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जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद ३७० का अन्त और भ्रमों का निराकरण

जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद ३७० का अन्त और भ्रमों का निराकरण

अनुच्छेद 370 उस जमीन में से पैदा हुआ था जिसकी जुताई पंडित जवाहरलाल नेहरू और माउंटबेटन दम्पत्ति के संयुक्त षड्यंत्र ने की थी। माउंटबेटन दम्पति पूरा जम्मू-कश्मीर पाकिस्तान को देने के लिए प्रयासरत थे। उन के लिए यह प्रश्न ब्रिटेन के भविष्य की रणनीति और पाकिस्तान के भविष्य से जुड़ा हुआ था। उन दिनों ब्रिटेन का हित पाकिस्तान को लाभ पहुंचाने और भारत के स्थल मार्ग को शेष विश्व, खासकर मध्य एशिया से काटने में ही था। यह तभी संभव था यदि जम्मू-कश्मीर पाकिस्तान में चला जाता। जिस समय ब्रिटिश संसद ने भारत का विभाजन किया और कांग्रेस में उसे सीमान्त गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान के सशक्त विरोध के बावजूद स्वीकार कर लिया तो रियासतों को भारत या पाकिस्तान डोमिनियम में से किसी की सांविधानिक व्यवस्था का हिस्सा बनने का अधिकार दिया गया था। जम्मू-कश्मीर नरेश महाराजा हरि सिंह का यह अधिकार ही ब्रिटिश साम्राज्यवादी योजना के रास्ते में चट्टान बन कर खड़ा था। दरअसल माउंटबेटन जानते थे कि महाराजा हरि सिंह किसी भी हालत में पाकिस्तान में तो शामिल नहीं होंगे। वे अन्तत भारत की सांलिधानिक व्यवस्था का ही हिस्सा बनेंगे।

अब माउंटबेटन दम्पति के पास एक ही रास्ता बचा था, पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर पर हमला कर उसे हथिया ले और भारत उसका विरोध न करे। यह आसान रास्ता था क्योंकि उस समय भारत की सेना के प्रमुख और पाकिस्तान की सेना के प्रमुख अंग्रेज ही थे और ये दोनों ब्रिटेन के हितों के संरक्षण हेतु निष्ठावान थे। पाकिस्तान ने कबायलियों की आड़ में जम्मू-कश्मीर पर हमला कर दिया, यहां तक तो स्क्रिप्ट ठीक चला। लेकिन नेहरु इस हमले का विरोध करेंगे, इतना तो माउंटबेटन दम्पति भी जानते थे। लेकिन  उन्हें यह आशा भी थी कि नेहरू जम्मू-कश्मीर में सेना तब तक नहीं भेजेंगे जब तक महाराजा हरि सिंह शेख मोहम्मद अब्दुल्ला को सत्ता नहीं सौंप देंगे। माउंटबेटन दम्पति की यह आशा पूरी हुई और  नेहरु सचमुच इस बात पर अड़ गए। उस समय माउंटबेटन दम्पति की खुशी का अंदाजा लगाया जा सकता है। माउंटबेटन दम्पति का दूसरा अनुमान था कि महाराजा हरि सिंह, शेख को सत्ता नहीं सौंपेंगे और बिना इसके, नेहरू किसी भी हालत में जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय स्वीकार नहीं करेंगे। तब तक पाकिस्तानी सेना जम्मू-कश्मीर पर कब्जा कर लेगी। लेकिन महाराजा हरि सिंह ने शेख अब्दुल्ला को राज्य का आपात प्रशासक बना कर माउंटबेटन दम्पति का यह तुरुप का पत्ता छीन लिया।

अब माउंटबेटन ने अपनी योजना का दूसरा हिस्सा सक्रिय किया। विलय पत्र को स्वीकार करते हुए माउंटबेटन ने गवर्नर जनरल ने अपने हस्ताक्षर कर दिए। इससे जम्मू-कश्मीर का पूरे विधि विधान से भारत में विलय हो गया। लेकिन माउंटबेटन ने बाद में एक पत्र अलग से महाराजा हरि सिंह को लिखा, जिसमें यह उल्लेख कर दिया कि अंतिम विलय तभी माना जाएगा, जब जम्मू-कश्मीर की जनता इसके पक्ष में राय व्यक्त कर देगी। जनता की राय जानने की बात नेहरू के दिमाग की उपज नहीं थी। यह दरअसल माउंटबेटन के शैतानी दिमाग की उपज थी। लेकिन नेहरू इसका विरोध नहीं कर पाए। क्यों विरोध नहीं कर पाए, इस रहस्य पर अभी तक पर्दा पड़ा हुआ है। माउंटबेटन दम्पति नेहरू के साथ इतने लम्बे अंतरंग संसर्ग से उनकी वैचारिक और व्यक्तिगत कमजोरियों को समझ गए थे। इस मोड़ पर माउंटबेटन दम्पत्ति ने नेहरू को खेलने के लिए उनकी मनपसंद का पहला खिलौना हिन्दु-मुस्लिम के नाम का सेकुलरिज्म को दे दिया। माउंटबेटन दम्पत्ति ने नेहरू को समझाया कि जम्मू-कश्मीर राज्य मुस्लिम बहुल प्रदेश है। यदि मुसलमान स्वयं आकर उन्हें कहें कि वे भारत में ही रहना चाहते हैं तो नेहरू की कितनी बड़ी जीत होगी। यह जिन्ना के मुंह पर तमाचा होगा और नेहरू की अन्तर्राष्ट्रीय छवि आकाश को भी चीर कर रख देगी। इस मसले पर शेख मोहम्मद अब्दुल्ला पेश किए गए। शेख मोहम्मद अब्दुल्ला कह रहे हैं कि हम दो राष्ट्र सिद्धान्त के खिलाफ हैं और भारत के साथ रहना चाहते हैं। नेहरू प्रसन्न हुए। कृपा आनी शुरू हुई। यानि शेख अब्दुल्ला साथ हैं तो जनमत संग्रह भारत के पक्ष में जा सकता है। उन्होंने माउंटबेटन दम्पत्ति की जनमत संग्रह योजना को स्वीकार कर लिया। अलबत्ता नेहरू ने माउंटबेटन को इस बात के लिए  राजी कर लिया कि जनता की राय राज्य में शान्ति स्थापित होने के बाद ली जाएगी। इस प्रकार माउंटबेटन दम्पत्ति ने नेहरू की भावात्मक कमजोरी का लाभ उठाते हुए ‘जनमत’ का ढोल उनके गले में डाल दिया।

जिस वक्त माउंटबेटन दम्पति नेहरू के साथ शतरंज का यह खेल खेल रहे थे, उस समय देश की  सेना ने विपरीत परिस्थितियों में भी जम्मू-कश्मीर से आक्रान्ताओं को पीछे खदेडऩा शुरू कर दिया। अब माउंटबेटन दम्पति की चिंता बढ़ी। कहीं भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना को हरा कर सारा जम्मू-कश्मीर मुक्त करवा लिया तो ब्रिटेन के सारे षड्यंत्र धरे धराए रह जाएंगे। अब माउंटबेटन दम्पति ने नेहरू के आगे अंतर्राष्ट्रीयता की बीन बजाना शुरु की। नेहरू मामूली से घरेलू प्रश्न को भी अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दा बना कर बच्चों की तरह उससे खेलते थे। उस पर नृत्य करते थे। वे चाहते थे कि देश के लोग उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय धुनों पर थिरकते देखें। माउंटबेटन दम्पत्ति ने उनकी इसी कमजोरी का लाभ उठा कर उन्हें समझाया कि वे जम्मू-कश्मीर के प्रश्न को सुरक्षा परिषद् में ले जाएं और परिषद् को बताएं कि जम्मू-कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच विवादास्पद प्रश्न है, और  सुरक्षा परिषद् इसका निर्णय करे। माउंटबेटन दम्पत्ति ने कमजोरी के इन क्षणों में नेहरु को विश्वास दिला दिया कि भारत का पक्ष इस मामले में मजबूत है, इसलिए सुरक्षा परिषद में भारत जीत जाएगा और नेहरू की अन्तर्राष्ट्रीय छवि को चार चांद लग जाएंगे। बहुत देर तक तो नेहरु इंकार करते रहे, लेकिन कमजोरी के किन्हीं क्षणों में उन्होंने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। नेहरू एक जनवरी 1948 को जम्मू-कश्मीर का प्रश्न, संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर के अनुच्छेद 35 के अन्तर्गत सुरक्षा परिषद् में ले गए। लेकिन मसला संयुक्त राष्ट्र संघ में ले जाने मात्र से न ब्रिटेन का हित सधता था न ही पाकिस्तान का। मसला तो यह था कि  संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के प्रतिनिधि को हर हालत में कहना चाहिए कि विलय के प्रश्न पर लोगों की राय ली जाएगी  और वह राय ही इसके बारे में अंतिम निर्णय होगी। यदि नेहरु का प्रतिनिधि,’ ‘लोगों की राय जानने’ के इस ढोल को सुरक्षा परिषद् में जाकर भी बजा आए, तब तो नेहरू की जय जयकार सारी दुनिया में होगी, माउंटबेटन ने नेहरू को इस मसले के बारे में पक्का कर दिया। फिर एक दिन नेहरू के वही प्रतिनिधि गोपालास्वामी आयंगर,  सचमुच ‘जनता की राय’ का यह ढोल सुरक्षा परिषद् में जोर-जोर से बजा आए। इतना ही नहीं, गोपालस्वामी आयंगर ने सुरक्षा परिषद् में यह भी कहा कि जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय रियासत के शासक महाराजा हरि सिंह और शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने किया है। यह अर्ध सत्य घातक था। शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की कोई वैधानिक हैसियत नहीं थी। नेहरु शेख अब्दुल्ला की हैसियत उसके कद से ज्यादा निर्मित कर रहे थे जो भविष्य में घातक सिद्ध होने वाली थी। उस दिन माउंटबेटन दम्पति कितने खुश हुए होंगे, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है।

