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गाय और गांधीजी का दृष्टिकोण

गाय और गांधीजी का दृष्टिकोण

कई देशों में स्वतंत्रता के लिए आंदोलन हुए। भारत में भी स्वतंत्रता के लिए बड़ा संघर्ष हुआ। लेकिन उस संघर्ष की विशेषता यह थी कि आजादी की लड़ाई के दौरान गांधीजी ने आजादी के बाद हमारे देश की स्वतंत्रता को ग्राम स्वराज्य में बदलने के लिए क्या-क्या प्रोग्राम चलाए जाएंगे, इसका न केवल खाका बना दिया था, बल्कि स्वतंत्रता सेनानियों ने किसी-न-किसी रूप में उस खाके पर कार्य किया था, उसकी साधना की थी। गांधी ने स्वतंत्रा आंदोलन के दौरान ही 18 रचनात्मक कार्यक्रमों की कल्पना की थी। इन रचनात्मक कार्यक्रमों में कृषि-गो-सेवा भी एक कार्यक्रम था।

कृषि गो-सेवा के कई प्रयोग, कई अनुसंधान गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रा सेनानियों के किए। भारत में गाय का बहुत महत्व है। धार्मिक दृष्टि से तो गाय का महत्व है ही, भावनात्मक दृष्टि से भी गाय का महत्त्व है। हिंदू का यह विश्वास है कि गाय की सेवा, गाय की पूजा करने से, गाय के चरण वंदन से या गाय को देने से मृत्यु उपरांत भगवान के दरबार तक पहुंचने के लिए जो वैतरणी पार करनी पड़ती है, वह गाय की पूंछ पकड़कर पार की जा सकती है। यह एक विश्वास है। सदियों से चली आ रही मान्यता है। इसको सही या गलत प्रमाणित करना बहुत कठिन है। क्योंकि प्रमाण सहित तो वही कह सकता है, जो स्वर्ग से वापस आया हो। लेकिन स्वर्ग से तो कोई वापस आता नहीं हैं। सदि पुनर्जन्म के सिद्धांत को मानते हुए, वापस आता भी है तो पूर्व जन्म का उसे कुछ याद रहता नहीं है, इसलिए मरने के बाद क्या होता है, यह प्रमाण सहित कहना कठिन है। लेकिन यह मान्यता है, विश्वास है कि वैतरणी पार करने के लिए गाय का सहारा आवश्यक है। इसलिए गाय की पूजा होती है। गाय के साथ हमारा धार्मिक संबंध है, गाय के साथ हमारा भावनात्मक संबंध है। लेकिन एक विषय, गाय के बारे में तथ्य आधारित प्रमाणीत है कि गाय एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण अंग है मानव जीवन का। इतने महत्त्वपूर्ण अंग की रक्षा मात्र धार्मिक सोच या भावनात्मक कारणों से संभव नहीं है। लेकिन यह आवश्यक है कि गाय की रक्षा होनी चाहिए। गांधीजी ने गाय की आवश्यकता और गाय के महत्त्व को समझा, इसलिए उन्होंने अपने रचनात्मक कार्यक्रमों में गाय को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया और कृषि गो-सेवा के नाम से एक कार्यक्रम बनाया। इस कार्यक्रम का शीर्षक ‘कृषि गो-सेवा’ रखकर गांधीजी ने रेखांकित किया कि गाय की रक्षा खेती के साथ जोड़कर ही हो सकती है। जो लोग गांव में रहते हैं और किसानी करते हैं, वे जानते हैं कि गाय खंत के बिना अधूरी है और गाय के बिना खेत अधूरा है। गांधीजी ने कृषि और गो-सेवा को जोड़कर गाय की रक्षा, गाय की सेवा, गो-संवर्धन का एक पुराना दृष्टिकोण नई सोच, नए दृष्टिकोण के साथ स्वतंत्रता सेनानियों और उनके माध्यम से,देश के भावी स्वास्थ्य और विकास के लिए एक स्वस्थ रूप में देश के भावी नीति-निर्धारकों और योजनाकारों के सामने रखा। गांधीजी अच्छी तरह जानते थे कि मात्र धार्मिक या भावनात्मक लगााव से गाय की पूजा तो हो ही सकती है, लेकिन गाय की सेवा, गो-संवर्धन नहीं हो सकता। उसके लिए गाय को व्यापक आधार चाहिए। वह व्यापक आधार खेती ही हो सकता है।

