होंने पूछा ब्लैक क्यों? मैंने कहा ब्लैक इसलिए कि इसमें कोई भी रंग डालिए वह सबको ले लेता है। इसलिए इसको मदर बोलते है- मां काली है। और पत्थर भी ग्रेनाईट होना चाहिए क्योंकि यह बहुत प्राचीन पत्थर है जिसने समय के हर उताव-चढ़ाव को देखा है। क्योंकि यहां पर जो पब्लिक आएगी उसके लिए तो वह भगवान जैसा है। जिस दिन मेमोरियल का उद्घाटन हुआ, मैने देखा कि वह लोगों को जैसा कि कुछ बता रहा है। कुछ लोग उसे सेल्यूट कर रहे थे और कुछ उसे छू रहे थे।

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आप नेशनल गैलरी ऑफ माडर्न आर्ट को कैसे बदल रहे?

आप देख सकते है कि लोगों का आना पहले के मुकाबले तीन गुना बढ़ गया है। आर्टिस्ट का मुवमेन्ट काफी बढ़ाया गया है और ब्लोकेज एरिया का इस्तेमाल भी बढ़ाया है गया। अभी और भी बहुत कुछ करना बाकी है।

अभी हाल ही में स्टेच्यू ऑफ यूनिटी बना और दूसरे प्रोजेक्ट पाइपलाईन में हैं। क्या आप सोचते है कि इससे लोगों में कला के प्रति रूची बढ़ेगी?

अवश्य, इससे लोगों में कला के प्रमि रूचि बढ़ेगी। असल में हमारे कलाकार प्रचीन काल से ही विशाल स्टेच्यू बनाते रहे हैं और बामियान बुद्धा अफगानिस्तान में इसकी मिसाल है, जिन्हें तालिबान काल में नष्ट कर दिया गया।

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