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सुरक्षा परिषद में ब्रिटेन की साम्राज्यवादी ताक़तों के लिए सबसे अहम प्रश्न था कि किसी तरह भारतीय सेना आगे बढऩे से रुक जाए ताकि जम्मू-कश्मीर का सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण गिलगित और बाल्टीस्तान का क्षेत्र पाकिस्तान के कब्जे में ही रहने दिया जाए। यह ब्रिटेन की भविष्य की रणनीति का हिस्सा था। सुरक्षा परिषद ने युद्ध विराम घोषित करने के लिए प्रस्ताव पारित कर दिया था। लेकिन उसको स्वीकार करने के  लिए नेहरु को तैयार करना तो शायद माउंटबेटन दम्पत्ति के लिए भी मुश्किल था। लेकिन उनको किसी भी तरह नेहरू को इसके लिए तैयार करना ही था। भारत की राष्ट्रवादी शक्तियां नहीं चाहती थीं कि युद्ध विराम हो। सेना भी यही चाहती थी कि पाकिस्तानी हमलावरों को पूरे जम्मू-कश्मीर से बाहर निकाल दिया जाए और वह इस काम में सफलता पूर्वक लगी थी। लेकिन  एक दिन नेहरू ने माउंटबेटन दम्पत्ति की इच्छा भी पूरी कर दी और बिना किसी को, यहां तक कि सेना को भी, विश्वास में लिए प्रथम जनवरी 1949 को युद्ध विराम की घोषणा कर दी और भारत के भविष्य के लिए कांटे बो दिए। माउंटबेटन दम्पत्ति के लिए अपनी विजय मनाने का यह दूसरा अवसर था। जम्मू-कश्मीर का सामरिक लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में ही रहा। इस प्रकार जम्मू-कश्मीर में अपना सारा काम निपटा कर और नेहरू के हाथ में दो खिलौने पकड़ा कर माउंटबेटन दम्पति  अपने वतन वापिस चले गए।

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लेकिन नेहरू जल्दी ही समझ गए कि कमजोरी के क्षणों में उन्होंने माउंटबेटन दम्पत्ति के आगे आत्म समर्पण कर देश का बहुत बड़ा अहित कर दिया है। वे केवल सुरक्षा परिषद् में गए ही नहीं थे बल्कि वहां पूरी परिषद् में अपना यह संकल्प सुना चुके थे कि जनमत से अंतिम निर्णय किया जाएगा। जिस प्रकार माउंटबेटन दम्पति नेहरू की मानसिकता को समझ कर, ब्रिटेन की भावी कूटनीति के हित में नेहरू का लांभ उठा कर चले गए थे, अब वही खेल शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने खेलना शुरू कर दिया था। अब तक संघीय संविधान प्राय बन चुका था और भारत को डोमिनियम के स्थान पर गणतंत्र की घोषणा होने वाली थी। संघीय संविधान सारे देश पर लागू होने वाला था। यदि वह जम्मू-कश्मीर पर भी लागू हो गया तो माउंटबेटन दम्पत्ति की सारी मेहनत बेकार चली जाती। रणनीति तो किसी तरह जम्मू-कश्मीर को भारत और पाकिस्तान के बीच विवादास्पद क्षेत्र दिखाना था ताकि निर्णय का अधिकार सुरक्षा परिषद् के हाथ रहे और वह समय असमय भारत की बांह, इसी बहाने मरोड़ता रहे। इस मरहले पर शेख मोहम्मद अब्दुल्ला सक्रिय हुए। अनुच्छेद 370 की कल्पना की गई। तर्क भी यही दिया गया कि जम्मू-कश्मीर में अभी विवाद चला हुआ है। मामला सुरक्षा परिषद् में लम्बित है। इसलिए अभी संघीय संविधान वहां लागू नहीं किया जाना चाहिए, नहीं तो अन्तर्राष्ट्रीय जगत में भारत की छवि खराब होगी। स्पष्ट था, माउंटबेटन दम्पति जो खिलौना नेहरू को दे गए थे वे उसे कुशलता से बजा रहे थे। लेकिन सुरक्षा परिषद् में निश्चय ही भारत जीतेगा और तब पूरा संविधान जम्मू-कश्मीर में भी लागू हो जाएगा। इसलिए अनुच्छेद 370 अस्थाई है। लेकिन शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने पूरे प्रश्न को हिन्दु मुस्लिम शब्दावली में ही गाया। नेहरू ने भी अपनी प्रकृति और स्वभाव के अनुसार इसे हिन्दु-मुस्लिम का प्रश्न बना कर तथाकथित सैक्युलरिज्म की धुनों से जोड़ दिया, जबकि इस प्रश्न के और अनेक पहलू हो सकते हैं लेकिन हिन्दु मुस्लिम की अवधारणा से इसका कुछ लेना देना नहीं है। दरअसल शेख अब्दुल्ला नेहरू को ब्लैकमेल कर रहे थे और भारतीय संविधान की आड़ में जम्मू-कश्मीर को अपनी जागीर की तरह इस्तेमाल करना चाहते थे। अनुच्छेद 370 उसमें शेख की सहायता कर रहा था। यह आज तक रहस्य बना हुआ है कि नेहरू, शेख मोहहम्मद अब्दुल्ला के सामने किस लिए झुके रहते थे?  शेख  चाहते थे कि जम्मू-कश्मीर में यदि संघीय संविधान लागू करने की नौबत आए तो निर्णय करने का अधिकार उनके हाथ में हो कि कितना संविधान वहां लागू करना है और कितना नहीं।

इसी मरहले पर संघीय संविधान में अनुच्छेद 370 का ताना बाना बुनना शुरू किया गया। यह शेख और नेहरू के दिमाग में से निकला था। लेकिन सीधे-सीधे यह अनुच्छेद संविधान सभा में लाने का साहस नेहरू में  भी  नहीं था। भारत के संविधान में अनुच्छेद 370 चोर दरबाजे से ही डाला गया था। बाबा साहिब आम्बेडकर में तो इसे हाथ लगाने से भी इंकार कर दिया था तब इसे नेहरु ने अपने मित्र गोपालस्वामी आयंगर से संविधान सभा में पेश करवाया था। नेहरू जानते थे कि कांग्रेस में इस अनुच्छेद का बहुत विरोध है और वे उसका सामना नहीं कर पाएंगे। इसलिए वे स्वयं देश से बाहर चले गए। जब कांग्रेस में यह अनुच्छेद विचार हेतु लाया गया तो नेहरु के विदेश में होने के कारण, इस पर चर्चा करवाने का दायित्व सरदार पटेल पर आ गया। जाहिर था कि कांग्रेस की उस बैठक में इस अनुच्छेद का बहुत विरोध होता, और ऐसा  हुआ भी। कांग्रेस के भीतर की राष्ट्रवादी शक्तियों ने इसका घोर विरोध किया था। लेकिन अन्तत यह अनुच्छेद येन केन प्रकारेण स्वीकार्य हुआ। जो बार बार कहा जाता है कि जम्मू-कश्मीर के लोग इस लिए भारत की संघीय व्यवस्था का हिस्सा बने थे कि उनको विशेष अधिकार दिए जाएंगे, यह शिगूफा नेहरू और शेख अब्दुल्ला की साम्प्रदायिक मानसिकता से निकला है, इसका जम्मू-कश्मीर और लद्दाख की जनता से कुछ लेना देना नहीं है। जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय महाराजा हरि सिंह की इच्छा और हस्ताक्षर से हुआ था, नेहरू और शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के बीच हुई किसी संधि से नहीं। इसके विपरीत जम्मू-कश्मीर लद्दाख के लोग तो पूरा संघीय संविधान लागू करवाने के लिए आंदोलन कर रहे थे।

