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खीरे के फायदे

खीरे के फायदे

फल एवं शाक-ये दोनों शरीर में खनिज, लवण तथा विटामिन की सम्पूर्तिक के लिये उत्तम अहारीय स्त्रोत हैं। प्राचीन काल में अरण्यप्रधान-संस्कृति होने के कारण लोकजीवन में कन्द और मूल यों ही अपने मूलस्वरूप में सेवन किये जाते थे, किंतु कालान्तर में सांस्कृतिक परिवर्तन एवं नगरीय विकास के साथ-साथ उनसे विविध शाक एवं व्यंजन बनने लगे। आजकल अनेक फल भी शाकरूप व्यवहृत होते हैं। ऐसे ही फलों की श्रेणी में त्रपुस (खीरा) आता है, जो हमारे जीवन में नित्य उपयोगी फल के साथ-साथ आहार मेंं शाक एवं सलाद के रूप में सेवन किया जाता है।

आयुर्वेदीय महर्षियों ऐसे आहारोपोगी फल शाक के पोषक गुणों के साथ ही इसकी विशिष्ट कार्मुकता शरीर के मूत्र-संवहनतन्त्र पर देखी, जिसके कारण इसके गुण-कर्म एवं प्रयोग को अपनी संहिताओं में उचित स्थान प्रदान किया।

फलशाकों जैसे कूष्माण्ड (पेठा)-का मानस-विकारों में विशेष लाभप्रद एवं कार्मुक है, उसी प्रकार त्रपुस अपने विशिष्ट मूत्रल-कर्म के कारण मूत्र संबंधी विकारों में हितावह एवं प्रभावी है।

त्रपुस के पर्याय- कण्टकीलता, सुधावास, कटु, छर्दिपर्णी, मूत्रफला, पित्तक, हस्तिपर्णिनी-ये त्रपुस (खीरे)- के प्रमुख नाम हैं, जो इनके स्वरूप एवं गुण-कर्म का बोध कराते हैं।

रासायनिक संगठन की दृष्टि खीरे में आद्र्रता 96.4, प्रोटीन 0.4, वसा 0.1, कार्बोहाइड्रेट 2.8, खनिज द्रव्य 0.3, कैलशियम 0.01 तथा फास्फोरस 0.03 प्रतिशत, लौह 1.4 मिग्रा. प्रति 100 ग्राम तथा विटामिन बी1 तथा सी होते हैं। इसके बीजों में प्रोटीन 42 तथा वसा 42.4 प्रतिशत होता है। इससे एक हलके पीत वर्ण का तेल निकलता है।

चरकसंहिता के सूत्रस्थान प्रथमाध्याय (80)- में फलिनी शीर्षक के अन्तर्गत ‘त्रपुस’ का उल्लेख है। इसके अतिरिक्त ‘मुखप्रियं च रूक्षं च मूत्रलं त्रपुसं त्वति’ (चू.सू. 27। 111) सूत्र द्वारा महर्षि चरक ने इस शाकीय फल को अतिमूत्रल निदर्शित किया है।

चाक में मूत्रकृच्छ्राश्मरी चिकित्सा में दो-तीन स्थलों पर इसका उल्लेख है (च.चि. 26। 58, 62,71) बस्तिशूलहर बस्ति में त्रपुस का उल्लेख एवं उपयोग है।

आचार्य सुश्रुतने- ‘बालं सुनीलं त्रपुसं तेषां पित्तहरं स्मृतम्’। अर्थात् बाल (कोमल) खीरे को विशेष रूप से गुणकारी एवं पित्तहर बताया है, जबकी पक्कावस्था में किंचित् अम्लरसयुक्त होने से पित्तकारक एवं मूत्रप्रवर्तक उतना नहीं होता  जितना कि बाल कोमल खीरा के उत्तम मूत्रल एवं पित्तशामक गुणों कारण इसे ‘बालमखीरा’ नाम से पुकारा गया है।

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धन्वन्तरि एवं मदनपाल निघण्टूकारने भी खीरे को- ‘त्रपुसं  छर्दिहृत् प्रोक्तं मूत्रबस्ति विशोधनम्’ तथा ‘त्रपुसं मूत्रलं शीतं रूक्षं पित्ताश्मकृच्छ्रनुत्।’ – कहा है।

इन निर्दिष्ट सूत्रों के द्वारा खीरे में विशिष्ट मूत्रोत्पादक एवं मूत्रबस्तिविशोधक कर्म को उद्धाटित किया है।

इस प्रकार उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि शाकीय फल खीरा एक तहत्त्वपूर्ण निरापद उपयोगी वानस्पतिक द्रव्य है, इसका वर्णन संक्षेप में इस प्रकार है-

(क) मूत्रवहसंस्थान के प्रमुख विकारों में उपयोगी है। जैसे मूत्रकृच्छ्र -मूत्रावरोध, मूत्राश्मरी (मूत्रपथ की पथरी)।

(ख) मूत्रवह स्त्रोतस् की शोथजन्य विकृतियों- जैसे वृक्काणुशोथ, मूत्रबस्ति एवं नलिकाशोथ में उपयोगी है।

(ग) मूत्ररक्तता, मूत्रविषमयता, मूत्राघात एवं मूत्रदाह में लाभकारी।

(घ) पौरुषग्रन्थिशोध और वृद्धिजन्य अवस्था में लाभप्रद है।

मूत्रवहसंस्थान के इन विकारों के अतिरिक्त खीरा उदरविकार, आध्मान, आटोप, विबन्ध, पाण्डु (रक्ताल्पता), कामला (पीलीया), यकृत्-विकार, विविध पैत्तिक विकार, हृद्रोग, शोथ एवं नेत्रदाह में भी उत्तम पथ्य एवं औषधरूप में व्यवहार करने योग्य है।

इन सब अवस्थाओं में इसके बाल (कोमल) फल (अपक्कावस्था)-का ही उपयोग सर्वदा फलप्रद एवं हित-कारक है।

(साभार: आरोग्य कल्याण अंक)

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