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देशहित से ऊपर नहीं है अल्पसंख्यकवाद

देशहित से ऊपर नहीं है अल्पसंख्यकवाद

मोदी सरकार-2 के द्वारा ईद पर अल्पसंख्यकों विशेषकर मुस्लिम छात्रों के लिए 5 साल में 5 करोड़ की छात्रवृतियों व अन्य कुछ घोषणाओं से एक नया राजनितिक विर्मश शुरू हो गया है कि क्या मोदी भी मुस्लिम तुष्टीकरण की वोट राजनीति की राह पर चल पड़े हैं? वस्तुत: 17वीं लोकसभा के चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने यह ‘मिथ’ तोड़ दिया है कि भाजपा को मुस्लिम वोट नहीं मिल सकते। विरोध कर उत्तर प्रदेश में गत लोकसभा चुनावों में मायावती और अखिलेश यादव ने महागठबंधन के नाम पर पकड़ा, उस पर दलित-यादव-मुस्लिम समीकरण धूल चाटता नजर आया। दरअसल गुजरात में मोदी के मुख्यमंत्री रहते गुजरात दंगों के नाम पर कांग्रेस व अन्य कथित सेकुलर दलों ने मोदी का मुस्लिम विरोधी चेहरा गढऩे की खूब कोशिश की। उन्हें ‘मौत का सौदागर’ तक कहकर मुस्लिमों के बीच मोदी का हौव्वा खड़ा करने की लगातार कोशिशें होती रहीं। लेकिन मोदी ने विकास और खुशहाली का सूत्र पकड़कर शासन का जो ‘गुजरात मॉडल’ प्रस्तुत किया, उसने सभी के दिलों में जगह बनाई और मोदी की जाति-मजहब से परे एक निष्पक्ष छवि गढ़ी। नतीजतन गुजरात के करीब एक दर्जन मुस्लिम प्रभाव वाले विधानसभा क्षेत्रों में से मतदाताओं को मोदी के विरूद्ध भड़काने-बहकाने के सारे सेकुलरी प्रपंच धरे रह गए।

गुजरात से निकलकर राष्ट्रीय परिदृश्य पर जब नरेंन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी संभाली तो उन्होंने अपनी इसी कार्यशैली का विस्तार करते हुए ‘सबका साथ-सबका विकास’ सिद्धांत गढ़कर मुस्लिम परस्त सेकुलरी राजनीति को मोंधरा कर दिया। 16वीं लोकसभा के चुनावों के दौरान प्रख्यात मुस्लिम चिंतक और स्कॉलर मौलाना कल्बे सादिक का यह बयान खूब चर्चित हुआ था कि कांग्रेस मुसलमानों को मोदी का हौब्वा दिखाकर डराना बंद करे। इस चुनाव में कांग्रेस की ऐतिहासिक व शर्मनाक हार पर तत्कालीन कांग्रेस चुनाव प्रचार समिति के प्रभाव ए. के. एंटनी की टिप्पणी बड़ी चर्चित हुई थी। उनका आशय था कि कांग्रेस की मुस्लिमपरस्ती व हिंदू-विरोधी राजनीति को जनता ने नकार दिया। उन्होंने स्पष्टत: कहा कि यह हार कांग्रेस की सेकुलर राजनीति की साख पर सवालिया निशान है। इस चुनाव में भाजपा की अप्रत्याशित जीत जिसने 30 साल बाद किसी एक दल की पूर्ण बहुमत वाली सरकार के गठन के रूप में मोदी की नई राजनीतिक अवधारणा ‘विकास सबका, तुष्टिकरण किसी का नहीं’ पर भारत की जनता ने मुहर लगाई।

नरेंद्र मोदी के पांच साल के शासन ने इस अवधारणा को और मजबूत किया। इसी का परिणाम है कि ताजा चुनावों में मुस्लिम समाज न तो मायावती के ‘मुसलमान एकजुट होकर महागठबंधन के पक्ष में वोट दें’ लोकतंत्र विरोधी आवहानों के झांसे में आया और न पश्चिम बंगाल में बेशर्मी की हद तक ममता बनर्जी की मुस्लिम परस्त मजहबी राजनीति उसे रास आई। दोनों राज्यों में जो मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति की धुरी बनते दिख रहे थे, मोदी विरोधियों को मुंह की खानी पड़ी। यानी मुस्लिम तुष्टिकरण अब भारत की राजनीति का ‘वोट दिलाउ फैक्टर’ नहीं रहा, यह स्पष्ट हो गया है। इसलिए मोदी सरकार-2 की अल्पसंख्यक छात्रों के लिए या मुस्लिम सशक्तिकरण संबंधी अन्य घोषणाओं में इस तरह के निहितार्थ तलाशना निरर्थक दिमागी कसरत के अलावा कुछ नहीं है। इस पूरे आशय को समझने के लिए मोदी की मानसिक गढऩ और उनकी सरकार की कार्यशैली को जानना जरूरी है। इस पूरी पृष्टभूमि को जानने के बाद ही भारत की नेहरूवादी राजनीति के पूर्वाग्रहों से इतर देश और समाजहित की राजनीति के अर्थ खेजे जा सकते हैं। नरेंद्र मोदी को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने जाति-मजहब क्षेत्र और भाषा के विनाशकारी खांचों में बांट दी गई चुनावी राजनीति को राष्ट्रहित और जनोन्मुख दिशा प्रदान की है। यह स्पष्ट हो गया है कि उनकी राजनीति सर्वजनहिताय लोककल्याणकारी सोच की पोषक है।

दूसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद अपनी सरकार का लक्ष्य निर्धारित करते हुए मोदी ने एक कदम और आगे बढ़ते हुए कहा- ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास।’ यह भारत के उस मुस्लिम समुदाय के लिए बेहद भरोसा जगाने वाला व आश्वस्तिकारक है जिसे वोट बैंट के रूप में अपने क्षुद्र राजनैतिक व सत्रा स्वार्थो के लिए सेकुलरी जमात द्वारा डराया व भ्रमित किया जाता रहा है। सरकार द्वारा मदरसों की शिक्षा को अंगे्रजी विज्ञान, गणित, आईटी जैसे विषयों से जोड़कर आधुनिक बनाकर उनमें पढऩे वाले क्षेत्रों को विकास की दौड़ में दूसरे तबकों के साथ खड़ा करने की कोशिश ही मानी जानी चाहिए। अगले पांच वर्षों में विभिन्न मंत्रालयों की छात्रवृतियों में पांच करोड़ अल्पसंख्यक खासकर मुस्लिम छात्रों को हिस्सेदारी, रन में भी 50 फीसदी छात्राओं को लाभान्वित किए जाने की योजना हो या बेगम हजरत महल बालिका स्कॉलरशिप के तहत दस लाख से ज्यादा मुस्लिम छात्राओं को छात्रवृत्ति दिए जाने की घेषणा, मुस्लिम समाज की नई  पीढ़ी को योग्य, सक्षम बनाकर विकास की मुख्यधारा में शामिल किए जाने की नीयत से उठाए गए कदम हैं।

कांग्रेस सहित दूसरे सेकुलर दल मुसलमानों के पिछड़ेपन को हर चुनाव में भुनाते तो रहे, लेकिन उन्हें इस गर्त से निकालकर शिक्षा और रोजगार की मुख्यधारा में लाने का प्रयास किसी ने नहीं किया। मुलायम सिंह यादव और लालू यादव जैसे नेता भी रामभक्तों पर गोलियां चलवाकर या माई (रू4) मुस्लिम-यादव का नारा देकर मुस्लिम हितैषी होने की वोट राजनीति ही करते रहे। अब यह पहल नरेंद्र मोदी कर रहे हैं तो उनकी नीपत को परखने का मौका हमारे सामने है कि बहुसंख्यक हिंदू समाज के हितों की कीमत पर यह किया जाना उचित नहीं होगा। इसलिए अखिल भारतीय संत समिति के बैनर से काशी के संत समाज द्वारा यह आवाज उठाना जर्क संगत है कि देया के आठ राज्यों नागालैंड, मेघालय, मिजोरम, मणीपुर, अरूणाचल प्रदेश, पंजाब, लक्ष्यद्वीप व जम्मू-कश्मीर में अल्पसंख्यंक हिंदुओं को भी इस तरह की सुविधाएं मिलनी चाहिए।

संत समाज द्वारा संबंधित मंत्रालयों को पत्र लिखकर यह पूछा जाना भी वाजिब है कि देश में अल्पसंख्यक की परिभाषा क्या है?

देश संविधान के अनुसार चलता है और संविधान निर्माताओं ने कहीं अल्पसंख्यक शब्द का प्रयोग नहीं किया, बल्कि ‘एक जन एक राष्ट्र’ की अवधारणा हमारे संविधान की मूल आत्मा है। संविधान की प्रस्तावना में सारे भेदों से ऊपर उठकर ‘हम भारत के लोग’ कहा गया है। फिर यह बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक का भेद क्यों खड़ा किया गया? 1992 में अल्पसंख्यक आयोग के गठन की क्या आवश्यकता पड़ गई जब संविधान ‘एक जन एक राष्ट्र’ मानता है। दरअसल अल्पसंख्यक के नाम पर मुस्लिम परस्त राजनीति का लाभ लेने के लिए कथित सेकुलर सोच में से यह शब्द जन्मा। भारत की ‘सर्वपंथ समभाव’ जैसी उदात्त सोच को अल्पसंख्यकवाद व सेकुलरवाद जैसी विभाजक मानसिकता में जकडऩे की जरूरत ही नहीं हैं, लेकिन वोट के लिए इन शब्दों को गढ़ा गया। विशेषकर अल्पसंख्यक का अर्थ मुस्लिम और सेकुलर का अर्थ मुस्लिम परस्तिीं परिभाषित कर दिया गया। जिसका खामियाजा यह देश तो भुगत ही रहा है, मुस्लिम समाज ने सबसे ज्यादा भुगता है और वह समुदाय देश की मुख्यधारा से कटकर पिछड़ता चला गया।

इसी संकीर्ण चुनावी राजनीति ने त्त्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बाध्य किया यह सार्वजनिक घोषणा करने के लिए कि देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का है। यह पूरी तरह संविधान विरोधी मानसिकता है। इसलिए संत समाज के द्वारा उठाए गए मुद्दों को मोदी सरकार दर किनार न करे, यह भी देशहि में होगा। प्रधानमंत्री जन विकास कार्यक्रम हो या पढ़ो और बढ़ो जागरूकता अभियान, इनके अंतर्गत अल्पसंख्यक हितों का पोषण किया जाना सर्वजनहिताय लोककल्याण की भावना से हो, न कि मुस्लिम परस्तिी की मानसिकता से। गुजरात से लेकर दिल्ली तक मोदी सरकार के ट्रैक रिकार्ड को देखते हुए यह विश्वास किया जा सकता है कि मोदी देश और समाज के हित को सर्वोपरि रखकर लोककल्याणकारी राज्य की संकल्पना के दायरे में ही इन योजनाओं का क्रियान्वयन करेंगे, संकीर्ण वोट राजनीति के लिए नहीं।

 

प्रो.बल्देब भाई शर्मा

(लेखक धर्मशाला सेंट्रल यूनिवर्सिटी में जर्नलिज्म और मास कम्युनिकेशन विभाग के हेड हैं)

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