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कश्मीरी गुलिस्तां में बहार

कश्मीरी गुलिस्तां में बहार

जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन, 2019 विधेयक, पर मैं खुशी जाहिर करने से अपने को रोक नहीं पा रहा हूं। समूचा भारत हर गांव-कस्बे-शहर में, हर गली-मोहल्ले में जश्न मना रहा है। मैं कह सकता हूं कि यह ऐतिहासिक फैसला लंबे समय से लंबित था। इस संदर्भ में राष्ट्र ऋषि श्यामा प्रसाद मुखर्जी की शहादत जरूर याद करना चाहिए, जो कश्मीर और अनुच्छेद 370 हटाने के लिए लड़े और अपनी जान दे दी। आज अब्दुल्ला और मुफ्ती छाती पीट रहे हैं कि उन्हें भारत से यह उम्मीद नहीं थी। क्या उन्होंने वह इतिहास भुला दिया कि कैसे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने गृहमंत्री सरदार पटेल की आवाज दबा दी थी? इसके अलावा जम्मू और लद्दाख इलाकों को जानबूझकर कोई सुविधा या कृषि, उद्योग और शिक्षा के लिए बुनियादी सुविधाएं नहीं दी गईं। इस पर अब्दुल्ला खानदान, मुफ्ती खानदान और सेकूलर ब्रिगेड ने हमेशा चुप्पी साधे रखी। देश के खजाने से बड़े पैमाने पर रकम वहां गई लेकिन सब जैसे नाले में बह गई। तमाम अलगाववादी बिरयानी का स्वाद चखते रहे और पाकिस्तानी शह से आतंकवाद को बढ़ाने में मददगार बने रहे। अलगाववादियों और असंतुष्ट नेताओं के लिए सिर्फ घडिय़ाली आंसू बहाने से कुछ होने वाला नहीं है। कश्मीर के लिए ऐसी कूटनीति पिछले 70 साल से नाकाम रही है।

अब सेकूलर ब्रिगेड भी अनुच्छेद 370 को बेमानी बनाने से छाती पीट रहा है। वैसे, किसी ने तब हायतौबा नहीं मचाई जब गोवा में सेना भेजकर बिना कोई खून बहाए देश में मिला लिया गया। और फिर सिक्किम के बारे में क्या कहेंगे? वह भारत का अंग 1975 में तब बना जब सत्ता में कांग्रेस थी। सही है कि  5 अगस्त उन पांच सितारा कश्मीर राग अलापने वालों के लिए दुखद दिन है, जो टीवी चैनलों पर उजागर होते रहते हैं। मुझे पूरा यकीन है कि देश के सबसे पिछड़े राज्य जम्मू-कश्मीर में अब आर्थिक खुशहाली लहलहाएगी। घाटी में टुलिप, गुलाब खूब खिलेंगे और डल झील का नजारा और शानदार होगा। घाटी में बंदूक की आवाजें धीरे-धीरे थम जाएंगी।

दरअसल जिसे हमेशा ”अस्थाई’’ कहा गया, उस अनुच्छेछ 370 को भारतीय संविधान में चोरी से शामिल कर लिया गया था, क्योंकि डॉ. भीमराव आंबेडकर ने इसका समर्थन करने से इनकार कर दिया था और भारत के पहले प्रधानमंत्री ने जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन वजीरे आजम शेख अब्दुल्ला को खुश करने के लिए एक और सज्जन एन. गोपालस्वामी आयंगर से इसका मसौदा तैयार कराया था। डॉ. आंबेडकर इस अनुच्छेद के लिए शेख अब्दुल्ला की राय से सहमत नहीं थे। अब अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने का जो विरोध कर रहे हैं, जैसे कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और दूसरे, उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि गवर्नर ही इस समय जम्मू-कश्मीर की सरकार हैं और आंतरिक सुरक्षा के मौजूदा हाल में उन्होंने केंद्र को अपनी सिफारिश भेजी। यह सोचना सही नहीं है कि गवर्नर हाथ पर हाथ धरे चुपचाप देखते रहें और रोजाना उस क्षेत्र के लोगों का जीवन मुश्किल होता रहे, वह भी एक ऐसे गलत अनुच्छेद की वजह से, जो भारतीय संविधान में बंटवारे के खून-खराबे के बीच कुछ लोगों की राय पर जल्दबाजी में शामिल कर लिया गया था।

जो विचारधारा संबंधी पसंदगी-नापसंदगी से इतर जम्मू-कश्मीर का शांतिपूर्ण विकास चाहते हैं और जीवन के सामान्य कारोबार को भीतरी-बाहरी ताकतों से अनंतकाल तक बर्बाद होने नहीं देना चाहते, वे अनुच्छेद 370 को बेमानी करने का स्वागत करेंगे। इस मामले में यह देखकर खुशी होती है कि कांग्रेस में कुछ प्रमुख चेहरे जनार्दन द्विवेदी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, दीपेंद्र हुड्डा, जितिन प्रसाद, मिलिंद देवड़ा वगैरह ने केंद्र की पहल का समर्थन किया है। गौरतलब यह भी है कि अगर केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर के लोगों की राय का इंतजार करती रहती तो अनुच्छेद 370 अपना ”अस्थाई’’ स्वरूप खो बैठता। पहले ही 72 वर्ष हो चुके हैं। इसलिए कांग्रेस को यह स्वीकार करना चाहिए कि वह अपने शासनकाल में वहां के लोगों को राजनैतिक रूप से जोड़ नहीं पाई या उसकी कोशिशें बेमानी साबित हुईं। दोनों ही हालत में इस अनुच्छेद को बेमानी बनाना जरूरी था जो समानता और सेकूलरिज्म के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ था। इसके अलावा हमारी पश्चिमी सीमा पर आईएसआईएस/तालिबान वगैरह से खतरा बढ़ता जा रहा था, इसलिए मौजूदा सरकार ने समाधान की तमाम अटकलों पर विराम लगाकर सही किया, जिससे जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में इन्फ्रास्ट्रक्चर, कृषि और शिक्षा का विकास होगा।

Deepak Kumar Rath

दीपक कुमार रथ

(editor@udayindia.in)

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