इस प्रकार अनुच्छेद 370 में जम्मू-कश्मीर के लिए अलग से संविधान सभा की व्यवस्था की गई। दरअसल उस समय सभी रियासतों को अपने-अपने यहां संविधानसभा गठित कर संविधान बनाने का अधिकार दिया। कालांतर में सभी राजाओं ने यह स्वीकार कर लिया कि उन पर भी संघीय संविधान ही लागू होगा लेकिन पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इस पूरी प्रक्रिया में जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह को बाहर ही कर दिया। उन्होंने महाराजा को यहां तक लिखा कि तुम्हारी औकात क्या है? जबकि नेहरू जानते थे कि हरि सिंह की औकात से ही जम्मू-कश्मीर भारत की संघीय संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा बना है। यहां तक की नेहरू ने शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के साथ मिल कर, जिसकी उस समय कोई कानूनी औकात नहीं थी, हरि सिंह को रियासत से निर्वासित ही कर दिया। यदि भारत सरकार उस समय अन्य राजाओं की तरह हरि सिंह से भी आग्रह करती तो वे भी पूरा संघीय संविधान रियासत में लागू कर देते। लेकिन नेहरू हरि सिंह को दुनिया भर की गालियां दे रहे थे और शेख मोहम्मद अब्दुल्ला को कन्धों पर बिठाए घूम रहे थे। यह नेहरू का ही निर्णय था कि शेष रियासतों पर पूरा संघीय संविधान लागू कर दिया जाए और जम्मू-कश्मीर को अपना अलग संविधान बनाने के लिए कहा जाए। नेहरू ऐसा क्यों चाहते थे, यह रहस्य अभी तक बरकरार है। एक अनुमान यह भी लगाया जाता है कि इसके पीछे उनका साम्प्रदायिक दृष्टिकोण था। उनको लगता था कि जम्मू-कश्मीर में मुसलमान बहुसंख्यक में हैं, इससे उनसे अलग प्रकार से व्यवहार करना चाहिए। यही सोच अंग्रेज साम्रज्यवादियों की थी और यही सोच जिन्ना की थी। इसी सोच से देश का विभाजन हुआ था। अंतर केवल इतना था कि वे अपना यह साम्प्रदायिक दृष्टिकोण छिपाते नहीं थे जबकि पंडित नेहरू ने अपनी इस साम्प्रदायिक मानसिकता को बड़ी होशियारी से समाजवाद के लबादे में छिपा कर रखा हुआ था। वैसे भी लबादा कश्मीरियों का परम्परागत पहनावा है और नेहरू भी कश्मीरी थे। लेकिन महाराजा हरि सिंह नेहरू के इस साम्प्रदायिक व्यवहार को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। महाराजा हरि सिंह जम्मू-कश्मीर के लिए अलग संविधान के पक्ष में नहीं थे। सरकार उनसे बातचीत करती तो वे स्वयं पूरा संघीय संविधान रियासत में लागू करते। इसलिए नेहरू ने उनके बेटे कर्ण सिंह को अपने साथ मिला लिया, कर्ण सिंह संकट की इस घड़ी में बाप का साथ छोड़कर नेहरू के साथ मिल गए। हरि सिंह पर दबाव डाल कर कर्ण सिंह को उनका रीजैंट बनाया गया। लेकिन नेहरु जिस प्रकार शेख अब्दुल्ला की मालिश करने में लगे हुए थे। लेकिन यह मानना होगा शेख और नेहरु, अनुच्छेद 370 के माध्यम से अलग-अलग कार्य सिद्धि चाहते थे।

नेहरू को आशा थी कि जम्मू-कश्मीर की  संविधान सभा से  दो काम तुरन्त पूरे हो जाएंगे  और उससे उनकी भूल सुधार हो जाएगी। संविधान सभा सबसे पहले तो विलय को स्वीकृति दे देगी। इससे जनमत संग्रह का गले पड़ा ढोल निकल जाएगा, क्योंकि संविधान सभा राज्य के चुने हुए प्रतिनिधियों से ही बनेगी। संविधान सभा द्वारा विलय के पक्ष में प्रस्ताव पारित हो जाने का अर्थ होगा कि राज्य के लोगों ने विलय को स्वीकार कर लिया है।  उनको दूसरी आशा थी कि संविधान सभा राज्य का संविधान बना लेने के बाद सिफारिश कर देगी कि अब अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया जाए क्योंकि अब इसकी जरूरत नहीं है। लेकिन क्योंकि राज्य संविधान सभा में शेख मोहम्मद अब्दुल्ला का कब्जा हो चुका था, इसलिए अब वह अपने असली रंग में आना शुरू हो गया था। नेहरू भी समझ गए कि पटेल ठीक ही कहते थे कि शेख अवसर आने पर धोखा देंगे। शेख में तो सचमुच धोखा दे दिया लेकिन बख्शी गुलाम मोहम्मद के नेतृत्व में राज्य की संविधान सभा में 26 जनवरी 1954 को विलय को मान्य कंपने वाला प्रस्ताव पारित कर दिया। इस प्रकार जम्मू-कश्मीर में राज्य के लोगों की राय जानने की भी शर्त पूरी हुई। लेकिन संविधान सभा ने अपनी वैधानिक मौत से पहले अनुच्छेद 370 को निरस्त करने का प्रस्ताव पारित नहीं किया। उनकी इच्छा बहुत थी कि अनुच्छेद 370 अब समाप्त हो जाए। इसलिए उन्होंने अनेक बार संसद में भाषण दिए कि यह अनुच्छेद समय पाकर हट जाएगा। लेकिन राज्य संविधान सभा ने उनकी यह इच्छा पूरी नहीं की।  नेहरू सचमुच ठगे गए थे। वे धोखा खा गए थे। इस मामले में पटेल ही सही सिद्ध हुए थे। नेहरू चाहते तो इसके बावजूद अनुच्छेद 370 हट सकता था। लेकिन इसके लिए  न तो उनमें हिम्मत थी न ही प्रकृति। यदि ऐसा होता तो शायद देश का ही विभाजन न होता। लेकिन नेहरू को यह श्रेय देना पड़ेगा कि वे अन्त तक अंडे रहे कि यह अनुच्छेद अस्थायी व्यवस्था होगी, जबकि शेख का षड्यंत्र इसे स्थायी बनाने का था।

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अनुच्छेद 370 के मृतक अंग

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 की चर्चा आमतौर पर होती ही रहती थी लेकिन जब उसके पिछवाड़े में छिप कर बैठा एक अन्य अनुच्छेद 35 ए पकड़ा गया, तब से चिंता ज्यादा बढ़ गई थी। विधि-विशारदों का कहना है कि अनुच्छेद 370 की ही अवैध संतान 35ए है। लेकिन एक बात समझ से परे है कि भारत का संविधान अधिकृत रूप से छापने वाले विधि मंत्रालय ने उसे इतने लम्बे अरसे तक यत्नपूर्वक संविधान के पिछवाड़े में छिपा कर क्यों रखा ? परंतु इससे एक लाभ भी हुआ है। 35 ए के पकड़े जाने के कारण ही एक बार फिर अनुच्छेद 370 की जामा-तलाशी ली गई। इस जामा तलाशी में इस अनुच्छेद के अंदर काफी मात्रा में बेकार हो चुका सामान मिला, जिसको लेकर स्वच्छता अभियान के लोग उत्साह में आए हैं लेकिन उधर जम्मू-कश्मीर के बकरा दल ने भी इस कचरे को देखकर अपने सींग तीखे करने शुरू कर दिए थे। उसका कहना था कि अनुच्छेद 370 के अंदर से यह कूड़ा निकाला गया तो जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता और उसका विशेष दर्जा खतरे में पड़ जाएगा। लेकिन तीखे हो रहे सींगों के बीच भी अनुच्छेद 370 के खोल में छिपे बेकार सामान की शिनाख्त करना लाजिमी हो गया था ताकि यह निरीक्षण ही हो सके कि इस सामान का कश्मीर के दर्जा-ए-खास से ताल्लुक है भी या कुछ लोगों ने अपनी राजनैतिक कांगडी गर्माए रखने के लिए शोर मचाना शुरू कर दिया।

