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तौबा मेरे प्यार की

तौबा मेरे प्यार की

मेरा जीवन तो सारा यूंही बीत गया। कभी एक मुसीबत में फंसा और कभी दूसरी में।

जब मैं 15 साल का हुआ तो उस समय मुझे फिल्में देखना का तो जैसे नशा ही हो गया। मैं कोई फिल्म देखने से छोड़ता ही न था। मेरी कोशिश तो यही रहती थी कि शहर में जो नई फिल्म आये मैं उसका पहला शो ही देख लूं और अपने यार-दोस्तों को इस के बारे उनका ज्ञान वर्धन करूं — बताऊं कि यह कितनी अच्छी है या बेकार। मैं हर फिल्म को कितनी बार देखता था, इसका तो अंदाजा बड़े-बड़े नहीं लगा सकते थे। बस शर्त यही थी कि मेरी जेब में पैसे होने चाहियें। फिल्म की कहानी तो मैं अपने दोस्तों को इस बारीकी से सुना देता था जैसे कहानी मैंने ही लिखी थी। फिल्म के संवाद तो मुझे जुबानी याद हो जाते थे। गाने भी मैं बड़ी अच्छी तरह गुनगुना लेता था। मैं अभिनेताओं-अभिनेत्रियों की नकल भी उतारता था। अपने पसंदीदा फिल्मी कलाकारों की नई फिल्मों में उनके हाव-भाव  को अपनी चाल-ढाल में भी उतार लेता था। मैं गाने व संवाद भी उनकी ही शैली में दोहरा लेता था। इस कारण मेरे मन में भी अपने जीवन में एक हीरो बनने की लौ जागृत हो गयी। जो काम अभिनेता कर सकते हैं, मैं तो असल जीवन में उनसे भी बेहतर कर सकता हूं — ऐसा मुझे पूरा विश्वास हो गया था।

और मैंने इस ओर अपने कदम बढाने शुरू कर दिए। फिल्मी जीवन की तरह अपने असल जीवन में मैंने भी एक लड़की का पीछा करना शुरू कर दिया। एक फिल्मी हीरो की तरह मैं भी उसको अपना दिल दे बैठा। यह भी फिल्मों की तरह पहली ही नजर में प्यार हो जाने वाली बात थी। मेरे लिए तो यह फिल्मी तर्ज पर हीरो की तरह एक ऐसी बड़ी उपलब्धि थी जो चांद पर पांव रखने से भी अधिक गौरवशाली थी।

पर इक्कीसवीं सदी में भी 18वीं सदी की परम्पराओं से जुड़ी मेरी मां को मेरी चालढाल, बातों, व्यवहार व कार्यकलाप से बड़ी शर्म आने लगी। पर मुझे नहीं। मैं तो इस सदी का एक हीरो था। मेरी मां ने मुझे अपने परिवार की मान-मर्यादा, आदर्शों की दोहाई दी। उसने कहा कि कुछ और नहीं तो मेरी और अपनी बहनों की ओर देख। उसने कहा कि मेरी हरकतों पर उसे शर्म आ रही है। अपने परिवार और उनके भविष्य की ओर देख। लोग क्या कहेंगे। मैंने भी अपनी मां को एक फिल्मी गाना दोहरा दिया। ‘कुछ तो लोग कहेंगे। उनका काम है कहना’। खीज कर उसने मेरे आगे हाथ जोड़ दिए।

मैंने भी मां को तर्क दिया फिल्मी स्टाइल में। ‘प्यार करना कोई गुनाह नहीं है। मैंने कोई अपराध नहीं किया है। मैंने कोई चोरी या किसी की हत्या नहीं की है। मैंने तो केवल उसको, अपनी प्रिय को केवल दिल दिया है। मैंने उसे दो-टूक शब्दों में कह दिया —  यह कोई अपराध नहीं है।

मेरे अनेक रिश्तेदारों व भला चाहने वालों ने मुझे सलाह दी कि जिस रास्ते पर मैं चल रहा हूं उससे पीछे हट जाऊं। उन्होंने कहा कि यह बहुत गलत रास्ता है। तुम पछताओगे। पर मेरे दिमाग में जो प्यार का कीड़ा घुस गया था वह मुझे पीछे देखने ही नहीं दे रहा था। मुझे पता था कि एक हीरो अपने कदमों को कभी पीछे नहीं खींचता। उन्होंने मुझ से बड़ी माथा-पच्ची की। पर सब व्यर्थ। मैं अपनी बात पर अड़ा रहा। मैंने उन सब को स्पष्ट कर दिया- प्यार तो अंधा होता है। इसमें कोई तर्क-वितर्क-कुतर्क नहीं होता। इसका कोई मौसम नहीं होता। यह हर समय फलता-फूलता रहता है। मैंने अपने माता-पिता को, अपने भाई-बहनों को, अपने भाई-बंधुओं को, दोस्त-मित्रों को — सबको फिल्मी हीरो की तर्ज पर पूरे विश्वास के साथ चुनौति दे दी कि वह सब मेरे रास्ते से हट जाएं। अपने प्यार की शक्ति के सहारे सारी दुनिया से मैं अकेले ही लड़ सकता हूं। सारा संसार हारकर मेरे कदमों पर गिरेगा।

सच्चा प्यार सदा विजयी रहता है। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। फिल्मों की तरह मेरा प्यार भी अंतत: एक कॉमेडी के रूप में सफल रहा। इसका भी अंत सुखद रहा। मैं अपनी प्रेमिका के साथ विवाह बंधन में बंध गया।

