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कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव : घर की बात घर में ही रहनी चाहिए

कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव : घर की बात घर में ही रहनी चाहिए

बेटा : पिताजी।

पिता : हां, बेटा।

बेटा :पिताजी, आजकल कांग्रेस पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष कौन है?

पिता : बेटा, पहले तो राहुल गांधी जी ही थे।

बेटा :आजकल कौन है?

पिता : बेटा, अभी तो स्थिति स्पष्ट नहीं है। राहुल जी ने तो लोक सभा चुनाव के बाद पार्टी की बुरी हार के लिए अपने आपको उत्तरदायी मान कर पद से इस्तीफा दे दिया था। यह लगभग 25 मई की बात है।

बेटा :फिर क्या हुआ?

पिता : बहुत से शीर्षस्थ कांग्रेस नेताओं ने उनके त्यागपत्र को अस्वीकार कर दिया था।

बेटा : कांग्रेस के प्रमुख प्रवक्ता ने तो तुरंत ही बयान दे दिया था कि राहुल जी कांग्रेस अध्यक्ष थे, हैं और रहेंगे।

पिता : यह तो ठीक है। पर राहुल जी अपनी बात पर अड़े हुये हैं। वह कहते हैं कि मैं अध्यक्ष नहीं हूं और पार्टी जिस को ठीक समझे उसे अपना अध्यक्ष चुन ले।

बेटा : उन्होंने तो यह भी कह दिया था कि किसी नए अध्यक्ष को चुनने की प्रक्रिया में वह शामिल नहीं होंगे। पर उसके बाद क्या हुआ?

पिता : यह तो किसी को पता नहीं।

बेटा : तो आज कांग्रेस का अध्यक्ष कौन है?

पिता : यह तो बेटा किसी को पता नहीं है। आजकल तो मीडिया भी उनको पूर्व अध्यक्ष नहीं लिख रहा है। कई उन्हें कांग्रेस के नेता ही लिख रहे हैं।

बेटा : मुझे यह बताइए कि आज की तारीख में कांग्रेस अध्यक्ष है कौन? राहुल जी या कोई और?

पिता : यही तो मैं कह रहा हूँ। यह किसी को भी पता नहीं।

बेटा : राहुल जी को पता है?

पिता : बेटा, राहुल जी ने तो स्पष्ट कर दिया है कि में नहीं हूँ।

बेटा : अगर वह नहीं हैं, तो है कौन? उनको तो पता होना चाहिए।

पिता : क्योंकि राहुल जी अडिग हैं कि वह अपना त्यागपत्र वापस नहीं लेंगे, तो उन्हें नए अध्यक्ष के मनोनयन या चुनाव की प्रक्रिया पूरे होने तक तो काम करते रहना चाहिए था न।

बेटा : दो चार नाम उभरे भी थे अखबारों में, पर अभी तक नतीजा कोई नहीं निकला।

पिता : हाँ, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत आदि के नाम तो जरूर आगे आये थे पर आगे कुछ बात नहीं बनी लगती है।

बेटा : बात तो यह भी थी कि राहुलजी ने तो चुनाव की हार की जिम्मेवारी अपने सिर लेली है लेकिन किसी केन्द्रीय नेता ने राहुलजी की महान पहल का अनुकरण नहीं किया।

पिता : पर उसके बाद तो अनेक नेताओं ने अपने त्यागपत्र दे दिये।

बेटा : पिताजी, प्रियंका गांधी वाड्रा जी को भी एक केन्द्रीय महामंत्री बनाया था सिंधिया की तरह और उन्हें भी उत्तर प्रदेश के एक भाग का प्रभारी बनाया गया था। सिंधिया ने तो महामंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया है पर प्रियंका जी ने त्यागपत्र अभी तक तो नहीं दिया है।

पिता : हाँ, यह तो सच्च है।

बेटा : फिर प्रियंका जी ने क्यों नहीं दिया?

पिता : यह बात तो मेरी समझ में भी नहीं आ रही है।

बेटा : प्रियंकाजी तो राहुलजी की पुसतेनी अमेठी सीट भी न बचा सकीं जिस पर उनके भाई 2004 से जीतते आ रहे थे। फिर यह भेदभाव क्यों?

पिता : पर केरल की वाइनाड सीट से तो जीत गए थे।

बेटा : लेकिन उस सीट से जीतने का श्रेय प्रियंकाजी को तो नहीं जाता।

पिता : बेटा यह कांग्रेस पार्टी है। इसमें तो लगता है कि जो कानून आम कांग्रेसी कार्यकर्ता पर लगता है वह गांधी परिवार पर नहीं लगता।

बेटा : क्यों?