संस्कृत में कहावत है प्रथम ग्रासे मक्षिका अर्थात पहले कौर में ही मक्खी आ गई। यही स्थिति अनुच्छेद 370 की है। इस अनुच्छेद के पहले वाक्य (370(1)( a) के अनुसार जम्मू-कश्मीर पर संघीय संविधान का अनुच्छेद 238 लागू नहीं होगा। लेकिन इस वक्त संघीय संविधान में अनुच्छेद 238 के नाम से कोई अनुच्छेद मौजूद ही नहीं है। बहुत साल पहले यह अनुच्छेद भारत के संविधान में विद्यमान होता था लेकिन बाद में संविधान संशोधन की प्रक्रिया के तमाम विधि विधान को अपना कर उस अनुच्छेद को संविधान में से हटा दिया गया था। संघीय संविधान में से अनुच्छेद 238 के विलुप्त हो जाने के बाद अनुच्छेद 370 (1)( a) अपने आप ही अप्रासांगिक हो जाता है। जब संविधान में कोई अनुच्छेद है ही नहीं तो उसके जम्मू-कश्मीर में लागू होने या न होने का प्रश्न ही कहां बचता है? अनुच्छेद 238 के मृत हो जाने या संविधान में से उसकी छुट्टी कर दिए जाने के बाद अनुच्छेद 370 की इस घोषणा का कोई अर्थ नहीं रह जाता कि अनुच्छेद 238 जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होगा। कायदे से अनुच्छेद 370 के इस भाग को  हटा दिया जाना चाहिए था क्योंकि अब यह निर्जीव हो गया था। लेकिन यह निर्जीव अंश भी संघीय संविधान में चिपका रहा और यदि कोई संशोधन करके इस मृत अंग को बाहर निकालने की बात भी  करता था तो श्रीनगर के लाल चौक में पटाखे छूटने लगते थे कि इससे जम्मू-कश्मीर का तथाकथित विशेष दर्जा खतरे में पड़ जाएगा।

लेकिन अभी अनुच्छेद 370 की आत्मा तक पहुंचना तो बाकी है। इस अनुच्छेद में जम्मू-कश्मीर सरकार पर बहुत भारी जिम्मेदारियां आयद की गई थीं। इसलिए बाकायदा स्पष्टीकरण दिया गया था कि आखिर जम्मू-कश्मीर सरकार से क्या अभिप्राय है, इसकी व्याख्या भी की गई थी। यह व्याख्या निम्नानुसार है, For the purpose of this article, the Government of the State means the person for the time being recognized by the President on the recommendation of the Legislative Assembly of the State as the Sadr-i-Riyasat of Jammu and Kashmir, acting on the advice of the Council of Ministers of the State for the time being in office. इसका अर्थ हुआ कि राज्य की विधान सभा द्वारा अनुमोदित जिस व्यक्ति को राष्ट्रपति उस समय जम्मू-कश्मीर का सदर-ए-रियासत स्वीकार करेंगे, राज्य की मंत्रि परिषद की सलाह पर कार्य करता हुआ वह व्यक्ति उस समय, ‘राज्य की सरकार’ माना जाएगा।

जम्मू-कश्मीर सरकार की यह व्याख्या 1950 में समझ आ सकती थी। उस समय प्रावधान यह था कि जम्मू-कश्मीर की विधानसभा सदरे रियासत के पद पर नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति को नाम प्रस्तावित करती थी। यदि राष्ट्रपति उस नाम को स्वीकृति दे देते तो वह व्यक्ति सूबे का सदरे रियासत माना जाता था। उस व्यक्ति के लिए लाजिमी था कि वह अपनी मंत्रिपरिषद की सलाह से कार्य करे। लेकिन बाद में यह सारी व्यवस्था समाप्त हो गई। जम्मू-कश्मीर के अपने संविधान अधिनियम 1957 में ही राज्य की विधानसभा में अनेक संशोधन कर नई व्यवस्थाएं लागू कर दीं। अब राज्य में सदर-ए-रियासत का कोई पद नहीं है। इसलिए राज्य की विधानसभा द्वारा न तो इस पद के लिए किसी को अनुमोदित करने का प्रश्न शेष बचता था  और न ही राष्ट्रपति द्वारा उसको स्वीकृति देने का। अब राज्य में राज्यपाल का पद है और राज्यपाल की नियुक्ति उसी प्रकार होती है जिस प्रकार किसी भी अन्य राज्य के राज्यपाल की नियुक्ति होती है। इसलिए अनुच्छेद 370 में दी गई राज्य सरकार की पूरी परिभाषा ही अप्रासांगिक हो जाती है। परंतु फिर भी यह परिभाषा अनुच्छेद से उसी प्रकार चिपकी हुई थी जिस प्रकार बंदरिया का मरा हुआ बच्चा भी मां के साथ चिपका रहता है। पंजाबी में एक कहावत है, जिधर गईंयां बेडिय़ां उधर गए मल्लाह। अर्थात जिधर किश्तियां चली गईं उसी तरफ मल्लाह चले गए। अब न राजा रहे न महाराजा, न सदरे रियासत रहे न रियासतें। लेकिन भारतीय संविधान का यह अनुच्छेद अभी भी वहां खड़ा पुराना राग अलाप रहा था।

भीमराव आम्बेडकर भारतीय संविधान को जीवन्त दस्तावेज कहते थे। संविधान कोई अजायबघर नहीं है जिसमें टूटी-फूटी चीजों को संभाल कर रखा जाता है। न ही यह चंडीगढ़ में बनाया गया टेक चंद का राक गार्डन है जिसे केवल टूटी-फूटी चीजों से ही बनाया और सजाया गया हो। फिर अनुच्छेद 370 के अंदर कालक्रम से प्राणहीन हो चुके शब्द और अर्थ क्यों नहीं हटाए जा सकते? आम्बेडकर तो यह भी मानते थे कि भविष्य की पीढिय़ों पर हम अपने आप को थोप नहीं सकते। वे आने वाले समय में अपने लिए अपनी जरूरतों के मुताबिक उपबंधों की व्यवस्था कर सकते हैं और उन्हें यह करने का पूरा अधिकार है। इसीलिए संविधान में संशोधन की व्यवस्था की गई थी। इसीलिए उन्होंने संविधान की प्रस्तावना में समाजवाद डालने से इंकार कर दिया था। उनका तर्क था मैं देश की आनें वाली संतानें पर एक खास विचारधारा कैसे लाद सकता हूं? इसी प्रकार अनुच्छेद 370 को हटाने या संशोधित करने की व्यवस्था संविधान में रखी गई थी। लेकिन जिन समूहों या व्यक्तियों का अपना निजी स्वार्थ इस अनुच्छेद से पूरा होने लगा था, वे इसे देखने या समझने से जानबूझकर कर इंकार करने लगे थे। अनुच्छेद में परिवर्तन करने या उसे हटाने की बात तो दूर, इस अनुच्छेद के खोल के भीतर के नकारा हो चुके अंगों को बाहर निकाल कर सफाई करने की अनुमति भी नहीं दी जा रही थी। ऐसा कहा जा रहा था कि अनुच्छेद 370 का दरवाजा खोलने की चाही राज्य की संविधान सभा के पास थी और वह पूरी की पूरी सभा अब यमराज के दरबार में पहुंच चुकी है, इसलिए वह चाबी भी यमराज के हाथ ही पहुंच गई है।

