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झारखण्ड में सोरेन को ताज भाजपा आदिवासी उपेक्षा के कारण हारी

झारखण्ड में सोरेन को ताज  भाजपा आदिवासी उपेक्षा के कारण हारी

झारखण्ड का जनादेश न सिर्फ स्थानीय मुद्दों की उपेक्षा को लेकर जमीनी स्तर पर व्याप्त गहरे असंतोष की अभिव्यक्ति है बल्कि आदिवासी उपेक्षा की निर्णायक कहानी है। चुनाव में आदिवासी जनजीवन से जुड़े एवं कतिमय बड़े मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए थी। लेकिन भाजपा ने एक बड़ी भूल करते हुए आदिवासी एवं स्थानीय मुद्दों को नजरअंदाज किया। इस चुनाव में आदिवासी जनता की समस्याओं, मसलन, जल, जंगल, जमीन, गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, बिजली आदि पर कोई बात नहीं की गई। आदिवासी समस्याएं झारखण्ड चुनाव में भाजपा का सबसे बड़ा मुद्दा होना चाहिए, लेकिन ऐसा न होना भी इन चुनावों की सबसे बड़ी विडम्बना बनी और यही भाजपा की हार का बड़ा कारण भी बनी है।

भाजपा ने अपनी चुनावी रणनीति के अनुरूप अन्य राज्यों की तरह यहां भी केंद्र सरकार के प्रमुख फैसलों पर वोट मांगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने अपनी चुनाव रैलियों में राममंदिर, अनुच्छेद 370, तीन तलाक कानून, एनआरसी और नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) पर तो व्यापक चर्चा की, लेकिन आदिवासी दिलों को छूने की कोई सार्थक एवं सफल पहल नहीं की। हिंदुत्व की लहर चलाने के लिए यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ को चुनाव प्रचार में उतारा गया। एनआरसी-सीएए विरोधी आंदोलन पर मोदी ने इस टिप्पणी से सांप्रदायिक ध्रवीकरण करने की कोशिश की कि विरोध करने वालों को उनके कपड़ों से पहचाना जा सकता है। लेकिन यह दांव भी नहीं चला, क्योंकि आदिवासी अपनी ही समस्याओं में आकंठ डूबे हैं।

झारखण्ड एक आदिवासी बहुल राज्य होने के बावजूद जिस तरह आदिवासी मुख्यमन्त्री से वंचित रहा उसका खामियाजा भी भाजपा को भुगतना पड़ा है। इसके साथ ही आदिवासियों के भूमि विशेषकर जंगल-जमीन और जल के अधिकार को हल्का करने के लिए रघुवर सरकार ने जो भूमि अधिग्रहण कानून बनाया उसने भी आदिवासियों में रोष का संचार करने में विशेष भूमिका निभाई। भाजपा ने इन महत्वपूर्ण आदिवासी मुद्दों पर तवज्जो न देकर राजनीतिक अपरिपक्कता का ही परिचय दिया है। आदिवासी जनता की समस्याओं पर कोई ठोस वादा भाजपा की तरफ से नहीं सामने आया। जबकि झारखण्ड के राजनीतिक मस्तक पर ये ही आदिवासी तिलक करते रहे हैं। क्या यह भाजपा की सोची-समझी रणनीति रही या आदिवासी समाज की उपेक्षा? इस बार झारखण्ड के इन चुनावों में आदिवासी लोगों के प्रति उदासीनता के कारण भी ये चुनाव परिणाम भाजपा के लिये लोहे के चने चबाने जैसे साबित हुए हैं।

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झारखण्ड में आदिवासी ही राजनीतिक सत्ता के लिये निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। यही कारण है कि उन्होंने वोट करते समय रघुबर दास सरकार के कामकाज के अलावा केंद्र के मुद्दों को भी नकारा। झारखण्ड के आदिवासियों में रघुबर सरकार की नीतियों को लेकर गुस्सा था। उनकी हजारों एकड़ जमीन एक पूंजीपति घराने को पावर प्लांट लगाने के लिए दी गई और उनके विरोध को कुचल दिया गया। काश्तकारी कानून में बदलाव को भी पसंद नहीं किया गया। सरकारी नौकरियों में स्थानीय लोगों की बहाली का मुद्दा बार-बार उठता रहा। झारखण्ड में 26.3 प्रतिशत आबादी आदिवासियों की है और 28 सीटें उनके लिए आरक्षित हैं। विपक्ष ने जेएमएम के आदिवासी नेता हेमंत सोरेन को सीएम पद का उम्मीदवार बनाया, जबकि बीजेपी ने लगातार दूसरी बार गैर-आदिवासी रघुबर दास को ही इस पद के लायक समझा। चुनाव में इसका सीधा असर देखने को मिला। यही कारण है कि मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के बाद पांचवां राज्य बीजेपी के हाथ से निकल गया। वक्त आ गया है कि पार्टी जनता की भावनाओं एवं जरूरतों को समझे और इस अति आत्मविश्वास से बाहर निकले कि उसकी हर नीति पर पूरे देश में आम सहमति है।

