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तनाव-मुक्त जीवन है खुशियों की कुंजी

तनाव-मुक्त जीवन है खुशियों की कुंजी

रोज सुबह उठकर अखबार के पन्ने पलटने पर मन में एक अजीब सी भावना जागृत होती है, उन खबरों का अध्यन करने से यह ज्ञात होता है कि किस मानसिक स्थिति में पूरी दुनिया रहती है। हर रोज अजीबो-गरीब खबरें हमारे सामने आती हैं। लोगों की मानसिक स्थिति, वाकई में एक चिंताजनक विषय हो गई है। कुछ रोज पहले यह खबर आई थी कि हवाई अड्डे पर यात्री अपने नवजात शिशुओं को भूलकर बाहर आ जाते हैं। कुछ क्षण बाद उन्हें इसका एहसास होता है। पहले तो लोग अपना सामान भूल जाते थे, लेकिन अब यह अपनी संतान को भूलने की बात हमें गहरी सोच में डाल देती है। माता-पिता के लिए अपने बच्चे जान से भी अधिक प्यारे होते हैं। अगर वे अपनी जान को भी छोड़कर आ पाते हैं तो उनकी मानसिकता दुनिया के सामने स्पष्ट हो जाती है। हो सकता है यह बात बहुत बड़ा अपराध नहीं है, लेकिन इस प्रकार की मानसिकता रखने वाले व्यक्ति कैसे अपने कर्मक्षेत्र तथा परिवार में एक स्वस्थ्य जीवन निर्वाह कर रहे होगें, यह सोचना बहुत कठिन हो रहा है।

ऐसे व्यक्तियों की इस प्रकार की मानसिकता के पीछे क्या कारण हो सकता है उसे खोजकर बाहर निकालना और उसका हल खोजना बहुत आवश्यक है। इसी प्रकार बहुत सी खबरें हम रोज की जिंदगी में देखते हैं। अपने आसपास के लोगों का बर्ताव पर गौर करने से यह जान पाएंगे कि किस मानसिक स्थिति में वे रहते हैं। हमेशा आर्थिक और शारीरिक कमी के कारण लोग मायूस नहीं रहते है, सबकुछ सही रहने के बावजूद लोग अपने आपको निराश और दु:खी रहते हैं। 20 से 30 साल पहले लोगों के परिवार के बारे में सोचे और आज के परिवार के बारे में सोचे तो जमीन आसमान का फर्क महसूस करेंगे। भले ही उस समय लोगों के पास साधन कम हुआ करते थे। उनके पास जो मानसिक संतुष्टि थी वह आज की इस पीढ़ी के पास नहीं है। इसी कारण लोग गंभीर से गंभीर बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। अगर इसी बात पर इसी क्षण से हम चिंता न करे तो पता नहीं आगे चलकर हमारे देश को कैसा दिन देखने को मिलेगा। इस यांत्रिक दुनिया में हर कोई अर्थ-उपार्जन की मशीन बनकर रह गए हैं। अपनी मानसिक स्थिति कुछ इस प्रकार बना रहे है कि तनाव अथवा ‘डिप्रेशन’ का शिकार हो रहे हैं। पूरे भारत में 45 प्रतिशत व्यक्ति इसी मानसिक तनाव का शिकार हो रहे हैं। 2015 तक 5,66,75,969 लोग इस बीमारी का शिकार हुए। घरेलू कार्यक्षेत्रों में इनकी संख्या 42.5 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

