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न्यायपालिका की अहिन्दूवादी मानसिकता?

न्यायपालिका की अहिन्दूवादी मानसिकता?

रांची की ऋचा भारती को एक न्यायाधीश ने बेल की शर्त के रूप में पांच कुरान बांटने का आदेश दिया जिसे बाद में वापस ले लिया गया। 19 साल की ऋचा भारती पर आरोप है कि उन्होंने सोशल मीडिया पर मुस्लिम विरोधी पोस्ट लिखी। उन्हें 13 शनिवार को कुछ लोगों की शिकायत पर गिरफ्तार किया गया और 15 सोमवार को जब उन्हें वेल दी गयी तो न्यायाधीश मनीष कुमार सिंह ने ये तुगलकी फरमान भी सुना दिया। मेरा प्रश्न है कि क्या इन न्यायाधीश महोदय को ऐसा करने की इजाजत देश का कानून देता है? ये महोदय रांची में पहली श्रेणी के दंडाधिकारी (मजिस्ट्रेट-फस्र्ट क्लास) के पद पर काम कर रहे हैं?

चलो, एक वार ये मान लिया जाए कि इन मजिस्ट्रेट महोदय की मंशा भली थी और उन्हें लगा कि ऐसा करके वे ‘कौमी एकता’ को मिसाल कायम करने का काम कर रहे हैं। परंतु कल्पना कीजिए कि ऋचा भारती की जगह किसी मुस्लिम बालिका ने ‘हिन्दू विरोधी’ पोस्ट लिखी होती तो क्या होता? अलबत्ता तो पुलिस कुछ पड़ोसियों की शिकायत पर उतनी सक्रिय नहीं होती और 13 शनिवार के दिन बच्ची को घर से नहीं उठाती। याद रखिए सप्ताहांत में पुलिस उन्हीं अपराधियों को गिरफ्तार करती है जिन्हें दो दिन हिरासत में रखना होता है क्योंकि जमानत फिर 15 सोमवार को ही हो सकती है। यानि एक पूरा विकृत षड्यंत्र रचा गया ताकि ये लड़की कम से कम तीन दिन तक हवालात में सड़ती रहे।

खैर, हम बात कर रहे थे कि मान लीजिये कि ये पोस्ट किसी मुस्लिम बच्चे ने हिन्दू धर्म के बारे में लिखी होती तो क्या ये दंडाधिकारी महोदय उस बच्चे को नसीहत के तौर पर गीता/रामायण बांटने का आदेश देते? 99.9 फीसदी तो ऐसा करने की इनकी हिम्मत ही नहीं होती। यदि ऐसा हो भी जाता तो पूरे देश नहीं बल्कि दुनिया भर में अब तक भारत की कथित ‘असहिष्णुता’ को लेकर कोहराम मच गया होता। मोदी से लेकर संघ तक को अब तक आरोपी बनाकर सूली पर टांगा जा चुका होता। सुप्रीम कोर्ट अब तक स्वयं इसका संज्ञान लेकर कार्रवाई कर चुका होता। दिल्ली का खान मार्किट गैंग सक्रिय होकर इसे एक राष्ट्रीय आपदा घोषित कर चुका होता। लेकिन फिलहाल सब चुप है क्योंकि मामला अल्पसंख्यक समुदाय का नहीं है।

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असल में सवाल किसी एक जज या थानेदार का नहीं हैं। एक विकृत मानसिकता हमारे सिस्टम में घर कर गई है। निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक अचानक अल्पसंख्यक अधिकारों के नाम पर अति सक्रिय हो जाते हैं। ये दृष्टिकोण साम्प्रदायिक नहीं तो फिर क्या है? जब अदालतें भारत के नागरिकों के मजहब के अनुसार न्याय करने लग जाये तो उसे फिर और  क्या कहा जाए? उन्हें अपने शहरी एक नागरिक न लगने के बजाय हिन्दू और  मुसलमान दिखाई देने लगते हैं। मैं अदालतों पर साम्प्रदायिक होने का आरोप नहीं लगा रहा बल्कि उस नजरिये की बात कर रहा हूं जो पूजा पद्धति के आधार पर नागरिकों में भेद करता है।

