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…चांद के पार चलो

…चांद के पार चलो

पुराने समय की फिल्मों का एक गाना था ‘चलो दिलदार चलो चांद के पार चलो’ आज भारत ने वह मुकाम हासिल कर लिया है जिससे इस गाने को हकीकत की जमीन पर उतारा जा सके। अपने दूसरे ‘मिशन मून’ के साथ ही भारत ने अंतरिक्ष में लंबी छलांग लगा दी है। 22 जुलाई को दोपहर 2:43 को प्रक्षेपित चंद्रयान 2 ने भारतवासियों के चांद पर जाने के सपने को साकार करने की तरफ एक मजबूत कदम बढ़ा दिया है।  चंद्रयान 2 भारतीय चंद्र मिशन है जो पूरी हिम्मत से चांद के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में उतरेगा जहां अभी तक कोई देश नहीं पहुंचा है – यानी कि चंद्रमा का दक्षिणी धु्रवीय क्षेत्र। इसका मकसद, चंद्रमा के प्रति जानकारी जुटाना और ऐसी खोज करना जिनसे भारत के साथ ही पूरी मानवता को फायदा होगा। इन परीक्षणों और अनुभवों के आधार पर ही भावी चंद्र अभियानों की तैयारी में जरूरी बड़े बदलाव लाना है, ताकि आने वाले दौर के चंद्र अभियानों में अपनाई जाने वाली नई टेक्नोलॉजी तय करने में मदद मिले।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) का दूसरा मून मिशन चंद्रयान-2 सफलतापूर्वक लॉन्च हो गया है। चंद्रयान-2 को 22 जुलाई को दोपहर 2.43 बजे देश के सबसे ताकतवर बाहुबली रॉकेट GSLV-MKx से लॉन्च किया गया। अब चांद के दक्षिणी ध्रुव तक पहुंचने के लिए चंद्रयान-2 की 48 दिन की यात्रा शुरू हो गई है। करीब 16.23 मिनट बाद चंद्रयान-2 पृथ्वी से करीब 182 किमी की ऊंचाई पर जीएसएलवी-एमके3 रॉकेट से अलग होकर पृथ्वी की कक्षा में चक्कर लगाना शुरू करेगा।

इसरो चीफ डॉ. के. सिवन ने लॉन्च की सफलता के बाद मिशन कंट्रोल सेंटर में मौजूद सभी वैज्ञानिकों को बधाई दी। उन्होंने बताया कि चंद्रयान-2 की सफल लॉन्चिंग देश के लिए ऐतिहासिक दिन है। चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग हमारी उम्मीद से ज्यादा बेहतर रही है। जीएसएलवी-एमके3 रॉकेट ने तय समय पर चंद्रयान-2 को उसकी निर्धारित कक्षा में पहुंचा दिया है। डॉ. सिवन ने बताया कि हमारे चंद्रयान-2 में ज्यादा ईंधन है। उसकी लाइफलाइन भी ज्यादा है। क्योंकि हमने ऑर्बिट में उसे बेहतर तरीके से स्थापित कर दिया है।

चंद्रयान-2 का प्रक्षेपण पहले 15 जुलाई को निर्धारित था लेकिन कुछ तकनीकी खामियों की वजह से उसे टाल दिया गया था। 15 जुलाई को हुई तकनीकी खामी को लेकर इसरो चीफ डॉ. के. सिवन ने बताया कि इसरो वैज्ञानिकों ने 24 घंटे के अंदर ही तकनीकी खामी को ठीक कर लिया था। पिछले एक हफ्ते से हमारे वैज्ञानिक दिन रात जगते रहे, ताकि चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग सफल हो। इसबार जीएसएलवी-एमके3 रॉकेट की क्षमता में भी 15 फीसदी का इजाफा किया है। ये अब तक का हमारा सबसे ताकतवर रॉकेट है।

डॉ. के. सिवन ने बताया कि अब चंद्रयान-2 सैटेलाइट मिशन से जुड़े वैज्ञानिक अगले 48 दिनों में अंतरिक्ष यात्रा के दौरान चंद्रयान-2 की 15 बार स्थिति बदलेंगे। अभी हमारा काम पूरा नहीं हुआ है। अभी हमें और हमारी टीम को लगातार काम करना है। इसरो यहीं नहीं रुकेगा। इस साल के अंत तक एक और महत्वपूर्ण सैटेलाइट कार्टोसैट-3 की लॉन्चिंग करेगा।