यह देश गावों का देश है। इसलिए देश के संदर्भ में गांधीजी ने गांव के महत्त्व को अच्छी तरह लिया था। इसीलिए ग्राम स्वराज की बात करते थे। गांव को आत्मनिर्भर बनाने की बात करते थे। गांव आत्मनिर्भर होगा तो देश आत्मनिर्भर होगा। गांव मजबूत होगा तो देश मजबूत होगा। 75 से 80 प्रतिशत जनता गांव में रहती है। सभी गांव खेती पर निर्भर करते हैं। खेती हर मजदूर, छोटे और मझोले किसानों का जीवनयापन मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर करता है। इस कृषि के साथ, गाय को जोड़कर यदि अर्थनीति बनाई बनाई जाए तो वह ग्रामीण अर्थनीति होगी। स्थायी भी होगी और विकासशील भी। ऐसा लिखना अंतर्विरोध जैसा भी लग सकता है। स्थायी और विकासशील भी। लेकिन गांधी जी की सोच के अनुसार यही सही है। ऐसी अर्थनीति, जिसे कोई खतरा न हो, जो छोटे-मोटे झंझावातों से विचलित न हो। जो अंतराष्ट्रीय शोषण से स्वंय को बचा सके, वही स्थायी है, टिकाऊ है। ऐसी टिकाऊ अर्थव्यवस्था में विकास की कडिय़ां जुड़ती चली जाएं तो यह अर्थनीति विकासशील है। इसलिए स्थिर और विकासशील में कोई अंतर्विरोध नहीं, बल्कि ये एक-दूसरे के पूरक हैं।

गांधीजी की समझ में यह स्पष्टत: आ गया था कि गांव का इतना बड़ा आधार, कृषि की इतनी बड़ी संभावनाएं जब गाय के साथ जुड़ जाएंगी तो गाय को बचाने के लिए कोई विशेष व्यवस्था नहीं करनी पड़ेगी। इसलिए गाय को मात्र धार्मिक और भावनात्मक स्थितियों से निकालकर अर्थ जैसे व्यापक आधार के साथ जोडऩा गाया के प्रति गांधीजी की मानवता के लिए एक विशेष देन है।

कृषि, गाय और ग्रामोद्योग को जोड़ दिया जाए तो यह एक संपूर्ण, स्वस्थ और विकासशील आर्थिक मॉडल है। जिस गांव में खेती, गांव तथा ग्रामोद्योग का आपसी आधार बनाकर यदि प्रयास किए जाएं तो गांव से शहरों की ओर पलायन समाप्त नहीं तो बहुत कम हो सकता है। आज स्थिति ऐसी है कि गांव का नवयुवक नौकरी की तलाश में शहरों की ओर भाग रहा है। इसलिए गांव खाली हो रहे हैं और गांव की अबादी शहरों में पहुंच रही है तो शहरों पर वनज रहा है। इसलिए शहर उस बढ़ते हुए वनज से परेशान हैं। इसमें संतुलन बनाए रखने के लिए गांव में रोजगार सृजन आवश्यक है।

जब हम रोजगार की बात करते हैं तो आज के दिन में उसका सीधा अर्थ लिया जाता है कि सरकारी नौकरियां या बड़ी-बड़ी कंपनियों में बड़ी-बड़ी नौकरियां, जो बिल्कुल भी नहीं है। न तो सरकार सबको नौकरी दे पाएगी और निजी कंपनिया तो उतनी ही भरती करेंगी जितनी उन्हें नितांत आवश्यकता है। तो फिर नौकरियां की संभावना कहां है। अंतत: स्वरोजगार की ओर ही जाना है। बेरोजगार का वही स्थायी हल है। स्वरोजगार के लिए गाय, खेती और ग्रामोद्योगों का परस्परावलंबन यही एक मात्र उपाय है। गांधीजी ने इन तीनों कार्यक्रमों को अपने रचनात्मक कार्यक्रमों में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है। आजादी की लड़ाई लड़ते-लड़ते, आजादी के बाद देश के विकास का माध्यम क्या होगा, उसका एक अच्छा चित्र गांधीजी ने अपने रचनात्मक कार्यक्रमों के  रूप में देश के सामने रखा। इस कार्यक्रम में गाय के महत्त्व को गांधी ने रेखांकित किया है।

गांधीजी जानते थे कि गाय जो हमारे लिए वरदान है, मानवता के लिए वरदान है, उसे यदि धार्मिक या रचनात्मक विषय तक सीमित रखा तो गाय की पूजा होगी, लेकिन गाय की सेवा नहीं होगी। ऐसे हजारों-लाखों लोग हैं, जो गाय की पूंछ पकड़कर वैतरणी पार करना चाहते हैं। परंतु उनमें ऐसे कितने लोग हैं, जो गाय को पालने की जिम्मेदारी लेना चाहते हैं या पालते हैं। शायद बहुत ही कम, शायद नाममात्र। मेरे मोहल्ले में एक गाय बंधी रहती थी। उस गाय को कभी दो-चार किलो घास कोई भक्त डाल देता था। वह भी तब, जब किसी तांत्रिक ने उसे बताया हो कि यदि आप गाय को हरी घास खिलाओगे तो अमुक बिगड़ा काम बन जाएगा। इसी आशा में वह गाय को कहीं से ढ़ूढ़कर घास लाता था। और खिलाता था। घास ढंूढऩा मुश्किल काम था लेकिन ऐसा मुश्किल काम कोई भी अवश्य करेगा। परंतु इतना मुश्किल करने के आधार पर क्या गाय पल सकती है। गाय पालने के लिए सातत्य चाहिए। धूप हो, वर्षा हो, सर्दी हो, हिमपात हो रहा है। गाय को तो खिलाना ही पड़ेगा। पानी पिलाना पड़ेगा, गोबर उठाना पड़ेगा। साफ-सफाई करनी पड़ेगी। यह सब कार्य किसी भी स्थिति में करना पड़ेगा और सातत्यपूर्वक करना पड़ेगा। तभी गाय पलेगी। तभी वह दूध देगी। इतनी मेहनत से पाली जानेवाली गाय का उपयोग यदि मरणोपरांत तक या धार्मिक भावनात्मक विषय तक सीमित रहा तो गाय पालना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य होगा। इसलिए गांधीजी ने गाय को धार्मिक तथा भावनात्मक विषय के अतिरिक्त आर्थिक विकास के साथ जोड़ा।