पिता : इसलिए कि कांग्रेस तो उनके घर की पार्टी है न।

बेटा : पिताजी, इस चुनाव में तो कांग्रेस को 2014 के मुकाबले 8 सीटें अधिक मिली हैं – 18 प्रतिशत ज्यादा और इसका श्रेय राहुल जी को ही जाता है । फिर त्यागपत्र क्यों?

पिता : बेटा, 8 सीटें  बढना भी कोई गर्व की बात?

बेटा : पीछे तो ऐसा ही होता आया है। नेता लोग तो ऐसे ही तर्क देकर अपना बचाव कर लेते थे।

पिता : बेटा, राहुल जी तो कांग्रेस की विशुद्ध सरकार बनाने का दावा कर रहे थे।

बेटा : यह बात तो ठीक है। इस बार तो कांग्रेस का सारा चुनाव मात्र राहुल जी पर ही केन्द्रित था। चुनावी साहित्य, झंडों, अखबारों, टीवी पर, सब जगह केवल एक नाम था – राहुलजी का। उनकी माताजी सोनिया जी का भी नहीं।

पिता : बेटा भाजपा में भी तो ऐसा ही हुआ। उनके भी प्रचार-प्रसार साधनों में केवल मोदी जी का फोटो ही छाया था और किसी अन्य नेता का नहीं। फर्क केवल यही है कि मोदीजी अपनी सीट से भी जीत गए और भाजपा भी पहले से अधिक सीटें जीत गई। एनडीए का भी यही हाल रहा।

बेटा : कांग्रेस को 2014 के चुनाव में तो केवल 44 सीटें ही मिली  थीं । उस समय तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी जी थीं। तब क्या सोनिया जी ने त्यागपत्र दिया था?

पिता : नहीं ।

बेटा : तो फिर राहुल जी क्यों दे रहे हैं?

पिता : बेटा, यह व्यक्ति की मान-मर्यादा का प्रश्न है।

बेटा : तो क्या पिछली बार सोनिया जी के समय मान-मर्यादा वाली बात नहीं रही?

पिता : बेटा, जीवन के, परिवार के सिद्धान्त, तर्क व आदर्श बदलते रहते हैं।

बेटा : आप तो मेरे को हर पल हमारे परिवार के उच्च सिद्धांतो और परम्पराओं की याद दिलाते रहते हैं और कहते हैं कि इन्हें तोड़ा नहीं जा सकता है। तब तो आप रूढि़वादी बनते हैं और राजनीति में बड़े उदार बन जाते हैं।

पिता : बेटा, राजनीति स्थिर नहीं, बदलती रहती है। अगर राजनीति स्थिर हो गई तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी। बदल और बदलाव ही राजनीति है। आज हमें जो चीज, व्यक्ति, नेता और सिद्धान्त आदर्श व श्रेष्ठ लगते हैं , वही कल को गलत, जनविरोधी व देशहित के विरुद्ध हो जाते हैं।

बेटा : बात तो आपकी ठीक लगती है। कभी जो कुछ राजनीतिक दल कांग्रेस को दुश्मन नंबर एक बताते थे, आज उसकी गोद में बैठकर गर्व महसूस करते हैं। आज उन सब के लिए भाजपा व उसके सहयोगी दल दुश्मन नंबर एक बन गए हैं। वह अब ‘कम्यूनल’ भी हो गए हैं।

पिता : अब नितीश कुमारजी को ही देख लो। एक समय बिहार में लालू राज जंगल राज लगता था। फिर समय बदला तो नीतिश जी को वही लालू जी अच्छे लाग्ने लगे। फिर समय बदला तो लालू जी उनके लिये भ्रष्ट हो गए। भाजपा व संघ में उन्हें अच्छाइयां ही अच्छाइयां दिखने लगीं।

बेटा : ताजा संकेतों के अनुसार अब उनका मन भाजपा से ऊब रहा है।

पिता : यही तो बेटा, मैं तुम्हें बता रहा हूँ। राजनीति में तो सच्च और झूठ की परिभाषा बदल जाती है। जो उसे आज अच्छा लगता है, धर्म लगता है, सच्च लगता है, वही कल को बुरा, अधर्म, और झूठ लगता है।

बेटा : यह तो बड़ी अजीब बात है।

पिता : इसी को तो बेटा पॉलिटिक्स कहते हैं।

बेटा : चलो, इसको तो छोडो। कांग्रेस में जो चल रहा है उसकी बात करें।

पिता : इसकी क्या बात करें? अब तो कुछ समझ नहीं आ रहा।

बेटा : अब तो पिताजी राज्यों के जो कांग्रेसी नेता हैं वह भी अपनी मनमानी करने लगे हैं। केंद्र में तो उन्हें कोई पूछने वाला नहीं है। कांग्रेस हाई कमान का जो दबदबा और डर होता था, वह अब लग नहीं रहा है।