चंद्रयान-2 के 48 दिन की यात्रा के विभिन्न पड़ाव

चंद्रयान-2 अंतरिक्ष यान 22 जुलाई से लेकर 13 अगस्त तक पृथ्वी के चारों तरफ चक्कर लगाएगा। इसके बाद 13 अगस्त से 19 अगस्त तक चांद की तरफ जाने वाली लंबी कक्षा में यात्रा करेगा। 19 अगस्त को ही यह चांद की कक्षा में पहुंचेगा। इसके बाद 13 दिन यानी 31 अगस्त तक वह चांद के चारों तरफ चक्कर लगाएगा। फिर 1 सितंबर को विक्रम लैंडर ऑर्बिटर से अलग हो जाएगा और चांद के दक्षिणी ध्रुव की तरफ यात्रा शुरू करेगा। 5 दिन की यात्रा के बाद 6 सितंबर को विक्रम लैंडर चांद के दक्षिणी धु्रव पर लैंड करेगा। लैंडिंग के करीब 4 घंटे बाद रोवर प्रज्ञान लैंडर से निकलकर चांद की सतह पर विभिन्न प्रयोग करने के लिए उतरेगा।

12चांद पर क्यों जाना है जरुरी?

चंद्रमा पृथ्वी का नजदीकी उपग्रह है जिसके माध्यम से अंतरिक्ष में खोज के प्रयास किए जा सकते हैं और इससे संबंध आंकड़े भी एकत्र किए जा सकते हैं। यह गहन अंतरिक्ष मिशन के लिए जरूरी टेक्नोलॉजी आजमाने का परीक्षण केन्द्र भी होगा। चंद्रयान 2, खोज के एक नए युग को बढ़ावा देने, अंतरिक्ष के प्रति हमारी समझ बढ़ाने, प्रौद्योगिकी की प्रगति को बढ़ावा देने, वैश्विक तालमेल को आगे बढ़ाने और खोजकर्ताओं तथा वैज्ञानिकों की भावी पीढ़ी को प्रेरित करने में भी सहायक होगा। चंद्रमा हमें पृथ्वी के क्रमिक विकास और सौर मंडल के पर्यावरण की अविश्वसनीय जानकारियां दे सकता है। वैसे तो कुछ परिपक्क मॉडल मौजूद हैं, लेकिन चंद्रमा की उत्पत्ति के बारे में और अधिक स्पष्टीकरण की आवश्यकता है। चंद्रमा की सतह को व्यापक बनाकर इसकी संरचना में बदलाव का अध्ययन करने में मदद मिलेगी। चंद्रमा की उत्पत्ति और विकास के बारे में भी कई महत्वपूर्ण सूचनाएं जुटाई जा सकेंगी। वहां पानी होने के सबूत तो चंद्रयान 1 ने खोज लिए थे और यह पता लगाया जा सकेगा कि चांद की सतह और उपसतह के कितने भाग में पानी है।

चंद्रमा का दक्षिणी धु्रव विशेष रूप से दिलचस्प है क्योंकि इसकी सतह का बड़ा हिस्सा उत्तरी ध्रुव की तुलना में अधिक छाया में रहता है। इसके चारों ओर स्थायी रूप से छाया में रहने वाले इन क्षेत्रों में पानी होने की संभावना है। चांद के दक्षिणी धु्रवीय क्षेत्र के ठंडे क्रेटर्स (गड्ढों) में प्रारंभिक सौर प्रणाली के लुप्त जीवाश्म रिकॉर्ड मौजूद है।

चंद्रयान-2 विक्रम लैंडर और प्रज्ञान रोवर का उपयोग करेगा जो दो गड्ढों- मंजनिस सी और सिमपेलियस एन के बीच वाले मैदान में लगभग 70ए दक्षिणी अक्षांश पर सफलतापूर्वक लैंडिंग का प्रयास करेगा।

निजी कंपनियों का भी रहा योगदान

करीब 978 करोड़ रुपये की लागत से चांद की सतह पर भेजे जाने वाले चंद्रयान-2 की सफल लॉन्चिंग में निजी और सरकारी क्षेत्र की कई कंपनियों का भी योगदान रहा है। सोमवार दोपहर 2.43 बजे ‘बाहुबली’ रॉकेट की मदद से लॉन्च हुआ चंद्रयान-2 करीब करीब 16 मिनट के बाद पृथ्वी की कक्षा में स्थापित हो गया।

