डॉ. साध्वी विश्वेश्वरीदेवीजी : भारतीय संस्कृति और हिन्दू संस्कारों की संवाहक

डॉ. साध्वी विश्वेश्वरीदेवीजी : भारतीय संस्कृति और हिन्दू संस्कारों की संवाहक

पूज्य साध्वी डॉ. विश्वेश्वरीदेवीजी का जन्म 13 दिसंबर, नवमी तिथि के दिन डबरा-ग्वालियर (मध्य प्रदेश) में एक सद्ब्राह्मण परिवार में पिता पंडित श्री हरिशंकर मिश्रा एवं माता श्रीमती नीलम मिश्रा के घर हुआ। माता-पिता ने पूर्ण सनातनी संस्कारों और वात्सल्यमयी भावना से आपका लालन-पालन किया। खिलौनों से खेलने की अवस्था में पूज्या देवीजी का अधिकांश समय घर के ही छोटे से मंदिर में भगवान के श्री विग्रह के दर्शन करने एवं उन्हीं के साथ खेलने में व्यतीत होता था। बचपन से ही एकांत में मौन रहकर अधिकांश समय आध्यात्मिक चिंतन-मनन में व्यतीत किया। आपके कोमल मन पर नानी मां से सुनी महापुरूषों की कहानियां एवं मानस की चौपाइयों का व्यापक प्रभाव स्थापित हुआ। घर में मनाये जाने वाले तीज त्यौहार के दिन होने वाली विशेष पूजा पाठ एवं भजन-कीर्तन में आप अत्यंत उत्साह एवं आनंद की अनुभूति करती थी। गांव में विद्यालय न होने के कारण प्राथमिक शिक्षा के लिए आपको दूसरे गांव जाना पड़ता था, विद्यालय आते-जाते समय रास्ते में पडऩे वाले मंदिरों में दर्शन एवं सेवा करना आपके स्वभाव का अभिन्न अंग था। आदिशक्ति मां पीताम्बरा माई की असीम कृपा एवं स्वप्न में दिये दर्शन से आप बाल्यकाल से ही श्रीराम की उपासक हैं। आपकी गहन भक्ति एवं आध्यात्मिकता, विश्व समभाव भावना से प्रभावित होकर परम पूज्य जगतगुरू रामानंदाचार्य श्री हर्याचार्यजी ने आपको विश्वेश्वरीदेवी के नाम से अलंकृत किया। त्रिदंडी स्वामी परम पूज्य जगतगुरू रामानंदाचार्य श्री देवनारायणाचार्य (वृन्दावन धाम) द्वारा आपने मन्त्र की दीक्षा प्राप्त की एवं जगतगुरू रामानंदाचार्य श्री रामभद्राचार्यजी तथा डॉ. रविशंकरजी दीक्षित द्वारा आपने ‘वाल्मीकीय रामायण में श्री सीताजी का जीवन दर्शन’ विषय पर जीवाजी यूनिवर्सिटी ग्वालियर से शोध की उपाधि प्राप्त की। व्यक्ति की कुछ विशिष्टताएं नैसर्गिक या जन्मजात होती हैं, तो कुछ अभ्यास साध्य होती हैं, अर्जित होती हैं। आपकी नेतृत्व एवं आध्यात्मिक क्षमताएं कितनी नैसर्गिक हैं और कितनी अर्जित, कहना कठिन है। पर यह निश्चित है कि आपके पास विविध विषयों का ज्ञान भंडार है।

