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जब भारतीय जवान शहीद हो रहे हों, तो पाकिस्तान से बातचीत!

जब भारतीय जवान शहीद हो रहे हों, तो पाकिस्तान से बातचीत!

समय, युद्ध, कूटनीति और शासन कला के सबसे आवश्यक और महत्वपूर्ण भागों में से एक है। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय जब उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारतीय सेना के मुखिया सेम मानेकसॉव से युद्ध में जाने की तैयारियों के बारे में पुछा तो उन्होंनें प्रधानमंत्री को उत्तर देते हुए कहा, ”यह आप पर निर्भर करता है कि हम युद्ध में जाये या न जाये, लेकिन युद्ध में कब जाना है, किस समय पर जाना है, इसका निर्णय आपको नहीं बल्कि मुझे लेना है। जमीनी हालातों के बारे में जानकर मैं इसका निर्णय लूंगा।’’ इंदिरा गांधी को भी उनकी बातों को मानना पड़ा। हालांकि अब वह इतिहास की बात है। कोई भी राष्ट्र अपने पड़ोसी देश से अपने सम्बंधों को सुधारने और मजबूती देने के लिए बात करता है। लेकिन किसी भी सम्मानीय देश को अपने पड़ोसियों से मजबूती से, न की निर्बल की तरह, बात करनी चाहिए। क्योंकि यह अपने आप में एक अपमान के समान है।

हाल के दिनों में पाकिस्तान की ओर से जम्मू और कश्मीर से सटी सीमा पर युद्ध-विराम का उल्लंघन तथा आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया गया। पाकिस्तान अपनी ओर  से प्रशिक्षित आतंकियों को भारत में घुसपैठ कराकर हमले करवाता रहा है। जम्मू और कश्मीर में पिछले एक वर्ष में आर्मी, बीएसएफ और सीआरपीएफ के जवानों ने सीमावर्ती क्षेत्रों में कुल 286 आतंकियों को मार गिराया। अभी हाल के दिनों में आतंकी हमले आम लोगों पर नहीं बल्कि आर्मी और अन्य जवानों पर हुए, जो पाकिस्तान के षड्यंत्र को पूरी तरह से उजागर करते हैं। अब इसके लिए कुछ सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है।

इस परिस्थिति में कांग्रेस के मणिशंकर अय्यर, एआईएमआईएम के औवैसी तथा जम्मू और कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती बयान देते हैं कि भारत को पाकिस्तान  से बात करनी चाहिए। कभी-कभी तो यह भी समझ में नहीं आता कि ये नेता किस ओर से बोलते हैं। जब जवानों और आतंकियों के बीच मुठभेड़ होती है, तो कई बार हमारे जवान इन आतंकियों के सफाया करने में सफल हो जाते हैं और कभी-कभार इन्हें भी कुछ दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ता है। यहां यह ध्यान देने योग्य बात है कि आतंकी किसी मानवाधिकार का अनुसरण नहीं करते, बल्कि हमारे जवानों को आतंकियों से मुठभेड़ के समय इन बातों को अपने दिमाग में रखना पड़ता है, जो कभी-कभी हमारे जवानों के लिए मुसीबत साबित होती है। ङ्क्षकतु जवानों के ऊपर कुछ हुए हमले का मतलब यह नहीं होता कि भारत ने सब कुछ गंवा दिया है।

जब हमारे जवानों पर पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी हमले हो रहे हों और इस हालात में जब कोई पाकिस्तान से बात करने के विषय में बोले तो उसे किसी भी राजद्रोह से कम नहीं मानना चाहिए। इस समय पाकिस्तान से की जानेवाली कोई भी बातचीत भारत के कमजोर होने को ही दर्शायेगी। इससे हमारे जवानों के मनोबल और सवा सौ करोड़ नागरिकों के स्वाभिमान पर कुठाराघात होगा। यह बातचीत हमारे सुरक्षा-बलों की बेईज्जती के समान होगी। अय्यर, ओवैसी और महबूबा के  पाकिस्तान से बातचीत करने के सुझाव दूर्भावनापूर्ण और बीमार मानसिकता से प्रेरित लगते हैं। इन नेताओं ने यह नहीं बताया कि भारत को पाकिस्तान से क्या बात करनी चाहिए? पाकिस्तान केवल कश्मीर पर हीं बात करना चाहता है, जबकि भारत को पाकिस्तान के युद्ध-विराम तोडऩे और पाकिस्तान द्वारा भारत में आतंकवाद फैलाने के मुद्दे पर बात करनी है। यदि भारत, पाकिस्तान से बातचीत करने के बाद भी अपने एजेंडे पर बात नहीं कर पायेगा, तो क्या इससे स्पष्ट नहीं होता कि ये नेता भारत-विरोधी एजेंडे को फैला रहे हैं? प्रधानमंत्री मोदी की इस मामले में बनायी गई नीति बिल्कुल उचित है कि बम, बंदूक और शोर-शराबे के बीच किसी भी प्रकार की बातचीत नहीं हो सकती।

जवानों को किसी भी बाध्यता से आजादी देने की आवश्यकता है। किसी भी अधिकारी पर किसी भी प्रकार के मुकदमे दर्ज नहीं होने चाहिए। आतंकी घटनाओं को रोकने के लिए जवानों को अत्याधुनिक हथियार देने की आवश्यकता है। जम्मू और कश्मीर सरकार को सेना के मामले में हस्तक्षेप न करने को कहा जाना चाहिए। जब हमारे जवान आतंकियों  का सफाया कर दें और पाकिस्तान घुटने टेक दे तब भारत को मजबूती से पाकिस्तान से बात करने का प्रस्ताव देना चाहिये।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

 

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