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क्या दोषियों के लिए फैसले का दिन उम्मीद से पहले आ गया?

क्या दोषियों के लिए फैसले का दिन उम्मीद से पहले आ गया?

हमारे देश में राजनेताओं की गिरफ्तारी कोई नई बात नहीं है। ब्रिटिश शासन वाले भारत में राष्ट्रवादियों से लेकर इंदिरा गांधी के निरंकुश शासन का विरोध करने वाले मुख्यधारा के राजनेताओं तक, राजनीति से जुड़े लोगों की हिरासत और गिरफ्तारियां हमेशा से ही हमारे राजनीतिक परिदृश्य का दुखदायी पहलू रही हैं। हालांकि, पूर्व मंत्री और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रमुख नेता, पी चिदम्बरम की गिरफ्तारी को उस चश्मे से नहीं देखा जा सकता है। ब्रिटिश हुकूमत वाली सरकार द्वारा राष्ट्रवादियों को और आपातकाल के दौरान इंदिरा के नेतृत्व वाली सरकार की ओर से विपक्षी नेताओं को जेल में डालने के पीछे की प्रमुख मंशा जहां भय का माहौल बनाने और उन सरकारों के अत्याचार के खिलाफ उठे आवाजों को कुचलन की थी, वहीं चिदम्बरम की गिरफ्तारी इसका एक उचित उदाहरण है कि जब कानून और न्याय सही दिशा में काम करता है तो कैसे प्रभावशाली और अमीर लोगों को भी अतीत में किए अपने पापों का भुगतान करना पड़ता है।

भले ही इस पूर्व मंत्री के खिलाफ लगे आरोप पिछले कुछ दिनों से सुर्खियों में थे, फिर भी हमें उन पर संक्षेप में विचार करना ही चाहिए। 21 अगस्त को सीबीआई ने  चिदम्बरम की जो गिरफ्तारी की उसका मुख्य कारण मीडिया की एक पूर्व अधिकारी, इंद्राणी मुखर्जी की गवाही थी, जिसने जांच एजेंसियों को बताया कि कैसे भारत का वित्त मंत्री रहते हुए इस व्यक्ति ने अपने पद का दुरूपयोग अपने बेटे, कार्ति चिदम्बरम को लाभ दिलाने के लिए किया। कानूनों को ताक पर रखते हुए और विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड (एफआईपीबी) की निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करते हुए श्रीमती मुखर्जी की कंपनी को विदेशी निवेश कराने की इजाजत दी गई थी। मुखर्जी दंपत्ति ने रिश्वत के तौर पर, जूनियर चिदम्बरम को उसकी कंपनी से कंसल्टिंग सेवा लेने की आड़ में अवैध पैसा दिया था। यहां गौर करने वाली एक बात यह है कि लेन-देन का यह मामला एक दशक से भी पहले हुआ जबकि श्रीमती मुखर्जी ने सरकारी गवाह बनकर इसका सारा भेद 2018 में खोला और इस कारण, जांच एजेंसियों को आरोपी को गिरफ्तार करने में किसी भी प्रकार की हड़बड़ी का इल्जाम नहीं लगाया जा सकता है। एजेंसियों ने अपनी तैयारी अच्छी तरह से की है।

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दूसरी बात, अग्रिम जमानत के लिए  चिदम्बरम की अर्जी को न केवल दिल्ली हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया बल्कि कोर्ट ने कठोर शब्दों में फटकार लगाते हुए यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष की ओर से पेश प्रमाण की ‘गहराई और विशालता’ जज को इसकी इजाजत नहीं देते कि वह जमानत की अर्जी को स्वीकार कर लें। अब इसकी तुलना जरा उस अदालती तस्वीर से कीजिए जब प्रधानमंत्री के रूप में श्रीमती इंदिरा गांधी के उत्पीडऩ का दौर था। कौन भूल सकता है कि श्रीमती गांधी ने मात्र अपने अत्याचारी शासन को जारी रखने के लिए ए. एन. रॉय (तीन सीनियर जजों की अनदेखी करते हुए) को सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया और उस पावन परंपरा का उल्लंघन किया जिसके अंतर्गत यह पद सबसे वरिष्ठ जज को दिया जाता है? आज की स्वतंत्र न्यायपालिका न केवल एक पूर्व कैबिनेट मंत्री और जाने-माने वकील, चिदम्बरम के सामने डटकर खड़ी रही बल्कि उनकी अग्रिम जमानत पर तत्काल आदेश जारी करने की अर्जी को भी खारिज कर दिया।

बात यहीं खत्म नहीं हुई। भले ही मुख्यधारा की मीडिया ने इंद्राणी मुखर्जी की गवाही को पी चिदम्बरम के कानूनी पचड़े में फंसने का तात्कालिक कारण बताया है, लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों में वह और उनके बेटे आकंठ डूबे हैं। जांच एजेंसियां एयरसेल-मैक्सिस केस में भी उनकी भूमिका की जांच कर रही हैं और इस मामले में कोर्ट ने पिता-पुत्र की जोड़ी को गिरफ्तारी से राहत दे रखी है। वास्तव में, दोनों चिदम्बरम के नाम सीबीआई की ओर से दायर चार्जशीट में दर्ज हैं और प्रवर्तन निदेशालय भी मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच कर रहा है। कानून उसी प्रकार अपना काम कर रहा है जिस प्रकार करना चाहिए और विपक्ष की ओर से इन मामलों को ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ और ‘प्रेरित’ ठहराने के आरोप मात्र कांग्रेस पार्टी पर बचे-खुचे विश्वास को और कमजोर करने का काम करेंगे जो एक के बाद एक अपने दो कार्यकालों के दौरान अपने मंत्रियों के द्वारा पदों के दुरुपयोग के अनगिनत मामलों में शामिल रहने के कारण राष्ट्रीय राजनीति के परिदृश्य से मिटने की कगार पर है।

