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क्यों जरूरी है एनआरसी भारत के लिए

क्यों जरूरी है एनआरसी भारत के लिए

असम में रहने वाले भारतीय नागरिकों की पहचान के लिए बनाए गए एनआरसी यानी नेशनल सिटीजन रजिस्टर (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्ट) की आखिरी सूची शनिवार 31 अगस्त को जारी कर दी गई। इस अंतिम सूची में राज्य के 3.29 करोड़ लोगों में से 3.11 करोड़ लोगों को भारत का वैध नागरिक करार दिया गया है, वहीं करीब 19 लाख लोग इससे बाहर हैं। जबकि पिछली बार  इसमें वे लोग भी शामिल हैं, जिन्होंने कोई दावा पेश नहीं किया था। जिन लोगों के नाम लिस्ट में नहीं हैं, उनके सामने अब भी फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में अपील करने का मौका है। फाइनल एनआरसी में उन लोगों के नाम शामिल किए गए, जो 25 मार्च 1971 के पहले से असम के नागरिक हैं या उनके पूर्वज राज्य में रहते आए हैं। इस बात का सत्यापन सरकारी दस्तावेजों के जरिए किया गया।

पिछली सूची में कितने लोग थे बाहर

साल 2015 में एनआरसी प्रक्रिया शुरू होने के बाद साल 2018 तक 3 साल में राज्य के 3.29 करोड़ लोगों ने नागरिकता साबित करने के लिए 6.5 करोड़ दस्तावेज सरकार को भेजे। एनआरसी के ड्राफ्ट (प्रारूप) का कुछ हिस्सा 31 दिसंबर 2017 को जारी किया गया था, वहीं दूसरा ड्राफ्ट जुलाई 2018 को प्रकाशित हुआ। दूसरी एनआरसी सूची में 3.29 करोड़ लोगों में से 2.89 करोड़ लोगों को नागरिक माना गया था, वहीं 40.37 लाख लोगों का नाम शामिल नहीं था। वहीं अब जारी की गई आखिरी सूची में 3.11 करोड़ लोगों का नाम शामिल है और 9 लाख 6 हजार 657 लोगों के नाम नहीं हैं। लिस्ट में अपना नाम लोग इंटरनेट के जरिए या फिर राज्य के 2500 एनआरसी सेवा केंद्रों, 157 अंचल कार्यालय और 33 जिला उपायुक्त कार्यालयों में जाकर देख सकते हैं।

एनआरसी क्या है और इसकी जरूरत क्यों?

नेशनल सिटीजन रजिस्टर (एनआरसी) असम में रहने भारतीय नागरिकों की पहचान के लिए बनाई गई एक सूची है। जिसका मकसद राज्य में अवैध रूप से रह रहे अप्रवासियों खासकर बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान करना है। इसकी पूरी प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चल रही थी। इस प्रक्रिया के लिए 1986 में सिटीजनशिप एक्ट में संशोधन कर असम के लिए विशेष प्रावधान किया गया। इसके तहत रजिस्टर में उन लोगों के नाम शामिल किए गए हैं, जो 25 मार्च 1971 के पहले असम के नागरिक हैं या उनके पूर्वज राज्य में रहते आए हैं।

अकेला राज्य जहां एनआरसी लागू है

असम देश का अकेला राज्य है, जहां सिटीजन रजिस्टर लागू है। राज्य में पहली बार नेशनल सिटीजन रजिस्टर साल 1951 में बना था। तब बने रजिस्टर में उस साल हुई जनगणना में शामिल हर शख्स को राज्य का नागरिक माना गया था। इसके बाद बीते कुछ सालों से राज्य में एकबार फिर उसे अपडेट करने की मांग की जा रही थी। दरअसल पिछले कई दशकों से राज्य में पड़ोसी देशों खासकर बांग्लादेश से हो रही अवैध घुसपैठ की वजह से वहां जनसंख्या संतुलन बिगडऩे लगा था। इसी वजह से वहां के लोग एनआरसी अपडेट करने की मांग कर रहे थे। इस मांग को लेकर और अनियंत्रित अवैध घुसपैठ के विरोध में कई बार राज्यव्यापी हिंसक विरोध-प्रदर्शन भी हो चुके थे।

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एनआरसी बना असंतोष का कारक

बात जब असहमति की हो तो वो लोग तो निश्चित रूप से असहमत होंगे जो असम में सालों से रह रहे हैं लेकिन इस बात का सबूत नहीं दे सके हैं। लेकिन असम बीजेपी भी लगातार अपनी असहमति दर्ज करवा रही है।

