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गांधी जी की हत्या के बाद हुआ था आजाद भारत का पहला नरसंहार

गांधी जी की हत्या के बाद हुआ था आजाद भारत का पहला नरसंहार

हाल ही में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए 1984 के दिल्ली दंगों के मुख्य आरोपी सज्जन कुमार को उम्रकैद की सजा सुनाई गई। दरअसल, ये दंगा नहीं नरसंहार था जिसमें 3000 सिख मारे गए। उसके आरोपी को 34 साल बाद सजा हुई है। कई अन्य आरोपियों को भी सजा हो चुकी है। मगर क्या आप जानते है कि आजाद भारत का पहला नरसंहार गांधी हत्या के बाद महाराष्ट्र में हुआ जिसमें सैकडों लोग मारे गए। तब महान डैमोक्रेडेट पंडित नेहरू प्रधानमंत्री थे। मगर न इस नरसंहार की जांच हुई, न पता चला कि कितने लोग मरे। लोग अब इसे भूल गए हैं। मगर दिल्ली के नरसंहार और गांधी हत्या के बाद महाराष्ट्र में हुए नरसंहार में एक समानता है कि दोनों के लिए कांग्रेस जिम्मेदार थी। महाराष्ट्र का नरसंहार अहिंसा के पुजारी बापू को कांग्रेसियों की हिंसक श्रद्धांजलि थी।

अब तो यह बात जगजाहिर है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी जनेऊधारी हिन्दू या ब्राह्मण है। पार्टी के प्रवक्ता रणजीत सिंह सुरजेवाला ने दावा किया था  कि ब्राह्मण तो कांग्रेस के डीएनए में है वह कांग्रेस के खून में बहता है । वैसे इस बात में सच्चाई है भी कि स्थापना के बाद से ही कांग्रेस के बड़े नेता ब्राह्मण रहे हैं जैसे तिलक, गोखले, मदन मोहन मालवीय, पंडित नेहरू आदि। इतना ही नहीं, आजादी के बाद तक कांग्रेस का जनाधार ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम ही माने जाते थे। मगर बारी-बारी से ये सभी ही कांग्रेस से बिछुड़ गए। इसलिए ज्यादातर लोगों ने इसे कांग्रेस की अपने पुराने जनाधार से जुडऩे की कोशिश के तौर पर ही देखा। दरअसल, कांगे्रस के प्रवक्ता यही कहना चाहते थे कि ब्राह्मण होना कांग्रेस के खून में है। यह सत्य है मगर अधूरा सत्य है। हकीकत यह है कि कांग्रेस वह पार्टी है जिसके हाथ ब्राह्मणों के खून से भी रंगे हुए हैं। ठीक उसी तरह जिस तरह कांग्रेस के हाथ 1984 में सिखों के खून से रंगे हुए थे। फर्क सिर्फ इतना है कि 1984 के दंगों के जख्म अब भी लोगों की यादों में ताजा हैं। मगर महात्मा गांधी की हत्या के बाद 1948 में महाराष्ट्र में हुए ब्राह्मण विरोधी दंगों को लोग भूल गए। देश महात्मा गांधी की याद में इतना गमगीन था कि लोग और मीडिया भी इन दंगों पर ज्यादा गौर नहीं कर पाया। दोनों घटनाओं में एक और समानता थी। 1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या करनेवाले सिख थे इसलिए उसके समुदाय के लोगों के खिलाफ कांग्रेस का गुस्सा उमड़ा। तो 1948 में महात्मा गांधी का हत्यारा नाथूराम गोडसे  एक चितपावन  ब्राह्मण था इसके कारण चितपावन ब्राह्मणों के खिलाफ कांग्रेसियों का गुस्सा उमड़ा।

30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेसियों में  प्रतिशोध की जो लहर उठी उसके सबसे ज्यादा शिकार हिन्दू महासभा और रास्व संघ वाले और चितपावन ब्राह्मण हुए। शुरूआत पुणे शहर से हुई 31 जनवरी-3 फरवरी 1948 तक पुणे में हुए चितपावन ब्राह्मणों के नरसंहार को आज लोग भुला चुके हैं। पूना के लोगों में भी इसकी धुंधली यादें ही हैं। अखबारों में इसके बारे में लगभग नहीं छपा। मगर न्यूयार्क टाइम्स ने 31 जनवरी 1948 की रपट ”गांधी इज किल्ड बाय ए हिन्द’’ में लिखा था कि केवल मुंबई में पहले दिन 15 लोग मर चुके थे। पुणे के स्थानीय लोगों ने बताया पचास लोग मर चुके हैं। (हिन्दू राष्ट्र सहित अन्य हिन्दू समर्थक अखबारों में आग लगाई गई थी।) यह तो सिर्फ पहले दिन के दंगों के आंकड़े थे। बाद में दंगा सारे दक्षिण महाराष्ट्र में फैल गया और ज्यादा विकराल हो गया। उस समय के बारे में माउरीन पेटरसन ने अपने अध्ययन में लिखा है भीड़  हिन्दू महासभा और रास्वसंघ के दफ्तरों में घुस गई थी उनके समर्थकों के घरों और दुकानों में सेंध लगी रही थी। 500 से 1000 लोगों की भीड़ ने सावरकर के घर को घेर लिया था। जिन्हें पुलिस ने बचाया। सबसे ज्यादा हिंसा हिन्दू राष्ट्रवादियों के गढों मुबई, पुणे और नागपुर में नहीं हुई वरन मराठी भाषी क्षेत्र दक्षिणी पश्चिमी सातारा, बेलगांव और कोल्हापुर में हुई। पुणें में 31 जनवरी-3 तक ये दंगे चलते रहे। उस समय न तो मोबाइल फोन थे, न पेजर, न फैक्स, न इंटरनेट अर्थात संचार माध्यम इतने दुरूस्त नहीं थे, परन्तु फिर भी कांग्रेस ने इतना भयंकर रूप से यह नरसंहार करवाया जो दशकों तक ब्राह्मणों को कचोटता रहा।