उसके बाद हमारा जीवन शांति व सुख और खूह रहा… नहीं, नहीं, बिल्कुल नहीं रहा। यह तो सुखदायक अंत फिल्मी स्टाइल में ही निकला क्योंकि फिल्में तो सुखद विवाहोपरांत से आगे तो कुछ दिखाते ही नहीं। अब तो मैं देखता हूं कि यह स्वप्निल सुखद विवाह तो मेरे असल जीवन की ट्रेजेडी, दुखांत निकला। जीवन के विकट यथार्थ ने तो मेरे सारे सुख और शांति के सपने जो मैंने संजो कर रखे थे वह तो एक कच्चे कांच की तरह जल्दी ही टूट गए। मैंने जल्दी ही पाया कि मैं तो संकटों के गहरे और उबलते पानी में गिर गया हूं। मेरी प्रेमिका होने के नाते उसने तो मुझे कहा था कि मेरे लिए तो वह अपने आप को भी प्रेम की सूली पर चढ़ा कर अपनी जान तक दे सकती है।

इस बीच मेरे साथ बुरे से बुरा भी हुआ। इतना कुछ होने के बावजूद विवाह उपरांत का हमारा सम्बन्ध इतना सबल रहा कि हम अभी भी एक छत के नीचे रह रहे हैं। यह अलग बात है कि कई बार हम एक ही कमरे में नहीं होते थे। हमारे प्यार के खिलने के फलस्वरूप हमारे बच्चे हुए। उनका विवाह भी हो चुका है। अपने जीवन में वह ठीक तरह से रस-बस गए हैं। वह हम से दूर रहते हैं जिस कारण हमें बहुत समय और एकांत मिलता है अपना हिसाब चुकाने के लिए।

अब जब कि हम समझते हैं कि समय आ गया है जब हमें इस जीवन का अपना हिसाब-किताब समेट लिया जाये, तब भी मेरी धर्मपत्नी मुझे कुछ दिन के लिए भी अकेला नहीं छोड़ती ताकि हम दोनों कुछ दिन के लिए अलग रहने का  मजा भी उड़ा सकें। तब मैं समझता हूं कि कुछ दिन के लिए मुझे स्वर्ग का नजारा यहां ही कुछ दिन के लिए मिल जाये। मृत्यु के बाद तो मुझे पूरा भरोसा है कि ईश्वर मुझे अवश्य स्वर्ग में ही भेजेंगे। मुझे इतना तो एहसास है कि ईश्वर इतना निर्दई व अन्यायी नहीं है कि वर्तमान नर्क के बाद भी मुझे दोबारा नर्क में ही धकेलेंगे।

मेरी धर्मपत्नी कई बार अपने मायके जाने की बात करती है। तब मैं बड़ा खुश हो जाता हूं। मैं उसे दिल खोलकर काफी पैसे दे देता हूं ताकि वह मुझे कुछ दिन के लिए अकेला छोड़ दे। मैं समझता हूं कि तब मेरे चेहरे पर भी कुछ दिन के लिए मुस्कान आ सकेगी। पर वह फिर मुझे धोखा दे जाती है। वह हर बार मेरा उल्लू बना देती है। मैंने जो पैसे उसे दिये होते हैं उनका गबन कर जाती है। उसे मुझे अकेला छोड़ देने पर बड़ा दु:ख लगता है। वह समझती है कि मैं उसके बिना घर में बहुत परेशान रहूंगा। वह हर बार उसके बिना रहने के मेरे सपनों और योजनाओं पर पानी फेर देती है।

एक बार मैंने उसे समझाने की कोशिश की। मैंने कहा कि तुम मेरी चिंता में मत सूखो। मैं तुम्हारी गैर-मौजूदगी में एक माई रख लूंगा जो मेरा सब काम कर देगी।

मेरा यह कहना ही था कि वह तो गुस्से में आपे से बाहर हो गयी। ‘मैं तुम्हें ऐसे रहने नहीं दूंगी। मैं सबको बता दूंगी कि तुमने माई नहीं एक रखैल रख ली है’।

‘तुम पर कौन विश्वास करेगा?’ मैंने उसकी बात को हलके से लेते हुए कहा। ‘लोग जानते नहीं कि मैं ऐसे कामों के लिए बहुत वृद्ध हो गया हूं।’ मैंने उसकी बात को एक हास्य की तरह लिया।

वह तो तब और भी तैश में आ गई। ‘मैं इस बात से सबको विश्वास करा दूंगी। मैं सबको बता दूंगी कि तुम्हारा तो उसके साथ अपनी जवानी के दिनों से ही ऐसा रिश्ता चल रहा था। तुमने तो तब से ही मुझे झूठ में रखा।’

ऐसे मौकों पर चुप्पी ही मेरा सहारा रही। पर इसने तो उसके गुस्से की लपटों को और भी हवा दे दी। वह और चिल्ला कर बोली, ‘यही नहीं। मैं तो पुलिस में भी तुम्हारे खिलाफ शिकायत करूंगी कि तुम मेरे विवाह के समय से ही कोई दहेज न लाने के लिए प्रताडि़त कर रहे थे। तुम मुझे मारते-पीटते रहे। मैं तुम्हें मुझ पर घरेलु हिंसा कानून के अंतर्गत भी फंसवा दूंगी। तुम अपने आपको समझते क्या हो? मैं तो तुम्हें बाकी जीवन के लिए जेल में ही सड़ाऊंगी।’

मैं तो यही चाहता था कि वह ऐसा कर दे। मेरे लिए तो इस घर के नर्क से उससे दूर मेरे लिए जेल ही स्वर्ग होती। पर वह कभी अपनी बात की सच्ची न रही।

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