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चुनाव में अजूबा कुछ नहीं

चुनाव में अजूबा कुछ नहीं

बेटा : पिताजी।

पिता : हां बेटा।

बेटा : इस बार तो चुनाव में बड़ी अजीब-अजीब बातें हुईं।

पिता : यह तो है बेटा। चुनाव है, चुनाव में क्या हो जाये और क्या न हो, इसका कोई पूर्वानुमान नहीं लगा सकता।

बेटा : यह तो है। किसी ने नहीं सोचा था कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधीजी ही हार जायेंगे और वह भी 50 हजार से अधिक वोटों से, और वह भी अपनी उस सीट से जिससे वह 2004 से लगातार जीतते आ रहे थे।

पिता : बेटा, दु:ख तो इस बात का है कि यह सीट तो एक प्रकार से गांधी-नेहरु परिवार की पुस्तैनी सीट मानी जाती थी और वहां से जीत तो तय ही मानी जाती थी। यह सीट तो इस परिवार ने केवल एक बार आपातकाल के बाद 1977 के चुनाव में हारी थी।

बेटा : पिताजी, अब समय बदल गया है। लोग अपने वोट की कीमत समझने लगे हैं। अब वह जमाना गया जब नेता किसी इलाके के वोटों को अपनी जेब में समझते थे कि जब मर्जी निकाल लो और बर्त लो।

पिता : बिलकुल ठीक है बेटा। वोह ज़माना गया जब किसी को कांग्रेस का टिकट मिल जाता था तो जीत की गारंटी समझी जाती थी। पर अब समय बदल गया है। अब तो जी-जान लड़ानी पड़ती है जीत के लिए। अब तो कोई भी विधानसभा या लोक सभा की सीट किसी की जद्दी जायदाद नहीं रह गई है। अब तो जाना चुनाव आने पर पिछले प्रतिनिधि से काम का हिसाब मांगती है।

बेटा : इस प्रकार तो हैरानी हुई ज्योतिरादित्य सिंधिया के हारने की।

पिता :  हां बेटा। उनके हारने का तो बहुत ही दु:ख हुआ। वह तो बहुत प्रतिभावान युवा नेता हैं।

बेटा : लोग तो उनका भविष्य बड़ा उज्जवल समझते थे।

पिता : बिल्कुल ठीक। वह राजघराने के होते हुए भी जनता में बहुत प्रिय थे।

बेटा : फिर ऐसा क्या हो गया कि उनको और उनके परिवार को भी हार का मुंह देखना पड़ा?

पिता : हां बेटा। इस सीट पर तो आज तक सिंधिया परिवार का ही एकाधिकार रहा। पहले राजमाता सिंधिया जीतती रहीं। उनके स्वर्गवास होने पर उनके पुत्र माधवराव जी सिंधिया का इस चुनावक्षेत्र पर एकाधिकार बन गया। उनके स्वर्गवास होने के उपरांत उनके पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया इस चुनावक्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते रहे।

बेटा : पर इस बार उनको हार का मुंह देखना पड़ा।

पिता : यह तो बेटा मेरे ख्याल में बहुत ही गलत हुआ।

बेटा : पिताजी, गलत-ठीक कुछ नहीं, जनतंत्र में जनता का निर्णय सिर-माथे पर ही स्वीकार करना चाहिए।

पिता : यह तो ठीक है।

बेटा : वैसे तो राहुल गांधीजी ने अपनी हार के कारणों की जांच के लिए एक कमेटी भी गठित कर दी है।

पिता : चलो, वोह तो अपनी रिपोर्ट देगी ही, पर स्वयं राहुलजी भी अति-आत्मविश्वास में रहे। उनको भी तो पता होना चाहिये था कि श्रीमती स्मृति ईरानी को पिछले 2014 के चुनाव में उन्हें अपने चुनाव अभियान में बहुत थोड़ा समय मिल पाया था, पर फिर भी उन्होंने अच्छी चुनौति  दी थी। और इस बार तो वह पूरे पांच साल अपने अभियान में डटी रहीं।