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महाराष्ट्र के हजारों-लाखों ब्राह्मण के घर-मकान-दुकाने-स्टाल फूंक दिए गए। सैंकडों ब्राह्मण मारेगए, हजारों जख्मी हुए, ब्राह्मण स्त्रियों के साथ दुष्कर्म किये गए वृद्ध हो या किशोर, सबका नाम पूछ-पूछ कर चितपावन ब्राह्मणों को चुन-चुन कर जीवित ही जला दिया गया। कई दिनों तक पुणे  जलता रहा। यह हिंसा गांव-गांव तक फैली। वहां नारे लगते थे -”ब्राह्मणों यदि जान प्यारी हो, तो गाँव छोड़कर भाग जाओ’’-1 फररवरी 1948 को कांग्रेसियों द्वारा हिंसा-आगजनी-लूटपाट का ऐसा नग्न नृत्य किया गया।

इसके बाद तो यह हिंसा पूरी तरह जातिवादी हो गई थी। खासकर मराठा जाति के लोग कांग्रेस पर छाए हुए थे वे राजनीति से ब्रह्माणों को हटाकर सत्ता पर काबिज  होना चाहते थे। मराठा राजनीतिज्ञों की लॉरियों में भर-भर कर लोग लाए गए। उन्होंने ब्राह्मण इलाकों में जाकर अपनी प्रतिशोध की आग को शांत किया। मुख्यरूप से चितपावन ब्राह्मणों को निशाना बनाया गया क्योंकि क्षत्रिय मराठाओं और सावरकर और नाथूराम गोडसे की ब्राह्मणों की उपजाति चितपावन ब्राह्मणों की कई सदियों से दुश्मनी थी। शिवाजी के वंशज उनके साम्राज्य का सही तरीके संचालन नहीं कर पाए। इसलिए मराठा साम्राज्य के संचालन की जिम्मेदारी चितपावन ब्राह्मण पेशवाओं के कंधों पर आ गई। उन्होंने मराठा साम्राज्य ग्वालियर झांसी तक फैलाया। इसलिए सत्ता में उनका वर्चस्व बना रहा। शिवाजी के वशंज नाममात्र के शासक रहे मगर असली सत्ता ब्राह्मण पेशवाओं के हाथ रही। इससे मराठा और ब्राह्मणों  के बीच प्रतिद्रवदिता बढ़ी। बाद में अंग्रेजों के हाथों पेशवापराजित हुए मगर सार्वजनिक जीवन में उनका दबदबा बना रहा। तिलक, गोखले, रानडे स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व करने के कारण राजनीति में छाए रहे। मगर बाद में मराठा कांग्रेस का प्रमुख जनाधार बन गए। कई इलाको में तो ब्राह्मणों से इष्र्या करनेवाले जैन और लिंगायत भी हमलों में शामिल हो गए।

दंगों का असर यह हुआ कि प्रत्येक गांव से ब्राम्हण भाग-भाग कर यहां-वहां छिप गए। बहुत से ब्राह्मण महाराष्ट्र से बाहर चले गए अथवा किसी अन्य दूर के गांव में छुप गए और बहुत समय तक उन्होंने अपना परंपरागत कार्य छोड़ दिया। कई अन्य व्यवसायों में चले गए। कईयों को विस्थापित होने को विवश कर दिया।

संघ के साथ जुड़े ब्राह्मणों के घर पर जो हमले हुए उसका विवरण ‘युग प्रवर्तक गुरूजी’ पुस्तक में च. प. भीशीकर ने बताया है कि-  ‘महाराष्ट्र के इस कांड ने ब्राह्मण, अब्राह्मण विवाद का रूप ले लिया। इसके परिणाम स्वरूप असंख्य लोगो के घरों पर हमले हुए। आगजनी, लूटपाट की घटनाए होती रही। भारी नुकसान हुआ। महाराष्ट्र और उसके आस-पास के प्रदेशों में हजारों परिवार निराधार भी हो गए। कितने ही लोगो के प्राण भी गए। देशभर में संघ के (ब्राह्मण) स्वयंसेवको और कार्यकर्ताओ को यातनाए भोगनी पड़ी’।

गांधी हत्या के बाद कांग्रेस के मराठा नेताओं ने ब्राह्मणों का अघोषित बहिष्कार शुरू कर दिया। नतीजतन वे कांग्रेस में एकदम हाशिए पर आ गए।

उस जमाने में सांप्रदायिक दंगों की रपट पर कड़ा निययंत्रण था। माउरीन पैटरसन लिखती है कि घटना के दस साल बाद भी उन्हें इन मामलों की पुलिस फाइलें नहीं दिखाई गई। जबतक सारे रिकॉर्ड सामने नहीं आते तबतक यह पता नहीं चल सकता कि कितनी जानें गई कितना नुकसान हुआ। वैसे पर्यवेक्षक मानते हैं इन दंगों में सैकडों जाने गई।

बहुत से लोग मानते है कि यह स्वतंत्र भारत की  लिंचिंग की पहली घटना थी जिसे कांग्रेस ने अंजाम दिया था। कुछ लोग इसे स्वतंत्र भारत का पहला नरसंहार कहते हैं। जिसकी न जांच हुई,न दोषियों को कोई सजा हुई।

 

सतीश पेडणेकर

 

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