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धर्म से मनुष्य का लगाव

धर्म से मनुष्य का लगाव

मनुष्य जीवन सृष्टि की सर्वोपरि कलाकृति है। ऐसी पूर्ण रचना और किसी प्राणी की नहीं है। यह उपहार असाधारण है। जब एक बार कोई मनुष्य गर्भ में आ जाता है तो मानवता उससे स्वयं जुड़ जाती है। इस मानवता का सर्वदा ध्यान रखना, उससे विमुख न होना ही मानव जीवन की सार्थकता है। मानव की प्रतिष्ठा में ही धर्म की प्रतिष्ठा है। मानव को सन्तप्त, कुण्ठित और प्रताड़ित करके कोई भी धर्म या सम्प्रदाय सम्मान्य नहीं हो सकता। इसीलिए स्वामी विवेकानन्द कहा करते थे- ‘सच्ची ईशोपासना यह है कि हम अपने मानव-बन्धुओं की सेवा में अपने आप को लगा दें, यह पुस्तक डॉ. सांवर सिंह यादव द्वारा लिखी गई है, जिसमें 14 अध्याय हैं।

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इस पुस्तक में धर्म के विभिन्न पक्षों पर तथा मानव समाज में धर्म का उद्भव और विकास कब और कैसे हुआ इस पर विस्तार से चर्चा की है। अंत में, इस पुस्तक का सार है कि समस्त मानवीय चिन्तन किसी धर्म विशेष की प्रति-छाया में या उसकी प्रतिक्रिया में उत्पन्न एवं विकसित हुआ है। धर्म के अतीत में मानवीय क्रिया-कलापों, प्रथाओं और विविध परम्पराओं की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। धर्म की व्यापकता एवं सर्वकालिक प्रासंगिकता को देखते हुए इस पुस्तक में धर्म के वास्तविक अर्थों, उसके दार्शनिक एवं व्यावहारिक पक्षों की सरल भाषा में व्याख्या की गई है।

उदय इंडिया ब्यूरो

 

 

 

 

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