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कॉरपोरेट टैक्स रेट में कटौती  शुरु होगा सकारात्मक चेन रिएक्शन

कॉरपोरेट टैक्स रेट में कटौती  शुरु होगा सकारात्मक चेन रिएक्शन

भारत में कॉरपोरेट टैक्स रेट में कटौती का इंतजार लंबे समय से हो रहा था। अब आलोचक बाकायदा पूछ सकते हैं कि मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार इस काम को करने में पांच साल तक किसकी राह देख रही थी। इसके बचाव में एक वाजिब तर्क दिया जा सकता है। बीजेपी ने जब 2014 में सरकार बनाई, तब विरासत में उसे न केवल नीतियों के स्तर पर लकवाग्रस्त व्यवस्था और व्यापक भ्रष्टाचार मिला बल्कि केंद्र सरकार पर राजकोषीय घाटे पर लगाम लगाने का बोझ था। ये ऐसे पहलू हैं जो इस दृष्टि से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं कि विदेशी रेटिंग ऐजेंसियां भारत के संप्रभु बॉन्ड को किस प्रकार रेट करती हैं और किस प्रकार किसी भी अर्थव्यवस्था में विदेशी निवेशक पैसे डालते हैं। पहला महत्वपूर्ण कदम राजकोषीय घाटे के संबंध में विवेकपूर्ण मानदंडों का पालन करना था और फिर तत्कालीन वित्त मंत्री ने धीरे-धीरे घाटे को वहनीय स्तर पर लाने के लिए सुधारों की शुरुआत की। यह कारगर सिद्ध हुआ। हालांकि, इसके साथ-साथ समझदारी दिखाते हुए कॉरपोरेट टैक्स दरों में चरणबद्ध कटौती की गई और 2018 में टैक्स की दर उन कंपनियों के लिए घटाकर 25 प्रतिशत कर दी गई जिनका सालाना टर्नओवर रुपए 250 करोड़ तक था। श्री जेटली की उत्तराधिकारी, श्रीमती सीतारमण ने 25 प्रतिशत के टैक्स रेट को 400 करोड़ तक के टर्नओवर वाली कंपनियों पर लागू किया। इसके बाद भी, इस महीने घोषित नवीनतम कटौती को भारत में कॉर्पोरेट कर की दरों के युक्तिकरण की दिशा में पहला कदम नहीं कहा जा सकता है।

सितंबर की घोषणा क्या कहती है?

व्यावहारिक रूप से वैश्विक मंदी की व्याख्या करके, जिसने भारत को अपनी चपेट में ले लिया है, वित्त मंत्रालय ने बाजार में तरलता बढ़ाने की महत्वाकांक्षी योजना पर काम किया है ताकि कंपनियां कर में अधिक बचत कर सकें जिससे इस प्रकार की बचत को विस्तार और अन्य वैसे ही निवेशों में लगाया जा सके। एक अध्यादेश की मदद से आयकर अधिनियम 1961 में संशोधन करके, मंत्रालय ने एक ही झटके में भारतीय कॉरपोरेट जगत के हौसलों को बुलंद कर दिया। इसमें घरेलू कंपनियों को 22 प्रतिशत की दर से कॉरपोरेट कर का भुगतान करने का विकल्प देना शामिल था, जिसका मतलब है कि अधिभार और उपकर जोड़े जाने पर प्रभावी कर की दर 25.17 प्रतिशत हो जाती है। वास्तव में, सरकार को विनिर्माण क्षेत्र में धीमी गतिविधियों के बारे में जानकारी थी और इसलिए, उन कंपनियों के लिए 15 प्रतिशत की कर दर की घोषणा की गई है जो 1 अक्टूबर 2019 के बाद स्थापित की जाती हैं, जिनके लिए यह शर्त है कि वे 31 मार्च 2023 से पहले उत्पादन शुरू करें और करों में छूट या प्रोत्साहन का लाभ न लें। इस कदम का मतलब है नई विनिर्माण कंपनियों के लिए प्रभावी कर की दर 17.01 प्रतिशत होगी, जो एक ऐसा कदम है जिससे आने वाले दिनों में रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज (आरओसी) के कार्यालय का व्यस्त रहना निश्चित है।  न्यूनतम वैकल्पिक कर (एमएटी) सभी उल्लिखित संस्थाओं पर लागू नहीं होगा।