इसके अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं:

  • देश की सर्वोच्च अदालत को अवैध रूप से भारत में घुस आए कुछ रोहिंग्या मुसलमानों के अधिकारों की चिंता हैं परंतु दशकों से जम्मू में बगैर भारतीय नागरिकता के रह रहे हिन्दू परिवारों की चिन्ता नहीं है।
  • पंजाब के कई शहरों में बस्तियां उन हिन्दू परिवारों की है जो अपने धार्मिक अधिकारों के हनन के बाद डर के कारण पाकिस्तान से भागने पर मजबूर हुए। ये दशकों से भारत में रह रहे हैं। परंतु हमारी व्यवस्था का कोई अंग, कार्यपालिका न्यायपालिका या विधायिका इससे विचलित नहीं होती।
  • और तो और, जिहादी इस्लामी आतंक के शिकार हुए कश्मीरी पंडितों – जिन्हें अपने ही घर में बेघर कर दिया  गया – उनके अधिकारों के बारे में हमारी अदालतों ने कड़ा रूख क्यों नहीं अपनाया?
  • सुप्रीम कोर्ट को रात को तीन बजे उठकर एक हत्यारे आतंकवादी की फांसी की सजा पर पुर्नविचार का समय मिल जाता है। परंतु अयोध्या में रामजन्म भूमि विवाद के मुकदमें की तारीख सालों साल टलती रहती है।

ये तो कुछ उदाहरण है जो सामने दिखाई दे जाते हैं। ऐसे अनेकों मामले लोग देश के कोने कोने से आपको बता सकते हैं। ऋचा ने जो लिखा उससे कई भद्दी, अश्लील बेहुदा पोस्ट हिन्दू धर्म प्रतीकों को अपमानित करते हुए आपको मिल जाएंगी। लेकिन प्रशासन और अदालतें इन्हें हल्के तौर पर ही लेती हैं। लेकिन इस स्पष्ट दिखाई देने वाले भेदभाव से स्वाभाव से शांत और सहनशील वृत्ति वाले आम हिन्दू नागरिकों में एक क्रोध पनप रहा है। यह भेदभाव जनित क्रोध देश के लिए अच्छा नहीं है। इसके लिए व्यवस्था जनित उपाय होने चाहिए। किसी भी समाज में अच्छेपन को दंड मिले और उदंड को पुरस्कार मिले – ठीक नहीं होता। इसके दूरगामी परिणाम सारे समाज के लिए अच्छे नहीं होंगे।

मजिस्ट्रेट मनीष कुमार सिंह ने ऋचा भारती को उस अपराध के लिए दंड दे दिया जो अभी अदालत में सिद्ध ही नहीं हुआ। साथ ही दंड भी ऐसा जो कि उसके मूलभूत धार्मिक अधिकारों का हनन करता है। ये अधिकार संविधान उसे देता है। यदि आप एक मुसलमान को हिन्दू धर्म का प्रचार करने का आदेश नहीं दे सकते तो फिर एक हिन्दू नागरिक को क्यों इस्लाम का प्रचार करने का काम दिया? ऐसी ‘कौमी एकता’ तो लादी गई ‘कौमी एकता’ है। कोई भी कौमी एकता एकतरफा कैसे हो सकती हैं? इन मजिस्ट्रेट महोदय ने छद्म और एकतरफा कौमी एकता एक आम शहरी पर लादने का अक्षम्य अपराध किया है। न्यायाधीश भी कानून से ऊपर नहीं हो सकते। न्यायपालिका को  अब अपने अंदर झांकने की आवश्यता है। और इस मामले में इस मजिस्ट्रेट महोदय को अपने अपराध का दंड मिलना ही चाहिए।

उमेश उपाध्याय

 

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