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अनुच्छेद 370 शोषण का माध्यम

संघीय संविधान में अनुच्छेद 370 संघीय संविधान में 1949 में जोड़ा गया था। इस अनुच्छेद से जम्मू-कश्मीर का विकास एक तरह से रूक गया था। यह अनुच्छेद संघीय संविधान और जम्मू-कश्मीर के बीच दीवार बन कर खड़ा था। संविधान देश के नागरिकों को जो अधिकार देता है, वे जम्मू-कश्मीर में इस अनुच्छेद के कारण नहीं पहुंच पाते थे। इस अनुच्छेद का लाभ उठा कर राज्य की सत्ता पर गिनती के  शेखों, सैयदों, पीरजादों, मुफ्तियों, मौलवियों और मीरवायजों ने कब्जा जमा लिया था और सत्ता का उपयोग लोकहित के लिए नहीं बल्कि अपने इस लघु समुदाय के पारिवारिक  हितों के लिए इस्तेमाल कर रहे थे। राज्य में आने वाले बजट का बड़ा हिस्सा इन चंद परिवारों और उनके सगे सबंधियों की जेब में चला जाता था।  यह बहुत ही शातिराना तरीके से प्रदेश की सत्ता व्यवस्था का अपहरण कहा जा सकता है। यह नए प्रकार की तानाशाही थी जिसमें  आम कश्मीरियों को लूटा भी जा रहा था और उन्हें अनुच्छेद 370 का ड्रग एडिक्ट बना कर पता भी नहीं चलने दिया जा रहा था। यह लघु समुदाय जानता था कि यदि आम कश्मीरी 370 के नशे से बाहर आ गया तो वह इस गिरोह की करतूतों से वाकिफ हो जाएगा और सत्ता इनके हाथ से छीन लेगा। इन शेखों  और सैयदों ने आम कश्मीरी के हाथ में 370 का झुनझुना दे रखा था जिसे वे बजाते रहते थे और पिछवाड़े में बैठे ये शेख, सैयद और पीरजादेह, एक ओर लूट खसूट करते रहते थे और दूसरी ओर अलगाववादियों की भाषा बोल कर केन्द्र सरकार को डराते रहते थे। अनुच्छेद 370 था तो अस्थायी लेकिन कांग्रेस सरकार ने अपने व्यवहार से इसको स्थायी बनाने की कोशिश बराबर जारी रखी थी। यह ध्यान रखना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस और नेशनल कांग्रेस एक ही सिक्के के दो पहलू थे। पंडित नेहरू तो नेशनल कान्फ्रेंस को जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस की शाखा ही बताते थे, इसलिए बहुत साल तक प्रदेश में कांग्रेस की शाखा खोली ही नहीं गई थी। बाद में एक बार नेशनल कान्फ्रेंस का कांग्रेस में विलय भी हो गया था। इसलिए अनुच्छेद 370 को बनाए रखने में कांग्रेस के भी बही स्वार्थ थे जो शेखों-सैयदों के इस समूह के थे।  इस पूरे परिदृश्य में शेखों और सैयदों को छोड़कर बाकी सभी राज्य निवासी पिस रहे थे। राज्य में बारह जनजातियां हैं, जिनको कोई अधिकार इन शेखों और सैयदों ने नहीं दिया था, जबकि देश के अन्य राज्यों में इन जनजातियों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ मिलता है। जम्मू-कश्मीर विधानसभा में इन जनजातियों के लिए कोई सीट सुरक्षित नहीं है, जबकि शेष राज्यों की विधानसभाओं में जनजातियों के लिए उनकी जनसंख्या के हिसाब से सीटें आरक्षित हैं। यही स्थिति अनुसूचित जातियों की है। उनकी हालत तो अमानवीय है। जम्मू में दलितों को, जो राज्य निवासी प्रमाण पत्र जारी किया हुआ है, उसमें अंकित है कि ये केवल सफाई सेवक का काम कर सकता हैं। दलितों के अधिकारों के लिए बाबा साहेब आम्बेडकर  जीवन भर संघर्ष करते रहे और संविधान में उनको सभी प्रकार के अधिकार उनको मुहैया करवाए, लेकिन जम्मू-कश्मीर की सरकार दलितों को ये अधिकार देने के लिए तैयार नहीं थी। इतना ही नहीं वह जन्म के आधार पर काम की एक नई वर्ण व्यवस्था तैयार कर रही थी जिसका शिकार वहां का दलित समाज हो रहा था।

1947 में विभाजन के समय लाखों लोग पश्चिमी पंजाब से पूर्वी पंजाब, दिल्ली, और अन्य प्रदेशों में गए। उन्हें भारत सरकार और राज्यों की सरकारों ने सभी प्रकार की सहायता प्रदान की। पाकिस्तान में रह गई सम्पत्ति का मुआवजा भी उन्हें दिया। पश्चिमी पंजाब के जो जिले, मसलन स्यालकोट और रावलपिंडि जम्मू-कश्मीर के नजदीक थे। वहां से लाखों पंजाबी जम्मू-कश्मीर में आ गए। लेकिन आज 70 साल बाद भी उनको वहां का स्थायी निवासी  नहीं माना जा रहा। वे जो सम्पत्ति वहां छोड़ आए थे, उसका मुआवजा देने की बात तो दूर, उनके बच्चों को प्रदेश के व्यवसायिक शिक्षा संस्थानों में प्रवेश नहीं दिया जा रहा। वे राज्य में नौकरी नहीं कर सकते। विधान सभा व पंचायतों में चुनाव लडऩे की बात तो दूर, वहां वोट तक नहीं दे सकते। अनुच्छेद 370 ने शेखों और सैयदों के कुछ परिवारों, मुल्ला मौलवियों, मीरवायजों और पीरजादों को छोड़कर शेष निवासियों के लिए राज्य को एक बड़ा यातना शिविर बना रखा था। लद्दाख के लोग तो 370 की व्यवस्था से इतने दुखी थे कि उन्होंने 1948 में ही यह प्रस्ताव पारित किया था कि लद्दाख को पूर्वी पंजाब में शामिल कर दिया जाए लेकिन वे कश्मीर के साथ मिलने को तैयार नहीं हैं। शुरु में स्थिति यह थी कि लद्दाख के विधानसभा सदस्य, प्रदेश की विधानसभा में अपनी मातृभाषा भोटी में बोल तक नहीं सकते थे। वहां से निर्वाचित विधायक कुशोक बकुला रिम्पोछे को भोटी में बोलने के लिए भी संघर्ष करना पड़ा था। दरअसल अनुच्छेद 370 देश के अन्य राज्यों के निवासियों से ही भेदभाव नहीं करता था बल्कि यह जम्मू-कश्मीर के निवासियों से ही भेदभाव करता है। अनुच्छेद 370 की अवैध संतान 35 ए जम्मू-कश्मीर के निवासियों को ही दो वर्गों में विभाजित करता था। प्रथम वर्ग  राज्य के स्थायी निवासी और द्वितीय वर्ग राज्य के शेष निवासी। राज्य में जाकर जमीनी स्तर पर अध्ययन किया जाए तो स्पष्ट हो जाएगा कि दूसरे वर्ग में आने वाले कश्मीरियों को राज्य की सांविधानिक व्यवस्था में ही अपंग बनाया गया है। इस अनुच्छेद के कारण जम्मू-कश्मीर में Child Marriage Act, Right to Education act, Land Accusation Act, Multiple Disability Act, Senior Citizens act, Delimitation act, Whistle Blower Protection act, National Commission for Minorities, National Council for Teacher Education लागू नहीं हो सकते थे। इस अनुच्छेद का प्रयोग कश्मीर के कुछ परिवार कश्मीरियों के हिस्से का माल डकारने में कर रहे थे और पाकिस्तान इसका उपयोग घाटी में अलगाववाद बढ़ाने में कर रहा था।

राजनीति शास्त्र के विद्वान प्रदेश के लोगों के साथ हो रहे इसी अन्याय को ही राज्य का स्पेशल दर्जा कह कर प्रचारित कर रहे थे। यदि इस व्यवस्था को राज्य का विशेष दर्जा मान लिया जाए तो इसका लाभ प्रदेश के एक हिस्से कश्मीर घाटी में, शेखों, सैयदों, मुफ्तियों, मीरवायजों, मौलवियों और पीरजादों को मिल रहा था। इन सभी ने मिलकर प्रदेश की राजनीति, व्यवसाय और मस्जिदों पर कब्जा कर रखा था। प्रदेश में अलगाववाद और आतंकवाद का संचालन कर रहे गिरोहों पर भी एक प्रकार से इन्हीं का कब्जा है और वे आतंकवाद के नाम पर विदेशों से पैसा एकत्रित करते थे और उससे सम्पत्ति भी अर्जित करते थे और अपने शरीफजादों को विदेशों के महंगे विश्वविद्यालयों में पढऩे के लिए भी भेजते थे। जम्मू-कश्मीर में अलगाववाद का परचम फहरा रही हुर्रियत कान्फ्रेंस और तथाकथित मुख्यधारा के दोनों क्षेत्रीय दल लगभग एक ही भाषा बोलते थे। केवल उनका मंच अलग होता था। इन समुदायों को अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए अनुच्छेद 370 की बैसाखियों की सख्त जरूरत थी। इसीलिए ये सभी इस अनुच्छेद को कश्मीर की पहचान के साथ जोड़कर आम कश्मीरी का भावात्मक शोषण कर रहे थे।

कश्मीर घाटी में एक कथा आमतौर पर बार-बार दोहराई जाती है कि अनुच्छेद 370 की जरूरत न मराज को है और न ही कामराज को। यह अनुच्छेद तो केवल यमराज को चाहिए। ध्यान रहे कश्मीर में दक्षिणी हिस्से को मराज, उत्तरी हिस्से को कामराज और मध्य कश्मीर को यमराज कहा जाता है।

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अनुच्छेद 370 के अन्त का प्रावधान और उसका प्रयोग      

अनुच्छेद  370(1)( c) में प्रावधान है कि संघीय संविधान का अनुच्छेद 1 और 370 जम्मू-कश्मीर में लागू है। अनुच्छेद  370(1)(स्र) में प्रावधान है कि राष्ट्रपति यदि चाहें तो वे संघीय संविधान के अन्य अनुच्छेद, उनके मूल रूप में या संशोधित रूप में, जम्मू-कश्मीर पर भी लागू कर सकते हैं। लेकिन राष्ट्रपति को ऐसा करने से पहले जम्मू-कश्मीर सरकार की तद् विषयक  सहमति लेनी होगी। इन संवैधानिक प्रावधानों के अन्तर्गत राष्ट्रपति ने पांच अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370(1)( d) से मिली शक्तियों का प्रयोग करते हुए पांच अगस्त 2019 को THE CONSTITUTION (APPLICATION TO JAMMU AND KASHMIR) ORDER, 2019 जारी करते हुए  संघीय संविधान के सभी अनुच्छेद जम्मू-कश्मीर में भी लागू कर दिए। लेकिन यह संविधान आदेश जारी करने के लिए जम्मू-कश्मीर सरकार की सहमति अनिवार्य थी। लेकिन फिलहाल राज्य में राष्ट्रपति राज लागू है। अत: व्यवहारिक रूप से राज्यपाल ही राज्य सरकार है। इसलिए राष्ट्रपति ने राज्यपाल की संस्तुतियां से यह आदेश जारी कर दिया। इस आदेश ने संविधान आदेश 1954 को निरस्त कर दिया। 1954 के इसी संविधान आदेश की देह में अनुच्छेद 35 ए छिपा बैठा था। उसका भी इससे स्वत: अन्त हो गया। 2019 का संविधान आदेश लागू हो जाने के बाद भारत सरकार को यह अधिकार भी प्राप्त हो गया कि वह राज्य का पुनर्गठन कर सके। उस अधिकार का प्रयोग करते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने राज्य सभा में जम्मू-कश्मीर राज्य पुनर्गठन बिल पेश किया। इस बिल के अनुसार लद्दाख और जम्मू-कश्मीर दो अलग केन्द्र शासित प्रदेश गठित किए गए।