इसी अधिसूचना में, मंत्रालय ने प्रतिभूतियों की बिक्री से उत्पन्न पूंजीगत लाभ पर संवर्धित अधिभार को वापस लेकर विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को बड़ी राहत दी जिसकी शुरुआत वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2019 के बाद हुई। इसके साथ ही, व्यक्तियों, हिंदू-अविभाजित परिवारों (एचयूएफ) और एओपी सहित भारतीय निवेशकों को कंपनी के इक्विटी शेयरों या इक्विटी-ओरिएंटेड फंड या व्यवसाय के इक्विटी शेयरों की बिक्री या कोराबारी ट्रस्ट जिसके लिए एसटीटी देय है, उन्हें उत्पन्न पूंजीगत लाभ पर लागू वृद्धि अधिभार से राहत मिली है। मंत्रालय ने कंपनियों द्वारा कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (सीएसआर) खर्च के लिए नए विस्तारक मानदंडों को भी निर्धारित किया है, जिसे गेम-चेंजर के रूप में देखा जा सकता है। अब से, सीएसआर फंड का उपयोग सरकार या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों द्वारा वित्त पोषित इनक्यूबेटरों की सहायता के लिए किया जा सकता है और आईआईटी, आईसीएआर, आईसीएमआर और डीआरडीओ जैसे संस्थानों में अंशदान किया जा सकता है। सीएसआर खर्च का दायरा इस अर्थ में बढ़ाया गया है कि धन का उपयोग विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा और इंजीनियरिंग के प्रचार के लिए किया जा सकता है, जिससे संयुक्त राष्ट्र महासभा की ओर से निर्धारित सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को प्राप्त करना संभव होगा।

कॉरपोरेट टैक्स की दरें क्यों मायने रखती हैं?

एक अर्थव्यवस्था के रूप में भारत में दुनिया में कॉरपोरेट कर की दरें सबसे अधिक हैं और यह दस्तावेजों में दर्ज तथ्य है। चीजों को परिप्रेक्ष्य में रखें तो, वैश्विक औसत कॉरपोरेट टैक्स दर 23.79 प्रतिशत है, जबकि एशिया में औसत कर दर 21.09 प्रतिशत है। घरेलू कंपनियों के लिए प्रभावी कर दर को 25.17 प्रतिशत तक लाकर, सरकार ने एक ही तीर से कई निशाने साधे हैं। सवाल यह है कि कैसे? हम सभी जानते हैं कि वैश्वीकरण और वस्तुओं और सेवाओं पर शुल्क में पर्याप्त कमी के कारण दुनिया आज लगभग एकल बाजार बन गई है। यहां तक कि कोई नौसिखिया भी यह बता सकता है कि भारतीय कंपनियों के भारी टैक्स ने उन्हें वैश्विक बाजार में मुकाबले से बाहर कर  दिया है, वह भी तब जब चीन जैसे देशों को नुकसान उठाकर या मार्जिन को जहां तक संभव को घटाकर भी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में अपना माल डंप करने के लिए जाना जाता है। दूसरा, लाभ पर कोई भी टैक्स कंपनी के अनुसंधान और विस्तार पर खर्च करने की क्षमता को कम कर देता है, जिससे वह तकनीकी प्रगति पर अपनी अतिरिक्त आय का निवेश करने वालों के साथ स्पर्धा नहीं कर पाती है।  बरसों से स्थिर निजी निवेश में अब  वृद्धि होना निश्चित है, वह भी तब जबकि नई निर्माण कंपनियों के लिए कर की दर को घटाकर 15 प्रतिशत तक लाया गया है।

