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कसो शिकंजा अवैध घुसपैठियों पर

कसो शिकंजा अवैध घुसपैठियों पर

अभी हाल ही में असम में एनआरसी की लिस्ट को लोगों के लिए जारी किया गया। जारी किये एनआरसी से कुल १९,०६,६५७ लोगों को बाहर किया गया हैं। एनआरसी के पीछे की मनसा असम के मूल निवासियों की सुरक्षा और राज्य में अवैध रूप से घुसे घुसपैठियों की पड़ताल करना था। लेकिन विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार असम के हजारों मूल निवासियों के नाम भी इस सूची में है। हां अब फुल प्रूफ सिटीजन की लिस्ट है। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये सभी डाटा कम्प्यूटराईज्ड हैं, जिसके माध्यम से आगे भी कानूनी जांच की जा सकती है। अब कोई भी घुसपैठियां अवैध में नागरिकता नहीं ले सकेगा। लेकिन प्रश्न यह है कि उन नागरिकों का क्या होगा, जो वास्तव में असम के नागरिक है और वे एनआरसी की लिस्ट से बाहर है? आखिर वे किस प्रकार अपनी नागरिकता साबित कर पायेंगे, क्योंकि असम सरकार स्वयं ही 1951 के एनआरसी के रिकार्डस को खो चूकी है। केन्द्र सरकार का मानना है कि एनआरसी में कोई खामी नहीं है, लेकिन सच्चाई तो यह है कि उनके पास सभी कागजात होते हुए भी वे लिस्ट से बाहर हैं। सेक्युलर ब्रिगेड का कहना है कि जो हिन्दू 25 मार्च 1971 के बाद बांग्लादेश में हो रहे अत्याचार से बचने के लिए भारत आये थे, उन्हें भी भारत की नागरिकता नहीं दी जानी चाहिये। यह जानते हुए भी कि बांग्लादेश में हिन्दुओं के ऊपर सबसे अधिक आत्याचार होता रहा है। आखिर बंगाली हिन्दू भारत में शरण नहीं लेंगे तो कहां लेंगे? आखिर वे किस देश में जायेंगे? लेकिन ये सेक्युलर ब्रिगेड के लोग अवैध रूप से आ रहे घुसपैठियों पर अपना मुह बंद रखते हैं। सभी को पता है कि अवैध रूप से रह रहे हैं। यहां तक कि ये लोग भारत में लाखों लोग भारत-बांग्लादेश सीमा से सूदूर स्थित तमिलनाडु में भी प्रवेश कर चुके हैं। लेकिन कोर्ट के आर्डर आने के बावजूद भी राजनीतिक दवाब उन्हें पहचानने और उनके खिलाफ एक्शन लेने से रोक लेता है। सच्चाई तो यह है कि ये लोग राशन कार्ड एवं आधार कार्ड मूल निवासियों से शीघ्र  पा जाते हैं। लेकिन राजनैतिक रोटियां सेकने के चक्कर में कोई भी इनके खिलाफ एक्शन लेने के लिए तैयार नहीं होता है।

सेक्युलर ब्रिगेड का तर्क यहां है कि जब लोग इतने वर्षों से यहां रह रहे हैं और वे यहां की स्थानीय अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन चुके हैं, तो उन्हें यहा से निकालना गलत होगा। उन्हें इस प्रकार से नहीं हटाया जा सकता। सच्चाई तो यह है कि ये लोग कुछ राजनेताओं के सहयोग से भारत के संसाधनों का उपभोग कर रहे हैं और  जनसांख्यिकी बदलाव ला रहे हैं। यही नहीं ये लोग असम और पूवोत्तर में कश्मीर जैसी स्थिती पैदा कर रहे हैं। किन्तु सेक्युलर ब्रिगेड इनके खिलाफ कड़ा कदम उठाने के बजाय उन्हें लुभाने में लगी रहती है। सच्चाई तो यह है कि विभिन्न हिंसात्मक घटनाओं में लिप्त इन लोगों के खिलाफ न ही पुलिस ही एक्शन ले पाती है और न ही कोर्ट में सजा मिल पाती है। पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर के राज्यों में रह रहे अवैध घुसपैठियों की यही कहानी है। इस पूरे क्षेत्र में पूरी तरह से जनसांख्यिकीय बदलाव हो चुका है। यदि हम असम में हुए 1971 और 1991 की जनगणना को देखें तो हम काफी बड़ा जनसांख्यिकीय बदलाव पायेंगे। फिर भी सेक्युलर ब्रिगेड अपनी छाती पिटती है और ये लोग अवैध रूप से बांग्लादेश से भारी संख्या में आये घुसपैठियों की सच्चाई को स्वीकार करने से मना कर देते हैं। बांग्लादेश बार्डर से सटे राज्य आर्थिक और सामाजिक रूप से कई सारी चुनौतियों का सामना करते हैं, लेकिन ये सेक्युलर ब्रिगेड इस बात को कभी स्वीकार नहीं करती हैं। ये लोग अवैध घुसपैठियों के भारत के किसी भी भाग में रहने का समर्थन करते हैं, लेकिन हिंदू शरणार्थियों की बात कभी नहीं करते। अत: अवैध घुसपैठियों के संदर्भ में शीघ्र ही कोई रास्ता निकालना होगा।

Deepak Kumar Rath

 दीपक कुमार रथ

(editor@udayindia.in)

 

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