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जेतलीजी महान, उनकी यादें भी महान

जेतलीजी महान, उनकी यादें भी महान

अरुण जेतली एक महान विचारक, अतुल्य वक्ता, श्रेष्ठतम कानून विशेषज्ञ और राजनीतिज्ञ थे। वह अनेक अन्य विधाओं के भी ज्ञातक थे। उनके जाने से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को ही नहीं सारे देश और राजनीति को महान क्षति हुई है जिसकी भरपाई एक लम्बे समय तक होने की संभावना नहीं लगती। उनके चले जाने के बाद उनके समर्थक भी उतने ही दुखी हैं जितने कि उनके राजनीतिक विरोधी।

मैं 14 वर्ष पूर्व भाजपा के प्रमुख पाक्षिक बीजेपी टुडे (जो बाद में कमल सन्देश में परिवर्तित हो गया) के अंग्रेजी संस्करण को देखने के लिए आया था। उस समय मुझे कुछ लोगों ने सचेत किया कि जेतली में बड़ा अहंकार है। वह तो न किसी को पहचानते हैं और न ही किसी की नमस्ते तक का उत्तर ही देते हैं। मैं अपनी पत्रिका के लिए तब तक उनके एक-दो साक्षात्कार ले चुका था। मुझे तो तब कोई ऐसी बात नजर नहीं आयी।

गुजरात विधानसभा चुनाव की घोषणा हो चुकी थी। जेतलीजी भाजपा की ओर से वहां के चुनाव प्रभारी थे। मुझे उनसे एक साक्षात्कार लेना था कि वहां की चुनावी परिस्थिति क्या है।

दुर्भाग्यवश उन्ही दिनों भाजपा के वयोवृद्ध नेता जेपी माथुर जी का निधन हो गया। जेतलीजी अन्य नेताओं के साथ पार्टी के तत्कालीन मुख्य कार्यालय 11, अशोक रोड  में माथुरजी के अंतिम दर्शन करने के बाद अपने कार्यालय 9, अशोक रोड पैदल ही वापस जा रहे थे। माथुरजी की अंतिम यात्रा व अंतिम संस्कार के लिए जाने में अभी देरी थी। मैं भी उन सब के साथ जा रहा था। इसी गलतफहमी से ग्रस्त कि वह किसी को पहचानते ही नहीं, मैंने उन्हें नमस्कार किया और अपना नाम बताया। इस पर वह बोले, ‘आप अपना नाम क्यों बता रहे हो। मैं तुम्हें जानता-पहचानता हूं’। लोगों के कहने पर जो मैंने किया उस पर मुझे अपने आप पर ग्लानी आयी।

मैंने फिर आगे कहा, ‘आज तो ऐसा मौका नहीं है पर बाद में मुझे गुजरात में चुनाव प्रचार जो चल रहा है, उस पर आपसे कमल सन्देश के लिए एक साक्षात्कार लेना है’। वह बोले, ‘कल-परसों फोन पर समय लेकर आ जाना’।

दूसरों के कहने पर ऐसा व्यवहार करने पर मुझे बड़ी झेंप महसूस हुई। उसके बाद भी मैंने उनसे कई मौकों पर साक्षात्कार लिया। मैंने उन्हें एक बड़ा सहज व्यक्तित्व पाया। वह तो सब कार्यकर्ताओं की परवाह करते थे और उन्हें आगे बढऩे के लिए प्रेरित करते थे।

एक बार और मुझे उनसे साक्षात्कार लेने की जरूरत पड़ी। तब गुजरात  विधानसभा के चुनाव होने वाले थे। इस बार जेतलीजी वहां के प्रभारी थे। मैंने उनसे समय मांगा तो उन्होंने मुझे अगले दिन 3 बजे आने के लिए कहा।

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दूसरे दिन जब मैं उनके कार्यालय की ओर जा ही रहा था तो मैंने उनको अपने कार्यालय से बहार आते देखा। मुझे आता देखकर बोले, ‘मुझे खेद है कि मुझे किसी बड़े नेता से बुलावा आ गया है। इसलिए मैं वहां जा रहा हूं’।

मैंने कहा कोई बात नहीं, मैं कल आ जाऊंगा।

मैं भी उनके पीछे उनको गाड़ी तक छोडऩे चला गया। गाड़ी में बैठते हुए बोले, ‘साक्षात्कार गाड़ी में नहीं हो सकता?

