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जीतता तो में हूं, हराते तो मेरे विरोधी

जीतता तो में हूं, हराते तो मेरे विरोधी

बेटा : पिताजी।

पिता : हां, बेटा।

बेटा : इस बार देश में लोकसभा चुनाव बड़े अच्छे ढंग से सम्पन हो गए। हिंसा हुई तो बस पश्मिी बंगाल और कुछ केरल में।

पिता : बेटा कई प्रेक्षक विदेशों से भी आये थे। उन्होंने भी हमारी जनता, मतदाता और सरकार की तारीफ की कि चुनाव स्वतंत्र, निर्मल व निष्पक्ष हुए।

बेटा : इसकी प्रशंसा तो विदेशों में भी हुई। इतने बड़े देश में इतना बड़ा चुनाव प्रबंधन तो विदेशों के लिए भी एक बहुत बड़ी चुनावी सफलता थी।

पिता : इसी कारण तो दुनियाभर के लोग हमारी चुनाव शैली की प्रशंसा करते हैं और इसी चुनाव प्रणाली को वह अपने देश में भी लागू करना चाहते हैं।

बेटा : हां पिताजी।

पिता : और हमारे देश के लिए यह बात तो गर्व की भी है।

बेटा : पर पिताजी, विपक्ष के हमारे लोग तो कई प्रकार से चुनाव आयोग की आलोचना करते हैं। उसकी स्वतंत्रता पर उंगली उठाते फिरते हैं।

पिता : बेटा, और बात तो छोड़, हमारा विपक्ष तो किसी भी विषय पर सत्तापक्ष से सहमत नहीं होता, चाहे मुद्दा देशहित का ही क्यों न हो।

बेटा : ऐसी ही एक बात मुझे किसी ने सुनायी थी। कहते है बहुत पहले किसी देश में हमारे विपक्ष की तरह एक व्यक्ति का असूल था कि सरकार कोई भी हो उसे तो उसका विरोध ही करना है चाहे कुछ हो जाये। वहां की सरकार ने आखिर तंग आकर उसे एक किश्ती में डाला और समुद्र में छोड़ दिया।

पिता : फिर क्या हुआ?

बेटा : किश्ती हवा के झोंकों से इधर-उधर तैरती रही। अंतत: किश्ती किसी देश के किनारे पर लग गयी। उसे पता नहीं था कि वह कौनसा देश है? अजनबी को देख कौतूहूलता वश वहां के लोग उसके पास आ गए। उस देश का नाम या कुछ और जानने से पहले उसने लोगों से सीधा सवाल किया: क्या यहां कोई सरकार है? लोगों ने कहा कि है। तब उसने लोगों को तुरंत कहा कि में उसके विरुद्ध हूं।

पिता : बेटा ऐसा ही माहौल हमारे भी है। हमारा विपक्ष समझता है कि यदि वह किसी भी विषय पर सत्तापक्ष को समर्थन दे देगा तो लोग कहेंगे कि विपक्ष सरकार का पिट्टू बन गया है।

बेटा : पर यह कौन सा पालीटिक्स है जो कहता है कि आंखें मीट सरकार का विरोध करो।

पिता : है तो बेटा यह हमारी समझ से बाहर।

बेटा : यह ईवीएम का क्या झगडा है?

पिता : यह भी समझ नहीं आता है, बेटा।

बेटा : पिताजी, आप मेरे को यह बताओ कि यह ईवीएम कब से चुनाव में प्रयोग में लाई गई?

पिता : बेटा, पहले चुनाव में बड़ा घोटाला होता था। असामाजिक तत्व चुनाव बूथों पर ही कब्जा कर लेते थे। कागजी मतपत्रों को छीन लेते थे और स्वयं ही अपने प्रत्याशियों के बक्से में डाल देते थे। बिहार जैसे कई प्रदेशों में यही कुछ होता था।

बेटा : हां, तभी तो जब बिहार आदि में ईवीएम का उपयोग होना शुरू हुआ और हिंसा के बिना ही चुनाव संपन्न होने लगे और इन राज्यों में हिंसा की घटनाएं बंद हो गईं, तो लोग कहते अब तो विश्वास नहीं होता कि चुनाव बिहार जैसे प्रदेशों में हो रहा है।

पिता : तभी तो बेटा, इनके प्रयुक्त होने पर लोगों ने चैन की सांस ली थी।

बेटा : यह मशीनें पूरणरूप से कब प्रयोग में आई?

