ब्रेकिंग न्यूज़

न्यायपालिका को भी सुधारो विचार करने का समय

न्यायपालिका को भी सुधारो विचार करने का समय

न्यायपालिका को निर्विवाद रूप से स्वायत्त शक्तिशाली संस्था होना ही चाहिये। उस पर किसी तरह का अंकुश दबाब न्यायिक प्रणाली में घातक होगा इसलिये न्याय पालिका को अपने कार्यों और कमियों पर खुद विचार कर उनमें सुधार लाना चाहिये। एक आरोप बराबर लगता आ रहा है कि न्यायाधीश की नियुक्तियां आजादी के शुरू के दौर में राजनैतिक प्राथमिकता के आधार पर होती रही है। यहां तक कि जब इन्द्रागांधी प्रधानमंत्री थी, तो जूनियर को प्रमुख न्यायाधीश बनाये जाने पर सुप्रीम कोर्ट के अन्य जजटिस ने इस्तीफा भी दे दिया था।

अब कहा जाता है कि अधिकांश जज वरिष्ठ जजों या नामी वकीलों के परिवार से ही नियुक्त हो जाते हैं। महात्मा गांधी ने आजादी के बाद जिन पांच सूत्रों को प्रतिपादित करने की सलाह दी थी उनमें से एक खतरा भाई भतीजावाद नेपोटिस्म का भी बतलाया था। नेताओं को भाई भतीजावाद से दूर रहने की सलाह दी थी।

इस समय सबसे बड़ा सुधार जो न्यायिक प्रणाली में हो सकता है वो हैं उसी कोर्ट में प्रेक्टिस या वकालत करने वाले वकीलों को उसी हाईकोर्ट में जज नियुक्त किये जाने पर विचार। अपने ही कोर्ट में जो भी जज बनाया जाता है जो वर्षों वहीं प्रेक्टिस कर रहा है। बाद में वही सीनियर जिनके नीचे उसने वर्षों वर्ष काम किया हो उसका गुरू रहा हो, वो जब उसकी अदालत में पेश होता है तो स्वाभाविक रूप से उसको अनसुना करने में कठिनाई किसी भी इन्सान को हो सकती है। यही नहीं वे सभी दोस्त जिसके साथ उसका रोजाना का उठना बैठना हो, खाना पीना साथ हो, उनके अदालत में आने पर असहज होना भी स्वाभाविक ही है। फिर ऐसे बहुत से केस भी होंगे ऐसे सारे केस अब उन्हें दूसरे वकील को सौंपना होंगे। पर उनके मुअक्किल की तो उनके पास यानि घर तक पहुंच आसान ही होगी।

सीनियर वकील या अपने गुरू वकील का ख्याल उसी हाईकोर्ट में चलने वाले अपने खुद के मुअक्किलों के केस सहयोगी मित्र वकीलों से निजी गहरे रिश्ते और घर परिवार के लोग रिश्तेदारों और मुअक्किलों में सहज रिश्ते आदि भले ही केस को प्रभावित न करें पर आम आदमी में इस बात की  चर्चा होती है और लोग संदेह प्रकट करते भी देखे गये हैं। यह अत्यंत आवश्यक है और समय की पुकार है कि स्वयं सुप्रीम कोर्ट इस पर विचार करें कि किसी भी हालत में कोई भी जज उस हाईकोर्ट में नियुक्त न हो जहां वह रजिस्टर्ड रूप से प्रेक्टिस करता है। आम प्रचलन में अपने होम (घरेलू) जिले में कलेक्टर और पुलिस अधिकारी भी पोस्ट नहीं किये जाते हैं।