असम के मंत्री हेमंत बिस्वा शर्मा ने ट्वीट करके कहा कि- ‘1971 से पहले बांग्लादेश से शरणार्थियों के रूप में आए कई भारतीय नागरिकों के नाम एनआरसी में शामिल नहीं किए गए हैं क्योंकि अधिकारियों ने शरणार्थी प्रमाण पत्र लेने से इनकार कर दिया था।

कई लोगों ने आरोप लगाया है कि कई नामों को डेटा में हेरफेर करके लिस्ट में शामिल किया गया है।’

हेमंत बीजेपी के उन नेताओं में से हैं जिन्होंने पहले भी एनआरसी पर अपना असंतोष जताया था। उनका कहना था कि एनआरसी से अवैध शरणार्थियों को हटाने में कोई मदद नहीं मिल सकेगी। एनआरसी का पहला मसौदा जारी होने के बाद से भाजपा नेता घुसपैठियों को निकालने के लिए पूरे देश में एनआरसी लाने की पैरवी कर रहे थे। लेकिन असम में एनआरसी लिस्ट जारी होने के बाद से ही बीजेपी एनआरसी के खिलाफ खड़ी दिख रही है। प्रदेश के बीजेपी नेता एनआरसी प्रक्रिया पर तमाम तरह के सवाल उठा रहे हैं, साथ ही एनआरसी समन्वयक प्रतीक हजेला उनके निशाने पर हैं।

बीजेपी का असंतोष वाजिब भी है। असम एनआरसी को अपडेट करने के लिए 6 साल पहले सुप्रीम कोर्ट याचिका लगाने वाले Assam Public Works ने भी एनआरसी के फाइनल डॉक्यूमेंट को गलत ठहराया है। इसके लिए उन्होंने इसके री-वेरिफिकेशन की मांग की थी जिसे शीर्ष अदालत ने ठुकरा दिया है। इस एनजीओ (NGO) ने ये भी सवाल उठाए हैं कि जिस सॉफ्टवेयर की मदद से इस प्रक्रिया को अंजाम दिया गया है वो सॉफ्टवेयर इतने बड़े डाटा की जांच करने में सक्षम नहीं है।

असम में अवैध रूप से घुसे बंगलादेशियों के खिलाफ छह साल लंबा जनांदोलन किया गया था जिसके बाद असम समझौते पर दस्तखत हुए थे। साल 1986 में सिटीजनशिप एक्ट में संशोधन कर उसमें असम के लिए विशेष प्रावधान बनाया गया। असम में एनआरसी को सबसे पहले 1951 में बनाया गया था जिससे ये पता किया जा सके कि कौन इस राज्य में पैदा हुआ है और कौन बांग्लादेश से आया है। इस रजिस्टर को पहली बार अपडेट किया गया है। इसमें उन लोगों को भारतीय नागरिक माना जाएगा जो ये साबित कर दें कि वो 24 मार्च 1971 से पहले से राज्य में रह रहे हैं। ये वो दिन है जब बांग्लादेश ने पाकिस्तान से अलग होकर अपनी आजादी की घोषणा की थी।

खतरे का समाधान है एनआरसी 

न्यूज 18 पर देवेश खंडेलवाल लिखते हैं ‘अंतर्राष्ट्रीय शोध संस्थान (www.pewresearch.org) के अनुसार 2017 में अमेरिका में बसे अवैध प्रवासियों की संख्या 10.5 मिलियन थी, जबकि 2007 में यह आबादी 12.2 मिलियन के आसपास थी। इस एक दशक के अंतराल में अमेरिका में नागरिक दस्तावेजों के बिना बसे लोगों की संख्या में कमी आयी है, जबकि भारत में 2004 तक बांग्लादेश से आये अवैध लोगों की संख्या 1.2 करोड़ थी। यह जानकारी यूपीए सरकार में मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने संसद को दी थी। 12 साल बाद राज्यसभा में फिर से इस मुद्दे पर प्रश्न किया गया। इस बार गृह राज्य मंत्री किरण रिजीजू ने बताया कि अब देश में 2 करोड़ अवैध बांग्लादेशी प्रवासी हैं।

यह दो देशों की एक समान समस्या के आंकड़े हैं। मगर अमेरिका को उनकी मजबूत नीतियों और कड़े निर्णयों के चलते कुछ राहत मिली। वहीं भारत में ‘वोट बैंक’ और साम्प्रदायिकता के कारण अवैध प्रवासियों की संख्या में 80 लाख का इजाफा हो गया। इसके अतिरिक्त 40 हजार रोहिंग्या मुसलमानों सहित म्यांमार, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के लोग भी गैर कानूनी तरीके से भारत में मौजूद हैं। ये उत्तर पूर्व के सभी राज्य, जम्मू-कश्मीर, तेलंगाना, तमिलनाडू, गुजरात, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली और उत्तर प्रदेश में बसे हुए हैं।’