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WHO के हिसाब से पूरे विश्व में  2005 से 2015 तक इस प्रकार के लोग 18 प्रतिशत बढ़ गए है। पूरे विश्व में जापान और अमेरिका के बाद भारत का नाम आता है जहां मानसिक रोगीयों की संख्या अधिक पाई जाती है। एक कमजोर मानसिकता रखने वाला इंसान न केवल खुद को क्षति पहुंचाता है, बल्कि अपने आसपास रहने वाले समाज पर भी गहरा असर डालता है। ऐसे व्यक्ति कोई भी सकारात्मक कार्य नहीं कर पाते, केवल नकारात्मक सोच में डूबे रहते हैं। इस प्रकार के कमजोर दिमाग के व्यक्ति आत्महत्या करने से पीछे नहीं हटते हैं। हमारे देश में प्रति 100,000 लोगों में 20.9 लोग आत्महत्या करते हैं। हाल ही में यह खबर भी आई थी कि एक महिला डॉक्टर ने अपने कार्यभार के कारण अपने दो मासूम बच्चों को छोड़कर आत्महत्या कर ली। हमारे हिसाब से एक डॉक्टर जीवन दान कर सकता है। लोगों को मृत्यु से दूर कर सकता हैं। रोज की जिंदगी में एक डॉक्टर जीवन और मृत्यु को सबसे करीब से देखते हैं। जिनके लिए जीवन को समझना इतना कठिन नहीं हो सकता, कैसे वह इस प्रकार का कदम उठा लेते है, उनके मन से जीने की इच्छा कैसे खत्म हो जाती है। बुरारी में घटी घटना सब को याद होगी कि किस प्रकार एक परिवार के समस्त सदस्य एक साथ आत्महत्या कर बैठे थे। कारण कुछ भी क्यों ना हो सारे सदस्य एक साथ रह रहे थे वह क्या जीने के लिए काफी नहीं था? दुख: कुछ भी हो एक दूसरे के साथ रहने में कितना आनंद मिलता है। और उस आनंद से वे कैसे वंचित हो रहे थे? इस प्रकार की अनेक घटनाएं हम हर रोज देखते हैं। लोग अपने जीवन से क्यों इतना विचलित हो गए हैं?

हमारा जीवन सच में इतना अधिक जटिल है या हम खुद ही उसे जटिल बना देते हैं? हमारी सोच ही हमारे जीवन को आगे बढ़ाती है, हम जैसी सोच को अपने अंदर लाते हैं हमारा जीवन वैसे ही बन जाता है। हमारी जीवनशैली ही हमारी चिंता का कारण बन जाती है। मानसिक असंतुलित व्यक्ति को लेकर समाज में कोई भी उन्नति संभव नहीं हो सकती है, ऐसे लोगों की संख्या हमारे समाज में बढ़ती जाएगी तो हमारे देश की अवनति सुनिश्चित है। हम आधुनिकता की चादर को जितना ओढ़ ले मगर हमारी सोच उन्नत नहीं होगी तो हम किसी भी दृष्टि से आगे नहीं बढ़ पाएंगे। हम जब तक अपने आप को चिंता से मुक्त नहीं करेंगे, तब तक कोई भी तरक्की काम नहीं करेगी। असंतुलित मानसिक व्यक्ति अनेक प्रकार के दुष्कर्म करने में लग जाते हैं। उनके मन में रहने वाले असंतोष को किसी और के उपर निकालने में लग जाते है। अपने अंदर की वितृष्णा को निकालने के लिए वे व्यभिचार में भी लिप्त हो जाते है। चोरी, डकैती, गुंडागर्दी, यहां तक खून-खराबा  जैसे घिनौने कार्य करने में लग जाते हैं। एक सुस्त दिमाग रखने वाला व्यक्ति कभी भी खुद के लिए गलत कार्य करने की सोच नहीं सकते। जिस कार्य का अंजाम भली-भांति पता है जो कि अपने हित में नहीं होता है ऐसे कार्य करने को कैसे सोच सकते हैं? आज समाज में अपहरण, बलात्कार भी दिनों-दिन बढ़ रहे हंै, किसी भी उम्र के व्यक्ति बलात्कारी हो रहे हैं और इन बलात्कारियों के शिकार भी हर उम्र के लोग हो रहे हैं। एक असंतुलित मानसिकता ही उसका कारण हो सकता है। छोटे बच्चे के अंदर भी इतनी अधिक कर्कश भावना दृष्यमान होती है, यह भी एक चिंता का विषय है। 14-15 साल के बच्चे अपने शिक्षक अथवा अभिभावकों के द्वारा डांटे जाने से खुद को संभालने की हिम्मत नहीं रख पाते हैं। ये छोटे-छोटे बच्चे जिनके सामने पूरी जिंदगी पड़ी होती है, वे आत्महत्या कर बैठते हैं। यहां पर गौर से देखें तो छोटे बच्चों के अंदर इतनी कर्कश भावना होती है जिससे मानसिक क्षतिक्रम हो सकता है। मानसिक तनाव आजकल हर पीढ़ी में, हर वर्ग में देखा जा रहा है- सफल अभिनेता से लेकर नेता तक, शिक्षक से लेकर विद्यार्थी तक, बड़े उद्योगपत्ति से लेकर किसान तक। चिंता का विषय यह है कि हमारे समाज में ऐसे बहुत लोग होंगे जो कि मानसिक तनाव में रहते हैं। लेकिन किसी को बताने की हिम्मत नहीं कर पाते हैं। समाज में कुछ व्यक्ति मानसिक रोगियों को घृणा चक्षु से देखते हैं, और उनकी सहायता करने के बजाय उनका मजाक उड़ाते है। इसीलिए वे अपने अंदर ही अंदर घुट कर मरते हैं लेकिन बयां नहीं कर पाते हैं।