पूज्य साध्वी डॉ. विश्वेश्वरीदेवीजी की पावन पुनीत मां गंगा के प्रति अगाध आस्था आपको ऋषिभूमि हरिद्वार तक लेकर आई। सन् 1999 में आपको मां गंगा की गोद में बैठकर अनुपम वात्सल्यानंद एवं शांति की अनुभूति हुई और आपके मानस में ‘श्रीराम कृपाधाम आश्रम’ का संकल्प जागा। जिसके परिणामस्वरूप सन् 2004 में आपने श्रीराम कृपाधाम ट्रस्ट की स्थापना की एवं उसके अंतर्गत आश्रम की नींव रखीं। समयानुसार आश्रम ने अपना वर्तमान स्वरूप प्राप्त किया। सन् 2010 के हरिद्वार महाकुंभ में आश्रम परिसर में ही श्रीराम दरबार एवं श्री राधाकृष्णजी के मंदिरों की स्थापना एवं प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव का आयोजन किया गया।

साध्वी डॉ. विश्वेश्वरीदेवीजी परम्परागत कथावाचक नहीं हैं, क्योंकि कथा उनका साध्य नहीं, साधन है। उनका उद्देश्य है भारतीय जीवन पद्धति की समग्र खोज अर्थात भारतीय मानस का साक्षात्कार। उन्होंने अपने विवेक प्रदीप्त मस्तिष्क से, विशाल परिकल्पना से श्रीमद् भागवत कथा, श्री रामचरितमानस के अन्तर्रहस्यों का उद्घाटन किया है। आपने जो अभूतपूर्व एवं अनूठी दिव्य दृष्टि प्रदान की है, जो भक्ति-ज्ञान का विश्लेषण तथा समन्वय, शब्द ब्रह्म के माध्यम से विश्व के सम्मुख रखा है, उस प्रकाश स्तम्भ के दिग्दर्शन में आज सारे इष्ट मार्ग आलोकित हो रहे हैं। आपके अनुपम शास्त्रीय पाण्डित्य द्वारा न केवल आस्तिकों का ही ज्ञानवर्धन होता है अपितु नयी पीढ़ी के शंकालु युवकों में भी धर्म और कर्म का भाव संचित हो जाता है। श्री रामचरितमानस में बिखरे हुए विभिन्न रत्नों को संजोकर आपने अनेक आभूषण रूपी भजनों एवं भावों की सृष्टि की है। जो आज लाखों लोगों के बीच भक्ति एवं आस्था का अनुपम पीयूष वितरण कर रही है। सत्संग के अविरल प्रवाह को क्रमिक गति देते हुए आपने सन् 1997 से नवदिवसीय श्रीराम कथा एवं सप्तदिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का प्रारंभ किया। पूज्य देवीजी के मुखारविंद से कथा के गूढ़तम सूत्रों को अत्यंत सरल-सहज रूप में श्रवण करके श्रोताओं को आध्यात्मिक परमानंद की रसानुभूति होने लगती है तथा ध्यानावस्था में सम्पूर्ण सजीव चित्रण का दर्शन कर श्रोतागण मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।

साध्वी डॉ. विश्वेश्वरीदेवीजी की सहज-सरल शैली, मधुर वाणी, गम्भीर चिंतन, सरलतम स्वभाव, तेजस्वी दर्शन एवं प्रत्येक शास्त्रीय सूत्रों को वर्तमान जीवन-व्यवहार से जोड़कर निष्कर्ष देने की वक्तव्य कला कथाओं को और भी प्रभावशाली रूप से जन-मानस के हृदय पटल पर अंकित कर देती है। कथाओं में भक्ति भावमय भजनों के माध्यम से आप श्रोताओं को भगवत् सान्निध्य एवं भगवत् कथा का साक्षात अनुभव करा रही हैं। इन कथाओं के माध्यम से पूज्य देवीजी का प्रमुख उद्देश्य सनातन धर्म-ध्वजा को संपूर्ण विश्व के कोने-कोने तक फहराना एवं गौरवशाली सर्वाधिक प्राचीन सनातन-संस्कृति के महत्व से विश्व को पुन: परिचित कराना है। विलक्षण प्रतिभा की धनी आपश्री चलता-फिरता भारतीय आध्यात्मिकता एवं हिन्दू संस्कृति का विश्वकोष हैं। उनकी अद्भुत प्रतिभा, अद्वितीय स्मरण शक्ति और उत्कृष्ट भक्ति जन-जन को प्रेरित करती हैं। वे अदम्य उत्साह और शौर्य की धनी हैं। जीवन के अथ से इति तक, उनमें रचनात्मकता एवं सृजनात्मकता के दर्शन होते हैं।