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गाय का अर्थ लाभ आत्मनिर्भर है। यदि कोई छोटी या बड़ी इंडस्ट्री लगाएंगे तो उसके लिए श्रम भी बाहर से आएगा, कच्चा माल भी अन्यत्र से आएगा और बिक्री भी कहीं अन्यत्र करनी पड़ेगी, इसकी पूरी व्यवस्था जुटानी पड़ेगी। लेकिन गाय क्या है? गाय को खेती के साथ जोड़कर देखें तो गाय पालक किसान को, गाय पालने के लिए कहीं बाहर नहीं जाना। जिस खेत में गाय बांधी गई है, उसी खेत से गाय को घास मिल जाती है, उसी खेत में गाय का गोबर खाद का काम करता है, किसान और किसान का परिवार श्रम के रूप में उपलब्ध है। हमारे बुजुर्ग थे, वे कहा करते थे कि गाय के अंदर ऐसी मशीन है, जो घास खाती है और अमृत जैसा दूध पैदा करती है। ऐसा उद्योग, ऐसी फैक्टरी जो हर तरह से आत्मनिर्भर। मैं स्वंय एक गांव का रहनेवाला हूं। मेरा परिवार एक छोटी जोतवाला किसान है। उसके साथ गाय भी पालता है। हम यदि हिसाब लगाएं तो गाय के दूध का लागत खर्च सौ-सवा सौ रुपये किलो आता है और तीस रुपए किलो बिकता है। फिर भी हमारा परिवार खुश है और मन से गाय पालन करता है। यह गाय ऐसा कौन सा धंधा है और यह अर्थशास्त्र है कि लागत मूल्य सौ-सवा सौ रुपया और विक्रय मूल्य 25 से 30 रुपए। फिर भी हम गाय पालते हैं हम गाय पालते हैं। अर्थ लाभ करते हैं। घर में दूध का इस्तेमाल करते हैं और जो दूध बेचते हैं, उससे परिवार का पोषण करते हैं। सौ रुपए लागत मूल्य और 25 बिक्री मूल्य के बाद भी धन लाभ। यह अर्थशास्त्र हिंदोस्तान के अर्थ विशेषज्ञों को समझना पड़ेगा, तभी इस देश की आर्थिक नीतियां देशहित में बनेंगी।

किसान, उसकी पत्नी और स्कूल जाने वाले बच्चे सुबह-सुबह उठते हैं। किसान खेत में जाने से पहले, बच्चे स्कूल जाने से पहले और गृहणी रसोई में जाने से पहले घर की गोशाला का काम पूरा करते हैं। यह जो सुबह से गाय की सेवा शुरू होती है, वह शाम की गौधूलि तक सातत्यपूर्वक जारी रहती है, बल्कि उसके बाद भी, सोने से पहले गाय को रात भर चारा डालकर किसान और उसका परिवार खाना खाता है। इस सारे श्रम को जोड़ा जाए। खेत से मिलने वाले चारे की कीमत जोड़ी जाए, इस तरह गाय पर आनेवाले सारे खर्च को जोड़ा जाए तो दूध का लागत मूल्य सौ-सवा सौ रुपए से कम नहीं बैठता। जब इसी दूध को किसान गांव के हलवाई की दुकान पर लेकर जाता है तो वह उसे 25 या तीस रुपए से अधिक नहीं देता। किसानों के चौधरी, किसानों के नाम पर नेतागिरी करनेवाले भले ही इससे खुश न हों, लेकिन किसान खुश है। किसान के इस अर्थशास्त्र को गांधीजी ने समझा, इसलिए उन्होंने कृषि गो-सेवा की बात की।  गाय को कृषि के साथ जोड़ा। गांधीजी ने गाय को संपूर्णता में देखा। इसी में गांधी को गाय का भविष्य नजर आया। इसी के लिए उन्होंने प्रयास किया। योजनाएं बनाई और गोपालन, गो-सेवा, गोसंवर्धन की एक वृहद योजना स्वत: बनी, जिस कारण, गाय गांव के, ग्रामीण अर्थशास्त्र के केंद्रबिंदु में आ गई।