मैंने कहा, ‘बिल्कुल हो सकता है’। तो बोले, ‘बैठो गाड़ी मे’।

उन्होंने मुझे अपने साथ बिठा लिया। इंटरव्यू गाड़ी में हो शुरू हो गया। 10-12 प्रश्नों के उत्तर देने में उन्हें 20-25 मिनट ही लगे। इसी बीच उन्होंने गुजरात में किसी रैली के बारे भी फोन पर सूचना ले ली। जहां उन्होंने जाना था वह अभी तक वहां भी नहीं पहुंचे थे। फिर पूछने लगे कि मैं वापस कैसे जाऊंगा। मैंने कहा, कोई बात नहीं मैं प्रबंध कर लूंगा। वह कहने लगे कि देख लो मुझे तो यहां कुछ समय लगेगा। तुम मेरी गाड़ी ले जाओ। मैंने कहा, ‘आप जाइए मैं प्रबंध कर लूंगा’।

सात-आठ साल पहले की बात है, उस समय पंजाब विधानसभा के चुनाव होने वाले थे। इस बार फिर वह पंजाब के प्रभारी थे। मैं उनके कार्यालय में साक्षात्कार के लिए प्रतीक्षा में बैठा था। तभी उनके सहयोगी ओ. पी. शर्मा (वर्तमान में दिल्ली विधानसभा सदस्य) आये और उन्होंने कहा कि पंजाब से आये कुछ पार्टी नेता व कार्यकर्ता उनसे मिलने के लिए बड़ी देर से प्रतीक्षा में बैठे हैं। तब उनको गुस्सा आ गया। उनका चेहरा लाल हो गया। कहने लगे कि यह मुझसे पांच-पांच, छ:-छ: बार मिल चुके हैं। अब मैं उनसे नहीं मिलूंगा। उन्हें मेरे स्वास्थय की भी चिंता नहीं है।

 

एक अच्छे सहयोगी की तरह शर्माजी ने कहा, ‘जनाब, आप इनको मिनट-दो मिनट के लिए मिल लीजिए। वह खुश होकर लौट जायेंगे कि उन्होंने आपको मिल लिया। तब वह मान गए और कहा एक-एक कर के भेजो।

जब शर्माजी पंजाब से आये लोगों को बुलाने गए, तब मैंने कहा, ‘जनाब, आपका स्वास्थय कुछ ठीक नहीं लगता। इसलिए मैं चलता हूं और कल-परसों फिर आ जाऊंगा’।

तब जेतलीजी बोले, ‘नहीं, तुम तो बैठो। इन लोगों के जाने के बाद मैं आपके साथ बैठ जाऊंगा। कोई बात नहीं। मैं इन लोगों को दस मिनट में निपटा दूंगा।’

जेतलीजी ने 50-60 आदमियों को 10-15 मिनटों में ही निपटा दिया। ज्योंही एक व्यक्ति आता, जेतलीजी उसको पहचानते ही कह देते, ‘तुम्हारा नाम विचाराधीन है…तुम्हारा तो वहां के लोग बहुत विरोध कर रहे हैं। फिर

भी मैं देखूंगा… तुम्हें टिकट मिल जाएगा… वगैरा- वगैरा।’

उसके बाद उन्होंने अपने प्रश्न शुरू करने को कहा। अपने उत्तर में वह बहुत सहज रहे व शांत। 15 मिनटों में ही मेरे सारे प्रश्नों का उत्तर दे दिया। मैंने धन्यवाद किया और लौट गया।

2012 के हिमाचल विधानसभा चुनाव के समय वह शिमला आये थे। तब मैं वहीं था। मेरे नमस्कार करने पर बोले, ‘तुम भी आये हो?’ मैंने कहा, ‘हां जी’। और आगे बताया कि मैं हिमाचल से ही हूं।


 

जेतली का सफरनामा


 

अरुण जेतली का जन्म दिल्ली में हुआ। 1973 में श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स, दिल्ली, से कॉमर्स में स्नातक करने के पश्चात् उन्होंने 1977 में दिल्ली विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री प्राप्त की। 1974 में वे दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र संगठन के अध्यक्ष भी रहे।

अरूण जेतली 1991 से भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य थे। वह 1999 के आम चुनाव से पहले की अवधि के दौरान भाजपा के प्रवक्ता बन गए। 1999 में, भाजपा की वाजपेयी सरकार के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सत्ता में आने के बाद, उन्हें 13 अक्टूबर 1999 को सूचना और प्रसारण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) नियुक्त किया गया। उन्हें विनिवेश राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) भी नियुक्त किया गया। विश्व व्यापार संगठन के शासन के तहत विनिवेश की नीति को प्रभावी करने के लिए पहली बार एक नया मंत्रालय बनाया गया। राम जेठमलानी के इस्तीफे के बाद उन्होंने 23 जुलाई 2000 को कानून, न्याय और कंपनी मामलों के मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार संभाला।

नवम्बर 2000 में एक कैबिनेट मंत्री के रूप में उनको पदोन्नत किया गया था और एक साथ कानून, न्याय और कंपनी मामलों और जहाजरानी मंत्री बनाया गया। भूतल परिवहन मंत्रालय के विभाजन के बाद वह नौवहन मंत्री थे। 29 जनवरी 2003 को उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल को वाणिज्य और उद्योग और कानून और न्याय मंत्री के रूप में फिर से नियुक्त किया।

3 जून 2009 को उन्हें भाजपा के वरिष्ठ नेता एल. के. आडवाणी द्वारा राज्यसभा में विपक्ष के नेता के रूप में चुना गया। 16 जून 2009 को उन्होंने अपनी पार्टी के वन मैन वन पोस्ट सिद्धांत के अनुसार भाजपा के महासचिव के पद से इस्तीफा दे दिया। वह पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति के सदस्य भी थे।  राज्यसभा में विपक्ष के नेता के रूप में, उन्होंने राज्यसभा में महिला आरक्षण विधेयक पर हुई बहस के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और जन लोकपाल

