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क्या गो-रक्षा एवं संवर्धन के प्रति हिन्दू गंभीर हैं?

क्या गो-रक्षा एवं संवर्धन के प्रति हिन्दू गंभीर हैं?

विदेशी आक्रमणों के दूरगामी दुष्परिणामों से अप्रभावित राष्ट्रीय मनीषा यदि गंभीरता एवं ईमानदारी से भारतीय इतिहास का अध्ययन करे तो यह निष्कर्ष निकलना निश्चित है कि भारत के अमिट अस्तित्व के मूल में गोमाता, भगवान् श्रीराम, एवं गंगा मैया अनादिकाल से ही सुशोभित रहे हैं। इसीलिए आक्रान्ताओं एवं उनके वंशजों/समर्थकों ने ऐसा कोई दुष्कर्म नहीं छोड़ा जिस से इन तीनों की छवि यदि नष्ट नहीं तो दूषित अवश्य हो जाय। गोघात, मंदिर तथा मूर्तियों का भंजन, श्रीराम के अस्तित्व पर भी प्रश्न खड़ा करना, और गंगा को प्रदूषित करने में कोई कसर न छोडऩा, ऐसे दुष्कृत्यों के अनेक उदाहरण रहे। आज हिन्दू समाज ने करवट ली तो राममंदिर निर्माण और गंगा को निर्मल-अविरल बनाने के प्रयास यद्यपि नव चैतन्य दायक सिद्ध हो रहे हैं, किन्तु गोमाता एवं समस्त गोवंश के महत्व को समझने समझाने एवं मानव मात्र के लिए उन से मिल सकने वाले दैवी वरदानों का लाभ उठाने के लिए शासन-प्रशासन में जो तत्परता होनी चाहिए वह दिखती नहीं। इस लेख में गोमाता को केंद्र मान कर शासन-प्रशासन को चेताने का प्रयास किया गया है।

गोमाता की महिमा से अपना सम्पूर्ण प्राचीन वांग्मय भरा पड़ा है। वैदिक युग से लेकर आधुनिक युग तक गो महिमा के विस्तृत वर्णन मिलते हैं, किन्तु आक्रान्ताओं ने उस महिमा को कलंकित करने के प्रयास किये, और उन्हीं प्रयासों का परिणाम यह है कि स्वतंत्र भारत के भी शासक/प्रशासक, जाने अनजाने में, गोमाता के द्वारा मिल सकने वाले लाभों का जन हित में यथेष्ट दोहन नहीं कर सके।

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देश के अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में खुले घूम रहे पालतू पशुओं के कारण बहुआयामी आर्थिक, सामाजिक, तथा राजनीतिक  समस्याएं बनाने के समाचार मिलना सामान्य बात हो गयी है। चारा की कमी के कारण अनेक किसान अपने अनुपयोगी पशु छोड़ देते हैं, और नील गायों की ही भांति वे भी किसानों के दुश्मन बन जाते हैं। अपनी भूख मिटाने के लिए वे खेतों की लहलहाती हुई फसल चरने के लिए लालायित और स्वतंत्र होते हैं। सम्पन्न किसान अपने खेतों की रक्षा हेतु खेतों के चारों ओर कंटीले और ब्लेड युक्त तार लगा लेते हैं। क्षुधा शांत करने के लिए पशु उन तारों का खतरा झेलते हुए खेत में घुस जाते हैं, और फल स्वरूप लहू लुहान हो जाते हंै। उनके इलाज की कोई व्यवस्था होती नहीं। उनके भोजन की कोई व्यवस्था होती नहीं। किसानों को भोजन के लिए अपनी फसल को बचाने की बाध्यता होती है। जो किसान कंटीले तारों से अपनी फसलों की रक्षा करने में असमर्थ होते हैं, और खेती के ही सहारे अपनी  जीविका चलाते हैं उन के लिए तो ये पशु सब से बड़े शत्रु होते हैं। शासन-प्रशासन इस समस्या से अनभिज्ञ है, यह कहना ठीक नहीं होगा, क्योंकि यदा कदा ये समाचार छपते रहते हैं कि इसके निराकरण हेतु सरकार शीघ्र ही गोशालाएं बनवाने वाली है।

देश-विदेश में अनुपयोगी पशुओं  को पाल कर उनसे उद्योग चलाने के अनेक उदाहरण मिलते हैं। अपने प्रदेश में इस दिशा में व्यापक प्रबंध होने अभी शेष लगते है। मेरा सुझाव है कि हर ब्लॉक में अनुपयोगी पशुओं के लिए आश्रम बनाये जाने चाहिए। गो-रक्षकों की बड़ी-बड़ी फौजें केवल राजनीति करने में अपना समय और शक्ति खपाते हैं। उन्हें न तो उन पशुओं की भूख प्यास की चिंता होती है, न ब्लेड वाले तारों से बने घावों से उत्पन्न सडऩ और पीड़ा की। उन्हें उन पशुओं के लालन पालन की चिंता हेतु पशु मित्र के नाते नियुक्त किया जा सकता है। उन पशुओं के गोबर और मूत्र से ईंधन, बिजली, उर्वरक, दवाईयां आदि बनाने के उद्योग खड़े किए जा सकते हैं। मरने के बाद उन की खाल और हड्डी आदि के सदुपयोग से हर ब्लॉक में अनेक उद्योगों का जन्म हो सकता है। बेरोजगारी की समस्या का हल पाने में मदद मिल सकती है। इससे किसान भी खुश रहेंगे और पशु भी।

यह सब करेगा कौन? हर काम में अपना निजी फायदा और कट की आशा चाहने के लिए बदनाम सरकारी तंत्र से यह आशा करना व्यर्थ होगा। असरकारी गोरक्षक तंत्र, जो, ज्यादातर आज सामाजिक और राजनीतिक विद्वेष बनाने और फैलाने के लिए ईंधन के रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं, को प्रशिक्षित और दीक्षित कर के, उन्हें आवश्यक संसाधन और कुछ मानदेय दे कर इस अभियान को अमली जामा दिया जा सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में घाव लिए, भूख प्यास से पीडि़त पशुओं के हृदय विदारक दृश्य वास्तव में वीभत्स होते हैं, और समाज विरोधियों को इस परिस्थिति का राजनीतिक लाभ लेने की प्रेरणा देते हैं। परिस्थिति भयंकर है।

डॉ. बलराम मिश्र

 

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