इतना समझने के बाद, गाय जैसे इतने महत्त्वपूर्ण विषय को कोई क्यों छोड़ेगा? ऐसी गाय हिंदू को भी चाहिए, मुसलमान को भी चाहिए। सिक्ख, ईसाई, पारसी को भी चाहिए। स्र्वण-अवर्ण को भी चाहिए। पुरूष-स्त्री को भी चाहिए। बूढ़े और बच्चे को भी चाहिए। यह गाय सब को चाहिए। सब को चाहिए तो सभी उसकी सेवा में लगेंगे। सब उसे पालेंगे। जब गाय को सब पालेंगे तो गाय की आवश्यकता बढ़ेगी। गाय का उपयोग बढ़ेगा। व्यापक स्तर पर गोपालन होगा। गोपालन के लिए गो-सेवा के लिए, गोवंश संवर्धन के लिए गांधीजी की यह महान सोच और महान सेवा है।

गाय का दूध अमृत है। यह हम सब जानते हैं। देशी अमृत है। जिसे कुछ नहीं पचता, उसे देशी गाय का दूध पचता है। ऐसे अमृत सामान दूध के लिए गाय जरूरी है, गोपालन जरूरी है। इसलिए जब तक गाय दूध देती है, तब तक गोपालन गाय पालता है। उसकी सेवा करता है। जब गाय दूध देना बंद कर देती है तो गाय के नए दूध की भी, किसान प्रतीक्षा करता है, लेकिन जब यह गाय दूध देने में असमर्थ हो जाती है तो गोपालन के लिए भार बन जाती है। तो क्या किया जाए?

किसान ने खेती और गाय को जोड़ा। गांधीजी ने खेती और गाय को जोड़ा। खेती और गाय का आपस में चोली-दामन का संबंध है। एक के बिना दूसरा अधूरा है। खेत में चारा पैदा होगा तो गाय को चारा मिलेगा। गाय गोबर देगी तो खेत को खुराक मिलेगी। गांधीजी ने अपने रचनात्मक कार्यक्रमों कृषि और गो-सेवा को जोड़कर कृषि गो-सेवा ऐसा विषय बताकर, खेती और गाय के परस्परावलंबन को रेखांकित किया। वैसी योजनाएं बनाईं। वैसे आविष्कार किए। 1945 में जब कस्तूरबाजी का आगा खां महल में नजरबंदी के दौरान देहावसान हुआ तो उसके बाद कस्तूरबाजी की याद में एक स्मारक ट्रस्ट बनाने का निर्णय किया। गांधीजी तो अपनी सोच में सदैव स्पष्ट थे। जब सहयोगियों ने, साथियों ने कस्तूरबा के नाम स्मारक ट्रस्ट बनाया तो गांधीजी ने इस ट्रस्ट को कृषि गो-सेवा के साथ जोड़ दिया।

इंदौर (मध्य प्रदेश) में गांधीजी को इस कार्य के लिए लगभग पांच सौ एकड़ जमीन मिली, जिसे गांधीजी ने कृषि, गो-सेवा के विकास, विस्तार और संवर्धन के लिए समर्पित किया। वहां अनेक अभिनव प्रयोग हुए। आज भी हो रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्य है कि आज की आधुनिकता की चकाचौंध में, आधुनिक आविष्कारों की आधुनिकता में, पढ़े-लिखे विशेषज्ञों के ‘आविष्कारों’ के कारण गांधी और गांधीजी के अनुयायियों के वे प्रयोग नेपथ्य में चले गए हैं या जा रहे हैं।

किसान को खेती के लिए खाद चाहिए तो आज का पढ़ा-लिखा विशेषज्ञ कहता है कि रासायनिक खाद का उपयोग करो। रासायनिक खाद की खोज हुई। फिर रासायनिक खाद का किसानों को उपयोग करना सिखाया गया। लालच पैदा किया गया। आकर्षण पैदा किया गया। शुरू-शुरू में रासायनिक खादों से खेती की पैदावार में वृद्धि भी हुई। क्योंकि भूमि स्वस्थ थी। गोबर और पत्तों आदि की खाद से भूमि की उर्वराशक्ति बहुत अच्छी थी। उसमें जब रासायनिक खाद का मिश्रण हुआ तो पैदावार में अधिक वृद्धि हुई। किसान को भी लगने लगा कि यह रासायनिक खाद वरदान है। हालांकि उस समय भी यद्यपि अनपढ़ या कम पढ़े लिखे किसान जोर देते थे यह रासायनिक खाद खेतों को हानि पहुंचाएगी और कालांतर में खेतों की उर्वरता समाप्त हो जाएगी या कम हो जाएगी। मेरे घर में, मेरे पिताजी खेत में रासायनिक खाद का इस्तेमाल करना नहीं चाहते थे, लेकिन मैं तो ‘पढ़ा-लिखा’ था, ‘शिक्षित’ था। मेरा आग्रह था कि खेत में रासायनिक खाद अवश्य डालनी चाहिए, जिससे हम अपनी पैदावार बढा सकें। मरे घर मेंं रासयायनिक खाद और जर्सी गाय का प्रवेश मेरे कारण हुआ। मेरे जैसे हजारों-लाखों तथाकथित शिक्षित बेटों ने ‘अनपढ़ या पढ़े-लिखे’ माँ-बाप को रासायनिक खाद इस्तेमाल करने के लिए मजबूर कर दिया। अच्छी पैदावार होने लगी तो सबको लगने लगा कि यह रासायनिक खाद तो रामबाण है। देश के तथाकथित विशेषज्ञों को पता भी नहीं लगा कि कब यह धरती रासायनिक खाद की गुलाम बन गई। अब तो स्थ्त ऐसी है कि यदि रासायनिक खाद नहीं डालते हैं तो जितना अन्न बिना खाद डाले होता था, उतना भी उत्पादना नहीं होता। धरती पूरे तौर पर रासायनिक खाद पर निर्भर होती गई है।