पिता : बेटा, रिकार्ड के अनुसार इन मशीनों का उपयोग सारे देश में शुरू हुआ 2003 में, सभी प्रदेश विधानसभा चुनावों में और 2004 में सारे देश के लोकसभा चुनाव में।

बेटा : तब कोई विरोध या प्रदर्शन हुआ इसके खिलाफ?

पिता : नहीं। उलटे इसे तो चुनाव प्रबंधन में एक क्रान्ति के रूप में अपनाया गया।

बेटा : 2004 में जब चुनाव हुए तब सरकार किस की थी?

पिता : भाजपानीत एनडीए की जब अटलजी प्रधानमंत्री थे।

बेटा : हारा कौन था और जीता कौन था?

पिता : हारी थी भाजपानीत अटलजी की एनडीए सरकार और जीती कांग्रेसनीत यूपीए।

बेटा : पिताजी, यह बताइए कि चुनाव आयोग पर उचित-अनुचित दबाव डालने में कौन सफल हो सकता है?

पिता : सत्ताधारी दल और कौन?

बेटा : तब में क्या मानूं कि सत्ताधारी एनडीए ने चुनाव आयोग पर दबाव डाला कि वह इस प्रकार काम करे कि उनकी सरकार को हरा दे हालांकि जनता चाहती थी कि सरकार अटलजी की ही पांच वर्ष और रहे?

पिता : क्या बात कर रहा है? कोई प्रधानमंत्री चुनाव आयोग पर दबाव डालेगा कि आयोग हर ठीक-गलत पग उठाये कि उसकी सरकार जनता के समर्थन के बावजूद हार जाये?

बेटा : विपक्ष यही तो कह रहा है। वरन अटलजी की सरकार दोबारा जीत कर न आ जाती?

पिता : यह कैसे हो सकता है?

बेटा : जब पिताजी, विपक्ष यह आरोप लगा रहा है कि सत्ता पक्ष अपने प्रभुत्व का गलत उपयोग कर विपक्ष की सरकारों को हरा रहा है।

पिता : तब तो बेटा यह भी कहा जा सकता है कि दो वर्ष पूर्व अकाली सरकार ने ही मोदी सरकार पर दबाव डाला होगा कि चुनाव आयोग को कहे कि ईवीएम को ऐसे तोड़-मरोड़ दिया जाये ताकि भाजपा-अकाली सरकार हार जाये और कांग्रेस सत्ता में आ जाये।

बेटा : तब तो में समझा कि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का आरोप ठीक है कि मोदी सरकार ने ही चुनाव आयोग पर अनुचित दबाव डाल कर भाजपा की अपनी छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश की सरकारों को हरा दिया। यह सब काम ईवीएम के माध्यम से हुआ।

पिता : तेरा तर्क तो मुझे समझ नहीं आ रहा। तेरे कहने का मतलब तो फिर यह हुआ कि 2014 में जब केंद्र में कांग्रेसनीत डॉ. मनमोहन सिंह जी की यूपीए सरकार थी तो वह इसलिए नहीं हारी कि वह जनादेश खो चुकी थी और मोदीजी की लोकप्रियता इतनी बढ़ गयी थी कि यूपीए सरकार हार गई बल्कि कांग्रेस ने अपनी सत्ता का दुरूपयोग कर चुनाव आयोग पर दबाव डाला कि ईवीएम के माध्यम से यूपीए की सरकार को चलता कर दिया जाये?

बेटा : तो पिताजी, क्या सोनियाजी व राहुलजी डॉ मनमोहन सिंह से नाराज चल रहे थे और उन्होंने मनमोहन सिंहजी को ईवीएम के माध्यम से चलता करवा दिया?