अभी यह देखा जाना बाकी है कि घरेलू कंपनियां बचत का उपयोग दरों में कटौती के बाद उपभोक्ताओं को वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में राहत देने या विस्तार और / या उत्पादन और बाजार अनुसंधान में निवेश करने में करती हैं या नहीं। इन दोनों विकल्पों से मिलने वाले फायदे कमोबेश एक जैसे ही हैं क्योंकि मांग और खपत का मध्यम से दीर्घावधि में बढऩा निश्चित हैं क्योंकि विस्तार से रोजगार सृजन और व्यक्तियों की खर्च क्षमता में वृद्धि होगी। एक अन्य तत्व जिस पर कर कटौती की घोषणा के बाद मीडिया में बहुत चर्चा नहीं हुई है, वह है सीएसआर फंड के उपयोग के दायरे का विस्तार। इस तथ्य को सभी स्वीकार करते हैं कि स्टार्टअप्स विकास के नए इंजन हैं और इनक्यूबेटरों को अपने शुरुआती चरणों में इन स्टार्टअप्स की मदद के लिए धन की आवश्यकता होती है, जब पूंजी की उपलब्धता सीमित होती है। कंपनियां अब इन इनक्यूबेटरों को अपने सीएसआर फंड का एक हिस्सा दे सकती हैं बशर्ते वे केंद्रीय या राज्य सरकार द्वारा वित्त पोषित हों। सरकार की ओर से आईआईटी और डीआरडीओ जैसे महत्वपूर्ण संस्थानों पर किए जाने वाले खर्च को कम करने के लिए, कंपनियों को इन संस्थानों को सीएसआर फंड सौंपने की अनुमति दी गई है, जिससे धन जुटाने के रास्ते बढ़ेंगे और रक्षा में अनुसंधान को बढ़ावा देने के अलावा भविष्य के लिए सक्षम इंजीनियरों का पूल तैयार करने में मदद मिलेगी।

क्या हमें रुपए 1,45,000 करोड़ के राजस्व नुकसान पर चिंतित होना चाहिए?

पहली बात, यह केवल एक अनुमान है। दूसरी बात यह है कि कोई भी जब हिसाब लगाता है कि टैक्स कटौती के बाद सरकार को सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से उनके शुद्ध लाभ में वृद्धि का कितना लाभांश मिलेगा, तो राजस्व में कमी का आकलन हद से अधिक लग सकता है। इसके साथ ही, बड़े कॉरपोरेट संस्थानों द्वारा अपने शेयरधारकों को अधिक शुद्ध लाभ पर अधिक लाभांश देने के बाद लाभांश वितरण कर (डीडीटी) के संग्रह में वृद्धि देखी जाएगी। कर कटौती की घोषणा के बाद शेयर बाजार में रिकॉर्ड उछाल इस तथ्य का संकेत है कि निवेशक अर्थव्यवस्था में तेजी से सुधार की उम्मीद कर रहे हैं। ऐसा हो जाए तो कॉरपोरेट कर में कटौती के कारण राजस्व घाटा, यदि होता भी है तो वस्तु और बिक्री कर (जीएसटी) में बेहतर संग्रह, और बढ़ी हुई प्रतिस्पर्धा के साथ पूरा हो जाएगा, और इस प्रकार, निर्यात उन्मुख घरेलू कंपनियों का लाभ भी बढ़ेगा। वास्तव में, कॉरपोरेट कर दरों में कटौती सही समय पर की गई है और इसे चतुराई भरा कदम के बजाय एक संरचनात्मक सुधार कहा जा सकता है, ताकि अर्थव्यवस्था को फिर से उच्च जीडीपी विकास के रास्ते पर लाया जा सके। भारत के निर्यात क्षेत्र में नई जान फूंकना, रोजगार सृजन और जब ऋण उपलब्धता दबाव में हो तब बेहतर निजी निवेश का माहौल बनाना, ऐसे लक्ष्य हैं जिन्होंने इस कदम के लिए प्रेरित किया है। आने वाले दिनों में अर्थव्यवस्था में सुधार की उम्मीद की जा सकती है।

 

सुनील गुप्ता

 

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