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चातुर्मास: भारतीय संस्कृति में अनूठा आध्यात्मिक अनुभव

चातुर्मास: भारतीय संस्कृति में अनूठा आध्यात्मिक अनुभव

श्रमण, वैदिक व बौद्ध संस्कृति में चतुर्मास की व्यवस्था है। धर्म व धर्म पथ पर चलने वाले संत साधु अहिंसा और जीवदया की भावना से चार माह तक एक स्थान पर रहते है जिसे चौमासा कहा जाता है। वर्षायोग की स्थापना साधु संत ही नहीं करते, हमें भी स्थापित करना चाहिए अपने भीतर, हर श्रावक को। चातुर्मास को चिन्तनमास के रूप में मनायें, उर्जा संग्रह का मापक बनाएं, धर्म से भटके हुए, सही मार्ग पकडऩे का प्रकाश बनाएं, दूसरों के गुण और अपने दोषों का अवलोकन करें।

वर्ष में वर्षा के चार माह दौरान जीवों की उत्पत्ति अत्याधिक होती है। जीवों की रक्षा व अहिंसा धर्म के पालनार्थ जैन मुनि चार माह पदयात्रा नहीं करते हैं और एक ही स्थान व नगर में रहकर साधना करते हैं और श्रावकों को ज्ञान, ध्यान, धर्म लाभ प्रदान करते हैं। यह वर्षायोग आषाढ़ सुदी चतुर्दशी से कार्तिक वदी चतुर्दशी तक हर साल होता है। इसे चातुर्मास कहते हैं। स्वयं को पाप से मुक्त करने की कला के जागरण एवं संत समागम के अद्भुत क्षण का नाम है चातुर्मास। चातुर्मास में अंदर बाहर दोनों जगह बारिश होती है। बाहर की बारिश तन को पवित्र करती है, वहीं अंदर की बारिश यानी ज्ञानामृत की बारिश से मन का कोना-कोना पवित्र एवं सुगन्धित हो उठता है।

वर्षा योग का अर्थ है वर्षा का जोड़। शीत और ग्रीष्म को जोडऩे वाला यह वर्षायोग ही है। वर्षा के होने से उष्ण वातावरण व शुष्क भूमि भी जल प्लावित एवं नम हो जाती है। यह वर्षायोग, हरियाली, खुशहाली, धर्म वृद्धि व आत्मा धन समृद्धि का कारण भी है।

चातुर्मास का सही मूल्यांकन श्रावकों और श्राविकाओं द्वारा लिए गए स्थायी संकल्पों एवं व्रतों से होता है। यह समय आध्यात्मिक क्षेत्र में लगातार नई उंचाइयों को छूने हेतु प्रेरित करने के लिए है। अध्यात्म जीवन विकास की वह पगडंडी है जिस पर अग्रसर होकर हम अपने आत्मस्वरूप को पहचानने की चेष्टा कर सकते हैं। साधु-साध्वियों के भरसक सकरात्मक प्रयासों की बदौलत कई युवा धर्म की ओर उन्मुख होकर नया ज्ञान-ध्यान सीखकर स्वयं के साथ दूसरों के कल्याण की सोच हासिल करते हैं।

श्रावक और संत के जुड़ाव का वाहक चातुर्मास दो किनारों को जोडऩे का काम करता है। धर्मरूपी रथ को चलाने के लिए दो पहिये हैं, एक श्रावक और दूसरा संत। इन दोनों को एक-दूसरे से जोडऩे का काम करता है चातुर्मास। इस काल में दोनों ही एक दूसरे को समझते हैं और श्रावक साधु की साधना में सहयोगी बनकर उन सब साधनों को उपलब्ध करवाता है, जो उसकी साधना में अत्यंत आवश्यक हैं और साधु, श्रावक को पाप और कषाय से बचने का मार्ग बताकर , उसके पापों का प्रक्षालन करने  के लिए प्रायश्चित देता है। इन चार महीनों में कई धार्मिक पर्व आते हैं, जो मनुष्य को धर्म अध्यात्म के करीब लाने का कार्य करते हैं। चातुर्मास मन, वचन और शरीर को शुद्ध करने का पर्व है।

जैनधर्म में चातुर्मास का अत्यधिक महत्व है। चातुर्मास काल सदैव आध्यात्मिक वातावरण और अच्छे विचार परिवर्तन का अवसर प्रदान करते हैं। जिस प्रकार बादल की सार्थकता बरसने में है, पुष्प्प की सुगंध में तथा सूर्य की सार्थकता रोशनी में है उसी प्रकार चातुर्मास की सार्थकता परिवर्तन में है।  चातुर्मास के दौरान संत और साध्वी के साथ लोग व्रत, तप व साधना करेंगे। वे धर्मावलंबियों को नियमित सत्य, अहिंसा और संयम का मार्ग बतायेंगे। उनके प्रवचन का लाभ जैन समाज सहित अन्य लोग भी ले सकेंगे।

चातुर्मास को चिन्तनमास के रूप में मनायें, ऊर्जा संग्रह का मापक बनाएं, धर्म से भटके हुए, सही मार्ग पकडऩे का प्रकाश बनाएं, ज्ञान का अर्जन करने का प्रयास करें, विनय, शालीनता, अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, सरल बनने की दिशा में चार कदम चलने का प्रयास करें। बाहरी ही नहीं, भीतरी भी सफाई करें। दूसरों के गुण और अपने दोषों का अवलोकन करें।

वर्षायोग श्रावण, भाद्रपद, अश्विन और कार्तिक इन चार महीने के योग को कहते है। अत: स्पष्ट है कि वर्षाऋतु के दो माह नहीं अपितु वर्षाकाल के चार माह से है। चार माह वर्षा होती है जिसमें सूक्ष्म व स्थूल जीवों की उत्पत्ति होती है उनकी विराधना न हो, साथ ही उनके प्रति दया की भावना बनी रहे अत: यह काल चातुर्मास। चौमासा सार्थक संज्ञा को लिए हुए है।

वर्षायोग की स्थापना आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी के दिन की जाती है। जिनसेन स्वामी ने आषाढ़ माह की प्रतिपदा एवं अनेक आचार्यों ने पंचमी तक का विधान किया है। इसकी समाप्ति कार्तिक कृष्णा अमावस्या के दिन की जाती है।

डॉ. सुनील जैन ‘संचय’

 

 

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