साध्वी डॉ. विश्वेश्वरीदेवीजी द्वारा व्यासपीठ से दिए जा रहे कुछ विशेष प्रभावशाली अनुकरणीय सूत्र हैं, जैसे कथा जीवन बने, जीविका नहीं। हमें पूर्व के संस्कार चाहिए पश्चिम के विकार नहीं। समन्वय, संयम और सुमिरण को जीवन बनाओ। कथाओं के माध्यम से आपका अनुभव कुछ ऐसी ज्वलंत समस्याओं से हुआ, जिन्होंने उनको इन पर गम्भीरतापूर्वक उनका समाधान करने के लिए विवश कर दिया। इनमें प्रमुख है- गौ-वध को रोकना तथा गौ-संरक्षण व गौ-पालन करना। वर्तमान में गौ-माता की अत्यन्त दयनीय स्थिति एवं देश में हो रही गौ वध की घटनाओं से अत्यंत क्षुब्ध होकर सर्वदेवमयी गौमाता को बचाने के लिए आपने व्यासपीठ से कहा- ”गौ-माता सनातन की रीड़ है। सनातन की गंगा माता, गौ-माता, जन्म देने वाली माता, जन्मभूमि और गायत्री माता, इन पांच माताओं का संरक्षण एवं सम्मान करने वाला ही सच्चा सनातन धर्मी है। अत: गौवध रोकना और गौ-माता की रक्षा करना ही हमारा परम कर्तव्य है। इसी तरह देश में बेटे व बेटियों के बीच हो रहे आनुपातिक अंतर, कन्याभ्रूण की बढ़ती हत्या के कारण आपका चिंतन बना की, देश की बेटियों को शिक्षित एवं संरक्षित कर उनको संस्कारित किया जाये, जिससे राष्ट्र वैभवशाली बन सके। साध्वी विश्वेश्वरीदेवीजी गौ-वंश के संरक्षण हेतु विशाल गौशालाओं का देशभर में निर्माण करने व गौ-सेवा हेतु जन जागृति लाने के मनोभाव को मूर्त रूप प्रदान करने की दृष्टि से राजस्थान के चूरू जिले के सुजानगढ़ तहसील के ग्राम बिरडो की ढाणी (चरला) में श्री ‘गौ-धाम गौशाला’ को स्थापित किया, इसके माध्यम से वे गौ-सेवा कार्यों को करने का पुण्य कार्य कर रही है।

वर्तमान में श्रीराम कृपाधाम ट्रस्ट द्वारा अनेक सामाजिक एवं धार्मिक गतिविधियां संचालित हो रही हैं, जिनके अंतर्गत प्रतिदिन साधु संतों एवं गरीब लोगों को प्रसाद वितरण, गरीब छात्र-छात्राओं को शिक्षार्थ आवश्यक अनुदान देना, गरीब कन्याओं का विवाह, वृद्ध एवं बीमार गरीब लोगों को चिकित्सा अनुदान प्रदान करना, स्कूल कॉलेजों में छात्र-छात्राओं के लिए विशेष संस्कार शिक्षा शिविरों का आयोजन करना इत्यादि शामिल है। हम शुभाशंसा करते हैं कि पूज्य साध्वी डॉ. विश्वेश्वरीदेवीजी की कथा वाचना, समाजसेवा, गौ-कल्याण एवं बालिका उत्थान की उपलब्धियां भारतीय संस्कृति, भक्ति, को नए शिखर दें। आने वाली पीढिय़ों के लिए नये पदचिन्ह स्थापित करें ताकि कोई कभी अपने मुकाम से भटक न सके।

ललित गर्ग

 

 

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