तनाव से छुटकारा पाने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि तनाव क्यों होता है उसको जानना बहुत अधिक आवश्यक है। कभी-कभी तो हम जब कारण जानने की कोशिश करते हैं तब  हम दु:खी हो जाते हैं। भिन्न-भिन्न लोगों के लिए कारण भिन्न-भिन्न होते हैं। किसी की दुश्चिंता के कारण को हम दूसरों पर लागू नहीं कर पाएंगे। तनाव किसी प्रकार का भी हो लेकिन उसका अहम कारण हमारा दुर्बल मन होता है। एक कमजोर मन आसानी से किसी भी हालात से प्रभावित हो जाता है। हालात कितना भी कठिन क्यों न हो अगर उसका सामना करने की हिम्मत हम कर पाएं तो हमें अधिक कष्ट महसूस नहीं होगा। प्रतिकूल हालात मन को विचलित करते हैं। उन्हीं प्रतिकूल परिस्थितियों को बार-बार सामना करने से मन एक प्रकार से टूट जाता है। एक टूटा हुआ मन अपने चारों तरफ एक मायूसी का वातावरण बना देता है।

इसी प्रकार वे मानसिक तनाव में रहने लग जाते है। कभी-कभी शारीरिक अस्वस्थता हमें मानसिक रूप से कमजोर बना देती है। अधिक दिन तक बीमार रहने से हम जो कार्य करने की इच्छा रखते हैं वो कार्य भी कर नहीं पाते हैं। हमारा मन टूट जाता हैं, मन में चिड़चिड़ापन, मायूसी छाई रहती है। मन में तनाव आने का अन्य एक कारण आपको आपके मनपसंद कार्य करने से बार-बार वर्जित करना भी है। कोई भी रोक-टोक को अधिक दिन तक सहने से मन पूरी तरह से मर जाता है। ऐसे व्यक्ति किसी सामाजिक कार्य में योगदान करने से हिचकिचाते हैं। आप कोई भी कार्य किसी भी कारण से करने को सक्षम नहीं होते हैं, धीरे-धीरे आपको सबका सामना करने को मन नहीं होता है। और अंदर ही अंदर मानसिक तनाव में रहने लगते हैं। आपके तनाव का कारण कभी-कभी आपके पास रहने वाले लोग हो सकते हैं। बार-बार आपके कार्य को आक्षेप किया जाए और बार-बार आपको नीचा दिखाने से मन दब जाता है, और फिर से कोई नया कार्य करने की इच्छा नहीं होती है। कार्यक्षेत्र में मानसिक तनाव बहुत पाया जाता है। अगर आपका खुद का व्यापार हो और उसमें कोई नुकसान सहना पड़े तो आदमी हिम्मत खो देते हैं। कभी-कभी प्रतियोगीओं को प्रतियोगिता में बार-बार हार का सामना करना पड़े तो वे मायूस होकर तनाव में आ जाते हैं। अधिकांश क्षेत्रों में  इस मानसिक तनाव का शिकार महिलाओं को पाया जाता है। एक निर्धारित उम्र के बाद हार्मान के असंतुलन के कारण उनके शरीर में अनेक परिवर्तन होते हंै। वही परिवर्तन उनके मन को पूरी तरह से प्रभावित करता है और वे अपने आपको दु:खी पाती हैं। अधिक से अधिक समय अकेला रहती है और उनमें अजीब सी चिड़चिड़ाहट बढ़ जाती है। महिलाओं में कार्य के भार के कारण भी तनाव आ जाता हैं। किसी के साथ अधिक दिल से जुड़ जाते हैं और वहां पर धोखा होने से भी व्यक्ति पूरी तरह से टूट जाता है और मानसिक बीमारी का सामना करना पड़ता है। युवा पीढ़ी में करियर बनाने में दुविधा आने से अथवा खुद का परिचय न बना पाने पर भी मानसिक रूप से कमजोर हो जाते हैं। वे अपने आपको  बुरी संगत से जोड़ देते हैं।