विधेयक के लिए अन्ना हजारे का समर्थन किया। 2014 के आम चुनाव में वह अमृतसर सीट भाजपा के उम्मीदवार थे, लेकिन उसमें उनको विजय प्राप्त नहीं हुई। वह गुजरात से राज्यसभा सदस्य बनाये गए। उन्हें मार्च 2018 में उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए फिर से चुना गया।

मोदी सरकार के कार्यकाल में  26 मई 2014 को, जेतली को वित्त मंत्री के रूप में चुना गया, (जिसमें उनके मंत्रिमंडल में कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय और रक्षा  मंत्रालय भी शामिल था।

 


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मेरी आदत है कि मैं बिना काम के नेताओं को नहीं मिलता। केवल नमस्कार करने के लिए नेताओं का समय बर्बाद करना मैं ठीक नहीं समझता। यही बात जेतलीजी के साथ भी रही। उन्हें मैं या तो साक्षात्कार के लिये मिला या किसी समारोह में।

जेतलीजी राज्यसभा में विपक्ष के नेता थे। राज्यसभा सांसद श्री प्रभात झा हमारे साहित्य व प्रकाशन प्रकोष्ठ के प्रभारी भी थे। एक दिन जब प्रभातजी उनको मिलने गए तो जेतलीजी ने उनसे मेरे बारे पूछा। यह उनकी महानता थी जो उन्होंने मुझ जैसे एक छोटे व्यक्ति की चिंता की। झाजी ने उन्हें बताया कि मैं प्रकाशन प्रकोष्ठ व कमल संदेश में ही हूं।

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प्रभातजी ने मुझे बताया कि जेतलीजी तुझे याद कर रहे थे। मैं जेतलीजी की इस महानता पर गदगद हो गया। झाजी ने कहा कि मैं कभी उनको मिल लूं। मैंने कहा कि मैं अवश्य मिलूंगा। पर मुझे तो उनके साथ कोई राजनीति पर चर्चा करनी नहीं है, इसलिए मैं उनसे साक्षात्कार कर लेता हूं। इस प्रकार उनसे मिलना भी हो जायेगा।

जब मैंने जेतलीजी से समय मांगा तो उन्होंने तुरंत दे दिया। मैं इस साक्षात्कार के लिए अपने तीन सहयोगियों को भी साथ ले गया। जब मैंने कहा कि मेरे साथ कुछ और सहयोगी भी आपके दर्शन करने आये हैं तो उन्होंने सबको भी अंदर बुला लिया। जेतलीजी ने सब से उनका काम, उनके परिवार के बारे पूछा। उनसे यह पूछा कि उन्हें कोई समस्या तो नहीं है। उनसे मिलकर मेरे सहयोगी भी पफुल्लित हो उठे। अपने सहयोगी को बुलाकर कहा कि इनको बढिय़ा सी चाय पिलाकर ही जाने देना। उनकी इस सरलता और महानता से हम सब प्रफुल्लित हो उठे। हमारे आग्रह पर जेतलीजी ने हम सब के साथ फोटो भी खिंचवाया।

उनके वित्तमंत्री बनने के बाद मेरी मुलाकात उनसे केवल कुछ समारोहों में ही हो सकी।

जेतलीजी बहु-प्रतिभा के मालिक थे। वह पते की बात ही करते थे। उनके पास फिजूल की गपशप के लिए समय न था। वह संक्षिप्त में बोलकर भी अपनी बात का दूसरों पर प्रभाव छोड़ जाते थे। अपने विचार में वह स्पष्ट थे। मीडिया के प्रश्नों पर वह सटीक और स्पष्ट उत्तर देते थे। अपने मीडिया के साथ बात करने या प्रश्नों के उत्तर में सदा संक्षिप्त व सटीक थे। उन्होंने कभी नहीं कहा कि मैंने जो बोला है उसके किसी शब्द या लाइन को काट दो या बदल। उन्होंने जो कह दिया वह कह दिया।

अपनी प्रेस वार्ता के बाद वह स्टेज से नीचे उतर आते थे और एक कुर्सी पर बैठ जाते थे। पत्रकार तब उनको घेर कर बैठ जाते थे। तब वह खुलकर उनसे अनौपचारिक बातें करते थे।

जेतलीजी तो राजनीती के एक अमूल्य नग थे। बह बहुत बड़े कानून विशेषज्ञ थे। राजनीति के साथ उनका खेल और क्रिकेट से बड़ा लगाव था। मीडिया के तो बड़े चहेते थे। उनकी मृत्यु से आई रिक्कता का भर पाना सहज नहीं है। मीडिया, राजनीति उन्हें हर समय याद करती रहेगी और उनकी अनुपस्थिति सबको चुभती रहेगी। उन्हें शत-शत नमन!

 

अम्बा चरण वशिष्ठ

 

 

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