लेकिन राष्ट्रपति ने संघीय संविधान के अनुच्छेद 367 को जम्मू-कश्मीर में मूल रूप में लागू न कर उसके संशोधित रूप में लागू किया। इस संशोधित रूप के अनुसार अनुच्छेद 370(3) में संविधान सभा के स्थान पर राज्य की विधानसभा पढ़ा जाना था। अनुच्छेद 367 संघीय संविधान में प्रयुक्त शब्दों की, यदि जरूरत पड़े, तो व्याख्या करने वाला अनुच्छेद है। इस अनुच्छेद को संशोधित करते हुए उन्होंने इसका विस्तार करते हुए sub-clause (4)(d)  शामिल की जिसमें कहा गया है कि अनुच्छेद 370(3) में जहां संविधान सभा लिखा गया है, उसको राज्य की विधानसभा पढ़ा जाए।

राज्य की संविधान सभा तो 1957 में खत्म हो चुकी थी। इसलिए कुछ हाईपर एक्टिव किस्म के बुद्धिजीवियों ने कहना शुरू कर दिया था कि संविधान सभा तो अपनी उम्र भोग कर मर गई है, इसलिए जब तक सूर्य चन्द्रमा कायम रहेंगे तब तक इस अनुच्छेद को हाथ नहीं लगाया जा सकता। अब यह अनुच्छेद अमर हो गया है। लेकिन उनके दुर्भाग्य से जब बाबा साहिब आम्बेडकर ने यह संविधान बनाया था तो उन्होंने शेष सभी व्यवस्थाएं इसमें शामिल कर दी थीं लेकिन किसी हिस्से या अनुच्छेद को अमर बनाने का तांत्रिक सूत्र इसमें नहीं डाला था। आम्बेडकर संविधान को एक जीवंत व्यवस्था मानते थे न कि विभिन्न अनुच्छेदों को अमर बनाने का तंत्र लगा कर तैयार किया गया कोई भुतहा अजायबघर। इतना ही नहीं स्वयं शेख मोहम्मद अब्दुल्ला भी यह मानते थे कि जम्मू-कश्मीर के संविधान में, स्थायी निवासी की जो परिभाषा स्थापित की जा रही है, वह भी स्थायी नहीं हो सकती। उन्होंने स्वयं ग्यारह अगस्त 1952 को राज्य की संलिधान सभा में बोलते हुए कहा था, No definition of the rights and privileges of the residents of the State can afford to remain static; the need may arise at one stage or the other to liberalize such a definition.’ आम्बेडकर द्वारा बनाई गई इसी व्यवस्था का उपयोग करते हुए राष्ट्रपति ने संघीय संविधान के अनुच्छेद 367(4) को जम्मू-कश्मीर में लागू कर दिया था। इस के कारण अब अनुच्छेद 370(3) में संविधान सभा के स्थान पर राज्य की विधान सभा स्थापित किया जा चुका था। अनुच्छेद  370(3) में ही यह प्रावधान है कि राष्ट्रपति यदि चाहें तो पूरे अनुच्छेद 370 को ही निष्प्रभावी करार दे सकते हैं वशर्ते जम्मू-कश्मीर संविधान सभा ऐसा करने के लिए राष्ट्रपति को कहे। इस अनुच्छेद 370(3) के अनुसार Notwithstanding anything in the foregoing provisions of this article, the President may, by public notification, declare that this article shall cease to be operative or shall be operative only with such e&ceptions and modifications and from such date as he may specify: Provided that the recommendation of the Constituent Assembly of the State referred to in clause (w) shall be necessary before the President issues such a notification. इसका अर्थ यह हुआ कि अब राज्य विधान सभा राष्ट्रपति को कह सकती है कि अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया जाए। नए परिप्रेक्ष्य में  राज्य की मर चुकी संविधान सभा  के पास नहीं बल्कि राज्य की विधानसभा के पास यह अधिकार आ गया कि वह यदि चाहे तो अनुच्छेद 370 को समाप्त करने के लिए राष्ट्रपति को आग्रह कर सकती थी। लेकिन इस समय राज्य में विधान सभा नहीं है। वह भंग हो चुकी है। इसलिए राष्ट्रपति से ऐसा आग्रह करने का अधिकार संसद के पास आ जाता है।

इसलिए गृहमंत्री ने ऐसा संकल्प संसद में प्रस्तुत किया जिसमें राष्ट्रपति से संस्तुतियां की गई थी कि वे अनुच्छेद 370 को समाप्त करें। संसद द्वारा पारित कर देने के बाद गृहमंत्री ने संसद की तद् विषयक संस्तुति राष्ट्रपति को प्रेषित कर दी। उस संस्तुति को स्वीकार करते हुए  राष्ट्रपति ने 6 अगस्त 2019 को संविधान आदेश 273 जारी किया जिसने अनुच्छेद 370 को निरस्त करते हुए उसे निम्न रूप में स्थापित किया।

  1. All provisions of this Constitution, as amended from time to time, without any modifications or e&ceptions, shall apply to the State of Jammu and Kashmir notwithstanding anything contrary contained in article vzw or article x®} or any other article of this Constitution or any other provision of the Constitution of Jammu and Kashmir or any law, document, judgement, ordinance, order, by-law, rule, regulation, notification, custom or usage having the force of law in the territory of India, or any other instrument, treaty or agreement as envisaged under article x{x or otherwise. इस प्रकार संसद ने अनुच्छेद 370 के सभी कांटे निकाल दिए, ताकि वे राज्य के किसी भी निवासी को, चाहे वह प्रथम वर्ग का हो या फिर दूसरे वर्ग का हो, घायल न कर सकें। लेकिन इसके साथ ही अमित शाह ने स्पष्ट किया कि पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर और चीन अधिकृत जम्मू-कश्मीर भी इन दो केन्द्र शासित प्रदेश का हिस्सा हैं।

अनुच्छेद 370 की जरुरत पाकिस्तान को थी

उधर पाकिस्तान को इस अनुच्छेद की सर्वाधिक आवश्यकता थी। यही कारण है कि  पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान कह रहे हैं कि अनुच्छेद 370 के मामले पर उनका देश किसी भी हद तक जा सकता है। उसने कहा है कि अब फिर से पुलवामा जैसे आतंकी आक्रमण हो सकते हैं। पाकिस्तान ने सीमा पर युद्धास्त्र लाने शुरू कर दिए हैं। आतंकियों को वह भारत में घुसाने की फिराक में है। समझौता एक्सप्रेस  वापिस आ गई हैं। इस्लामाबाद ने 13 भारतीय राजनयिकों को वापिस भेज दिया है और भारत से राजनयिक सम्बंधों का दर्जा कम कर दिया है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि पाकिस्तान को जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 बना रहने से कितना राजनैतिक, कूटनीति और सामरिक लाभ मिलता होगा, जिसके छिन जाने से वह इतना बौखलाया हुआ है।