बेटा : हां पिताजी, वह तो हर मॉस वहां जाकर जनता से संपर्क में रहीं। उनकी समस्याओं का समाधान करती रहीं, अमेठी के लोगों के साथ हर दु:ख-सुख में खड़ी रहीं।

पिता : तो जनता चुनाव में भी स्मृति ईरानीजी के साथ खड़ी हो गई।

बेटा : और परिणाम हाजिर है।

पिता : बेटा, चाहे हों राहुलजी या सोनियाजी, वह अमेठी और रायबरेली दोनों ही सीटों पर अपना पारिवारिक हक समझते हैं। पर उन्होंने कभी इनको अपना परिवार न बनाया और न ही समझा। इन क्षेत्रों को तो उन्होंने सदा ही एक टूरिस्ट प्लेस समझा है, जहां वह कभी-कभी जब वहां का मौसम ठीक होता है और उनका भी दिल कर आता है वहां घूम आने का तो वह वहां चले जाते हैं। तब अवश्य प्रबंध कर लेते हैं कि उनके दौरे को मीडिया में भरपूर पब्लिसिटी मिले।  इसीलिए उनको वहां के लोग एक चुनावी और राजनीतिक पर्यटक ही मानते हैं।

बेटा : बात तो पिताजी ठीक ही लगती है।

पिता : पर बेटा स्मृतिजी ने तो पिछले पांच वर्ष बहुत काम किया है हालांकि वह राहुलजी से चुनाव हार गई थीं। सांसद तो राहुलजी थे पर उनसे ज्यादा चुनाव क्षेत्र का दौरा तो वह करती थीं और लोगों को ऐसा एहसास देती थीं मानो उनके चयनित सांसद राहुलजी नहीं, स्मृतिजी थीं।

बेटा : पर पिताजी, स्मृतिजी भी तो राहुलजी की तरह ही अमेठी की रहने वाली नहीं हैं।

पिता : यह तो ठीक है पर वास्तविकता यह भी है कि आदमी की पहचान रिश्ते से ही नहीं उसके व्यवहार से भी होती है। नाम को तो कोई सगा भाई हो या दोस्त हो, पर पहचान तो तब होती है जब कोई वक्त पर काम आता है, साथ खड़ा हो जाता है।

बेटा : यह तो ठीक है, स्मृतिजी ने तो अपने आचरण-व्यवहार से पिछले पिछले 5 वर्ष में लोगो के मन में जगह बना ली और उन्हें आश्वस्त करवा दिया कि जनप्रतिनिधि वह ही नहीं होता जिसे जनता चुनती है पर वह जो उनके साथ हर सुख-दुख के समय खड़ा होता है।

पिता : बेटा, आज इस 21वीं सदी में मुकेश अंबानीजी ने भी तो साबित कर दिया कि वह अनिल अंबानीजी के सगे बड़े भाई रिश्ते से ही नहीं अपने व्यवहार से भी हैं। उन्होंने अपने छोटे भाई अनिल को 453 करोड़ की देनदारी चुकता करवाने में सहायता कर उसे जेल जाने से बचा दिया। एक बड़े भाई कर कर्तव्य निभा कर आज के युग में एक नया कीर्तिमान स्थापित कर दिया है।

बेटा : मुकेशजी ने तो भारतीय परम्परा का निर्वाहन कर एक सच्चे भारतीय होने का एक सबूत दिया है।

पिता : इस में तो कोई शक नहीं बेटा। मुकेशजी ने तो साबित कर दिया है की वह एक बहुत बड़े व्यवसायी ही नहीं, भारतीय परम्परा के एक बड़े सच्चे उपासक भी हैं।

बेटा : पिताजी, राहुलजी वायुयान इंजीनियर भी हैं?