पिता : बेटा, ऐसा तो नहीं लगता कि सोनियाजी व राहुलजी स्वयं ही अपनी सरकार को चलता करवा दें और पार्टी को सत्ता से बाहर करा दें।

बेटा : यहां तक तो में आप से सहमत हूं कि ऐसा नहीं हो सकता कि वह दोनों ऐसा करवा दें। पर उस समय सत्ता में तो कांग्रेसनीत यूपीए सरकार थी और मोदीजी या भाजपा तो विपक्ष में थे। चुनाव आयोग पर तब भाजपा या मोदीजी इस स्थिति में थे नहीं कि वह अनुचित दबाव डालकर ईवीएम के माध्यम से यूपीए सरकार को चलता करवा दें।

पिता : हां, उस समय तो चुनाव आयोग ने बात माननी थी तो डॉ मनमोहन सिंह या सोनिया-राहुलजी की न कि भाजपा या मोदीजी की।

बेटा : पिताजी, आजकल तो विपक्ष यही कहता फिरता है कि हमें मतदाता ने नहीं, ईवीएम ने हराया।

पिता : अभी पिछले ही दिनों वयोवृद्ध नैशनल के सर्वेसर्वा शरद पवार ने तो यह भी कह दिया कि घोटाला ईवीएम ने नहीं, मतगणना में हुया।

बेटा : पर शुक्र की बात तो यह है कि अब ईवीएम के विरुद्ध शोर कुछ कम हो गया है।

पिता : कम और ज्यादा कुछ नहीं बेटा। इसकी याद तो चुनाव के आसपास ही आती है।

बेटा : हां, चुनाव के दिनों में विपक्ष ने बहुत शोर मचाया।  वह उच्चतम न्यायालय तक गए कि ईवीएम में डाले गए वोटों का मिलान वीवीपैट स्लिपों से किया जाये। न्यायालय ने पांच प्रतिशत की अनुमति दी। वह चाहते थे कि कम से कम 50 प्रतिशत का मिलान किया जाये। पर न्यायलय इसपर सहमत न हुआ।

पिता : पर जब चुनाव संपन्न हो गया तो किसी ने इस बारे चिंता नहीं की। चुनाव आयोग ने स्वयं ही घोषणा कर दी कि मिलान के बाद कोई भी गलती नहीं पाई गई।

बेटा : पर पिताजी, जब विपक्ष ने ईवीएम की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाये तो चुनाव आयोग ने सभी दलों को खुली चुनौति दी कि वह उनके सामने ईवीएम में हेराफेरी या छेड़छाड़ कर के दिखाए। आयोग ने एक सप्ताह का समय दिया पर एक भी दल या व्यक्ति पेश नहीं हुआ। क्यों?

पिता : इससे तो स्पष्ट हो गया कि ईवीएम के विरुद्ध सारा शोर पालिटिक्स है और कुछ नहीं।

बेटा : पिताजी, एक अजीब बात और भी है। ईवीएम के विरुद्ध सिर्फ राजनेता ही बोलते हैं, वह कभी नहीं बोले जिन्होंने अपने मताधिकार का प्रयोग किया है।

पिता : बिलकुल ठीक। वास्तव में शोर तो मतदाता को डालना चाहिए कि वोट तो उन्होंने किसी अन्य पार्टी या उम्मीदवार को दिया था और जीता कोई अन्य है।

बेटा : यह निकाली तूने पते की बात।

पिता : बेटा, यह पालिटिकस है ही अजीब चीज। हर प्रत्याशी या पार्टी समझती है कि  जीतेंगे तो वह और कोई नहीं। हर प्रत्याशी जोरदार दावा करता है कि में तो अपने प्रतिद्वंदी की जमानत जब्त करवा दूंगा। जब चुनाव परिणाम निकलता है तो जमानत उसकी अपनी ही जब्त हो गई होती है।

बेटा : पिताजी, कई यह काम भी करते हैं। जो प्रत्याशी जीत जाता है, वह धौंस जमाता है कि उसकी जीत में तो कभी कोई संशय था ही नहीं। कईयों के नाम गिना देगा कि चुनाव में उन्होंने उसके विरुद्ध काम किया, पैसे बांटे, शराब पिलाई और अनगिनित हथकंडे अपनाये। पर जनता मेरे साथ थी, इसलिए उनके सब षडय़ंत्र फैल हो गए।

पिता : इसका दूसरा पहलू भी है। जब कोई हार जाता है तो वह यह कभी नहीं मानता कि मुझमें कुछ कमी रह गयी थी। उलटे वह डींग मारेगा कि में तो जीता हुआ था जी, पर अमुक व्यक्ति, अमुक महिला, अमुक सरकारी अफसर ने, अमुक नेता आदि ने मेरे खिलाफ बहुत काम किया। रुपये पानी की तरह बहाए। सब ठीक-गलत किया। इस कारण में हार गया वरन मेरे को तो कोई हरा नहीं सकता था।

 

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