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दरिन्दे बलात्कारियों को हो फांसी

दरिन्दे बलात्कारियों को हो फांसी

ऐसा लगता है कि उन्नाव और अलीगढ़ में हुई रेप की घटनाओं ने सरकार की आंखें खोल दी है, जिसके चलते यूनियन केबिनेट ने हाल ही में एक अध्यादेश पास किया है जिसके तहत 12 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों के साथ बालात्कार करने वाले दरिन्दों को फांसी की सजा दी जायेगी। यह एक अच्छा कदम है इससे बालात्कार जैसी झकझोर देने वाली घटनाओं में कमी आयेगी। दानवीय प्रवृति के लोग जो इस प्रकार की घटनाओं को अंजाम देते हंै, उन्हें इस प्रकार की सजा अवश्य मिलनी चाहिये। अत: सरकार का यह कदम प्रसंशनीय है। फिर भी यह प्रश्न अवश्य खड़ा होता है कि क्या यह अध्यादेश ऐसी  दरिंदगी भरी घटनाओं को रोकने में कारगर होगा? सबसे बड़ी बात तो यह है कि ऐसे अपराध तब तक नहीं रूकेंगे जब तक ऐसे मामलों की शीघ्रता-पूर्वक जांच नहीं होगी तथा इन अपराधियों को अतिशीघ्र सजा नहीं मिलेगी। मामलों की अतिशीघ्र जांच करने के लिए फोरेंसिक साइंस की उपयोग होना चाहिये। किसी भी अभियोजन की सफलता या असफलता फोरेंसिक साइंस के रिपोर्ट पर निर्भर करती है। जब जांच का नमूना लिया जाता है, तब इसकी जांच अच्छे प्रकार से की जानी चाहिये, ताकि कोई भी प्रमाण न छुट सके। और इसमें कोई भी हस्तक्षेप न हो। फोरेंसिक वैज्ञानिकों और डॉक्टरों को रिश्वतखोरी से बचना चाहिए। भारत में 70 प्रतिशत बलात्कार की घटनाओं में सजा इसलिए नहीं मिल पाती क्योंकि उनकी सही से फोरेंसिक जांच नहीं हो पाती। और जांच करने वाला व्यक्ति भी ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाले व्यक्तियों से प्रभावित होता है। हांलाकि सरकार द्वारा लाया गया यह अध्यादेश केवल 12 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार करने वालों पर ही नहीं, बल्कि यह सभी पर लागू होना चाहिये।

यहां यह कहना महत्वपूर्ण है कि सभी बच्चों को शुरू से ही महिलाओं का सम्मान करने की शिक्षा दी जानी चाहिये। व्यक्तिगत स्तर पर, बलात्कार हमेशा सेक्स पर कमजोर नियंत्रण, वर्चस्व और अपमान के बारे में होता है। हालांकि, बलात्कारी को यह समझना चाहिए कि वह मानसिक रूप से कमजोर है जो खुद को नियंत्रित करने में सक्षम नहीं है और इस घटना से वह न केवल पीडि़त  बल्कि अपने और अपने परिवार के लिए भी दु:ख लाता है। कई सारी रिपोर्ट तो यही बताती है कि ऐसी घटनाओं को अंजाम लोग शराब से प्रभावित होकर देते हंै। इसलिए महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार के ऊपर है। इस पृष्ठभूमि में यह कहना आवश्यक है कि इस प्रकार की घटनाओं को रोकने के लिए पुलिस रिफार्म की आवश्यकता है। पूर्व में सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में पुलिस रिफार्म की बात की है। परन्तु ऐसा लगता है कि केन्द्र और राज्य की सरकारें पुलिस के ऊपर अपना नियंत्रण खोना नहीं चाहती है। क्योंकि इससे राजनेताओं का पुलिस के ऊपर कोई नियंत्रण नहीं होगा, जिससे वे इन बर्बर घटनाओं में होने वाली जांच में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं कर पायेंगे। हालांकि यह सच है कि ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वालों को कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिये। यहां इस बिन्दु पर प्रभाव डालना आवश्यक है कि महिलाओं के प्रति इस प्रकार की भावना की उत्पत्ति फिल्मों में महिलाओं को एक प्रयोग की जाने वाली वस्तु के रूप में दिखाये जाने से होती है। हर बार बालात्कार जैसी घटनाओं पर मीडिया और राजनेता बलात्कारी की फांसी की मांग करते हैं, लेकिन कुछ ही दिनों में यह मुद्दा खत्म हो जाता है। ऐसी घटनाओं में लोगों का गुस्सा जायज है। पुलिस और न्यायपालिका को दोषी ठहराना काफी आसान है, लेकिन इन सभी घटनाओं के लिए आम जनता भी जिम्मेदार है। यह धारणा की महिलाएं परिवार का सम्मान होती हंै, हमारे समाज की जड़ों से गहराई से जुड़ी हैं। इसलिए यहां शिक्षा एक महत्वपूर्ण योगदान हो जाता है, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी महिलाओं के सम्मान को एक दायित्व के रूप में ले।

Deepak Kumar Rath

   दीपक कुमार रथ

(editor@udayindia.in)

 

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