खेत को खाद चाहिए थी तो गोबर की आवश्यकता थी। गोबर के लिए गााय चाहिए, लेकिन अब गोबर नहीं चाहिए तो गाय की आवश्यकता भी नहीं। गाय का काम रासायनिक खाद कर रही है। खेत के लिए बैल चाहिए। बैल तो गाय से ही मिलेंगे। लेकिन जब यह खेती ‘विशेषज्ञों’ के हाथ में आई तो उन्होंने खोज की, आविष्कार किया, अनुसंधान किया। विशेषज्ञों ने टै्रक्टर किसान के सामने लाकर खड़ा कर दिया। टै्रक्टर के सामने बैल की क्या औकात। न चारा चाहिए, न सेवा चाहिए, न बैल पालने का श्रम। टै्रक्टर में डीजल डालो, टै्रक्टर से जुताई शुरू। सब आसान भी और टै्रक्टर वाले की शान भी। इसमें गाय के बहाने इस तत्त्व की आवश्यकता समाप्त तो गाय की भी आवश्यकता नहीं। दूध एक महत्वपूर्ण उत्पाद है गाय का, लेकिन इसमें भी विशेषज्ञों ने मेहनत करके अमूल और मदर डेयरी आदि ऐसे माध्यम उपलब्ध करवा दिए कि दूध के लिए भी गाय की आश्यकता नहीं। इस तरह खेती और दूध दोनों के लिए गाय की आवश्यकता नहीं। अब गाय और बैल की एक ही आवश्यकता बची, वह है ‘बीफ’। मुझे भारत सरकार के योजना आयोग की एक रिपोर्ट पढऩे को मिली। उसमें वाणिज्य मंत्रालय की प्रगति रिपोर्ट थी। इसमें वाणिज्य मंत्रालय ने यह कहकर अपनी पीठ थपथपाई थी कि अमुक वर्ष में भारत से बीफ का निर्यात बढ़ा है। कृषि मंत्रालय तो यह नहीं कह सका कि देश में गायों की संख्या बढ़ी है, बैलों की संख्या बढ़ी है। गोवंश विस्तार हुआ है, लेकिन वाणिज्य मंत्रालय कह सका कि ऐश से बीफ का निर्यात बढ़ा है। क्या गाय की अब यही उपयोगिता रह गई? क्या गोवंश की अब यही उपयोगिता रह गई? यह एक दुखद: प्रगति है। हमें पीछे मुड़कर देखना होगा।