अब गैर नागरिकों से आतंरिक सुरक्षा को कैसे खतरा उत्पन्न होता है, इसका उदाहरण ग्रीक से लिया जा सकता है। मई 2009 में राजधानी एथेंस में पुलिस और स्थानीय नागरिकों के खिलाफ सैकड़ों की तादाद में अवैध नागरिक सड़कों पर उतर आये थे। तकरीबन 1500 से ज्यादा अवैध लोगों ने दो दिनों तक राजधानी को बंधक बना लिया था। बस स्टैंड, दुकानें, बैंक और दर्जन भर कार को जला दिया गया। उन्होंने वहां युद्ध जैसे हालत पैदा कर दिए थे। आखिरकार जब 46 अवैध लोगों को गिरफ्तार किया गया तब वहां सामान्य जीवन वापस लौटा।

भारत में भी ऐसी समस्या न पैदा हो इसके लिए नैशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स (एनआरसी) की व्यवस्था प्रस्तावित की गई। साल 2015 में इसे असम में लागू किया गया। यह सिटीजनशिप रजिस्टर देश के नागरिकता कानून से अलग है। इसकी महत्वपूर्ण कड़ी भारत-पाकिस्तान 1971 युद्ध से जुड़ी हुई है। बांग्लादेश के अस्तित्व में आने के बाद अवैध तरीके से लोग भारत में बसने लगे। 80 के दशक में इसके खिलाफ छात्र संगठनों ने आन्दोलन शुरू कर दिया। प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने आन्दोलनकारियों को आश्वासन दिया कि अवैध लोगों को बाहर किया जायेगा। उन्होंने अगस्त 1985 को असम एकॉर्ड की घोषणा की। जिसके अनुसार 24 मार्च 1971 की मध्य रात्रि तक राज्य में प्रवेश करने वाले लोगों को भारतीय नागरिक माना जाएगा।

इससे पहले भारत और बांग्लादेश सरकारों के बीच भी अवैध प्रवास पर एक राय बन चुकी थी। बावजूद इसके यह सबकुछ कागजों तक ही सीमित रह गया। बांग्लादेश सरकार की तरफ से हमेशा कहा जाता है कि भारत में कोई भी बांग्लादेशी नागरिक गैर तरीके से नहीं रह रहा है। हालांकि यह तथ्यात्मक नहीं हैं। साल 1993 से 1998 के बीच बॉर्डर सिक्यूरिटी फोर्स ने 39,746 बांग्लादेशी लोगों को बांग्लादेश राइफल्स को वापस करने का कदम उठाया। वहां की सरकार ने मात्र 9,253 लोगों को ही अपने देश वापस बुलाया। स्थिति साफ है कि बांग्लादेश सरकार से भी हमें कूटनीतिक आधार पर इस मसले का हल निकालना होगा। वास्तविकता तो यही है कि पिछली सरकारों ने अवैध नागरिकों पर गंभीरता से कोई ठोस निर्णय नहीं लिया। इन अवैध प्रवासियों की हिम्मत कितनी बढ़ गयी थी वह इस बात से समझिये की एनआरसी का इतिहास तो 1951 का है साथ ही  देश में जनगणना तो हर 10 सालों के अंतराल में होती रही, लेकिन रजिस्टर को अपडेट करने का काम रूक गया। इससे भारत में मौजूद अवैध नागरिकों के हौसले भी बढऩे लगे। उन्हें राजनैतिक और न्यायिक समर्थन मिलने लगा। जैसे साल 2008 में एक बांग्लादेशी नागरिक ने अपने निर्वासन के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका तक दायर कर दी। हालांकि न्यायालय ने उसे खारिज कर दिया और कहा कि यह भारत की आंतरिक सुरक्षा के खिलाफ है। इन अवैध प्रवासियों में अपनी कट्टर सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने की प्रवृत्ति होती है। वे जहां भी बस जाते हैं, इस कार्य में लग जाते हैं। हर देश में यह लोग ऐसा करते रहे हैं, चाहे भारत हो या अमेरिका और यूरोप का कोई देश सामाजिक, सांस्कृतिक और कानूनी रूप से ऐसे आप्रवासियों के लिए दो विकल्प होते है, एक वे अपने देश लौट जाए। दूसरा- उन्हें स्थानीय नागरिकों के साथ समायोजन करके चलना चाहिए। अब मोदी  सरकार खास कर अमित शाह के गृहमंत्री बनने से इन अवैध प्रवासियों की हिम्मत टूटने लगी है और वे सही रास्ते पे आने को मजबूर होंगे।

नीलाभ कृष्ण

 

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