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अधिक समय तक मोबाईल फोन का प्रयोग भी मानसिक रोगों को जन्म दे सकता है। छोटे बच्चे हिंसात्मक गेम को देखकर भी अपने मानसिक संतुलन खो बैठते हैं। कहीं पर ऐसा भी पाया जाता है जहां पर माता-पिता परिवार में अधिक समय तक घर से बाहर रहने के कारण बच्चे अपने मन की बात को किसी के साथ बांट नहीं पाते हैं। और बार-बार ऐसा सामना करने के कारण वे मन को कमजोर बना लेते हैं। इस प्रकार देखें तो अनेक कारण हमारे सामने आ जाते हैं जिससे हमारे मन का तनाव बढ़ता है।

कारण कोई भी हो लेकिन हमें जब तक यह एहसास नहीं होगा की हम खुद अपने तनाव का कारण होते हैं, तबतक हम उससे मुक्त नहीं हो सकते हैं। हमारा मन केवल हमारा खुद का होता है। उसपर किसी को हावी नहीं होना चाहिए। देखा जाए तो भावनाओं के साम्राज्य में हमारा मन साम्राज्ञी है। हमें हमारे जीवन को भली-भांति समझना होगा। इसी क्षण स्थायी दुनिया में कुछ भी स्थिर नहीं। यहां तक हमारे हालात भी हमेशा एक जैसे नहीं रहेगें तो किस बात की इतना चिंता? मानसिक बिमारी से मुक्त होने के लिए अनेक चिकित्सा उपलब्ध हैं। चिकित्सक तरह-तरह की औषधि का प्रयोग करके रोगी को ठीक करने का प्रयास करते हैं। कहा जाता है उपचार के बजाय परहेज करना अकलमंदी का काम होता है। अगर हम जिस समय यह जान लेते है कि हम कोई मानसिक तनाव का शिकार हो रहे हैं, उसी क्षण से अपनी जीवनशैली में परिवर्तन लाने का प्रयास करना चाहिए। सुबह उठकर कुछ समय ध्यान करें। ध्यान करके एकाग्रचित्त बैठकर हम अपने आपको जान पाएंगे। हम जब अपने आपको पसंद करने लग जाते हैं तो जीने की इच्छा दोगुनी हो जाती है। कुछ समय प्रकृति के साथ गुजारे, बगीचे में अकेले बैठकर फूल-पौधे, नन्हीं चिडिय़ाओं और आसमान में उड़ता हुआ बादल इन समस्त चीजों का अध्यन करं, जिसके द्वारा मन में आनंद और संतुष्टि का अनुभव होता है।

कभी-कभी छोटे-छोटे बच्चे या वृद्ध-वृद्धाओं के साथ भी समय बिताएं। सबसे अधिक जरूरी है कुछ सकारात्मक सोच रखने वाली किताबों का अध्यन करें। अगर गीता अथवा कोई धार्मिक किताब पढ़ पाते हैं तो जरूर पढऩे का प्रयास करें। नई-नई चीजों को करने में समय बिताएं। कोई भी छोटी हस्तकला हो लेकिन रोज कुछ ना कुछ सृष्टि करे, जिसके द्वारा मन में एक संतुष्टि महसूस करेंगे। यदि आप संगीत का शौक रखते है तो कुछ समय मधुर संगीत जरूर सुना करें। यदि पुराने मित्रों के साथ कुछ समय बाते करें तो मन ताजा हो जाता है। नकारात्मक सोच और आलोचना से खुद  को अलग रखें। इस प्रकार के अनेक सकारात्मक कार्य को जीवन में लाने से हमारा जीवन फिर से आनंदमय हो जाएगा और हम तनाव-मुक्त जीवन जी पाएंगे।

उपाली अपराजिता रथ

 

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