गांधीजी के प्रयोग और उपयोगों को ध्यान में रखकर कृषि और गो-सेवा को जोडऩे की योजना बनानी होगी और गाय के सर्वांगीण विकास और उपयोग की बाते सोचनी होगी, वैसी ही नीतियां बनानी होगी। गांधीजी ने ‘यंग इंडिया’ के 6-10-1921 के अंक में लिखा है, ‘हिंदू धर्म की मुख्य वस्तु है गोरक्षा। गोरक्षा, मुझे, मनुष्य के सारे विकास क्रम में, सबसे अलौकिक वास्तु मालूम हुई। गाय का अर्थ, मैं मनुष्य से नीचे की, सारी गूंगी दुनिया से करता हूं। इसमें गाय के बहाने इस तत्त्व के द्वारा, मनुष्य को, संपूर्ण चेतन सृष्टि के साथ आत्मीयता का, अनुभव कराने का प्रयत्न है। मुझे तो यह भी स्पष्ट दीखता है कि मनुष्य का सबसे सच्चा साथी, सबसे बड़ा आधार यही हिंदोस्तान की एक कामधेनु थी। वह सिर्फ दूध नहीं देती थी बल्कि सारी खेती का आधार-स्तंभ थी। गाय दया-धर्म की मूर्तिमंत कविता है। इस गरीब और शरीफ जानकर में हम केवल दया ही उमड़ती है। यह लाखों-करोड़ों हिंदोस्तानियों को पालनेवाली माता है। इस गाय की रक्षा करना ईश्वर की सारी मूल सृष्टि की रक्षा करना है। जिस अज्ञान ऋषि या द्रष्टा ने गो पूजा चलाई, उसने गाय से शुरूआत की, इसके सिवा और कोई ध्येय हो ही नहीं सकता। इस पशु सृष्टि की फरियाद मूक होने से और भी प्रभावशाली है। गोरक्षा हिंदू धर्म की दुनिया को दी हुई एक किमती भेंट है और हिंदू धर्म भी तभी तक रहेगा, जब तक गाय की रक्षा करने वाले हिंदू हैं। गांधीजी के इस कथन में, इस सोच में उन्होंने जहां गाय को पूरे विश्व के साथ जोड़ दिया हमारी मान्यता प्राणिमात्र की रक्षा है। गांधीजी ने मनुष्य के बाद, सभी प्राणियों का केंद्रबिंदु गाय को माना। अर्थात गाय की सेवा सबसे प्राणियों की सेवा ऐसी सोच का, ऐसे कर्म का आव्हान। गांधीजी ने इसमें हिंदू की गाय की सर्व व्यापकता और गाय के सवौंगीण रूप को रेखंकित किया।

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गाय गांव के आर्थिक विकास का मॉडल है। गाय, खेती और ग्रामोद्योग, इन तीनों को जोड़कर देखें तो यह गांव के लिए, गांव में रहनेवाले हर ग्रामवासी के लिए संपूर्ण आर्थिक मॉडल है। इस देश की खेती की स्थिति ऐसी है कि खेती की जोत धीरे-धीरे कम हो रही है। परिवार बंट रहे हैं। पांच भाई-बहन, पांच एकड़ भूमि। वही भूमि, जो अब तक पांच एकड़ थी, बंटकर एक एकड़ रह गई। भूमि कम हो रही है। खेती की व्यवस्था बदल रही है, परिणाम किसान के पास खेत में 12 महिने और महिने में तीस दिन काम नहीं है। इस तरह यदि किसान ने चार छह माह काम करके कुछ कमा भी लिया तो पूरे वर्ष की, उसकी आवश्यकताएं पूरी नहीं हो पातीं। इस तरह किसान कमजोर ही रह जाता है। अत: जहां किसान को, उसके उत्पाद का न्यायिक मूल्य चाहिए वहीं उसे वर्षभर का काम चाहिए, जो उसके खेत में उपलब्ध नहीं है। अत: उसे पूरक काम चाहिए। गाय और ग्रामोद्योग पूरक काम हैं। खेत के समय खेत में काम और खाली समय में पूरक काम। इस तरह किसान गांव में रहेगा। खेती भी करेगा। गांधीजी ने अपने रचनात्मक कार्यों में जहां कृषि गो-सेवा को जोड़ा, वहीं खादी और ग्रामोद्योगों को भी जोड़ा। इस तरह गाय की उपयोगिता को बढ़ाया। गाय की व्यापकता को बढ़ाया। गाय मात्र दूध उपलब्ध करवाने का साधन नहीं है। गाय मात्र धार्मिक या भावनात्मक विषय नहीं है। गाय मात्र वैतरणी पार करवाने का माध्यम नहीं है, बल्कि गाय इहलोक को दूध के अतिरिक्त भी अनेक साधन-सुविधाएं उपलब्ध करवाने का माध्यम है।

गांधीजी ने गाय के सर्वांगीण रूप पर कई बार प्रकाश डाला है। गाय जीवित है तो दूध देती है, बैल देती है, गोबर देती है, गौमूत्र देती है, लेकिन मरने के बाद भी गाय का बहुत उपयोग है, गाय के दूध की महिमा के साथ गाय के अन्य स्वरूप को रेखांकित करते हुए गांधीजी ने हरिजन सेवक के 21 सितंबर,1920 के अंक में लिखा,’गौमाता जन्म देनेवाली मां से कहीं बढ़कर है। यों तो साल दो साल दूध पिलाकर, हमसे फिर जीवनभर सेवा की आशा रखती है। पर गौमाता को तो सिवाय दाने और घास के कोई सेवा की आवश्यकता ही नहीं। मां की तो हमें उसकी बीमारी में सेवा करनी पड़ती है। परंतु गौमाता केवल जीवनपर्यंत हमारी अटूट सेवा नहीं करती, बल्कि उसके मरने के बाद भी हम उसके मांस, चर्म, हड्डी, सींग आदि से अनेक लाभ उठाते हैं। यह सब मैं जन्मदात्री माता का दर्जा कम करने को नहीं कहता, बल्कि यह दिखाने के लिए कहता हूं कि गौमाता हमारे लिए कितनी पूज्य है।’