वह इस अनुच्छेद की व्याख्या जम्मू-कश्मीर को भारत और पाकिस्तान के बीच विवादित क्षेत्र सिद्ध करता था। अब यदि यह प्रदेश देश के बाकी प्रदेशों या केन्द्रशासित क्षेत्रों की तरह हो जाता है तो पाकिस्तान के बीच विवाद का विषय तो इतना ही बचता है कि 1947 में जब पाकिस्तान ने भारत पर सैनिक हमला करके जम्मू-कश्मीर के जिस एक तिहाई हिस्से पर कब्जा कर लिया था, उस पर दोनों देश आपस में बातचीत करें। अभी तक पाकिस्तान, अनुच्छेद 370 की व्याख्या यह कह कर करता था कि भारत स्वयं भी जम्मू-कश्मीर को अपना स्थायी हिस्सा नहीं मानता, इसीलिए उसने अपने संविधान में इस राज्य की व्यवस्था के लिए यह विशेष अनुच्छेद बनाया हुआ है और न ही भारत का संघीय संविधान प्रदेश पर पूरी तरह लागू होता है। अभी तक जम्मू-कश्मीर के लिए यह व्यवस्था थी कि वहां के भूगोल में संसद दखलंदाजी नहीं कर सकती। शेष सभी प्रान्तों का पुनर्गठन हो सकता था और होता भी रहा है लेकिन जम्मू-कश्मीर के भूगोल को छेड़ा तक नहीं जा सकता था। लेकिन अनुच्छेद 370 के प्रावधान बदल जाने के कारण, संसद ने जम्मू-कश्मीर राज्य पुनर्गठन अधिनियम पारित कर, उसे दो केन्द्र शासित क्षेत्रों में तब्दील कर दिया है। अब लद्दाख, चंडीगढ़, दिल्ली और पुदुच्चेरी की तरह अलग केन्द्र शासित प्रदेश होगा।

अब पूर्व  अनुच्छेद 370 का स्वरूप बदल जाने और राज्य का भाषा के आधार पर पुनर्गठन हो जाने से जम्मू-कश्मीर को लेकर पाकिस्तान की सारी व्याख्याएं केवल अप्रासंगिक ही नहीं हुईं बल्कि इतिहास का हिस्सा बन गई हैं। पाकिस्तान का अपना हित इसी में था कि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 लागू रहे और उसी के आधार पर इसे विवादित हिस्सा सिद्ध किया जाता रहे। यह स्थिति वहां के कुछ राजनैतिक दलों को अनुकूल पड़ती थी और वहां की सेना को भी अनुकूल थी। दरअसल जम्मू-कश्मीर का विवादित बने रहना पाकिस्तान के राष्ट्रीय हितों और सामरिक हितों के लिए लाभदायक है। लेकिन भारत के लिए यह स्थिति धीरे-धीरे आत्मघाती बनती जा रही थी। यह आश्चर्य का विषय है कि भारत में भी कुछ राजनैतिक दल जम्मू-कश्मीर को इसी दृष्टि से देखते थे।

जाहिर था पाकिस्तान अनुच्छेद 370 को समाप्त करने के प्रश्न को लेकर दुनिया भर में शेर मचाता और उसने मचाया भी। उसे आशा रही होगी की अमेरिका और ब्रिटेन, जो अब तक पाकिस्तान का उपयोग, भारत के खिलाफ अपने हितों की पूर्ति के लिए करते आए हैं, अब भी इस नए मामले में उसका समर्थन करेंगे। पाकिस्तान को आशा रही होगी कि अमेरिका आजकल अफगानिस्तान में फंसी अपनी पूंछ छुड़ाने के लिए तालिबान के साथ बातचीत कर रहा है। पूंछ छुड़ाने में उसे पाकिस्तान की सहायता की जरूरत पड़ेगी। इसलिए पाकिस्तान अमेरिका पर दबाव बना लेगा। लेकिन अमेरिका, दोनों देशों को बातचीत करनी चाहिए, इससे एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा। इंग्लैंड भी शिमला समझौता या द्विपक्षीय रणनीति पर अटक गया। यूएई ने तो स्पष्ट ही कहा कि यह भारत का आंतरिक मामला है। रूस ने भी यही दोहराया। चीन लद्दाख के मुद्दे पर जरूर कुछ खांसता रहा लेकिन कुल मिला मिला वह द्विपक्षीय बातचीत के इर्द-गिर्द घूमने लगा। यहां तक की एक भी अरब देश ने इस मामले पर पाकिस्तान का समर्थन करना उचित नहीं समझा। पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र संघ में मामला ले जाने की बात कहने जरूर लगा है लेकिन जमीनी हालात को देखते हुए कहा जा सकता है, वह वहां अकेला ही रिरियाते हुए पकड़ा जाएगा। मोटे तौर पर वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति की विवशताएं या यथार्थ के चलते पाकिस्तान इस मामले में अकेला रह गया है। कोई भी देश आखिर यह कैसे कह सकता है कि भारतीय संसद अपने संविधान में वैधानिक ढंग से हस्तक्षेप नहीं कर सकती। इसी प्रकार के तर्क लेकर एक सज्जन अनुच्छेद 370 की घरवापिसी के लिए उच्चतम न्यायालय तक जा पहुंचे हैं। वे न्यायालय से गुहार लगा रहे थे कि उनकी याचिका को आपातकालीन मान कर तुरंत सुनवाई की जाए। उनको डर था कि तब तक पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र संघ पहुंच जाएगा। तब न्यायाधीश ने पूछा कि संयुक्त राष्ट्र क्या भारतीय संसद द्वारा पारित किए गए अधिनियमों  पर स्थगन आदेश जारी कर देगा? स्पष्ट है कि संयुक्त राष्ट्र भारत के आंतरिक संसदीय मामलों में तो दखलंदाजी नहीं कर सकता। वैसे भी अब वे दिन हवा हो गए हैं जब भारत, कमजोर की जोरू सब की भाभी हुआ करती थी। वैसे भी अमित शाह ने संसद में इन आशंकाओं का निराकरण भी किया। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 और जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन का संयुक्त राष्ट्र संघ का कोई सम्बंध नहीं है। क्योंकि न तो इससे भारत की अन्तर्राष्ट्रीय सीमा बदली है और न ही वास्तविक नियंत्रण रेखा बदली है। पाकिस्तान ने अनुच्छेद 370 की समाप्ति के कारण पाकिस्तान ने हो हल्ला मचाया लेकिन अन्तर्राष्ट्रीय परिदृष्य में पाकिस्तान अकेला पड़ गया था कि तभी उसे एक ऐसे इलाके से सहायता मिली जिसकी उसने कल्पना भी न की होगी।

सोनिया कांग्रेस का पाकिस्तान को राष्ट्रघाती समर्थन

पाकिस्तान को सहायता या कुमुद पहुंचाने वाला यह समूह सोनिया कांग्रेस का पाकिस्तान सैल कहा जा सकता है। अपनी भाषा में पार्टी शायद उसे अपना अन्तर्राष्ट्रीय सैल ही कहती होगी। लेकिन लगता है उसकी पूरी रणनीति इस संकट काल में किसी भी तरह पाकिस्तान को अनुच्छेद 370 के मुद्दे पर निरन्तर सहायता पहुंचाते रहना है ताकि अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर कहीं पाकिस्तान निराश होकर अनुच्छेद 370 का मुद्दा छोड़ न दे।

इस अभियान की शुरुआत स्वयं राहुल गांधी ने की। उन्हें इसके लिए सहायता बीबीसी इत्यादि ने मुहैया करवाई। बीबीसी इस समय पूरी निष्ठा में ये अफवाहें फैलाने में लगा हुआ है। न्यूयार्क टाईम्स यही काम अपने सम्पादकीय लेखों के माध्यम से कर रहा है। राहुल गांधी ने कहा कि कश्मीर घाटी में लोग प्रदर्शन कर रहे हैं और लोग विद्रोह पर उतर आए हैं। सरकार वहां लोगों का दमन कर रही है। चिदंबरम ने इस मामले को और आगे बढ़ाया उसने कहा कि जम्मू-कश्मीर यदि हिन्दु बहुल होता तो मोदी सरकार उस ओर देखती भी न। जम्मू-कश्मीर को इसलिए निशाना बनाया जा रहा है कि वहां मुसलमान रहते हैं। उनके अनुसार कश्मीर में तानाशाही है और लोकतंत्र का गला लगभग दबा ही दिया गया है। दिग्विजय उससे भी आगे गए। उनका भारतीय मीडिया पर विश्वास नहीं है। उनके अनुसार यह बिका हुआ है। कश्मीर का सच जानना है तो एक बार ब्रिटेन की शरण में ही जाना होगा। कश्मीर की असली हालत वहीं से जानी जा सकती है। वहां बीबीसी डांट काम कश्मीर के बारे में बता रहा है। दिग्विजय के अनुसार वहां से पता चल रहा है कि कश्मीर को किस प्रकार एक बड़ी जेल में बदल दिया गया है। फिर अन्त में शशि थरूर नमूदार हुए। उनका कहना था कि मोदी सरकार ने कश्मीर को फीलिस्तीन में बदल लिया है और भारत से कश्मीर छिन जाएगा।

पाकिस्तान जिस सहायता के लिए दुनिया भर में गुहार लगा रहा था और वह उसे मिल नहीं रही थी, वही सहायता उसे भारत के ही सबसे पुराने राजनैतिक दल से प्राप्त हुई। अन्धा क्या मांगे दो आंखें! आज पाकिस्तान की सरकार और उसका मीडिया सोनिया कांग्रेस के इन्हीं नेताओं के बयानों का ढोल पीट रहा है। इन्दिरा गांधी को जैसे ही इसका पहला अवसर मिला उन्हॉने शिमला समझौता में जम्मू-कश्मीर पर से अंतर्राष्ट्रीयता का मुलम्मा उतार दिया। और पांच अगस्त को अनुच्छेद 370 को निरस्त कर मोदी सरकार ने माउंटबेटन दम्पति और शेख मोहम्मद अब्दुल्ला द्वारा शुरु किए गए इस राष्ट्रघाती प्रकरण को सदा के लिए समाप्त कर दिया। चाहिए तो यह था कि इन्दिरा गांधी की विरासत को आगे बढ़ाते हुए कांग्रेस इसका समर्थन करती।