झारखण्ड ‘धनवान’ जमीन के ‘निर्धन’ लोगों का राज्य है। इस राज्य की खनिज प्रचुरता का लाभ यदि यहीं के लोगों को नहीं मिल पा रहा है तो इसके पृथक राज्य बनने का कोई औचित्य नहीं रह जाता है। बिहार से अलग करके इस राज्य का निर्माण लम्बी लड़ाई के बाद हुआ था। पृथक झारखण्ड की लड़ाई आजादी की लड़ाई के जमाने से ही चली आ रही थी और मूलत: ‘झारखण्ड पार्टी’ यह झंडा उठाये हुए थी। कालान्तर में झारखण्ड मुक्ति मोर्चा पार्टी के गठन से इस मांग का आन्दोलन उग्र होता रहा। वस्तुत: भाजपा ने ही अपने अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में इस राज्य का निर्माण किया था परन्तु पार्टी आदिवासी जनता में अपनी वह पैठ बनाने मे सफल नहीं हो सकी जिसकी अपेक्षा की जाती थी। हालांकि भाजपा ने आदिवासी कल्याण एवं उत्थान की अनेक योजनाओं को लागू किया है। बावजूद इसके झारखण्ड में अभी भी आदिवासी दोयम दर्जे के नागरिक जैसा जीवनयापन कर रहे हैं। जबकि केंद्र सरकार आदिवासियों के नाम पर हर साल हजारों करोड़ रुपए का प्रावधान बजट में करती है। इसके बाद भी 7 दशक में उनकी आर्थिक स्थिति, जीवन स्तर में कोई बदलाव नहीं आया है। स्वास्थ्य सुविधाएँ, पीने का साफ पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं आदि मूलभूत सुविधाओं के लिए वे आज भी तरस रहे हैं। आखिर चुनाव का समय इन स्थितियों में बदलाव का निर्णायक दौर होता है, लेकिन इनकी उपेक्षा चुनाव की पृष्ठभूमि को ही धुंधलाती रही है।

आदिवासी बनाम गैर आदिवासी का मुद्दा भी रह-रहकर इस चुनाव में सामने आ रहा था। यह भी सच है कि गठबंधन के इस दौर में भाजपा लगभग अकेले चुनाव लड़ रही थी और विरोधी लगभग एकजुट थे। भाजपा के भीतर का असंतोष और बगावत भी बहुत स्पष्ट थी। यह भी कहा गया कि भाजपा को राज्य स्तरीय राजनीति से ज्यादा अपने राष्ट्रीय नेतृत्व के चमत्कारी स्वरूप पर भरोसा है। यानी राज्य स्तर पर ऐसे बहुत से कारण एवं परिस्थितियां बनी, जिससे मतदाता इधर या उधर वोट देने का मन बना पाएं, और शायद अंतिम नतीजों में राज्य के इन्हीं मुद्दों ने अपनी भूमिका निभाई।

भाजपा की हार के असल कारणों की तलाश करें तो यही सार निकलेगा कि भाजपा स्वयं से हारी है, उसकी चुनावी रणनीति असफल रही एवं उसका अहंकार भी बड़ा कारण बना है। स्थानीय मुद्दों एवं नेताओं की उपेक्षा भी बड़े कारण हैं। वह एक अलग दौर था जब प्रधानमंत्री मोदी ने 2014 से राज्यों के मुख्यमंत्रियों के रूप में लीक से हटकर प्रयोग किए। इसी कड़ी में महाराष्ट्र में गैर-मराठा देवेंद्र फडऩवीस, हरियाणा में गैर-जाट मनोहरलाल और झारखण्ड में गैर-आदिवासी रघुवर दास को मुख्यमंत्री बनाया। पुन: इसी प्रयोग को दोहराने के कारण पार्टी को भारी कीमत चुकानी पड़ी है। भाजपा को अपनी पराजय से सबसे बड़ा सबक यह सीखना होगा कि वह केवल प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता के बूते पर अपनी क्षेत्रगत कमियों पर पर्दा नहीं डाल सकती है। साथ ही यह भी समझना होगा कि इस देश के किसी भी राज्य का गरीब या अनपढ़ मतदाता राजनीतिक रूप से बहुत चतुर एवं सावधान होता है। राष्ट्रीय मुद्दों और राज्यों के मुद्दों में भेद करना उसे आता है, विशेषकर आर्थिक व सामाजिक विषयों की उसे जानकारी रहती है अत: राष्ट्रहित में वह अपनी वरीयता बदलने में भी किसी प्रकार का संकोच नहीं करता है। लोकतन्त्र का पहला प्रहरी यही मतदाता होता है जो वक्त के अनुसार अपनी रणनीति बिना किसी राजनीतिक बहकावे में आये तय करता है। मतदाता के मन को समझना ही राजनीतिक कौशल है, इस कौशल में भाजपा चूक करती जा रही है।

 

ललित गर्ग

 

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