इस कथन में गांधीजी ने गाय के संपूर्ण रूप, संपूर्ण महत्त्व और संपूर्ण उपयोग को रेखांकित किया। गाय गोबर देती है। गोबर खाद बनाने के काम आता है। गाय के गोबर के उपले ईंधन की कमी को पूरा करते हैं, हालांकि गाय के गोबर  के उपले बनाकर जलाने के भी बजाय उसका इस्तेमाल खाद बनाने के लिए ही करना चाहिए। बल्कि गाय के गोबर की गोबर गैस प्लांट में गैस बनाकर, ईंधन की जरूरत भी पूरी करनी चाहिए और उसे जो खाद मिलती है, वह खेत को अधिक समृद्ध करती है। गोबर से न केवल खाद मिलती है, वह खेत को अधिक समृद्ध करती है। गोबर से न केवल खाद, न केवल गैस बल्कि उस गैस से बिजली पैदा करके बिजली की कमी को पूरा किया जा सकता है। गाय के गोबर से किसी पूजास्थल को पवित्र करने के लिए चौका लगाने के लिए इस्तेमाल किया ही जाता है। मुझे एक मित्र बता रहे थे कि उनके मोबाइल पर किसी ने एक छोटा सा चिप लगा दिया है, जो गाय के गोबर का है उस चिप के लगने के बाद मोबाइल सुनने से कान या दिमाग पर दुष्प्रभाव की जो सूचनाएं आती हैं, समाचार आते हैं, गाय के गोबर का चिप बनानेवाले का दावा है कि गाय के गोबर का चिप मोबाइल में लगाने से, मोबाइल के शरीर के अंगों पर दुष्प्रभाव नहीं होंगे। मैंने फर्श की वे देखी हैं, जो मुझे बताया गया कि गाय के गोबर के पुट से बनी हैं। मजबूत हैं। सुदंर हैं। उन टायलों को घर के फर्श पर लगाने से, घर में कीटनाशकों, के लिए छिड़काव  करने की आवश्यकता नहीं है। गाय के गोबर की अगरबत्ती से सुगंध भी मिलती है। वह मच्छर भगाऊ भी है। गाय के गोबर की अगरबत्ती जल रही हो तो मच्छर निकट नहीं आता। यह जो भी प्रयोग या उपयोग हुए हैं या हो रहे हैं, वे सब व्यक्तिगत प्रयासों से हैं। यदि इन सब उत्पादनों पर आज के ‘प्रसिद्ध विशेषज्ञ’ अनुसंधान करें। इनका विधिवत और वैज्ञानिक दोहन करें तो कल्पना कीजिए कि गोबर गैस, गोबर खाद, मोबाइल चिप, टायल, अगरबत्ती आदि की इस दुनिया को कितनी आवश्यकता होगी और उस आवश्यकताओं की आपूर्ति के लिए कितनी गायों की आवश्यकता होगी और उस आवश्यकताओं की आपूर्ति के लिए कितनी गायों की आवश्यकता होगी। दूध के लिए तो गाय पाली ही जाती है, लेकिन यदि इसके गोबर का वैज्ञानिक दोहन किया जाए। गाय के गोबर के नए-नए उत्पाद बनाए जाएं तो गाय पालन एक सहज लेकिन टिकाऊ आवश्यकता बन जाएगी। फिर कोई कहे भी कि गाय मत पालो तो भी गोपालक गाय पालेगा। वह गाय मांस के लिए कटेगी नहीं बल्कि परिवार पोषण के लिए सुरक्षित और स्वस्थ रखी जाएगी। उसका सही अर्थों में पालन-पोषण किया जाएगा।

गौमूत्र एक ऐसा द्रव्य है, जिसकी महिमा तो हमारी धार्मिक पुस्तकों में भी गाई गयी है। मैं ऐसी कई गोशालाओं को जानता हूं जो दूध बेचने मात्र से लाभ नहीं कमा पा रही थीं, लेकिन गौमूत्र के उपयोग से या तो आत्मनिर्भर बन गई या लाभ कमाना शुरू कर दिया। आज की व्यवस्था ऐसी हो गई है कि कोई भी सामाजिक कार्य दान या अनुदान से करना बहुत कठिन है तथा उसे टिकाना और भी कठिन है। दान या अनुदान, आपातकालीन व्यवस्था तो हो सकती है, लेकिन सातत्य के लिए उपयोगी भी है और इस पर निर्भर भी नहीं कर सकते हैं। क्योंकि अनुदान में भ्रष्टाचार है और दान में स्वेच्छा। किसी की इच्छा होगी तो दान मिलेगा नहीं तो नहीं यदि दाता की इच्छा होगी तब दान मिलेगा। इससे गाय की रक्षा नहीं हो सकती। क्योंकि गाय की सेवा हमारी इच्छा पर निर्भर नहीं करती, इसके लिए तो सातत्य चाहिए। वह सेवा तो गाय की आवश्यकता से जुड़ी हुई है। गाय को जब-जब चारा चाहिए, पानी चाहिए, सफाई चाहिए, वह सब उसकी आवश्यकतानुसार उसे उसी समय मिलना चाहिए, तभी गाय पालन संभव है, इसलिए गाय के गोबर के साथ गौमूत्र का भी वैज्ञानिक उपयोग, वैज्ञानिक अनुसंधान करने की आवश्यकता है।

