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डॉक्टरों की सुरक्षा सुनिश्चित हो

डॉक्टरों की सुरक्षा सुनिश्चित हो

पश्चिम बंगाल में मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में डॉक्टरों द्वारा सात दिनों तक हड़ताल की गई, जो धीरे-धीरे पूरे भारत में फैल गई, जिससे लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं में  बाधाओं का सामना करना पड़ा। यह बड़े दुख की बात है कि लोग यह नहीं समझ पाए कि एक डॉक्टर केवल आपरेशन ही कर सकता है। वह मरीज के ठीक होने की पूर्ण जिम्मेदारी नहीं ले सकता। फिर, ऐसा कौन सा डॅाक्टर है, जो यह चाहेगा कि उसके द्वारा ईलाज किये जा रहे मरीज की मृत्यु हों? इस पृष्ठभूमि में यह कितने हद तक सही है कि एक डॉक्टर को पीटा जाए, सिर्फ इसलिए कि एक मरीज बच नहीं पाया? यहां यह बताना महत्वपूर्ण है कि ममता बनर्जी हड़ताल पर चल रहे डॉक्टरों की बातों को मानने के लिए एक हफ्ते बाद राजी हुई। ममता बनर्जी को ऐसा लगता था कि इन सब के पीछे उनके विरोधी दलों का हाथ था और इसलिए वह लगातार डॉक्टरों की मूल मांगों को दरकिनार करते हुए उन्हें भला-बुरा बोल रहीं थी एवं धमकियां दे रही थी। जबकि उन्हें डॉक्टरों की मांगों को पहले सुनना चाहिये था। यहां यह बताना महत्वूर्ण है कि जब से भाजपा ने ममता बनर्जी के गढ़ में सेंध लगायी है, तब से वह हर किसी मामले में भाजपा का ही हाथ होने का संदेह करती हैं। वह एक मुख्यमंत्री के रूप में अपना कर्तव्य निभाने में असफल रहीं। सबसे ज्यादा गंभीर बात तो यह है कि लेफ्ट की ओर झुकाव रखने वाले तथाकथित बुद्धिजिवी जो ममता बनर्जी के शासन पर नकेल कसने का प्रयास करते रहे है, वे इस बार बिल्कुल ही चुप थे। बंगाल में डॉक्टरों की हड़ताल का भगवा, भगवान राम, राजनीति या बंगाली संस्कृति या गर्व से कोई लेना-देना नहीं था। इन सबका लेना-देना था ममता बनर्जी का एक मुख्यमंत्री के रूप में तथा उनके प्रशासन का असफल होने से। वह बंगाल में लेफ्ट के खिलाफ लड़कर शासन में आयीं और इसके लिए उन्हें लोगों से प्रशंसा भी मिली। और अब वह सोचती हैं कि वह राईटिस्ट के खिलाफ लड़ती है। लेकिन ऐसा कर वह अपने स्वयं के जाल में फंस रही है। सच्चाई तो यह है कि राज्य सरकार ने स्वास्थ्य सेवा को मार्केट पर ही छोड़ दिया है। अगली बात यह है कि स्वास्थ्य सेवा से जुड़े व्यपारियों ने मीडिया की सहायता से लोगों में यह बात फैला रखी है कि चाहे लागत कितना भी हों लोगों का ईलाज संभव है। स्वास्थ्य नीति भी बड़े कॉर्पारेट हाऊसेस के हिसाब से बनाई गई। इसलिए पढ़ाई पूरा कर डॉक्टरों को भी इन कारपोरेट हाऊसेस पर निर्भर होना पड़ता है। इसलिए प्रश्न यह है कि इस क्षेत्र में सुधार कौन लायेगा?

अस्पताल में काम करने वाले लोगों की सुरक्षा इन दिनों बिल्कुल ही महत्वपूर्ण है और इसका कारण खराब कानून व्यवस्था का होना है। फिर भी, डॉक्टर रोगी के स्वास्थ्य में सुधार के लिए यह एकमात्र कारक नहीं है। रोगियों और उनके रिस्तेदारों को भी यह बताया जाना चाहिए कि किस तरह अस्पताल और उसमें काम करने वाले डॉक्टरों की भी एक सीमा होती है और उस सीमा के बाहर कभी कोई  स्थिती पैदा होती है तो मरीज के रिश्तेदारों को कैसे व्यवहार करना चाहिए। चूंकि डाक्टरों के उपर भी तनाव होता है, फिर भी यदि वे कोई भेदभाव करते है तो उसे भी माफ नहीं किया जा सकता है। हमें पश्चिमी देशों की तरह स्वास्थ्य के क्षेत्र में अच्छे कानून बनाने होंगे। हालांकि लोगों का व्यवहार भी इन सभी के लिए जिम्मेदार है, हांलाकि डाक्टर भी कई जगह अपनी मनमानी करते हैं। कभी-कभी कुछ पूछने पर तो डॉक्टरों का जबाब यह होता है कि डॉक्टर आप नहीं, बल्कि हम हैं। यहां यह कहना महत्वपूर्ण है कि डॉक्टरों द्वारा की गई हड़ताल नाजायज नहीं थी। अस्पतालों में प्रशासन का हाल बदहाल है। यह पहली बार नहीं है कि किसी डॉक्टर को पीटा गया। हर वर्ष ऐसे 5-10 मामले देखने को मिलते हैं। ममता बनर्जी और हड़ताल पर चल रहे डॉक्टरों के बीच समझौतें के बाद भी डाक्टरों के साथ दिल्ली के बवाना और महाराष्ट्र के ठाणे में दुव्र्यवहार की घटनाएं सामने आई।  हमेशा से यह ड्रामा किया जाता है कि डॉक्टरों से दुव्र्यवहार करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता। नेताओं की सुरक्षा के लिए जेड कैटेगरी की सुविधा मिलती है, लेकिन डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए कोई योजना नहीं हैं। ये कैसा लोकतंत्र है? एक अच्छे कार्य के माहौल के लिए सुरक्षा अति-आवश्यक होती है। इसलिए इस मामले पर ध्यान दिया जाना चाहिये। डाक्टरों को प्रर्याप्त सुरक्षा दी जानी चाहिये, ताकि वे अपना कार्य निर्भीक होकर कर सकें।

Deepak Kumar Rath

  दीपक कुमार रथ

(editor@udayindia.in)

 

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