इस मिशन की सफलता में इसरो सहित कई सरकारी विभागों का जहां प्रमुख योगदान था, वहीं सेल, गोदरेज जैसी कई निजी और सार्वजनिक कंपनियों (PSU) ने भी इसमें योगदान किया। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) ने चंद्रयान मिशन – 2 के लिए स्पेशल क्वालिटी के स्टेनलेस स्टील की अपने सेलम स्टील प्लांट से आपूर्ति की है। सेल द्वारा आपूर्ति की गई स्पेशल क्वालिटी स्टील शीट का इस्तेमाल चंद्रयान –2 के क्रायोजेनिक इंजन (सीई-20) में किया गया है। बिजनेस स्टैण्डर्ड को उद्धृत करते हुए आजतक की एक रपट के अनुसार गोदरेज, एलऐंडटी, अनंत टेक्नोलॉजी, एमटीएआर टेक्नोलॉजीज, इनॉक्स टेक्नोलॉजीज, लक्ष्मी मशीन वर्कस, सेंटम अवसराला और कर्नाटक हाइब्रिड माइक्रोडिवाइसेज ने भी इसके लिए योगदान किया है। गोदरेज एयरोस्पेस के एक अधिकारी के मुताबिक गोदरेज ने इस मिशन के लॉन्चर GSLV MkIII में इस्तेमाल होने वाले एल110 इंजन और सीई20 इंजन, ऑर्बिटर एवं लैंडर के थ्रस्टर तथा डीएसएन एंटेना के कम्पोनेंट की आपूर्ति की है।

एलऐंडटी के एक अधिकारी के मुताबिक कंपनी ने इस ऐतिहासिक मिशन के लिए कई महत्वपूर्ण फ्लाइट हार्डवेयर, सब-सिस्टम और एसेम्बलीज की आपूर्ति की है।  GSLV MkIII लॉन्च व्हीकल में जिस ट्विन एस 200 बूस्टर्स का इस्तेमाल किया गया उसका निर्माण L&Tके पवई एयरोस्पेस वर्कशॉप में किया गया। इसके अलावा L&T ने फ्रूफ प्रेशर टेस्टिंग भी किया। इसके अलावा कंपनी ने इस मिशन के लिए कई अन्य हार्डवेयर की भी आपूर्ति की।

गौरतलब है कि भारत ने अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत 50 साल पहले की थी और 1974 में परमाणु परीक्षण के बाद पश्चिमी देशों द्वारा कई तरह का प्रतिबंध लगाए जाने के बाद भारत ने स्वदेशी स्तर पर टेक्नोलॉजी और रॉकेट विकसित किया। इसरो ने इसके बाद से ज्यादातर पार्ट्स का विकास भारत में करके पहले तो आयात लागत को कम से कम किया और दूसरे चरण में घरेलू निजी कंपनियों से पार्ट्स आउटसोर्स किए गए।

नारी है अपराजिता

भारत में अब पुन: महिला वैज्ञानिकों की धाक जमने वाली है जो समाज में फैली इस धारणा पर गहरी चोट करेगी कि महिलाएं नाजुक कामों के लिए बनी हैं और बहुत साहस व हौंसले वाले कामों में उनकी यह कोमलता आड़े आ जाती है।

खास बात यह है कि भारत में अब महिलाओं पर विश्वास करने व उनकी योग्यता व क्षमता को सही प्रकार से आंकने का नजरिया बनने लगा है। विज्ञान के क्षेत्र में तो प्राय: यही कहा जाता था कि महिलाएं अर्थात युवतियां विज्ञान के विषयों और गणित में न तो रुचि लेती हैं और न ही इन विषयों को लेकर कुछ विशेष करना चाहती हैं। लेकिन अब हालात यह हैं कि युवतियों ने विज्ञान को ही अपनी उच्च शिक्षा में अध्ययन का विषय बनाया है। चंद्रयान-2 पहला ऐसा अंतरग्रहीय मिशन है, जिसकी कमान दो महिलाओं ने संभाली है। जब से इसरो ने अपने चंद्रयान-2 की कमान दो महिलाओं को सौंपने की घोषणा की है तब से महिलाओं के विज्ञान के क्षेत्र में और अधिक संख्या में आने की संभावना और बढ़ी है। इसे एक बहुत बड़ी पहल कहा जा सकता है। यह भारत का पहला ऐसा अंतरग्रहीय मिशन है जिसमें महिलाओं ने सक्रिय रूप से नेतृत्व के साथ-साथ मिशन के बाकी हिस्सों में भी भाग लिया है और उनकी सफलता को विश्व देखेगा।