गौमूत्र पर आज जो प्रयोग हो रहे हैं, उनसे यह प्रमाणित हुआ है कि  गौमूत्र से और गौमृत्र के उपयोग से बनने वाली दवाईयां कैंसर जैसी बीमारी का इलाज कर सकती हैं। यदि मत सही है, जबकि मैं मानता हूं कि हां यह सही है। लेकिन ‘पढ़े-लिखे विशेषज्ञों’ की तो मानें। यदि उनकी समझ में गौमूत्र दवाइयों के लिए उपयोगी कच्चा माल है, या गौमूत्र से असाध्य रोगों का इलाज हो सकता है, ऐसा समझ में आ जाए और इसके लिए राष्ट्रीय-स्तर की प्रयोगशालाएं बनाकर नए-नए अनुसंधान किए जाएं तो मानव स्वास्थ्य के लिए आवश्यक गौमूत्र गौपालन का एक ऐसा कारण बन जाएगा कि गौपालन-गौसेवा के लिए कहना नहीं पड़ेगा। इस तरह गाय, गांव और ग्रामोद्योग के परस्परावलंबन से, जिसका संदेश गांधी जी ने दिया, जिसका व्यवहार गांधीजी ने किया। जिस पर प्रयोग गांधीजी और गांधीजी के अनुयायियों ने किए। जिसका महत्व गांधी विचार में रेखांकित किया गया है। वह सब गौरक्षा, गौसेवा, गौपालन, गौवंश-संवर्धन का सहज और आवश्यक आधार बन जाएगा। आज प्लास्टिक हमारी समस्या बना हुआ है। सरकार भी चिंतित है और समाज भी चिंतित है। लेकिन कोई हल नहीं निकल रहा है। प्लास्टिक पर बैन लगाने की सरकारें कोशिश करती हैं, लेकिन वह भी संभव नहीं हो पाता। कानून बनता है, लेकिन लागू करना कठिन होता है। क्योंकि लोगों की आवश्यकता बन गया है प्लास्टिक। प्लास्टिक का एक उपयोग प्लास्टिक की चप्पल और जूते भी हैं। चमड़ा इतना महंगा है कि हर व्यक्ति चमड़े के जूते नहीं पहन सकता। चमड़ा यदि सस्ता करना है, सहज उपलब्ध करवाना है तो गोवंश की अधिक-से-अधिक रक्षा करनी होगी, उसका संवर्धन करना होगा। इसका विस्तार करना होगा। जब तक गाय जीवित है, उसके दूध, गोबर और गौमूत्र का उपयोग करना और फिर गाय की प्राकृतिक मृत्यु पर उसके चमड़े का उपयोग करना, यदि यह व्यवस्था बनती है तो गांधीजी की ग्रामोद्योग की परिभाषा में गांव का चमड़ा गांव में रमाया जाएगा। उसका जूता गांव में बनेगा। इस तरह गांव का धन गांव में रहेगा। रोजगार सृजन होगा। गांव की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। यह मरी हुई गाय का उपयोग है। इतना ही नहीं, मरी हुई गाय के खुरों (पांव) में एक ऐसा तरल पदार्थ होता है, जो चिपकाने के काम आता है। यह तरल पदार्थ फैवीकोल से भी अधिक मजबूत है। जिन लोगों ने गांव में जूता बनता हुआ देखा है, वे जानते हैं कि गांव-गांव में बनाए जाने वाले चमड़े के जूते में, एक सोल नीचे रखकर उस पर चमड़े की छोटी-छोटी कितरें टुकडें-टुकड़ें चिपकाए जाते हैं। इसी से जूते का सोल मजबूत और मोटा बनाया जाता है। और यह छोटे-छोटे टुकड़े चिपकाने के काम में गाय के खुर से निकलने वाला तरल पदार्थ भी इस्तेमाल किया जाता है।

इस तरह जीवित गाय की सेवा से वैतरणी पार करने की व्यवस्था, उसके अमृत जैसे दूध ये शरीर पोषण और धन लाभ, उसके गौमूत्र से मानव शरीर की सुरक्षा की दवाईयां, गोबर से गैस, खाद, बिजली, टायल, अगरबत्ती, मोबाइल चिप और गाय की प्राकृतिक मृत्यु पर चमड़ा, खूंट, सींग, हड्डियों का उपयोग, गाय को सर्वसाधारण से ऊपर उठाकर उच्च कोटी का मानव मित्र, मानव के लिए पूज्यनीय, सेव्य, वंदनीय बना देता है।

साभार : साहित्य अमृत

लक्ष्मीदास

 

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