चलिए अब न्यूज चैनलों की ओर से आयोजित की जा रही बहस की बात करते हैं जिनका जोर इस पर नहीं कि कानून को कैसे स्वतंत्र रूप से और तेजी से काम करने दिया जाए बल्कि पी चिदम्बरम के विरूद्ध मामलों के राजनीतिक पहलुओं पर है। अधिकांश समाचार कक्षों ने कांग्रेस प्रवक्ताओं को जानबूझकर या अनजाने में ही विपक्ष द्वारा सत्ताधारी बीजेपी की ओर ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ की अपनी थ्योरी को आगे बढ़ाने का अवसर दिया है। क्या इस बात को आसानी से नहीं समझा जा सकता कि जांच एजेंसियों को जानकारी हासिल करने के लिए आरोपी को हिरासत में लेने की आवश्यकता होती है ताकि जांच को सही दिशा में ले जाया जा सके? अपने खेमे में कई नामी-गिरामी वकीलों के होने का बखान करने वाली कांग्रेस पार्टी अनेक मामलों में अग्रिम जमानत की अपनी अर्जियों पर अपने हक में फैसला हासिल करने में सफल रही है, जिनमें से कुछ मामलों में पार्टी के अन्य बड़े चेहरे फंसे हुए हैं। कांग्रेस की चाल स्थगन और अंतरिम आदेश के जरिए न्याय में देरी करने की है जिससे उचित प्रक्रिया में भारी बाधा खड़ी हो जाती है। कोर्ट के बाहर, इस पार्टी ने यह झूठ फैला रखा है कि सरकार इस कथित मंशा से काम कर रही है कि उसके राजनीतिक नेतृत्व को जेल में डाल दिया जाए ताकि वह अपने आलोचकों का मुंह बंद कर दे। इन आरोपों पर कोई यकीन नहीं करने वाला है।

कांग्रेस हताश है कि न तो कोर्ट ना ही आम जनता उसे अपने एजेंडा में कामयाब होने दे रही है। केंद्र तथा राज्यों के चुनावों में पार्टी की दुर्गति दिखाती है कि किस प्रकार लोग अच्छी तरह समझ चुके हैं कि उनके लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा। वे समझ चुके हैं कि मनमोहन सरकार की पॉलिसी पैरालिसिस की जगह अब मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी की सुधारवादी सरकार ने ले ली है, जो चुनावी घोषण पत्र में किए वादों को पूरा करने में कोई कसर बाकी नहीं रख रही है। विस्थापित गरीबों को देश के किसी भी राज्य में रियायती दरों पर राशन पाने का अधिकार देने वाली ‘एक राष्ट्र, एक राशनकार्ड’ योजना से लेकर तीन तलाक को गैरकानूनी करार देकर मुस्लिम महिलाओं को उनका उचित सम्मान दिलाने वाली सत्ताधारी बीजेपी अपनी उस राह पर चल रही है जिसे कभी सुशासन का मात्र एक चुनावी बयान बना लिया गया था।

न्याय के हित में, चिदम्बरम कथा को भारत की भरोसेमंद न्यायपालिका पर छोड़ देना ही सबसे अच्छा रास्ता है। इस मामले में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप मात्र उचित प्रक्रिया में बाधा खड़ी करेंगे और अपराधियों को कानून के चंगुल से बच निकलने का अवसर भी दे सकते हैं। हाल के दिनों में, अतीत में गलत काम कर चुके लोगों पर कार्रवाई तेज हुई है और देश को बिल्कुल इसी प्रकार से चलाया जाना चाहिए। सुशासन का काम मात्र भविष्य को सुधारना नहीं होता बल्कि अतीत में की गई गलतियों को भी दरूस्त करना होता है। अतीत की गलतियों को तभी दुरूस्त किया जा सकता है जब हमारी जांच एजेंसियों को अपराधियों से निपटने की खुली छूट दी जाए। वर्तमान व्यवस्था में, ऐसा लगता है कि वे दिन लद गए जब प्रभावशाली लोगों के गुनाहों को राजनीतिक दलों के बीच एक अलिखित समझौते के तहत माफ कर दिया जाता था कि जब वे सत्ता में रहेंगी तो सुख भोगेंगी और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के पापों से आंखें मूंद लेंगी जिन्होंने अपने लिए लोगों के पैसों को लूटा था। आज का भारत अतीत का उत्तर प्रदेश नहीं जब एसपी और बीएसपी जनता के सामने तो एक दूसरे से लड़ते थे लेकिन कांग्रेस की ओर से आयोजित रात्रि भोज में साथ बैठकर भोजन का आनंद लिया करते थे। यह नया भारत है, बीते समय में अपराध कर चुके लोग इसे अच्छी तरह समझ लें।

डॉ. सुनील गुप्ता

 

 

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