लेकिन आश्चर्य की बात है कि सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस, इन्दिरा गांधी की विरासत को छोड़कर, आज भी उसी षड्यन्त्र को स्थायी रखने के प्रयास में अडिग दिखाई दे रही है, जिसके बीज माउंटबेटन दम्पति ने बोए थे। पाकिस्तान को आज जिस समर्थन व तर्कों की सबसे ज्यादा जरुरत थी, वे सभी उसे सोनिया कांग्रेस भारत में ही बैठ कर मुहैया करवा रही है। दरअसल सोनिया कांग्रेस ने इसकी शुरुआत छह अगस्त को राज्यसभा में ही कर दी थी जब गृहमंत्री अमित शाह में अनुच्छेद 370 को लेकर संकल्प प्रस्तुत किया था।  कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ग़ुलाम नबी आजाद और अधीर रंजन चौधरी ने संसद में इस विषय को लेकर जो भाषण दिया था, यदि उसके भाषणकर्ता के नाम की घोषणा न की जाए तो उसे कोई भी किसी पाकिस्तानी प्रतिनिधि का भाषण कह सकता है।

यह स्थिति 1948 में सुरक्षा परिषद में भी पैदा हुई थी जब भारत के प्रतिनिधि गोपालस्वामी आयंगर परिषद में भारत का पक्ष रख रहे थे। तब किसी ने टिप्पणी की थी कि यदि श्रोता को यह न पता हो कि बोलने वाला भारत का प्रतिनिधि है, तो वह इनके भाषण को सुन कर सही कहेगा कि पाकिस्तान का प्रतिनिधि बोल रहा है। आज 79 साल बाद भी कांग्रेस वहीं कि वहीं खड़ी है जबकि देश बहुत आगे निकल गया है। ऐसे समय में सारे देश को एक साथ होना चाहिए था। लेकिन सोनिया कांग्रेस इस समय भी पाकिस्तान के साथ जा खड़ी हुई है और उसके सभी वरिष्ठ नेता वही भाषा बोल रहे हैं, जो पाकिस्तान बोल रहा है।

अनुच्छेद 370 हटने से बदलेगी जम्मू-कश्मीर की फिजा

सप्त सिन्धु क्षेत्र या पश्चिमोत्तर भारत में जम्मू-कश्मीर ही ऐसा प्रदेश है जिसमें पन्द्रह प्रतिशत जनजाति समुदाय के लोग हैं। जनजाति समुदाय में सबसे ज्यादा संख्या गुज्जरों या गुर्जरों की है जिनकी मातृभाषा गोजरी है। लेकिन सरकारी नौकरियों और विधानसभा में इनको किसी किस्म का आरक्षण नहीं दिया जाता जिससे सचिवालय और विधानसभा में कब्जा कश्मीरियों की तथाकथित बड़ी जातियों का ही बना रहता है। कश्मीरियों की बड़ी जातियां यह सारा खेल अनुच्छेद 370 की आड़ में खेलती थीं। लेकिन अब 370 की यह छतरी हट जाने के कारण गुज्जरों को भी उनके सभी संवैधानिक अधिकार प्राप्त हो जाएंगे। जम्मू-कश्मीर में इसी प्रकार का दूसरा प्रताडि़त समुदाय पहाड़ी राजपूतों का है। ये सभी क्षत्रिय वर्ग के लोग हैं। जम्मू संभाग के पूंछ-राजौरी जिलों में और उत्तरी कश्मीर के बान्दीपुर, कुपवाड़ा, बारामूला जिलों में इन पहाड़ी राजपूतों की बहुतायत है। इनकी मातृभाषा पहाड़ी है। ये भी सभी प्रकार के आरक्षण अधिकारों से वंचित प्राणी हैं। लेकिन सबसे बुरी स्थिति गुरेज की शीना जनजाति है। इनकी मातृभाषा शीना है जो सरकारी उपेक्षा के कारण लगभग लुप्त होने के कगार पर है। गुरेज के स्कूलों में कहीं भी इसके पढ़ाने की व्यवस्था नहीं है। गुज्जरों की तरह, शीना जनजाति को भी आरक्षण का कोई अधिकार प्राप्त नहीं है। गुज्जरों की जनसंख्या बहुत ज्यादा है, इसलिए वे अनेक बार अपने अधिकारों और भाषा के संरक्षण के लिए आन्दोलन भी करते रहते हैं। उन्होंने जनजाति का दर्जा भी 1991 में एक लम्बे आन्दोलन के बाद ही प्राप्त किया था। लेकिन शीना समुदाय जनसंख्या में कम होने के कारण ऐसा भी नहीं कर सकता। कश्मीरी, उनके साथ भेदभाव करते हैं। लेकिन अब सरकारी नौकरियों में तो उन्हें आरक्षण का लाभ मिलेगा ही, विधानसभा में भी आरक्षित की गई सीटों पर वे चुने जा सकते हैं। कश्मीरी सवर्ण जातियों की सबसे बड़ी चिन्ता यही है कि अनुच्छेद 370 हट जाने के कारण अब तक की प्रताडि़त और वंंचित जनजातियां भी उनके मुकाबले उठ कर खड़ी हो जाएंगी।

दूसरा सबसे बड़ा तबका अन्य पिछड़ी जातियों यानि ओबीसी का है। पूरे देश में ओबीसी को सरकारी नौकरियों में आरक्षण प्राप्त है लेकिन जम्मू-कश्मीर राज्य में उच्च वर्ग के लोगों ने अनुच्छेद 370 की ढ़ाल आगे करके अन्य पिछड़ा वर्ग की जातियों को सरकारी नौकरियों में उनकी उचित हिस्सेदारी की बात तो दूर प्रदेश में उनकी शिनाख्त तक नहीं होनी दी। अब जब कश्मीर घाटी में ऐसे वर्गों की शिनाख्त का काम शुरू होगा तो यकीनन सैयदों के घरों में रूदाली शुरू हो जाएगी। क्योंकि कश्मीर में सैयदों की जनसंख्या बमुश्किल एक-दो प्रतिशत से ज्यादा नहीं है लेकिन नौकरियों में उनका अनुपात सारी हदें तोड़ता है। प्रताडि़त वर्ग व अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग जब अपने अधिकारों की मांग करते हैं तो ये मुफ्ती सैयद मस्जिदों में बिठाकर उन्हें शरीयत का ज्ञान दे कर बेहोश किए रहते हैं। अब 370 खत्म होने से कश्मीर में जो नई हवा चली है, उसने 70 साल से बंद मकान के दरबाजे खोल दिए हैं और अंदर से सड़ांध बाहर निकल रही है। ताजी हवा मकान के अंदर जानी शुरू हुई है। जाहिर है मजहब की गोलियां खिला खिला कर बेहोश की गई जातियां अंगड़ाई लेने लगी हैं। उनकी यह अंगड़ाई ही सैयदों के वर्चस्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है। यही कारण है कि वे 370 की लाश को रो-रोकर घर में संभालने का हठ किए हुए हैं  और सुपुर्दे खाक करने से आनाकानी कर रहे हैं।

कभी न कभी तो जम्मू-कश्मीर को इस षड्यंत्र से मुक्ति मिलनी ही थी। लेकिन इसके लिए जिस साहस की जरूरत थी, वह अब तक की सरकारों में से किसी ने नहीं दिखाया। नरेन्द्र मोदी बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने उस षड्यन्त्र का अत कर दिया जिसकी शुरुआत नेहरू, माउंटबेटन दम्पत्ति और शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने 70 साल पहले की थी। वैसे भी भारत सरकार ने स्वच्छता अभियान चला रखा है। लगे हाथ अनुच्छेद 370 में भी साफ-सफाई कर ली जाए तो भाव और अर्थ दोनों की रक्षा हो जाएगी। यह अलग बात है कि जम्मू-कश्मीर में जिनका आर्थिक और राजनैतिक स्वार्थ अनुच्छेद 370 से ही चलता है, वे जरूर रूदाली रूदन करेंगे और उनके साथ बकरे भी मींगन करेंगे कि बिना भाव को छेड़े, केवल सफाई से भी रियासत का दर्जा-ए-खास नष्ट हो जाता है। ऐसे लोगों के लिए इतना ही काफी है कि अल्लाह इन्हें स्वच्छता में रहने की तौफीक दे।

डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

 

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