एक ओर एम वनिता चंद्रयान-2 की प्रोजेक्ट इंजीनियर हैं और रितु करिधाल मिशन डायरेक्टर होंगी। जब इसरो प्रमुख ने इन दो महिला वैज्ञानिकों की घोषणा की तो अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा में इसकी बहुत चर्चा की और इसरो की इस घोषणा का स्वागत किया। जाहिर है अब तो विश्व जान गया है कि भारतीय महिला वैज्ञानिक भी किसी भी प्रकार कमतर नहीं है और भारतीय महिलाओं की योग्यता व क्षमता भी कम नहीं है।

क्या हैं मिशन के ताजा हालात

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के वैज्ञानिकों ने अपने दूसरे मून मिशन चंद्रयान-2 को पृथ्वी की कक्षा में आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है। 22 जुलाई को लॉन्च के बाद इसे पेरिजी (पृथ्वी से कम दूरी) 170 किमी और एपोजी (पृथ्वी से ज्यादा दूरी) 45,475 किमी पर स्थापित किया गया था। इसकी कक्षा में 25 और 26 जुलाई की दरम्यानी रात 1.08 बजे सफलतापूर्वक बदलाव किया गया। अब इसकी पेरिजी 251 किमी. और एपोजी 54,829 किमी कर दी गई है। इससे पहले चंद्रयान-2 की कक्षा में 24 जुलाई की दोपहर 2.52 बजे सफलतापूर्वक बदलाव किया गया था। तब इसकी पेरिजी 230 किलोमीटर और एपोजी 45,163 किलोमीटर की गई थी।

अभी 6 अगस्त तक पृथ्वी के चारों तरफ चंद्रयान-2 के ऑर्बिट को बदला जाएगा। 22 जुलाई को लॉन्च के बाद चांद के दक्षिणी धु्रव तक पहुंचने के लिए चंद्रयान-2 की 48 दिन की यात्रा शुरू हो गई है। लॉन्चिंग के 16.23 मिनट बाद चंद्रयान-2 पृथ्वी से करीब 170 किमी की ऊंचाई पर जीएसएलवी-एमके3 रॉकेट से अलग होकर पृथ्वी की कक्षा में चक्कर लगा रहा था। इसरो वैज्ञानिकों ने चंद्रयान-2 के लॉन्च को लेकर काफी बदलाव किए थे।

भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की आलोचना भी होती है कि क्या एक विकासशील देश को देश के संसाधनों को अंतरिक्ष कार्यक्रम पर खर्च करना चाहिए जहां लाखों लोग भूख और गरीबी से जूझ रहे हैं।

विक्रम साराभाई को भारत के अंतरिक्ष प्रोग्राम का जनक कहा जाता है और उन्होंने इन आलोचनाओं के जवाब में कहा था, ”अंतरिक्ष प्रोग्राम का देश और लोगों की बेहतरी में सार्थक योगदान है। भारत को चाहिए कि समाज और लोगों की समस्या को सुलझाने के लिए तकनीक का इस्तेमाल करे।’’

गौरतलब है की भारत के पहले मंगल ग्रह पर भेजे गए मार्स सैटेलाइट की लागत स्पेस विज्ञान पर बनी हॉलीवुड की फिल्म ग्रैविटी से भी कम थी। चंद्रयान-2 की लागत 14.1 करोड़ डॉलर है जो कि अमेरिका के चांद पर इंसान भेजने वाले अपोलो प्रोग्राम की लागत 25 अरब डॉलर से कम ही है। चंद्रयान-2 भारत की चांद की सतह पर उतरने की पहली कोशिश है। इससे पहले यह काम रूस, अमेरिका और चीन कर चुका है। इस मिशन के सफल होते ही भारत अंतरिक्ष में एक महाशक्ति के रूप में स्थापित हो जायेगा। भारत ने इससे पहले चंद्रयान-1 2008 में लॉन्च किया था। यह भी चांद पर पानी की खोज में निकला था। भारत ने 1960 के दशक में अंतरिक्ष कार्यक्रम शुरू किया था और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के एजेंडे में यह काफी ऊपर है।

2022 तक भारत चांद पर किसी अंतरिक्ष यात्री को भेजने की योजना पर भी काम कर रहा है। अंतरिक्ष विज्ञान पर किताब लिखने वाले मार्क विटिंगटन ने सीएनएन से कहा है, ”भारत ने फैसले लेने शुरू कर दिए हैं और इससे वो अंतरिक्ष में एक बड़ी शक्ति के तौर पर उभरेगा। भारत को यह अहसास है कि अंतरिक्ष में कई कार्यक्रमों को अब बढ़ाने का वक्त आ गया है।’’

 

नीलाभ कृष्ण

 

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