पिता : बेटा, मुझे तब ही तो तेरे पर गुस्सा आ जाता है जब तो एक संजीदा चर्चा में एक फिजूल की बात अड़ा देता है।

बेटा : पिताजी, आप मेरी पूरी बात सुनने से पहले ही मुझ पर बरस पढ़ते हैं। मेरी पूरी बात तो सुनो।

पिता : बोल, क्या बताना चाहता है?

बेटा : मैं अपनी ओर से कोई अफवाह नहीं फैला रहा। पिछले 21 अप्रैल को प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक स्टेट्समैन ने लिखा है कि उनके पत्र को राहुलजी की बहन प्रियंका गांधी वाडरा ने अपने भाई के व्यक्तित्व के बारे में अब तक छुपे बहुत से रहस्योद्घाटन किए। उन्होंने बताया कि उनके भाई ने वेदों, उपनिषदों, ईसाई व मुस्लिम धर्म का गहन अध्ययन किया है। वह इन सब धर्मों के इतने बड़े ज्ञानी हैं कि जितना ज्ञान शायद बड़े-बड़े धर्मज्ञ भी नहीं रखते।

पिता : अच्छा?

बेटा : यही नहीं पिताजी, वह तो और भी बहुत कुछ हैं। वह पर्वतारोही होने के साथ-साथ चट्टान पर्वतारोही भी हैं। वह एक धुरंधर गोताखोर भी हैं। उससे भी ऊपर वह एक प्रशिक्षित पायलट भी हैं।

पिता : तब तो फिर ठीक ही है, उन्हें वायुयान इंजीन्यरिंग का भी ज्ञान होगा ही।

बेटा : तभी तो पिताजी, प्रियंकाजी ने बताया कि कुछ समय पूर्व राहुलजी जब एक बार वायुयान द्वारा कर्नाटक का सफर कर रहे थे तो जहाज में कुछ खराबी पैदा हो गई। प्रियंकाजी को जब पता चला तो वह परेशान हो उठीं। उन्होंने राहुलजी के सचिव से संपर्क साधना चाहा पर हो न सका। उधर वायुयान में सफर कर रहे मुसाफिर भी घबरा उठे। राहुलजी बिलकुल शांत रहे। वह जहाज के कॉकपिट में गए और हालत को बखूबी संभाल लिया।

पिता : बहुत खूब!

बेटा : पर पिताजी, राहुलजी कॉकपिट में कैसे चले गए? वहां तो कोई अनाधिकृत व्यक्ति जा ही नहीं सकता चाहे वह कोई प्रशिक्षित पायलट ही क्यों न हो।

पिता : बेटा, यह बड़े आदमियों की बातें हैं। उनके साथ सब कुछ हो सकता है, वह सब कुछ कर सकते हैं।

बेटा : यही नहीं, पिताजी। जब राहुलजी चुनाव अभियान के दौरान हिमाचल के दौरे पर थे तो उन्होंने उस हेलीकाप्टर को भी चुटकियों में ठीक कर दिया था जिस में वह सफर कर रहे थे।

पिता : बेटा, जो इतना बड़े जहाज में पड़ी खराबी को ठीक कर सकता है, उसके लिए हेलीकाप्टर में परेशानी को दूर कर देना तो चुटकियों की बात है।

बेटा : यह बात तो समझ आ गई। अब एक बात और बताइये पिताजी।

पिता : क्या?

बेटा : यदि मैं जहाज में सफर कर रहा होऊं और जहाज में कोई परेशानी हो जाए तो आपको तुरंत उसी समय पता चल जाएगा क्या?

पिता : यह तो संभव नहीं, यह तो बाद में या तू बताएगा या टीवी या समाचारपत्र बताएंगे।

बेटा : फिर प्रियंकाजी को किसी ने कैसे तुरंत बताकर उन्हें परेशान कर दिया?

पिता : मैं तेरे को पहले ही बता चुका हूं कि बड़े आदमियों की बातें और ही होती हैं। उन्हें तू अपने जैसे आदमियों के साथ मत मिलाया कर।

बेटा : हां, यह भी तो बात है कि वह समय भी तो चुनाव का था। जब सब चलता है।

 

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