दूसरी समस्या है समय से न्याय नहीं मिल पाना। बहुत जज हाईकोर्ट में सरकारी वकील के विनय पर तारीख देते रहते हैं और न्यान पाने का फरियादी का वक्त ही गुजर जाता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट में दसियों साल से मुकदमों की तारीखें लग रही हैं पर सुनवाई एक दिन भी नहीं होती। ऐसे भी लोग हैं जिनके कॉलेज में प्रवेश संबंधी या परीक्षा संबंधी प्रकरण होते हैं और जिनका निवारण समय रहते न हो तो उनका साल ही बर्बाद हो जाता है। सरकारी वकीलों की हील हवाली के कारण फैंसले समय से नहीं हो पाते हैं और याचक को न्याय पाने का समय निकल जाता है। इन बिन्दुओं पर खुद कोर्ट को अपने ऊपर आचार संहिता लगा कर समस्याओं का निदान निकालना चाहिये।

एक और ज्वलंत वहस का मुद्दा बना हुआ है। कोलेजियम में सरकार का कोई भी मेम्बर न होने के कारण भी जजों की विश्वसनीयता पर लोग प्रश्न चिन्ह लगाते हैं। न्यायाधीशों की नियुक्ति करने वाले कोलेजियम का अध्यक्ष जब मुख्य न्यायधीश होता है और वरिष्ठ दो न्यायाधीश भी सदस्य होते हंै ऐसी स्थिति में अंतिम निर्णय उन्हीं का होना है। यदि एक सदस्य सरकार का मुख्य न्यायाधीश के अनुमोदन से ही नियुक्त हो जाये एैसे प्रस्ताव का स्वयं सुप्रीम कोर्ट स्वागत करे ऐसी स्थिति में जजों की नियुक्ति में और अधिक पारदर्शिता दिखाई देगी। जब सी.बी.आई. के डायरेक्टर तक की नियुक्ति में मुख्य न्यायाधीश की भूमिका महत्वपूर्ण है चुनी हुयी सरकार का एक सदस्य कोलेजियम में नियुक्त किये जाने से परहेज किया जाना अजीब लगता है। आखिर सर्वोच्च न्यायालय के भी एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश पर भ्रष्टता के गंभीर आरोप लगे हैं। कई हाईकोर्ट के जज भी भ्रष्ट पाये गये और गैर कानूनी गतिविधियों में लिप्त भी पाये गये हैं।

19

बढ़ती हुयी जन याचिकायें भी न्यायिक प्रक्रिया में बाधा बन रही है तमाम नामी गिरामी वकील इनमें ज्यादा उत्सुकता दिखा रहे हैं। सरकार के प्रत्येक कदम को रोकने के लिये विरोधी दल अब जन याचिकाओं का सहारा ले रहे है। इनकी संख्या कैसे कम की जाये इस पर विचार किया जाना आवश्यक है। दो तीन सुप्रीम कोर्ट के वकील तो उसके पूर्णकालीन विशेषज्ञ बनकर यही काम कर रहे हैं। फालतू का समय बर्बाद करने या किसी निर्णय को देर कराने की गंध जिस किसी भी याचिका में दिखाई दे उस पर लाखों रूपयों का जुर्माना किया जाना इस प्रवृत्ति को रोकने में मददगार साबित हो सकता है।

आज पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है कि जब एक बेंच ने अयोध्या मंदिर की सुनवायी के लिये समस्त पहलुओं पर विचार कर 29 अक्टूबर 2018 से लगातार सुनवायी का फैसला लिया था तो दूसरी समकक्ष बेंच में उस आदेश को न मानते हुये सुनवायी को अगली तारीख तक टाल दिया। आम तौर से समकक्ष बेंच अपनी ही समकक्ष दूसरी बेंच के फैसलों को नहीं बदलती है।

बड़ती हुयी प्रायोजित जन याचिकायें किसी अधिवक्ता को प्रेक्टिस करने वाली कोर्ट में ही जज की नियुक्ति, कोलेजियम को और अधिकपारदर्शी बनाया जाना, मैंसन केस पर तुरन्त सुनवायी और प्रशासनिक दक्षता कुछ ऐसे विषय हैं जिन पर सुप्रीम कोर्ट स्वयं विचार कर नये सुधार लागू कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के निर्णयों  पर किसी को कोई शक सुबह न कभी था न अभी है पर प्रशासनिक कार्य प्रणाली में सुधार की आवश्यकता स्पष्ट दिखाई दे रही है।

 

डॉ0 विजय खैरा

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.