पिता : यह तो ठीक है। पिछले 40-50 दिन से कोई राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं है इसलिए सब प्रदेश नेता अपने आपको स्वतंत्र समझ रहे हैं।

बेटा : दिल्ली में कांग्रेस प्रभारी चाकोजी और प्रदेश अध्यक्ष शीला दीक्षित जी में भी ठन गयी है।

पिता : गोवा के 10 कांग्रेसी विधायक भाजपा में शामिल हो गए हैं।

बेटा : कर्णाटक की कांग्रेस-जेडीएस सरकार अपनी सांसे गिन रही है।

पिता : मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकार पर भी खतरा मंडरा रहा है।

बेटा : पंजाब की कांग्रेस सरकार तो खिल्ली का कारण बनी हुई है। डेढ़ महीने से अधिक से मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने नवजोत सिंह सिद्धू के विभाग बदल दिए थे पर सिद्धू जी ने उनको दिया ऊर्जा विभाग अभी संभाला नहीं है। अब पता चला कि सिद्धू जी ने अपना त्यागपत्र  40 दिन पूर्व 6 जून को राहुल जी को भेज दिया था।

पिता : मुझे तो बस हैरानी हो रही है कि सिद्धू जी को यह भी पता नहीं है कि मंत्री बनाने और हटाने का अधिकार मुख्यमंत्री को होता है। इसलिए उन्हें त्यागपत्र मुख्यमंत्री को ही देना होता है।

बेटा : पर पिता जी सिद्धू जी ने तो पहले ही कह दिया था कि कांग्रेस में तो वह एक ही कैप्टन को मानते हैं और वह हैं राहुल जी।

पिता : यानि वह न तो अमरिंदर सिंह जी को कैप्टन मानते हैं और न मुख्यमंत्री ही। हां, अब दो-तीन दिन पहले समाचार पत्रों में आया था कि सिद्धू जी ने अपना त्यागपत्र मुख्यमंत्री को भेज दिया है।

बेटा : और अब अनिर्णय की स्थिति यह हो गयी है कि पहले तो मुख्यमंत्री जी ने कहा कि वह अभी दिल्ली में हैं और लौटने पर निर्णय लेंगे।

पिता : अब तो आ गए हैं।

बेटा : अभी तक फिर कुछ नहीं हुआ।

पिता : बेटा, जब सिधुजी ने त्यागपत्र देने में 40 दिन लगा दिए तो मुख्यमंत्री को भी तो अधिकार है न कि वह भी जितने दिन मर्जी त्यागपत्र स्वीकार या अस्वीकार करने के लिए जितने दिन चाहें लगा दें।

बेटा : दोनों का तो कुछ नहीं जाता। सिद्धू जी बिना काम के वेतन और जनता के खर्च पर सुविधाएं लेते रहेंगे। उन्हें क्या फर्क पड़ता है?

पिता : तब तो यह भी शक पड़ता है कि सिधुजी और मुख्यमंत्री के बीच कोई सांठ-गांठ है। दोनों एक-दूसरे की मदद कर रहे हैं।

बेटा : क्या मजाक है? जनता के खून-पसीने की कमाई पर जनता को ही प्रताडि़त कर रहे हैं। क्या तमाशा है कि आज पंजाब में ऊर्जा मंत्री तो नहीं है, जनता की इस विभाग की कठिनाइयों को दूर करने वाला कोई मंत्री नहीं है, पर न मंत्री के कान पर जूं रींग रही है न मुख्यमंत्री के।

पिता : इसी पॉलिटिक्स को समझने केलिए तो मैं तुम्हें बार-बार कह रहा हूं।

बेटा : अब तो ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस-मुक्त भारत एनडीए नहीं कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता ही इस ध्येय की पूर्ति करने जा रहे हैं।

पिता : मेरे को तो बेटा यह सारी एक चाल ही लग रही है। एक ड्रामा खेला जा रहा है।

बेटा : शक तो मुझे भी हो रहा है। पार्टी की तो किसी को चिंता ही नहीं लग रही है।

पिता : आज तो कुछ समाचार पत्रों में भी तो यह लिखा है कि यदि कुछ और न हुआ तो प्रियांका जी को ही अध्यक्ष बना दिया जा सकता है।

बेटा : मतलब घर की बात घर में ही रह जाएगी।

पिता : इस में कोई शक भी नहीं हो सकता।

 

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