क्या नमो बयार बरकरार?

क्या नमो बयार बरकरार?

आज हमारा राष्ट्र लोकतंत्र के बुनियादी मानदंड को बचाने की चुनौती से जूझ रहा है। क्योंकि हमारे लोकतंत्र के रक्षकों का एक वर्ग जबरदस्ती संविधान की शालीनता और नैतिकता को उलझाने में लगा है। भारत तपोभूमि और कर्मभूमि का देश है। लेकिन हमारी सदियों पुरानी वैदिक संस्कृति को अस्थिर करने और बिगाडऩे के लगातार प्रयास हो रहे हैं। हम सभी उस धर्म का अनुसरण करते हैं, जो सभी को एक बताता है। हम उन आदर्शों का अनुसरण करते हैं जो समाज में जाति, पंथ और नस्ल के किसी भी भेदभाव के बिना सभी की प्रसन्नता का प्रचार-प्रसार करते हैं। शांति और प्रसन्नता के वातावरण का निर्माण करना ही हमारा लक्ष्य है। हमारी संस्कृति पूरे विश्व को एक परिवार के रूप में मानती है। लेकिन हमारा लोकतंत्र हमेशा से ही विदेशी मानसिकता का शिकार रहा है। हम समाज को बांटने वाले तत्वों के चंगुल में हमेशा से ही फंसते रहे हैं। ये बांटने वाली ताकतें हमारी राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा हैं। ये ताकतें ‘देश प्रथम’ का परामर्श देने वाली भारतीय संस्कृति के विरूद्ध कार्य करती हैं। जब 2014 में नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने उस समय भारत ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व ने भारत में हुए साकारात्मक बदलाव को स्वीकारा। लेकिन 2019 में फिर से ये बांटने वाली ताकतें गलत प्रचार-प्रसार के माध्यम से मोदी सरकार जो एकात्मबाद के आधार पर देश के विकास में लगी है, उसको उलझाने के लिए पहले से मजबूत खड़े हुए दिखाई पड़ते हैं। केवल मोदी ही नहीं, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, सुषमा स्वराज और अरूण जेटली जैसे अन्य मोदी की कोर टीम के सदस्य मजबूत भारत और आम जनमानस की बुनियादी आवश्यकताओं को उपलब्ध करवाने हेतु कार्य कर रहे हैं।

तथाकथित सेकुलर मीडिया जिसका अपना एक राजनीतिक झुकाव है, वह भाजपा को सत्ता से हटाने के लिए  फेक न्यूज के माध्यम से भरपूर प्रयास में लगा है। ये तत्व भाजपा को तोडऩे के लिए भाजपा के नेताओं के बयानों को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर अभी हाल में ही नितिन गडकरी के बयान को तोड़-मरोड़ कर लोगों के बीच लाया गया। विपक्ष ये सब हथकंडे इसलिए अपना रहा है, क्योंकि उसे डर लगता है कि कहीं उसका फिर से  लोकसभा चुनाव में सफाया न हो जाएं। एक समाचार पत्रिका में अमित शाह को किसी एक समुदाय की निन्दा करने के विषय में छापा गया था, जो बाद में फेक न्यूज निकला। यह खबर मध्य प्रदेश के एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता के द्वारा ट्वीट किया गया था, जिसे बाद में डिलीट कर दिया गया। यहां यह कहना महत्वपूर्ण हो जाता है कि कुछ दिन पहले आम आदमी पार्टी ने एक फेक वीडियो का प्रचार किया, जिसमें हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को यह कहते दिखाया गया कि वह किसी एक खास जाति के मुख्यमंत्री हैं। राजनेताओं और नौकरशाहों के बीच भ्रष्टाचार व्याप्त है और काले धन का उत्तसर्जन मतदाताओं को गुमराह कर रहा है। अक्सर वोटों की सीधी खरीद-परोख्त होती है। इससे भी गंभीर बात यह है कि गरीब भोली-भाली जनता इन नेताओं से कुछ धन पाने का लालच रखती है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इन नेताओं के पास आत्याधिक मात्रा में काला धन होता है।

अब जब हम विपक्ष की ओर देखते हैं तो ममता बनर्जी क्षेत्रीय दलों को एक करती हूई दिखाई देती हैं। क्योंकि उन्हें लगता है कि वह भाजपा को 2019 चुनाव में बाहर कर पाने में सफल हो जायेंगी और पिछली 19 जनवरी को उनके द्वारा कोलकाता में आयोजित रैली में उनकी विपक्ष को एक करने की कोशिश देखने को भी मिली जहां सभी क्षेत्रीय दल के नेता एक ही मंच पर दिखे। यहां यह मना नहीं किया जा सकता कि बिखरे हुए विपक्षी दल शीघ्र से शीघ्र प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की शक्तिशाली भाजपा को हराने के लिए रास्ता निकालने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह भी है कि विपक्षी दलों में अभी भी काफी दूरियां है, जो बिल्कुल साफ दिखाई देती है। तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस, सीपीएम, एसपी, बीएसपी, आरजेडी, जेडीएस और एनसीपी की तथा-कथित एकता को देखने के पश्चात यह साफ प्रतीत होता है। उदाहरण के तौर पर कर्नाटक के मुख्यमंत्री कुमारस्वामी का हाल ही में अपने सहयोगी दल कांग्रेस के विरूद्ध दिये गये बयान यह सिद्ध करने के लिए प्रर्याप्त है। कुमारस्वामी बार-बार बयान दे रहे हैं कि कांग्रेस उन्हें काम नहीं करने दे रही है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री, जिनके सोनिया गांधी से अच्छे संबंध रहे हैं, उन्होंने हाल ही में अपने एक बयान में कहा कि वह जो राजीव व सोनिया गांधी के बारे में कह सकती है, वह राहुल गांधी के बारे में नहीं कह सकती। क्योंकि वह काफी जूनियर है। ममता बनर्जी द्वारा दिया गया यह बयान उनकी प्रधानमंत्री बनने की मंशा को दर्शाता है। इससे भी अधिक बहुजन समाजवादी पार्टी की मुखिया मायावती ने स्वयं ममता बनर्जी की कोलकाता रैली में भाग नहीं लिया। अत: इस पृष्ठभूमि में यह कहना गलत नहीं होगा कि आज कोई भी प्रधानमंत्री बनने का सपना देख सकता है, भले ही उसके पास लोकसभा की एक भी सीट न हो। हालांकि इन चार वर्षो में भारत की जनता ने नरेन्द्र मोदी के कार्यों को देखा है। हालांकि नरेन्द्र मोदी के स्तर का कोई भी विपक्ष में नेता नहीं है जो 2019 के चुनाव में अपनी धाक बना सके। क्या विपक्षी दल इसे समझ रहे हैं?

Deepak Kumar Rath

  दीपक कुमार रथ

(editor@udayindia.in)

 

 

 

 

 

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